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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २०६
अथ आतम अनुभव को अंग
॥२८॥
इन्दव छंद
है दिल मैं दिलदार सही,
आंखिया उलटो कर ताहि चितइये ।
आब मैं खाक मैं वाद मैं आतस,
सुन्दर जानि मैं जानि जनइये ॥
नूर मैं नूर है तेज मैं तेज है,
ज्योति मैं ज्योति मिलै मिल जइये ।
क्या कहिये कहतै न बनै कछु,
जौ कहिये कहतै हि लजइये ॥१॥
जासौ कहू सब मैं वह एक सौं,
तौ कहै कैसौ है आखि दिखइये ।
जौ कहू रूप न रेख तिसै कछु,
तौ सब झूठ के मानि कहइये ॥
जौ कहू सुन्दर नैननि माझि,
तौ नैनहू बैन गये पुनि कहइये ।
क्या कहिये कहते न बनै कछु,
जौ कहिये कहते ही लजइये ॥२॥
(१) दिलदार-प्रियतम, परमेश्वर । आब पानी ।
खाक-पृथ्वी । वाद-वायु । आतस-अग्नि, तेज ।