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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

सोलहवाँ अध्याय ८३७
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
§ § त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
§ § यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥
लिये यज्ञ किया करते हैं । (१८) अहंकारसे, बलसे, दर्पसे, कामसे और क्रोधसे फूल-
कर, अपनी और पराई देहमें वर्तमान मेरा (परमेश्वरका) द्वेष करनेवाले, (और)
निंदक, (१९) अशुभ कर्म करनेवाले (इन) द्वेषी और क्रूर अधम नरोंको मैं
(इस) संसारकी आसुरी अर्थात् पाप-योनियोंमेंही सदैव पटकता रहता हूँ ।
(२०) हे कौंतेय ! (इस प्रकार) जन्म-जन्ममें आसुरी योनिकोही पाकर, ये
मूर्ख लोग मुझे बिना पायेही अंतमें अत्यंत अधोगतिको जा पहुँचते हैं ।
| [आसुरी लोगोंका और उनको मिलनेवाली गतियोंका वर्णन हो चुका ।
| अब बतलाते हैं, कि इससे छुटकारा कैसे पावे ।-]
(२१) काम, क्रोध और लोभ, ये तीन प्रकारके नरकके द्वार हैं, और ये
हमारा नाशकर डालते हैं; इसलिये इन तीनोंका त्याग करना चाहिये । (२२) हे
कौंतेय ! इन तीन तमोद्वारोंसे छूटकर, मनुष्य वही आचरण करने लगता है, जिसमें
उसका कल्याण हो; और फिर उत्तम गति पा जाता है ।
| [प्रकट है, कि नरकके तीनो दरवाजे छूट जानेपर मद्गति मिलनीही
| चाहिये; किंतु यह नहीं बतलाया, कि कौन-सा आचरण करनेसे वे छूट जाते
| हैं । अतः अब उसका मार्ग बतलाते हैं ।-]
(२३) जो शास्त्रोक्त विधि छोड़कर मनमाना बर्ताव करने लगता है, उसे
न सिद्धि मिलती है, न सुख मिलता है और न उत्तम गतिभी मिलती है ।

८३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
(२४) इसलिये कार्य-अकार्यव्यवस्थितिका अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय
करनेके लिये तुझे शास्त्रोंको प्रमाण मानना चाहिये; और शास्त्रोंमें जो कुछ कहा
है, उसको समझकर, तदनुसार इस लोकमें कर्म करना तुझे उचित है ।
| [ इस श्लोकके 'कार्याकार्यव्यवस्थिति' पदसे स्पष्ट होता है, कि कर्तव्य-
| शास्त्रकी अर्थात् नीतिशास्त्रकी कल्पनाको दृष्टिके आगे रख कर गीताका उपदेश
| किया गया है। गीतारहस्यमें (प्र. २, पृ. ४८-५१) स्पष्टकर दिखला दिया है,
| कि इसीको कर्मयोगशास्त्र कहते हैं । ]
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म-
विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें,
दैवासुरसम्पद्विभागयोग नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

सत्रहवाँ अध्याय ८३९
सप्तदशोऽध्यायः ।
अर्जुन उवाच ।
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
सत्रहवाँ अध्याय
[ यहाँतक इस बातका वर्णन हुआ, कि कर्मयोगशास्त्रके अनुसार संसारका
धारण-पोषण करनेवाले पुरुष किस प्रकारके होते हैं ? और इसके विपरीत, संसारका
नाश करनेवाले मनुष्य किस ढंगके होते हैं ? अब यह प्रश्न सहजही होता है, कि
मनुष्य-मनुष्यमें इस प्रकारके भेद होते क्यों हैं ? इस प्रश्नका साधारण उत्तर
सातवेंही अध्यायके “ प्रकृत्या नियताः स्वया ” – अपना अपना प्रकृति-स्वभावपदोंमें
दिया गया है ( गीता ७. २० ) । परन्तु वहाँ सत्त्व, रज और तम, गुणोंका विवेचन
नहीं किया गया था, अतएव वहाँ इस प्रकृतिजन्य भेदकी उपपत्तिका विस्तारपूर्वक
वर्णनभी न हो सका । यही कारण है जो चौदहवें अध्यायमें त्रिगुणोंका विवेचन
किया गया है, और अब इस अध्यायमें वर्णन किया गया है, कि त्रिगुणोंसेही उत्पन्न
होनेवाली श्रद्धा आदिकेभी स्वभावभेद क्योंकर होते हैं और फिर इसी अध्यायमें
ज्ञान-विज्ञानका संपूर्ण निरूपण समाप्त किया गया है, इसी प्रकार नवें अध्यायके
भक्ति-मार्गके अनेक भेदोंका कारणभी इस अध्यायकी उपपत्तिसे समझमें आ जाता
है ( गीता ९. २३, २४ ) । पहले अर्जुन यों पूछता है, कि :- ]
अर्जुनने कहा :- (१) हे कृष्ण ! जो लोग, श्रद्धासे युक्त होकरभी, शास्त्र-
निर्दिष्ट विधिको छोड़करके यजन करते हैं, उनकी निष्ठा अर्थात् ( मनकी )
स्थिति कैसी है – सात्त्विक है, या राजस है, या तामस ?
। [ पिछले अध्यायके अंतमें जो यह कहा था, कि शास्त्रकी विधिका अथवा
। नियमोंका पालन अवश्य करना चाहिये; उसीपर अर्जुनने यह शंका की है ।
। शास्त्रोंपर श्रद्धा रखते हुएभी मनुष्य अज्ञानसे भूल कर बैठता है । उदाहरणार्थ,
। शास्त्रविधि यह है, कि सर्वव्यापी परमेश्वरका भजन-पूजन करना चाहिये;
। परंतु वह इसे छोड़कर देवताओंकीही धुनमें लग जाता है ( गीता ९.२३ ) ।
। अतः अर्जुनका प्रश्न है, कि ऐसे पुरुषकी निष्ठा अर्थात् अवस्था अथवा स्थिति
। कौनसी समझी जावे । यह प्रश्न उन आसुरी लोगोंके विषयमें नहीं है, कि जो
। शास्त्रका और धर्मका अश्रद्धापूर्वक तिरस्कार किया करते हैं । तोभी इस अध्यायमें
। प्रसंगानुसार उनके कर्मोंके फलोंकाभी वर्णन किया गया है । ]

८४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
श्रीभगवानुवाच ।
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
श्रीभगवानने कहा :- (२) प्राणिमात्रकी यह श्रद्धा स्वभावतः तीन प्रकारकी
होती है; सात्त्विक, राजस और तामस । उनका वर्णन सुन । (३) हे भारत ! सब
लोगोंकी श्रद्धा अपने अपने सत्त्वके अनुसार अर्थात् प्रकृतिस्वभावके अनुसार होती
है । मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा ( रहती ) है, वैसाही वह होता है ।
[ दूसरे श्लोकके 'सत्त्व' शब्दका अर्थ देहस्वभाव, बुद्धि अथवा अंतः-
करण है । कठोपनिषद्में 'सत्त्व' शब्द इसी अर्थमें आया है ( कठ. ६. ७), और
वेदान्त-सूत्रके शांकरभाष्यमेंभी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' पदके स्थानमें 'सत्त्व-क्षेत्रज्ञ' पदका
उपयोग किया गया है (वे. सू. शां. भा. १. २. १२ ) । तात्पर्य यह है, कि दूसरे
श्लोकका 'स्वभाव' शब्द और तीसरे श्लोकका 'सत्त्व' शब्द दोनों यहाँ, समानार्थक
हैं । क्योंकि सांख्य और वेदान्त इन दोनोंकोभी यह सिद्धान्त मान्य है, कि
स्वभावका अर्थ प्रकृति है और इस प्रकृतिसे बुद्धि एवं अंतःकरण उत्पन्न होते हैं।
“यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - यह तत्त्व “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंको
पाते हैं” प्रभृति पूर्व-वर्णित सिद्धान्तोंकाही साधारण अनुवाद है (गीता ७. २०-
२३ ; ९. २५ ), और इस विषयका विवेचन हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें
किया है (गीतार. पृ. ४२३-४२९ ) । तथापि जब यह कहा, कि जिसकी
जैसी बुद्धि हो, उसे वैसा फल मिलता है, और इस बुद्धिका होना या न होना
प्रकृति-स्वभावके अधीन है; तब प्रश्न होता है, कि फिर इस बुद्धि क्योंकर सुधर
सकती है ? इसका यह उत्तर है, कि आत्मा स्वतंत्र है, अतः देहका यह स्वभाव
क्रमशः अभ्यास और वैराग्यके द्वारा धीरे धीरे बदला जा सकता है। इस बातका
विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें किया गया है (पृ. २८०-२८१ ) ।
अभी तो यही देखना है, कि श्रद्धाके भेद क्यों और कैसे होते हैं ? इसीसे कहा गया
है, कि प्रकृति-स्वभावानुसार श्रद्धा बदलती है । अब बतलाते हैं, कि जब प्रकृतिभी
सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे युक्त है, तब प्रत्येक मनुष्यमें श्रद्धाकेभी
त्रिधा भेद किस प्रकार उत्पन्न होते हैं, और उनके परिणाम क्या होते हैं :- ]
(४) जो पुरुष सात्त्विक हैं, अर्थात् जिनका स्वभाव सत्त्वगुण-प्रधान है, वे देवताओंका

सत्रहवाँ अध्याय ८४१
§ § अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
यजन करते हैं; राजस पुरुष यक्षों और राक्षसोंका यजन करते हैं, एवं इनके
अतिरिक्त जो तामस पुरुष हैं, वें प्रेतों और भूतोंका यजन करते हैं।
। [ इस प्रकार शास्त्रपर श्रद्धा रखनेवाले मनुष्योंकेभी सत्त्व आदि प्रकृतिके
। गुण-भेदोंसे जो तीन भेद होते हैं, उनका और उनके स्वरूपोंका वर्णन हुआ।
। अब बतलाते हैं, कि शास्त्रपर श्रद्धा न रखनेवाले कामपरायण और दांभिक
। लोग किस श्रेणीमें आते हैं। यह तो स्पष्ट है, कि ये लोग सात्त्विक नहीं हैं; परंतु
। ये निरे तामसभी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि यद्यपि इनके कर्म शास्त्रविरुद्ध
। होते हैं, तथापि इनमें कर्म करनेकी प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्ति रजोगुणका धर्म
। है। तात्पर्य यह है, कि ऐसे मनुष्योंको न सात्त्विक कह सकते हैं, न राजस और
। न तामसभी। अतएव, दैवी और आसुरी नामक दो भिन्नही श्रेणियाँ बनाकर उक्त
। दुष्ट पुरुषोंका आसुरी श्रेणीमें समावेश किया जाता है। यही अर्थ अगले दो
। श्लोकोंमें स्पष्ट किया गया है।]
(५) (परंतु) जो लोग दंभ और अहंकारसे युक्त होकर, काम एवं आसक्तिके
बलपर, शास्त्रके विरुद्ध घोर तप किया करते हैं, (६) तथा जो न केवल शरीरके
पंचमहाभूतादिकोंके समूहकोही, वरन् शरीरके अन्तर्गत रहनेवाले मुझकोभी कष्ट
देते हैं, उन्हें अविवेकी आसुरी बुद्धिके जान ।
। [ इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नोंके उत्तर हुए। इन श्लोकोंका भावार्थ यह
। है, कि मनुष्यकी श्रद्धा उसके प्रकृतिस्वभावानुसार सात्त्विक, राजस अथवा तामस
। हो सकती है; और उसके अनुसार उसके कर्मोंमें अन्तर होता है, तथा अपने कर्मोंके
। अनुरूपही उसे पृथक् पृथक् गति प्राप्त होगी। परंतु केवल इतनेसेही कोई आसुरी
। श्रेणीमें नहीं गिना जाता । आत्माकी स्वाधीनताका उपयोगकर और शास्त्रा-
। नुसार आचरण करके प्रकृति-स्वभावको धीरे धीरे सुधारते जाना प्रत्येक
। मनुष्यका कर्तव्य है। हाँ, जो ऐसा नहीं करते और दुष्ट प्रकृति-स्वभावकाही
। अभिमान रखकर शास्त्रके विरुद्ध आचरण करते हैं, उन्हें आसुरी बुद्धिके कहना
। चाहिये। अब यह वर्णन करते हैं, कि श्रद्धाके समानही आहार, यज्ञ, तप और
। दानके सत्त्व, रज, तममय प्रकृतिके गुणोंसे भिन्न-भिन्न भेद कैसे हो जाते हैं, एवं
। इन भेदोंसे स्वभावकी विचित्रताके साथ-ही-साथ क्रियाकी विचित्रताभी कैसे
। उत्पन्न होती है :- ]

८४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
§ § अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
(७) प्रत्येककी रुचिका आहारभी तीन प्रकारका होता है। और यही
अवस्था यज्ञ, तप एवं दानकीभी है। सुन, उनका भेद बतलाता हूँ। (८) आयु,
सात्त्विक वृत्ति, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिकी वृद्धि करनेवाले, रसीले, स्निग्ध,
शरीरमें भिदकर चिरकालतक रहनेवाले और मनको आनंददायक आहार सात्त्विक
मनुष्यको प्रिय होते हैं। (९) कटु अर्थात् चरपरे, खट्टे, खारे, अत्युष्ण, तीखे, रूखे,
दाहकारक तथा दुःख, शोक और रोग उपजानेवाले आहार राजस मनुष्यको प्रिय
होते हैं।
| [ संस्कृतमें कटु शब्दका अर्थ चरपरा और तिक्तका अर्थ कडुआ होता
| है। इसीके अनुसार संस्कृतके वैद्यक ग्रंथोंमें काली मिर्च कटु तथा नींब तिक्त
| कही गई है (वाग्भट-सूत्र, अ. १०) हिंदीके कडुआ और तीखा शब्द क्रमानुसार
| कटु और तिक्त शब्दोंकेही अपभ्रंश हैं ।]
(१०) कुछ काल रखा हुआ अर्थात् ठंडा, नीरस, दुर्गंधित, बासा, जूठा तथा अपवित्र
भोजन तामस पुरुषको रुचता है।
| [ सात्त्विक मनुष्यको सात्त्विक, राजसको राजस तथा तामसको तामस
| भोजन प्रिय होता है, इतनाही नहीं, यदि आहार शुद्ध अर्थात् सात्त्विक हो, तो
| मनुष्यकी वृत्तिभी क्रम-क्रमसे शुद्ध या सात्त्विक हो सकती है। उपनिषदोंमें कहा
| है, कि "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" (छां. ७. २६. २)। क्योंकि मन और
| बुद्धि प्रकृतिके विकार हैं, इसलिये जहाँ सात्त्विक आहार हुआ, वहाँ बुद्धिभी
| आप-ही-आप सात्त्विक बन जाती है। ये आहारके भेद हुए। इसी प्रकार अब
| यज्ञके तीन भेदोंकाभी वर्णन करते हैं :-]
(११) फलाशाकी आकांक्षा छोड़कर, अपना कर्तव्य समझ करके शास्त्रकी

सत्रहवाँ अध्याय ८४३
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
§ § देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
विधिके अनुसार, शांत चित्तसे जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।
(१२) परंतु हे भरतश्रेष्ठ ! उसको राजस यज्ञ समझ, कि जो फलकी इच्छासे अथवा
दंभके हेतु अर्थात् ऐश्वर्य दिखलानेके लियेभी किया जाता है। (१३) शास्त्र-
विधिरहित, अन्नदानविहीन, बिना मंत्रोंका, बिना दक्षिणाका और श्रद्धासे शून्य
यज्ञ तामस यज्ञ कहलाता है।
| [ आहार और यज्ञके समान तपकेभी तीन भेद हैं। पहले, तपके कायिक,
| वाचिक और मानसिक, ये भेद किये हैं; फिर इन तीनोंमेंसे प्रत्येककी सत्त्व, रज
| और तम गुणोंमे जो विविधता होती है, उसका वर्णन किया है। यहाँपर, तप
| शब्दसे यह संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि जंगलमें जाकर पातंजलयोगके
| अनुसार शरीरको कष्ट दिया करें; किंतु मनुका किया हुआ 'तप' शब्दका यह
| व्यापक अर्थही गीताके निम्नलिखित श्लोकोंमे अभिप्रेत है, कि यज्ञायाग आदि
| कर्म, वेदाध्ययन, अथवा चातुर्वर्ण्यके अनुसार जिसका जो कर्तव्य हो – जैसे
| क्षत्रियका कर्तव्य युद्ध करना है और वैश्यका व्यापार इत्यादि – वह सब उसका
| तपही है ( मनु. ११. २६३ )।
(१४) देवता, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानोंकी पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य
और अहिंसाको शरीर अर्थात् कायिक तप कहते हैं। (१५) (मनको) उद्विग्न न
करनेवाले, सत्य, प्रिय और हितकारक संभाषणको, तथा स्वाध्याय अर्थात् अपने
कर्मके अभ्यासको, वाङ्मय (वाचिक) तप कहते हैं। (१६) मनको प्रसन्न रखना,
सौम्यता, मौन अर्थात् मुनियोंके समान वृत्ति रखना, मनोनिग्रह और शुद्ध भावना –
इनको मानस तप कहते हैं।

८४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
§ § दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
[ जान पड़ता है, कि पंद्रहवें श्लोकके सत्य, प्रिय और हित, तीनों शब्द
मनुके इस वचनको लक्ष्यकर कहे गये हैं :- “ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्
सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥” (मनु. ४. १३८) -
यह सनातन धर्म है, कि सच और मधुर बोलना चाहिये; परंतु अप्रिय सच न
बोलना चाहिये । तथापि महाभारतमेंही विदुरने दुर्योधनसे कहा है, कि
“ अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ” (मभा. सभा. ६३. १७) ।
अब फिर कायिक, वाचिक और मानसिक तपोंके जो भेद होते हैं, वे यों हैं :- ]
(१७) इन तीनों प्रकारके तपोंको यदि मनुष्य फलकी आकांक्षा न रखकर
उत्तम श्रद्धासे तथा योगयुक्त बुद्धिसे करे, तो वे सात्त्विक कहलाते हैं; (१८) और
जो तप अपने सत्कार, मान या पूजाके लिये, अथवा दंभसे, किया जाता है, वह चंचल
और अस्थिर तप शास्त्रोंमें राजस कहा जाता है । (१९) मूढ़ आग्रहसे, स्वयं कष्ट
उठाकर, अथवा (जारण-मारण आदि कर्मोंके द्वारा) दूसरोंको सतानेके हेतुसे
किया हुआ तप तामस कहलाता है ।
[ये तपके भेद हुए; अब दानके विविध भेद बतलाते हैं :- ]
(२०) वह दान सात्त्विक कहलाता है, कि जो कर्तव्य-बुद्धिसे किया जाता
है, जो (योग्य) स्थल, काल और पात्रका विचार करके किया जाता है, एवं जो अपने
ऊपर प्रत्युपकार न करनेवालेको दिया जाता है। (२१) परन्तु (किये हुए)
उपकारके बदलेमें, अथवा किसी फलकी आशा रख, बड़ी कठिनाईसे आगे, जो दान
दिया जाता है, वह राजस दान है। (२२) अयोग्य स्थानमें, अयोग्य कालमें,

सत्रहवाँ अध्याय ८४५
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
अपात्र मनुष्यको, बिना सत्कारके, अथवा अवहेलनापूर्वक, जो दान दिया जाता
है, वह तामस दान कहलाता है।
[ आहार, यज्ञ, तप और दानके समानही ज्ञान, कर्म, कर्त्ता, बुद्धि, धृति
और सुखकी विविधताका वर्णन अगले अध्यायमे किया गया है ( गीता १८.
२०-३९) इस अध्यायका गुणभेद-प्रकरण यहीं समाप्त हो चुका । अब ब्रह्म-
निर्देशके आधारपर उक्त सात्त्विक कर्मकी श्रेष्ठता और संग्राह्यता सिद्ध की
जावेगी। क्योंकि, उपर्युक्त संपूर्ण विवेचनपर सामान्यतः यह शंका हो सकती
है, कि कर्म सात्त्विक हो, या राजस, या तामस, कैसाभी क्यों न हो ? है तो वह
दुःखकारक और दोषमय ही; इस कारण इन सारे कर्मोंका त्याग किये बिना
ब्रह्मप्राप्ति नहीं हो सकती; और यदि यह बात सत्य है, तो फिर कर्मके सात्त्विक,
राजस आदि भेद करनेसे लाभही क्या है? इन आक्षेपपर गीताका यह उत्तर
है, कि कर्मके सात्त्विक, राजस और तामस भेद परब्रह्मसे अलग नहीं हैं। जिस
संकल्पमें ब्रह्मका निर्देश किया गया है, उसीमें सात्त्विक कर्मोंका और सत्कर्मोंका
समावेश होता है, और इससे निर्विवाद सिद्ध है, कि ये कर्म अध्यात्म-दृष्टिसेभी
त्याज्य नहीं है (गीतार. प्र. ९, पृ. २६६-२४७) । परब्रह्मके स्वरूपका
मनुष्यको जो कुछ ज्ञान हुआ है, वह सब 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दोंके निर्देशमें
ग्रथित है। इनमेंसे ॐ अक्षर-ब्रह्म है, और उपनिषदोंमे उसका भिन्न-भिन्न अर्थ
किया गया है ( प्रश्न ५; कठ. १५-१७; तै. १. ८; छां. १. १; मैत्र्यु. ६.
३, ८; मांडूक्य १-१२ ) । और जब यह वर्णाक्षररूपी ब्रह्मही जगतके आरंभमें
था, तब सब क्रियाओका आरंभ वहींसे होता है। 'तत् = वह' शब्दका अर्थ है
सामान्य कर्मसे परेका कर्म, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे फलाशा छोड़कर किया
हुआ सात्त्विक कर्म; और 'सत्'का अर्थ वह कर्म है, कि जो यद्यपि फलाशामहित
हो, तोभी शास्त्रानुसार किया गया हो और शुद्ध हो - यही उक्त संकल्पका अर्थ
है; और इस अर्थके अनुसार निष्काम बुद्धिसे किये हुए सात्त्विक कर्मकाही नहीं,
वरन् शास्त्रानुसार किये हुए सत् कर्मकाभी परब्रह्मके सामान्य और सर्वमान्य
संकल्पमें समावेश होता है; अतएव इन कर्मोंको त्याज्य कहना अनुचित है। अंतमें
'तत्' और 'सत्' कर्मोंके अतिरिक्त 'असत्' अर्थात् बुरा कर्म बच जाता है। परंतु
अंतिम श्लोकमें सूचित किया है, कि वह दोनों लोकोंमें गर्ह्य माना गया है, इस
कारण उस कर्मका इस संकल्पमें समावेश नहीं होता । भगवान् कहते हैं कि :- ]
(२३) (शास्त्रमें) परब्रह्मका निर्देश 'ॐ तत्सत्' यों तीन प्रकारसे किया
जाता है। इसी निर्देशसे पूर्वकालमें ब्राह्मण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।

८४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
[ पहलेही कह चुके हैं, कि संपूर्ण सृष्टिके आरंभमें ब्रह्मदेवरूपी पहला
ब्राह्मण, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए हैं ( गीता ३. १० )। परंतु ये सब जिस
परब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, उस परब्रह्मका स्वरूप 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दोंमें
है। अतएव इस श्लोकका यह भावार्थ है, कि 'ॐ तत्सत्' संकल्पही सार्ग
सृष्टिका मूल है। अब इस संकल्पके तीनों पदोंका कर्मयोगकी दृष्टिसे पृथक्
निरूपण करते हैं :- ]
(२४) तस्मात् अर्थात् जगतका आरंभ इस संकल्पसे हुआ है, इस कारण,
ब्रह्मवादी लोगोंके यज्ञ, दान, तप तथा अन्य शास्त्रोक्त कर्म सदा इस ॐ के उच्चारके
साथ हुआ करते हैं ( २५ ) 'तत्' शब्दके उच्चारणसे फलकी आशा न रखकर,
मोक्षार्थी लोग यज्ञ, दान, तप आदि अनेक प्रकारकी क्रियाएँ किया करते हैं।
( २६ ) अस्तित्व और साधुता अर्थात् भलाईके अर्थमें 'सत्' शब्दका उपयोग
किया जाता है; और हे पार्थ ! इसी प्रकार प्रशस्त अर्थात् अच्छे कर्मोंके लियेभी
'तत्' शब्द प्रयुक्त होता है। ( २७ ) यज्ञ, तप और दानमें स्थिति अर्थात् स्थिर
भावना रखनेकोभी 'सत्' कहते हैं; तथा इनके निमित्त जो कर्म करना हो, उस
कर्मका नामभी 'सत्' ही है।
[ यज्ञ, तप और दान मुख्य धार्मिक कर्म हैं; तथा इनके निमित्त जो
कर्म किया जाता है, उसीको मीमांसक लोग सामान्यतः यथार्थ कर्म कहते हैं।
इन कर्मोंको करते समय यदि फलकी आशा हो, तोभी वह धर्मके अनुकूल रहती
है, इस कारण ये कर्म 'सत्' की श्रेणीमें गिने जाते हैं और सब निष्काम कर्म
'तत् = वह अर्थात् परेका' की श्रेणीमें लेखे जाते हैं। प्रत्येक कर्मके आरंभमें जो
यह 'ॐ तत्सत्' ब्रह्मसंकल्प कहा जाता है, उसमें इस प्रकारसे इन दोनों कर्मोंका
समावेश होता है, इसलिये इन दोनों कर्मोंको ब्रह्मानुकूलही समझना चाहिये।
( गीतार. प्र. ९, पृ. २५० ) । अब असत् कर्म विषयमें कहते हैं :- ]

सत्रहवाँ अध्याय ८४७
§ § अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।।
( २८ ) अश्रद्धासे जो हवन किया हो, ( दान ) दिया हो, तप किया हो या
जो कुछ (कर्म) किया हो, वह 'असत्' कहा जाता है। हे पार्थ ! वह (कर्म)
न मरनेपर (परलोकमें) और न इस लोकमें हितकारी होता है।
[ तात्पर्य यह है, कि ब्रह्मस्वरूपके बोधक इस सर्वमान्य संकल्पमेंही
निष्काम बुद्धिसे, अथवा केवल कर्तव्य समझकर, किये हुए सात्त्विक कर्मका, और
शास्त्रानुसार सद्बुद्धिसे किये हुए प्रशस्त कर्म अथवा सत्कर्मका समावेश होता
है। अन्य सब कर्म वृथा हैं। इससे सिद्ध होता है, कि उस कर्मको छोड़ देनेका
उपदेश करना उचित नहीं है, कि जिस कर्मका ब्रह्मनिर्देशमेंही समावेश होता है,
और जो कर्म ब्रह्मदेवके साथही उत्पन्न हुआ है (गीता ३. १०), तथा जो
किसीसेभी छूट नहीं सका है। 'ॐ तत्सत्' रूपी ब्रह्मनिर्देशके उक्त कर्मयोग-
प्रधान अर्थको इसी अध्यायमें कर्मविभागके साथही बतलानेका हेतुभी यही है।
क्योंकि केवल ब्रह्मस्वरूपका वर्णन तो पीछे तेरहवें अध्यायमें और उसके
पहलेभी हो चुका है। गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें (पृ. २५०)
बतला चुके हैं, कि "ॐ तत्सत् पदका असली अर्थ क्या होना चाहिये" आजकल
'सच्चिदानन्द' पदसे ब्रह्मनिर्देश करनेकी प्रथा हे। परंतु उसको स्वीकार न करके
यहाँ जब इस 'ॐ तत्सत्' ब्रह्मनिर्देशकाही उपयोग किया गया है, तब इससे यह
अनुमान निकल सकता है, कि 'सच्चिदानन्द' पदरूपी ब्रह्मनिर्देश गीता-ग्रंथके
निर्मित हो चुकनेपर साधारण ब्रह्मनिर्देशके रूपसे प्रायः प्रचलित हुआ होगा । ]
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म-
विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें,
श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

८४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अठारहवाँ अध्याय।
[ अठारहवाँ अध्याय पूरे गीता-शास्त्रका उपसंहार है। अतः अबतक जो
विवेचन हुआ है, उसका हम यहाँ संक्षेपमें सिंहावलोकन करते हैं ( अधिक
विस्तार गीतारहस्यके १४ वें प्रकरणमें देखिये ) पहले अध्यायमे स्पष्ट होता है,
कि स्वधर्मके अनुसार प्राप्त युद्धको छोड़, भीख मांगनेपर उतारू होनेवाले अर्जुनको
अपने कर्तव्यमें प्रवृत्त करनेकेलिये गीताका उपदेश किया गया है। अर्जुनकी शंका
थी, कि गुरुहत्या आदि सदोष कर्म करनेसे आत्मकल्याण कभी न होगा। अतएव
आत्मज्ञानी पुरुषोंके स्वीकृत, आयु बितानेके दो प्रकारके मार्गोंका — सांख्य
( संन्यास ) मार्गका और कर्मयोग ( योग ) मार्गका — वर्णन दूसरे अध्यायके
आरंभमेंही किया गया है; और अंतमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि यद्यपि ये
दोनों मार्ग मोक्ष देते हैं, तथापि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेयस्कर है ( गीता
५. २ )। फिर तीसरे अध्यायसे लेकर पाँचवें अध्यायतक इन युक्तियोंका वर्णन है,
कि कर्मयोगमें बुद्धि श्रेष्ठ समझी जाती है; बुद्धिके स्थिर और सम होनेसे कर्मकी
बाधा नहीं होती; कर्म किसीकेभी नहीं छूटते; तथा उन्हें छोड़ देनाभी उचित नहीं;
केवल फलाशाको त्याग देनाही काफी है; अपनेलिये न सही, लोकसंग्रहके हेतु कर्म
करना आवश्यक है; बुद्धि अच्छी हो, तो ज्ञान और कर्मके बीच विरोध नहीं
होता; तथा पूर्वपरंपरा देखी जाय तो ज्ञात होगा, कि जनक आदिने इसी मार्गका
आचरण किया है। अनन्तर इस बातका विवेचन किया है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके
लिये बुद्धिकी जिस समताकी आवश्यकता होती है, उसे कैसे प्राप्त करना चाहिये,
और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए अंतमें उसीके द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त होता
है। बुद्धिकी इस समताको प्राप्त करनेके लिये इंद्रियोंका निग्रह करके पूर्णतया यह
जान लेना आवश्यक है, कि सब प्राणियोंमें एक परमेश्वरही भरा हुआ है, इसके
अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है। अतः इंद्रिय-निग्रहका विवेचन छठे अध्यायमें किया
गया है और फिर सातवें अध्यायमे सत्रहवें अध्यायतक बतलाया है, कि कर्मयोगका
आचरण करते हुएही परमेश्वरका ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, और वह ज्ञान क्या है।
सातवें और आठवें अध्यायमें क्षर-अक्षर अथवा व्यक्त-अव्यक्तके ज्ञान-विज्ञानका
विवरण किया गया है। नवें अध्यायसे बारहवें अध्यायतक इस अभिप्रायका वर्णन
किया गया है, कि यद्यपि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूप श्रेष्ठ
है, तोभी इस बुद्धिको न डिगने दें, कि परमेश्वर एकही है, और व्यक्त स्वरूपकीही
उपासना प्रत्यक्ष ज्ञान देनेवाली अतएव सबके लिये सुलभ है। अनन्तर तेरहवें
अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह विचार किया गया है, कि क्षर-अक्षरके विचारमे
जिसे अव्यक्त कहते हैं, वही मनुष्यके शरीरका आत्मा है। इसके पश्चात् चौदहवें

अठारहवाँ अध्याय ८४९
अष्टादशोऽध्यायः ।
अर्जुन उवाच ।
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्यायतक, चार अध्यायोंमें क्षर-अक्षर विज्ञानके अंतर्गत
इस विषयका विस्तारसहित विचार किया गया है, कि प्रकृतिके गुणोंके कारण एकही
अव्यक्तसे जगतके विविध स्वभावोंके मनुष्य कैसे उपजते हैं, अथवा और अनेक
प्रकारका विस्तार कैसे होता है, एवं ज्ञान-विज्ञानका निरूपण समाप्त किया गया है।
तथापि स्थान-स्थानपर अर्जुनको यही उपदेश है, कि तू कर्म कर; और यह सिद्धान्त
किया गया है, कि शुद्ध अंतःकरणसे परमेश्वरकी भक्ति करके “ परमेश्वरार्पणपूर्वक
स्वधर्मके अनुसार केवल कर्तव्य समझकर मरणपर्यंत सब कर्म करते रह यही ” कर्म-
योग-प्रधान आयु बितानेका मार्ग सबसे उत्तम है, जिसमें इस प्रकार ज्ञानमूलक और
भक्ति-प्रधान कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन कर चुकनेपर, अठारहवें अध्यायमें उसी
धर्मका उपसंहार करके अर्जुनको स्वेच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त किया है। गीताके
इस मार्गमें, कि जो गीतामें सर्वोत्तम कहा गया है, अर्जुनसे यह नहीं कहा गया,
कि “ तू चतुर्थ आश्रमको स्वीकार करके संन्यासी हो जा । ” हाँ, यह अवश्य कहा
है, कि इस मार्गके आचरण करनेवाला मनुष्य ‘नित्यसंन्यासी’ है ( गीता ५. ३ ) ।
अतएव अब अर्जुनका प्रश्न है, कि चतुर्थ आश्रमरूपी संन्यास लेकर किसी समय सब
कर्मोंको सचमुचही त्याग देनेका तत्त्व इस कर्मयोग-मार्गमें है या नहीं, और नहीं है
तो ‘संन्यास’, एवं ‘त्याग’ दोनों शब्दोंका अर्थ क्या है ? गीता प्र. ११, पृ. ३४८-
३५१ देखो । ]
अर्जुनने कहा :— ( १ ) हे महाबाहु, हृषीकेश ! मैं संन्यासका तत्त्व, और हे
केशिदैत्य-निषूदन ! त्यागका तत्त्व पृथक् पृथक् जानना चाहता हूँ ।
[ संन्यास और त्याग शब्दोंके केवल उन अर्थों अथवा भेदोंको जाननेके लिये
| यह प्रश्न नहीं किया गया है, कि जो कोशकारोंने किये हैं। यह न समझन
| चाहिये, कि अर्जुन यहभी न जानता था, कि दोनोंकाभी धात्वर्थ ‘छोड़ना’ है।
| परंतु बात यह है, कि भगवान् कर्म छोड़ देनेकी आज्ञा कहींभी नहीं देते; बल्कि
| चौथे, पाँचवें अथवा छठे अध्यायमें ( गीता ४. ४१ ; ५. १३ ; ६. १ ) या अन्यत्र
| जहाँ कही संन्यासका वर्णन है, वहाँ उन्होंने यही कहा है, कि केवल फलाशाका
| ‘त्याग’ करके ( गीता १२. ११ ) परमेश्वरमें सब कर्मोंका ‘संन्यास’ करो
| अर्थात् सब कर्म परमेश्वरको समर्पण करो ( गीता ३. ३० ; १२. ६ ) ; और
गी. र. ५४

८५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
उपनिषदोंमें देखें, तो कर्मत्याग-प्रधान संन्यास-धर्मके वचन पाये जाते हैं, कि
“न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” (कै. १. २. नारायण
१२. ३ ), सब कर्मोंका स्वरूपतः 'त्याग' करनेसेही कई एकोने मोक्ष प्राप्त
किया है, अथवा “वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्ध
सत्त्वाः” (मुंडक ३. २. ६) कर्मत्यागरूपी 'संन्यास' योगसे शुद्ध होनेवाले
'यति', या “किं प्रजया करिष्यामः” (बृ. ४. ४. २२) हमें पुत्रपौत्र आदि
प्रजासे क्या काम है? अतएव अर्जुनने समझा, कि भगवान् स्मृति-ग्रंथोंमें
प्रतिपादित चार आश्रमोंमेसे कर्मत्यागरूपी संन्यास आश्रमके लिये 'त्याग' और
'संन्यास' शब्दोंका उपयोग नहीं करते, किंतु वे और किसी अर्थमें उन शब्दोंका
उपयोग करते हैं, इसीसे अर्जुनने चाहा, कि उस अर्थका स्पष्टीकरण हो जाय ।
इसी हेतुसे उसने उक्त प्रश्न किया है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण
(पृ. ३४८-३५१ में इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।
श्रीभगवानने कहा :- (२) (जितने) काम्य कर्म हैं, उनके न्यास अर्थात्
छोड़नेको ज्ञानी लोग संन्यास समझते हैं; (तथा) समस्त कर्मोंके फलोंके त्यागको
पंडित लोग त्याग कहते हैं।
[इस श्लोकमें स्पष्टतया बतला दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें संन्यास
और त्याग किसे कहते हैं? परंतु संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंने यह मत ग्राह्य
नहीं, इस कारण उन्होंने इस श्लोककी बहुत कुछ खींचातानी की है। श्लोकके
आरंभमेंही 'काम्य' शब्द आया है। अतएव इन टीकाकारोंका मत है, कि यहाँ
मीमांसकोंके नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध प्रभृति कर्मभेद विवक्षित हैं;
और उनकी समझमें भगवान्का अभिप्राय यह है, कि उनमेंसे केवल “काम्य
कर्मोंहीको छोड़ना चाहिये।" परंतु संन्यास-मार्गीय लोगोंको नित्य और नैमित्तिक
कर्मभी नहीं चाहिये, इसलिये उन्हें यों प्रतिपादन करना पड़ा है, कि यहाँ नित्य
और नैमित्तिक कर्मोंका काम्य कर्मोंमेंही समावेश किया गया है। इतना करने-
परभी इस श्लोकके उत्तरार्धमे जो कहा गया है, कि फलाशा छोड़नी चाहिये;
न कि कर्म (आगे छठा श्लोक देखिये) उसका मेल मिलताही नहीं; अतएव
अंतमे इन टीकाकारोंने अपनेही मनमें यों कहकर अपना समाधान कर लिया है,
कि भगवान्ने यहाँ कर्मयोग-मार्गकी कोरी स्तुति की है, उनका सच्चा अभिप्राय
तो यही है, कि कर्मोंको छोड़ही देना चाहिये ! इससे स्पष्ट होता है, कि संन्यास

आदि संप्रदायोंकी दृष्टिसे इस श्लोकका ठीक ठीक अर्थ नहीं लगता। वास्तवमें
इसका अर्थ कर्मयोग-प्रधानही करना चाहिये, अर्थात् फलाशा छोड़कर मरण-
पर्यंत सारे कर्म करते जानेका जो तत्त्व गीतामें पहले अनेक बार कहा गया है,
उसीके अनुरोधसे यहाँभी अर्थ करना चाहिये; तथा यही अर्थ सरल है और ठीक
ठीक जमताभी है। पहले इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि 'काम्य' शब्दसे
इस स्थानमें मीमांसकोंका नित्य, नैमित्तिक, काम्य, और निषिद्ध कर्मविभाग
अभिप्रेत नहीं है। कर्मयोग-मार्गमें सब कर्मोंके दोही विभाग किये जाते हैं, एक
'काम्य' अर्थात् फलाशासे किये हुए कर्म और दूसरे 'निष्काम' अर्थात् फलाशा
छोड़कर किये हुए कर्म; मनुस्मृतिमें उन्हींको क्रमसे 'प्रवृत्त' कर्म और 'निवृत्त'
कर्म कहा है (मनु. १२. ८८, ८९)। कर्म चाहे नित्य हों, नैमित्तिक हों, काम्य
हों, कायिक हों, वाचिक हों, मानसिक हों, अथवा सात्त्विक आदि भेदके अनुसार
और किसी प्रकारके हों, उन सबको 'काम्य' अथवा 'निष्काम' वर्गोंमें इन दो,
किसीएक विभागमें आनाही चाहिये। क्योंकि काम अर्थात् फलाशाका होना
अथवा न होना, इन दोनोंके अतिरिक्त फलाशाकी दृष्टिसे तीसरा भेद होही
नहीं सकता। शास्त्रमें जिस कर्मका जो फल कहा गया है, जैसे, पुत्रप्राप्तिके
लिये पुत्रेष्टि, उस फलकी प्राप्तिके लिये वह कर्म किया जाय, तो वह
'काम्य' है; तथा मनमें उस फलकी इच्छा न रखकर वही कर्म केवल कर्तव्य
समझकर किया जाय, तो वह 'निष्काम' हो जाता है। इस प्रकार सब कर्मोंके
'काम्य' और 'निष्काम' (अथवा मनुकी परिभाषाके अनुसार प्रवृत्त और
निवृत्त) येही दो भेद सिद्ध होते हैं। अब कर्मयोगी सब 'काम्य' कर्मोंको सर्वथा
छोड़ देता है, अतः सिद्ध हुआ, कि कर्मयोगमेंभी काम्य कर्मोंका संन्यास करना
पड़ता है। फिर बच रहे निष्काम कर्म। सो गीतामें कर्मयोगीको निष्काम कर्म
करनेका निश्चित उपदेश किया गया है सही; परंतु उसमेंभी 'फलाशा'का सर्वथा
त्याग करना पड़ता है (गीता ६. २)। अतएव त्यागका तत्त्वभी गीता-धर्ममें
स्थिरही रहता है। सारांश अर्जुनको यही बात समझा देनेके लिये, कि सब कर्मोंको
न छोड़नेपरभी कर्मयोग-मार्गमें 'संन्यास' और 'त्याग', दोनों तत्त्व बने रहते हैं,
इस श्लोकमें संन्यास और त्याग, दोनोंकी व्याख्याएँ यों की गई हैं, कि
'संन्यास'का अर्थ 'काम्य कर्मोंको सर्वथा छोड़ देना' है, और 'त्याग'का यह मतलब
है, कि "जो कर्म करना हों, उनकी फलाशा न रखें।" पीछे जब यह प्रतिपादन
हो रहा था, कि संन्यास (अथवा सांख्य) और योग ये दोनों तत्त्वतः एकही
हैं; तब 'संन्यासी' शब्दका अर्थ (गीता ५. ३-६, ६. १,२) तथा इसी
अध्यायमें आगे 'त्यागी' शब्दका अर्थभी (गीता. १८. ११) इसी भाँति किया
गया है, और इस स्थानमें वही अर्थ इष्ट है। यहाँ स्मार्तोंका यह मत प्रतिपाद्य
नहीं है, कि क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ आश्रमका पालन करनेपर

८५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
| "अंतमें प्रत्येक मनुष्यको सर्वकर्मत्यागरूपी संन्यास अथवा चतुर्थाश्रम लिये बिना
| मोक्षप्राप्तिही हो नहीं सकती ।" इससे सिद्ध होता है, कि कर्मयोगी यद्यपि
| संन्यासियोंका गेरुआ भेष धारणकर सब कर्मोंका त्याग नहीं करता, तथापि
| वह संन्यासके सच्चे तत्त्वका पालन किया करता है, इसलिये कर्मयोगका स्मृति-
| ग्रंथसे कोई विरोध नहीं है । अब संन्यास-मार्ग - और मीमांसकोंके कर्मसंबंधी
| वादका उल्लेख करके कर्मयोगशास्त्रका, इस विषयमें अंतिम निर्णय सुनाते हैं :-]
( ३ ) कई पंडितोंका कथन है, कि कर्म दोषयुक्त है, अतएव उसका (सर्वथा)
त्याग करना चाहिये; तथा दूसरे कहते हैं, कि यज्ञ, दान, तप और कर्मको कभी न
छोड़ना चाहिये । ( ४ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! त्यागके विषयमें मेरा निर्णय सुन ।
हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है । ( ५ ) यज्ञ, दान, तप और
कर्मका त्याग न करना चाहिये; इनको ( कर्मों ) करनाही चाहिये । यज्ञ, दान और
तप बुद्धिमानोंके लिये (भी) पवित्र अर्थात् चित्तशुद्धिकारक हैं । ( ६ ) अतएव
इन ( यज्ञ, दान आदि ) कर्मोंकोभी बिना आसक्ति रखे, फलोंका त्याग करके
( अन्य निष्काम कर्मोंके समानही लोकसंग्रहके हेतु ) करते रहना चाहिये ।
हे पार्थ ! इस प्रकार मेरा निश्चित मत ( है, और वही ) उत्तम है :
| [ कर्मका दोष अर्थात् बंधकता कर्ममें नहीं, फलाशामें है, इसलिये पहले
| अनेक बार जो कर्मयोगका यह तत्त्व कहा गया है, कि सभी कम फलाशा छोड़-
| कर निष्काम बुद्धिसे करने चाहिये, उसका यह उपसंहार है । संन्यास मार्गका यह
| मत गीताको मान्य नहीं है, कि सब कर्म दोषयुक्त, अतएव त्याज्य हैं ( गीता
| १८. ४८, ४९ ), गीता केवल काम्य-कर्मोंका संन्यास करनेके लिये कहती है ।
| परंतु धर्मशास्त्रमें जिन कर्मोंका प्रतिपादन है, वे सभी काम्यही हैं ( गीता २.
| ४२-४४ ) । इसलिये अब कहना पड़ता है, कि उनकाभी संन्यास करना
| चाहिये; और यदि ऐसा करते हैं, तो यज्ञ-चक्र बंद हुआ जाता है ( ३. १६) एवं

अठारहवाँ अध्याय ८५३
§ § नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
[ उसमे सृष्टिके उद्ध्वस्त होनेकाभी अवसर आ जाता है। प्रश्न होता है, कि फिर
करना क्या चाहिये ? गीता इसका यों उत्तर देती है, कि यद्यपि शास्त्रमें कहा
है, कि यज्ञ, दान प्रभृति कर्म स्वर्गादि फलप्राप्तिके हेतु करो, तथापि ऐसी बात
नहीं है, कि येही कर्म लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे न हो सकते हों, कि यज्ञ
करना, दान देना और तप करना आदि मेरा कर्तव्य है (गीता १७ ११, १३.
२०)। अतएव लोकसंग्रहकेनिमित्त स्वधर्मके अनुसार जैसे अन्यान्य निष्काम
कर्म किये जाते हैं वैसेही यज्ञ, दान आदि कर्मोंकोभी फलाशा और आसक्ति
छोड़कर करना चाहिये। क्योंकि वे सदैव 'पावन' अर्थात् चित्तशुद्धिकारक
अथवा परोपकार बुद्धि बढ़ानेवाले हैं। मूल श्लोकमें जो 'एतान्यपि – येभी'
शब्द हैं, उनका अर्थ यही है, कि "अन्य निष्काम कर्मोंके समान ये यज्ञ, दान
आदि कर्मभी करने चाहिये।" इस रीतिसे ये सब कर्म फलाशा छोड़कर अथवा
भक्ति-दृष्टिसे केवल परमेश्वरार्पण-बुद्धिपूर्वक किये जावें, तो सृष्टिका चक्र चलता
रहेगा। और कर्ताके मनकी फलाशा छूट जानेके कारण ये कर्म मोक्ष-प्राप्तिमेंभी
बाधा नहीं डाल सकते, इस प्रकार सब बातोंका ठीक ठीक मेल मिल जाता
है। कर्मके विषयमें कर्मयोगशास्त्रका यही अंतिम और निश्चित सिद्धान्त है
(गीता २. ४५ पर हमारी टिप्पणी देखो)। मीमांसकोंके कर्म-मार्ग और गीताके
कर्मयोगका भेद गीतारहस्यमें (प्र. १०, पृ. २९५-२९७; प्र. ११, पृ. ३४५-
३४८) अधिक स्पष्टतासे दिखाया गया है। अर्जुनके प्रश्न करनेपर संन्यास
और त्यागके अर्थोंका कर्मयोगकी दृष्टिसे इस प्रकार स्पष्टीकरण हो चुका; अब
सात्विक आदि भेदोंके अनुसार कर्म करनेकी भिन्न-भिन्न रीतियोंका वर्णन करके
उसी अर्थको दृढ़ करते हैं। ]
(७) जो कर्म (स्वधर्मके अनुसार) नियत अर्थात् स्थिरकर दिये गये हैं,
उनका संन्यास याने त्याग करना (किसीकोभी) उचित नहीं है। उनका, मोहसे
किया हुआ त्याग तामस कहलाता है। (८) शरीरको कष्ट होनेके डरसे, अर्थात्
दुःखकारक होनेके कारणही, यदि कोई कर्म छोड़ दे, तो उसका वह त्याग राजस
हो जाता है, (तथा) त्यागका फल उसे नहीं मिलता। (९) हे अर्जुन! (स्वधर्मा-

८५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
§ § अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
नुसार) नियत कर्म जब कार्य अथवा कर्तव्य समझकर और आसक्ति एवं फलको
छोड़कर किया जाता है, तब वह सात्त्विक त्याग समझा जाता है।
| [सातवें श्लोकके 'नियत' शब्दका अर्थ कुछ लोग नित्यनैमित्तिक आदि
| भेदोंमेंसे 'नित्य' कर्म समझते हैं, किंतु वह ठीक नहीं है "नियतं कुरु कर्म त्वम्"
| (गीता ३. ८) पदमें 'नियत' शब्दका जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँपरभी करना
| चाहिये, और हम ऊपर कह चुके हैं, कि यहाँ मीमांसकोंकी परिभाषा विवक्षित
| नहीं है। गीता ३. १९ में 'नियत' शब्दके स्थानमें 'कार्य' शब्द आया है और यहाँ
| नवें श्लोकमें 'कार्य' एवं 'नियत' ये दोनों शब्द एकत्र आ गये हैं। इस अध्यायमें
| आरंभमें, दूसरे श्लोकमें, यह कहा गया है, कि स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले
| किसीभी कर्मको न छोड़कर, उसीको कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये
| (गीता ३. १९), इसीको सात्त्विक त्याग कहते हैं, इतनाही नहीं, तो कर्मयोग-
| शास्त्रमें इसीको 'त्याग' अथवा 'संन्यास' कहते हैं, इसी सिद्धान्तका इस श्लोकमें
| समर्थन किया गया है। इस प्रकार त्याग या संन्यासके अर्थोंका स्पष्टीकरण हो
| चुका; अब इसी तत्त्वके अनुसार बतलाते हैं, कि वास्तविक त्यागी या संन्यासी
| कौन है :—]
(१०) जो किसी अकुशल अर्थात् अकल्याणकारक कर्मका द्वेष नहीं करता,
तथा कल्याणकारक अथवा हितकारी कर्ममें अनुषक्त नहीं होता, उसे सत्त्वशील,
बुद्धिमान् और संदेहविरहित त्यागी अर्थात् संन्यासी कहना चाहिये। (११) क्योंकि
जो देहधारी है, उससे, कर्मोंका निःशेष त्याग होना संभव नहीं है, अतएव जिसने
(कर्म न छोड़कर) केवल कर्मफलोंका त्याग किया हो, वही (सच्चा) त्यागी
अर्थात् संन्यासी है :
| [अब यह बतलाते हैं, कि उक्त प्रकारसे, अर्थात् कर्म न छोड़कर केवल
| फलाशा छोड़करके, जो त्यागी हुआ हो, उसे उसके कर्मके कोईभी फल बंधक
| नहीं होते :—]
(१२) मृत्युके अनन्तर अत्यागी मनुष्यको अर्थात् फलाशाका त्याग न
करनेवाले को तीन प्रकारके फल मिलते हैं – अनिष्ट, इष्ट और (कुछ इष्ट और

अठारहवाँ अध्याय ८५५
§ § पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
§ § तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
कुछ अनिष्ट मिला हुआ ) मिश्र । परंतु संन्यासीको अर्थात् फलाशा छोड़कर कर्म
करनेवालेको ( ये फल ) कभी नहीं मिलते, अर्थात् बाधा नहीं कर सकते ।
| [ त्याग, त्यागी और संन्यासी संबंधी उक्त विचार पहले ( गीता ३. ४-७ ;
| ५. २-१० ; ६. १ ) कई स्थानोंमें आ चुके हैं, उन्हींका यहाँ उपसंहार किया
| गया है । समस्त कर्मोंका संन्यास गीताको कभीभी इष्ट नहीं है । फलाशाका त्याग
| करनेवाला पुरुषही गीताके अनुसार सच्चा अर्थात् नित्य-संन्यासी है ( गीता
| ५. ३ ) । ममतायुक्त फलाशाका अर्थात् अहंकार-बुद्धिका त्यागही सच्चा त्याग
| है। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये अब और कारण दिखलाते हैं :- ]
(१३) हे महाबाहु ! सब कर्मोंकी सिद्धिके लिये सांख्योंके सिद्धान्तमें जो पाँच
कारण कहे गये हैं; उन्हें मैं बतलाता हूँ, सुन । (१४) अधिष्ठान (स्थान), तथा
कर्ता, भिन्न भिन्न करण याने साधन या हथियार, (कर्ताकी) अनेक प्रकारकी पृथक्
पृथक् चेष्टाएँ अर्थात् व्यापार, और उसके साथही साथ पाँचवाँ (कारण) दैव है ।
(१५) शरीरसे, वाणीसे अथवा मनसे मनुष्य जो जो कर्म करता है, फिर चाहे वह
न्याय्य हो या विपरीत अर्थात् अन्याय्य उसके उक्त पाँच कारण हैं ।
(१६) ( वास्तविक ) स्थिति ऐसी होनेपरभी, जो संस्कृत बुद्धि न होनेके
कारण यह समझे, कि मैंही अकेला कर्ता हूँ, ( समझना चाहिये, कि ), वह दुर्मति
कुछभी नहीं जानता । (१७) जिसमें यह भावना नहीं है, कि मैं कर्ता हूँ तथा
जिसकी बुद्धि अलिप्त है, वह यदि इन लोगोंको मार डाले, तथापि (समझना चाहिये,
कि ) उसने उन्हें नहीं मारा है, और वह ( कर्म ) उसे बंधकभी नहीं होता ।
| [ कई टीकाकारोंने तेरहवें श्लोकके 'सांख्य' शब्दका अर्थ वेदान्तशास्त्र
| किया है। परंतु अगला अर्थात् चौदहवाँ श्लोक नारायणी धर्ममें ( मभा. शां.

८५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
। ३४७. ८७ ) अक्षरशः आया है, और वहां उसके पूर्व कापिल-सांख्यके प्रकृति
और पुरुष - तत्त्वोंका उल्लेख है, अतः हमारा यह मत है, कि - 'सांख्य' शब्दसे
इस स्थानमें कापिल-सांख्यशास्त्रही अभिप्रेत है। गीतामें यह सिद्धान्त पहले
अनेक बार कहा गया है, कि मनुष्यको न तो कर्मफलकी आशा करनी चाहिये,
और न ऐसी अहंकार-बुद्धि मनमें रखनी चाहिये, कि मैं अमुक करूँगा ( गीता
२. १९; २. ४७; ३. २७; ५. ८-११; १३. २० ) ; और यहांपर वही
सिद्धान्त यह कहकर दृढ़ किया गया है, कि "कर्मका फल होनेके लिये अकेला
मनुष्यही कारण नहीं है" ( गीतार. प्र. ११ ) । चौदहवें श्लोकका अर्थ यह
है, कि मनुष्य इस जगतमें हो या न हो, प्रकृतिके स्वभावके अनुसार जगतका
अखंडित व्यापार सदैव चलताही रहता है; और जिस कर्मको मनुष्य अपनी
करनी समझता है, वह केवल उसीके यत्नका फल नहीं है, वरन् उसके यत्न और
संसारके अन्य व्यापारों अथवा चेष्टाओंकी सहायताका परिणाम है। उदाहरणार्थ
खेती केवल मनुष्यकेही यत्नपर निर्भर नहीं है, उसकी सफलताके लिये धरती,
बीज, पानी, खाद और बैल आदिके गुणधर्म अथवा व्यापारोंकी सहायता आव-
श्यक होती है। इसी प्रकार, मनुष्यके प्रयत्नकी सिद्धि होनेके लिये जगतके जिन
विविध व्यापारोंकी सहायता आवश्यक है, उनमेंसे कुछ व्यापारोंको जानकर,
उनकी अनुकूलता पाकरही मनुष्य यत्न किया करता है। परंतु हमारे प्रयत्नोंके
लिये अनुकूल अथवा प्रतिकूल, सृष्टिके औरभी कई व्यापार ऐसे हैं, कि जिनका
हमें ज्ञान नहीं है। इसीको दैव कहते हैं; और कर्मकी घटनाका यह पाँचवाँ
कारण कहा गया है। मनुष्यका यत्न सफल होनेके लिये जब इतनी सब बातोंकी
आवश्यकता है, तथा जब उनमेंसे कई या तो हमारे वशकी नहीं या हमें ज्ञातभी
नहीं रहतीं, तब यह बात स्पष्टतया सिद्ध होती है, कि मनुष्यका ऐसा अभिमान
रखना निरी मूर्खता है, कि मैं अमुक काम करूँगा; अथवा ऐसी फलाशा
रखनाभी मूर्खताका लक्षण है, कि मेरे कर्मका फल अमुकही होना चाहिये (गीतार.
प्र. ११, पृ. ३१८-३१९ ) । तथापि सत्रहवें श्लोकका अर्थ योभी न समझ लेना
चाहिये, कि जिसकी फलाशा छूट जाय, वह चाहे जो कुकर्म कर सकता है।
साधारण मनुष्य जो कुछ करते हैं, वह स्वार्थके लोभसे करते हैं, इसलिये उनका
बर्ताव अनुचित हुआ करता है। परंतु जिसका स्वार्थ या लोभ नष्ट हो गया है,
अथवा फलाशा पूर्णतया विलीन हो गयी है और जिसे प्राणिमात्र समानही हो
गये हैं, उससे किसीकाभी अनहित नहीं हो सकता। कारण यह है, कि दोष बुद्धिमें
रहता है, न कि कर्ममें। अतएव सत्रहवें श्लोकका यही तात्पर्य है, कि जिसकी
बुद्धि पहलेसे शुद्ध और पवित्र हो गयी हो, उसका किया हुआ कोई कर्म यद्यपि
लौकिक दृष्टिसे विपरित भलेही दिखलाई दे; तोभी न्यायतः कहना पड़ता है,
कि उसका बीज शुद्धही होगा; फलतः उस कामके लिये फिर उस शुद्ध-बुद्धि-