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सर्वकोश
सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary

श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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तब जम की त्रास कहहु किसु होइ ॥
जब अबिगत अगोचर प्रभ इेका ॥
तब चित्र गुपत किसु पूछत लेखा ॥
जब नाथ निरंजन अगोचर अगाधे ॥
तब कउन छुटे कउन बंधन बाधे ॥
आपन आप आप ही अचरजा ॥
नानक आपन रूप आप ही उपरजा ॥३॥
जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥
तह बिनु मैलु कहहु किआ धोता ॥
जह निरंजन निरंकार निरबान ॥
तह कउन कउ मान कउन अभिमान ॥
जह सरूप केवल जगदीस ॥
तह छल छिद्र लगत कहु कीस ॥
जह जोति सरूपी जोति संगि समावै ॥
तह किसहि भूख कवनु तृपतावै ॥
करन करावन करनैहारु ॥