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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

२०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ ब्रह्म निष्कलांक को अंग
॥२७॥
एक कोऊ दाता गाय ब्राह्मन कौ देत दान,
एक कोऊ दयाहीन मारत निंशक है ।
एक कोऊ तपस्वी तपस्या मांहि सावधान,
एक कोऊ कामी क्रीडै कामिनी कै अंक है ॥
एक कोऊ रूपवंत अधिक बिराजमान,
एक कोऊ कोढी कोढ चूवत करक है ।
आरसी मैं प्रतिबिब सबही कौ देखियत,
सुन्दर कहत ऐसैं ब्रह्म निष्कलंक है ॥१॥
रवि कै प्रकाश ते प्रकाश होत नेत्रनि कौ,
सब कोऊ शुभाशुभ कर्म कौ करतु है ।
कोऊ यज्ञ दान जप तप यम नेम ब्रत,
कोऊ इद्रिय बसि कर ध्याँन कौ धरतु है ॥
(२) परदारा-पराई स्त्री ।