सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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जाते हैं ।
५. सुदामा जब तीन दिनों तक निरन्तर चलते-चलते थककर सो जाते हैं,
तो भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें निद्रावस्था में ही गोमती के तट पर पहुँचा देते हैं ।
‘सुदामा-चरित’ में वर्णित इस घटना का भी ‘श्रीमद्भागवत’ में स्वतन्त्र रूप से
उल्लेख नहीं हुआ है ।
उपर्युक्त मौलिक उद्भावनाओं ने ‘सुदामा-चरित’ की कथावस्तु के महत्त्व
को बढ़ाया है । इस काव्य-रचना को इतना अधिक मर्मस्पर्शी बनाने में इन
मौलिक उद्भावनाओं का सहयोग स्तुत्य है ।
‘सुदामा-चरित’ में कथा-विकास की पाँच अवस्थाओं—आरम्भ, प्रयत्न,
प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम में से चार का निर्वाह बड़ी सफलता के
साथ हुआ है । ‘नियताप्ति’ की अवस्था, जहाँ पाठकों को ज्ञात हो जाता है कि
फल की प्राप्ति निश्चित है, उसे कविवर नरोत्तमदास ने छोड़ दिया है । उन्होंने
इस अवस्था को छोड़कर अपनी रचना में कौतूहल का संचार किया है । वे
प्राप्त्याशा के पश्चात् फलागम अवस्था का वर्णन करके पाठकों को चकित
कर देते हैं । उससे भी काव्य-सौन्दर्य में वृद्धि हुई है और रचना का महत्त्व
बढ़ा है ।
‘सुदामा-चरित’ की कथावस्तु पूर्णतः सुगठित, रोचक, मार्मिक, प्रवाह-
मयी तथा मौलिक उद्भावनाओं से युक्त है । वह मूल संवेद्य के सर्वथा अनु-
रूप है ।
सुदामा-चरित की पात्र-योजना
‘सुदामा-चरित’ की पात्र-योजना अत्यन्त व्यवस्थित, स्वाभाविक तथा
सार्थक है । कविवर नरोत्तमदास ने अपने इस खण्ड-काव्य में मुख्य रूप से तीन
पात्रों की योजना की है । वे मुख्य पात्र हैं—सुदामा, सुबुद्धि और श्रीकृष्ण । इन
पात्रों के चरित्र-चित्रण में नरोत्तमदास का कवि-कौशल द्रष्टव्य है । वे मानव-
मनोविज्ञान के पारखी हैं, उन्होंने मानवीय दुर्बलताओं को निकटता से देखा और
दिखाया है । वे अपने पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व को कलात्मक वाणी देने में अत्यन्त सफल