श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ८४५
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
अपात्र मनुष्यको, बिना सत्कारके, अथवा अवहेलनापूर्वक, जो दान दिया जाता
है, वह तामस दान कहलाता है।
[ आहार, यज्ञ, तप और दानके समानही ज्ञान, कर्म, कर्त्ता, बुद्धि, धृति
और सुखकी विविधताका वर्णन अगले अध्यायमे किया गया है ( गीता १८.
२०-३९) इस अध्यायका गुणभेद-प्रकरण यहीं समाप्त हो चुका । अब ब्रह्म-
निर्देशके आधारपर उक्त सात्त्विक कर्मकी श्रेष्ठता और संग्राह्यता सिद्ध की
जावेगी। क्योंकि, उपर्युक्त संपूर्ण विवेचनपर सामान्यतः यह शंका हो सकती
है, कि कर्म सात्त्विक हो, या राजस, या तामस, कैसाभी क्यों न हो ? है तो वह
दुःखकारक और दोषमय ही; इस कारण इन सारे कर्मोंका त्याग किये बिना
ब्रह्मप्राप्ति नहीं हो सकती; और यदि यह बात सत्य है, तो फिर कर्मके सात्त्विक,
राजस आदि भेद करनेसे लाभही क्या है? इन आक्षेपपर गीताका यह उत्तर
है, कि कर्मके सात्त्विक, राजस और तामस भेद परब्रह्मसे अलग नहीं हैं। जिस
संकल्पमें ब्रह्मका निर्देश किया गया है, उसीमें सात्त्विक कर्मोंका और सत्कर्मोंका
समावेश होता है, और इससे निर्विवाद सिद्ध है, कि ये कर्म अध्यात्म-दृष्टिसेभी
त्याज्य नहीं है (गीतार. प्र. ९, पृ. २६६-२४७) । परब्रह्मके स्वरूपका
मनुष्यको जो कुछ ज्ञान हुआ है, वह सब 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दोंके निर्देशमें
ग्रथित है। इनमेंसे ॐ अक्षर-ब्रह्म है, और उपनिषदोंमे उसका भिन्न-भिन्न अर्थ
किया गया है ( प्रश्न ५; कठ. १५-१७; तै. १. ८; छां. १. १; मैत्र्यु. ६.
३, ८; मांडूक्य १-१२ ) । और जब यह वर्णाक्षररूपी ब्रह्मही जगतके आरंभमें
था, तब सब क्रियाओका आरंभ वहींसे होता है। 'तत् = वह' शब्दका अर्थ है
सामान्य कर्मसे परेका कर्म, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे फलाशा छोड़कर किया
हुआ सात्त्विक कर्म; और 'सत्'का अर्थ वह कर्म है, कि जो यद्यपि फलाशामहित
हो, तोभी शास्त्रानुसार किया गया हो और शुद्ध हो - यही उक्त संकल्पका अर्थ
है; और इस अर्थके अनुसार निष्काम बुद्धिसे किये हुए सात्त्विक कर्मकाही नहीं,
वरन् शास्त्रानुसार किये हुए सत् कर्मकाभी परब्रह्मके सामान्य और सर्वमान्य
संकल्पमें समावेश होता है; अतएव इन कर्मोंको त्याज्य कहना अनुचित है। अंतमें
'तत्' और 'सत्' कर्मोंके अतिरिक्त 'असत्' अर्थात् बुरा कर्म बच जाता है। परंतु
अंतिम श्लोकमें सूचित किया है, कि वह दोनों लोकोंमें गर्ह्य माना गया है, इस
कारण उस कर्मका इस संकल्पमें समावेश नहीं होता । भगवान् कहते हैं कि :- ]
(२३) (शास्त्रमें) परब्रह्मका निर्देश 'ॐ तत्सत्' यों तीन प्रकारसे किया
जाता है। इसी निर्देशसे पूर्वकालमें ब्राह्मण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।