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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

नवाँ अध्याय ७६३
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
§ § समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
कर। (२८) इस प्रकार बर्तनेसे (कर्म करकेभी) कर्मोंके शुभ-अशुभ फलरूप
बंधनोंसे तू मुक्त रहेगा, और (कर्मफलोंके) संन्यास करनेके इस योगसे युक्तात्मा
अर्थात् शुद्ध अंतःकरण हो कर मुक्त हो जायगा, एवं मुझमें मिल जायगा।
। [ इससे प्रकट होता है, कि भगवद्भक्तभी कृष्णार्पण-बुद्धिसे समस्त कर्म
। करे, उन्हें छोड़ न दे; और इस दृष्टिसे ये दोनों श्लोक महत्त्वके हैं। “ब्रह्मार्पणं
। ब्रह्म हविः” (गीता ४. २४) यह ज्ञान-यज्ञका तत्त्वही अब भक्तिकी परिभाषाके
। अनुसार २७ वें श्लोकमें बतलाया है (गीतार. प्र. १३, पृ. ४३२, ४३३) ।
। तीसरेही अध्यायमें अर्जुनसे कह दिया है, कि “मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य”
। (गीता ३. ३०) - मुझमें सब कर्मोंका संन्यास करके - युद्ध कर; और पाँचवें
। अध्यायमें फिर कहा है, कि “ब्रह्ममें कर्मोंको अर्पण करके संगरहित कर्म
। करनेवालेको कर्मका लेप नहीं लगता” (५. १०)। गीताके मतानुसार यही
। यथार्थ संन्यास है (गीता १८. २), और इस प्रकार अर्थात् कर्मफलाशा
। छोड़कर (संन्यस्य) सब कर्मोंको करनेवाला पुरुषही 'नित्यसंन्यासी' है (गीता
। ५. ३); कर्मत्यागरूप संन्यास गीताको संमत नहीं है। पीछे अनेक स्थलों-
। पर कह चुके हैं, कि इस रीतिसे किये हुए कर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते
। (गीता २. ६४; ३. १९; ४. २३; ५. १२; ६. १; ८. ७), और इस २८ वें
। श्लोकमें उसी बातको फिर कहा है। भागवत-पुराणमेंही नृसिंहरूपी भगवानने
। प्रल्हादको यह उपदेश किया है कि “मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः”-
। मुझमें चित्त लगाकर सब काम किया कर (भाग. ७. १०. २३); और आगे
। एकादश स्कन्धमें भक्तियोगका यह तत्त्व बतलाया है, कि भगवद्भक्त सब कर्मोंको
। नारायणार्पण कर दे (भाग. ११. २. २६; ११. ११. २४)। इस अध्यायके
। आरंभमें वर्णन किया है, कि भक्तिका मार्ग सुखकारक और सुलभ है। अब उसके
। समत्वरूपी दूसरे बड़े और विशेष गुणका वर्णन करते हैं :-]
(२९) मैं सब भूतोंको एक-सा हूँ। न मुझे (कोई) द्वेष्य अर्थात् अप्रिय है,
और न (कोई) प्यारा। भक्तिसे जो मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं, और मैंभी
उनमें हूँ। (३०) बड़ा दुराचारीही क्यों न हो, यदि वह मुझे अनन्यभावसे भजता है,

७६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
तो उसे साधुही समझना चाहिये। क्योकि उसकी बुद्धिका निश्चय अच्छी तरह हुआ
है। (३१) वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शांति पाता है। हे कौंतेय !
तू भली भाँति समझे रह, कि मेरा भक्त (कभीभी) नष्ट नहीं होता ।
| [ तीसवें श्लोकका भावार्थ ऐसा न समझना चाहिये, कि भगवद्भक्त
| यदि दुराचारी हो, तोभी व भगवान्‌को प्यारेही रहते हैं। भगवान् इतनाही कहते
| हैं, कि पहले कोई मनुष्य दुराचारीभी रहा हो, परंतु जब एक बार उसकी बुद्धि
| निश्चयमे परमेश्वराभिमुखका भजन करनेमे हो जाती है, तब आगे उसके हाथसे
| कोईभी दुष्कर्म नहीं हो सकता; और फिर वह धीरे धीरे धर्मात्मा हो कर सिद्धि
| पाता है, तथा अन्तमें इस सिद्धिस उसके पापका बिलकुल नाश हो जाता है।
| सारांश, छठे अध्यायमें (६.४४) जो यह सिद्धान्त किया हे, कि कर्मयोगके
| जाननेकी सिर्फ़ इच्छा होनेसेही कोल्हूमें अवश होकर मनुष्य शब्द-ब्रह्मसे परे
| चला जाता है, अब उसीही भक्ति-मार्गके लिये लागू कर दिखलाया है। अब इस
| बातकोही अधिक स्पष्ट करते हैं, कि परमेश्वर सब भूतोंको एक-सा कैसे है:- ]
(३२) क्योंकि, हे पार्थ ! मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र, (अथवा)
अन्त्यज आदि जो पापयोनि हों, वेभी परम गति पाते हैं। (३३) फिर पुण्यवान्
ब्राह्मणोंकी, मेरे भक्तोंकी, और राजर्षियों, (क्षत्रियौं) की बात क्या कहनी है ?
तू इस अनित्य और असुख अर्थात् दुःखकारक मृत्युलोकमें है, इस कारण मेरा भजन
कर।
| [ ३२ वे श्लोकके 'पापयोनि' शब्दको स्वतंत्र न मानकर कुछ टीकाकार
| कहते हैं, कि वह स्त्रियो, वैश्यों और शूद्रोंकोभी लागू है, क्योंकि पहले कुछ-न-
| कुछ पाप किये बिना कोईभी स्त्री, वैश्य या शूद्रका जन्म नही पाता। उनके मतमें
| पापयोनि शब्द साधारण है और ये स्त्री, वैश्य तथा शूद्र उसके भेद उदाहरणार्थ
| दिये गये हैं। परंतु हमारी रायमें यह अर्थ ठीक नहीं है। आजकल राजदरबारमें
| जिन्हें 'गुन्हेगार जाति' कहते हैं, पापयोनि शब्दसे उस प्रकारका अर्थ विवक्षित
| है। इस लोकका सिद्धान्त यह है, कि उस जातिके लोगोंकोभी भगवद्भक्तिसे

नवाँ अध्याय ७६५
§ § मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
————————
| सिद्धि मिलती है। स्त्री, वैश्य और शूद्र इस वर्गके नहीं है, उन्हें मोक्ष मिलनेमें
| इतनीही बाधा है, कि वे वेद सुननेके अधिकारी नहीं हैं। इसीसे भागवत-पुराणमें
| कहा है, कि :-
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥
| "स्त्रियों, शूद्रों अथवा कलियुगके नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंमें वेद नहीं पहुँचते,
| इस कारण उन्हें मूर्खतामे बचनेके लिये व्यासमुनिने कृपालु होकर उनके
| कल्याणार्थही महाभारतकी - अर्थात् गीताकीभी - रचना की" ( भाग. १. ४.
| २५ ) । भगवद्गीताके उक्त श्लोक कुछ पाठभेदसे अनुगीतामेंभी पाये जाते हैं
| (मभा. अश्व. १९. ६१, ६२ ) । जातिका, वर्णका, स्त्री-पुरुष आदिका अथवा
| काले-गोरे रंग प्रभृतिका कोईभी भेद न रखकर सबको एकही सद्गति देनेवाले
| भगवद्भक्तिके इस राजमार्गका ठीक ठीक बड़प्पन इस देशकी - और विशेषतः
| महाराष्ट्रकी - संतमंडलीके इतिहाससे किसीकोभी ज्ञात हो सकेगा । उल्लिखित
| श्लोकका अधिक स्पष्टीकरण गीतारहस्यके प्र १३. पृ. ४३८-४४२ में किया है ।
| इस प्रकारके धर्मका आचरण करनेके विषयमें ३३ वें श्लोकके उत्तरार्धमें अर्जुनको
| जो उपदेश किया गया है, अगले श्लोकमेंभी वही प्रचलित है । ]
(३४) मुझमें मन लगाकर, मेरा भक्त हो, मेरा यजन-पूजन कर और मुझे
नमस्कार कर, इस प्रकार मत्परायण होकर, योगका अभ्यास करनेसे मुझेही पावेगा।
| [ वास्तवमें इस उपदेशका आरंभ ३३ वें श्लोकमेंही हो गया है । ३३ वें
| श्लोकमे 'अनित्य' पद अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तके अनुसार आया है, कि
| प्रकृतिका फैलाव अथवा नामरूपात्मक दृश्य-सृष्टि अनित्य है और एक पर-
| मन्माही नित्य है; और 'असुख' पदसे इस सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है,
| कि इस संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक है । तथापि यह वर्णन अध्यात्मक
| नहीं है, भक्ति-मार्गका है। अतएव भगवानने परब्रह्म अथवा परमात्मा शब्दका
| प्रयोग न करके "मुझे भज, मुझमें मन लगा, मुझे नमस्कार कर", ऐसे व्यक्त-
| स्वरूपके दर्शानेवाले प्रथम पुरुषका निर्देश किया है । भगवानका अंतिम कथन है,

७६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
| कि हे अर्जुन ! इस प्रकार भक्ति करके मत्परायण होता हुआ योग अर्थात् कर्म-
| योगका अभ्यास करता रहेगा, (गीता ७. १ ) तो तू कर्मबंधनसे मुक्त हो करके
| निःसंदेह मुझे पा लेगा । इसी उपदेशकी पुनरावृत्ति ग्यारहवें अध्यायके अंतमें की
| गई है। समस्त गीताका रहस्यभी यही है। भेद इतनाही है, कि इस रहस्यको
| एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और एक बार भक्ति-दृष्टिसे बतला दिया है। ]
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए – अर्थात् कहे हुए – उपनिषदमें, ब्रह्म-
विद्यान्तर्गत योग – अर्थात् कर्मयोग -- शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें,
राजविद्या-राजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

दसवाँ अध्याय ७६७
दशमोऽध्यायः ।
श्रीभगवानुवाच ।
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
§ § बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
दसवाँ अध्याय
[ पिछले अध्यायमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपकी
उपासनाका जो राजमार्ग बतलाया गया है, उसीका वर्णन इस अध्यायमें हो रहा
है, और अर्जुनके पूछनेपर, अंतमें परमेश्वरके अनेक व्यक्त रूपों अथवा विभूति-
योंका, अंतमें वर्णन किया गया है । इस वर्णनको सुनकर अर्जुनके मनमें भगवानके
प्रत्यक्ष स्वरूपको देखनेकी इच्छा हुई, अतः ११ वें अध्यायमें भगवानने उसे विश्वरूप
दिखलाकर कृतार्थ किया है । ]
श्रीभगवानने कहा :- ( १) हे महाबाहु ! ( मेरे भाषणसे ) संतुष्ट होनेवाले
तुझसे, अब तेरे हितार्थ मैं फिर ( एक ) अच्छी बात कहता हूँ, उसे सुन । ( २ )
देवताओंके गण और महर्षिभी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते; क्योंकि देवताओं और
महर्षिओका सब प्रकारसे मैंही आदिकरण ( हूँ ) । ( ३) जो जानता है, कि मैं
( पृथ्वी आदि सब ) लोगोंका बड़ा ईश्वर हूँ और मेरे जन्म तथा आदि नहीं हैं,
मनुष्योंमें वही मोहविरहित हो कर सब पापोंसे मुक्त होता है ।
| [ ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें यह विचार पाया जाता है, कि भगवान् या
| परब्रह्म देवताओंकेभी पहलेका है, देवता पीछेसे हुए ( गीतार. प्र. ९, पृ. २५६ ) ।
| इस प्रकार प्रस्तावना हो गई । अब भगवान् इसका निरूपण करते हैं, कि मैं
| सबका महेश्वर कैसे हूँ :- ]
(४) बुद्धि, ज्ञान, असंमोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव (उत्पत्ति),
अभाव ( नाश ), भय, अभय,

७६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
(५) अहिंसा, समता, तुष्टि ( संतोष ), तप, दान, यश, अयशके आदि
अनेक प्रकारके प्राणिमात्रके भाव मुझसेही उत्पन्न होते हैं।
। [ 'भाव' शब्दका अर्थ है 'अवस्था', 'स्थिति' या 'वृत्ति' और सांख्य-
। शास्त्रमें उनका 'बुद्धिके भाव' एवं 'शारीरिक भाव' ऐसा भेद किया गया है।
। सांख्यशास्त्री पुरुषको अकर्ता और बुद्धिको प्रकृतिका एक विकार मानते हैं, इस-
। लिये वे कहते हैं, कि लिंग-शरीरको पशु-पक्षी आदिके भिन्न भिन्न जन्म मिलनेका
। कारण लिंग-शरीरमें रहनेवाली बुद्धिकी विभिन्न अवस्थाएँ अथवा भावही हैं
। (गीतार. प्र. ८, पृ. १८९; सां. का. ४०-५५); और ऊपरके दो श्लोकोंमें उन्हीं
। भावोंका वर्णन है। परंतु वेदान्तियोंका सिद्धान्त है, कि प्रकृति और पुरुषसेभी
। परे परमात्मारूपी एक नित्य तत्त्व है और नासदीय सूक्तके वर्णनानुसार उसीके
। मनमें सृष्टि निर्माण करनेकी इच्छा उत्पन्न होकर आगेपर सारा दृश्य जगत्
। उत्पन्न होता है, इस कारण वेदान्तशास्त्रमेंभी कहा है, कि सृष्टिके मायात्मक सभी
। पदार्थ परब्रह्मके मानस भाव हैं (अगला श्लोक देखो), तप, दान और यज्ञ आदि
। शब्दोंसे तन्निष्ठ बुद्धिके भावही उद्दिष्ट हैं। भगवान् और कहते हैं, कि :-]
(६) सात महर्षि, पहलेके चार, और मनु, ये मेरेही मानस अर्थात् मनसे निर्माण
किये हुए भाव हैं, कि जिनसे ( इस ) लोकमें यह प्रजा हुई है।
। [ यद्यपि इस श्लोकके शब्द सरल हैं, तथापि जिन पौराणिक पुरुषोंको
। उद्देश्य करके यह श्लोक कहा गया है, उनके संबंधमें टीकाकारोंमें बहुतही मतभेद
। है। विशेषतः अनेकोंने इसका निर्णय कई प्रकारसे किया है, कि 'पहलेके' (पूर्व)
। और 'चार' ( चत्वारः ) पदोंका अन्वय किन पदोंसे लगाना चाहिये। सात
। महर्षि प्रसिद्ध हैं, परंतु ब्रह्माके एक कल्पमें चौदह मन्वन्तर ( गीतार. प्र. ८, पृ.
। १९४ ) होते हैं और प्रत्येक मन्वंतरके मनु, देवता एवं सप्तर्षि भिन्न भिन्न होते
। हैं ( हरिवंश १, ७; विष्णु. ३. १; मत्स्य. ९ )। इसीसे 'पहलेके' शब्दको सात
। महर्षियोंका विशेषण मान कई लोगोंने ऐसा अर्थ किया है, कि आजकलके, अर्थात्
। वैवस्वत मन्वंतरसे पहलेके, चाक्षुष मन्वंतरवाले सप्तर्षि यहाँ विवक्षित हैं। भृगु
। आदि इन सप्तर्षियोंके नाम हैं - भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा
। और सहिष्णु । किंतु हमारे मतमे यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योंकि, आजकलके
। अर्थात् वैवस्वत अथवा जिस मन्वन्तरमें गीता कही गई, उससे, पहलेके मन्वंतर-

दसवाँ अध्याय ७६९

| वाले सप्तर्षि यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है, अतः वर्तमान मन्वंतर-
| केही सप्तर्षि लेने चाहिये । महाभारतके शांतिपर्वके नारायणीयोपाख्यानमें इनके
| ये नाम हैं – मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ (मभा.
| शां. ३३५. २८, २९; ३४०. ६४, ६५); और हमारे मतसे येही यहाँपर
| विवक्षित हैं। क्योंकि गीतामें नारायणीय अथवा भागवत धर्मही विधिसहित
| प्रतिपाद्य है (गीतार. पृ. ८–९)। तथापि यहाँ इतना बतला देना आवश्यक
| है, कि मरीचि आदि सप्तर्षियोंके उक्त नाम कहीं कहीं अंगिरसके बदले भृगुसे
| दिये हुए पाये जाते हैं; और कुछ स्थानोंपर तो ऐसा वर्णन है, कि कश्यप, अत्रि,
| भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ वर्तमान युगके सप्तर्षि
| हैं (विष्णु. ३. १. ३२, ३३; मत्स्य ९. २७, २८; मभा. अनु. ९३. २१)।
| मरीचि आदि ऊपर लिखे हुए सात ऋषियोंमेंही भृगु और दक्षको मिलाकर
| विष्णु-पुराणमें (विष्णु. १. ७. ५, ६) नौ मानसपुत्रोंका और इन्हींमें फिर
| नारदकोभी जोड़ कर मनुस्मृतिमें ब्रह्मदेवके दस मानसपुत्रोंका वर्णन है (मनु.
| १. ३४, ३५); और इन मरीचि आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति भारतमें की गई है
| (म.भा. अनु. ८५)। परंतु हमें अभी इतनाही देखना है, कि सात महर्षि कौन
| कौन हैं, इस कारण इन नौ-दस मानसपुत्रोंका अथवा इनके नामोंकी व्युत्पत्तिका
| यहाँ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रकट है कि, 'पहलेके' इस पदका
| अर्थ 'पूर्व मन्वन्तरके सात महर्षि' लेंगा नहीं सकते। अब देखना है, कि 'पहलेके
| चार' इन शब्दोंको मनुका विशेषण मानकर कई एकोंने जो अर्थ किया है, वह
| कहाँ तक युक्तिसंगत है? कुल चौदह मन्वंतर हैं और इनके चौदह मनु हैं;
| उनमें सात-सातके दो वर्ग हैं। पहले सातोंके नाम स्वायंभुव, स्वारोचिष, औत्तमी,
| तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत हैं, तथा ये स्वायंभुव आदि मनु कहे जाते
| हैं (मनु. १. ६२, ६३)। इनमेंसे छः मनु हो चुके और आजकल सातवाँ अर्थात्
| वैवस्वत मनु चल रहा है। इसके समाप्त होनेपर आगे सात मनु आवेंगे (भाग.
| ८. १३. ७), उनको सावर्णि मनु कहते हैं; उनके नाम हैं – सावर्णि, दक्षसावर्णि,
| ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इंद्रसावर्णि (विष्णु. ३. २;
| भाग. ८. १३; हरिवंश १. ७)। इस प्रकार प्रत्येक मनुके सात सात होनेपर
| इस बातका कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता, कि किसीभी वर्गके 'पहलेके'
| अर्थात् पहले 'चार' ही गीतामें क्यों विवक्षित हों ? ब्रह्मांड-पुराणमें (४. १)
| कथा है, कि सावर्णि मनुओंमेंसे पहले मनुको छोड़कर अगले चार अर्थात्-दक्ष-,
| ब्रह्म-, धर्म- और रुद्रसावर्णि एकही समयमें उत्पन्न हुए; और इसी आधारसे
| कुछ लोग कहते हैं, कि; ये चार सावर्णि मनुही गीतामें विवक्षित हैं। किंतु इस-
| पर दूसरा आक्षेप यह है, कि ये सब सावर्णि मनु भविष्यमें होनेवाले हैं, इस कारण
| “जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई” यह भूतकालदर्शक अगला वाक्य भावी
गी. र. ४९

७७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
। सावर्णि मनुओंको लागू नहीं हो सकता। इसी प्रकार 'पहलेके चार' शब्दोंका
। संबंध 'मनु' पदसे जोड़ देना ठीक नहीं है। अतएव कहना पड़ता है, कि 'पहलेके
। चार' ये दोनों शब्द स्वतंत्र रीतिसे प्राचीन कालके किन्हीं चार ऋषियों अथवा
। पुरुषोंका बोध कराते हैं। और ऐसा मान लेनेसे यह प्रश्न सहजही होता है, कि
। ये पहलेके चार ऋषि या पुरुष कौन हैं ? जिन टीकाकारोंने इस श्लोकका ऐसा
। अर्थ किया है, उनके मतमें सनक, सनंद, सनातन और सनत्कुमार (भाग. ३.
। १२. ४) येही वे चार ऋषि हैं। किंतु इस अर्थपर आक्षेप यह है, कि यद्यपि ये
। चारों ऋषि ब्रह्माके मानसपुत्र हैं, तथापि ये सभी जन्मसेही संन्यासी होनेके
। कारण प्रजावृद्धि नहीं करते थे, इससे ब्रह्मा इनपर क्रुद्ध हो गये थे (भाग. ३.
। १२; विष्णु. १. ७)। अर्थात् जिनसे इस लोकमें यह प्रजा हुई" - "येषां लोक
। इमाः प्रजाः" यह वाक्य इन चार ऋषियोंको बिलकुलही उपयुक्त नहीं होता।
। इसके अतिरिक्त पुराणोंमें यद्यपि यह वर्णन है, कि ये ऋषि चार थे; तथापि
। भारतके नारायणीय अर्थात् भागवत धर्ममें कहा है, कि इन चारोंमें सन, कपिल
। और सनत्सुजातको मिला लेनेसे जो सात ऋषि होते हैं, वे सातों ब्रह्माके मानस-
। पुत्र हैं और पहलेसेही वे निवृत्ति-धर्मके थे (मभा. शां. ३४०. ६७; ६८)। इस
। प्रकार सनक आदि ऋषियोंको सात मान लेनेसे कोई कारण नहीं दीख पड़ता,
। कि उनमेंसे चारही यहाँ क्यों लिये जायें। फिर 'पहलेके चार' हैं कौन ? हमारे
। मतमें इस प्रश्नका उत्तर नारायणीय अथवां भागवत धर्मकी पौराणिक कथाओंसेही
। दिया जाना चाहिये। क्योंकि यह निर्विवाद है, कि गीतामें भागवत धर्महीका
। प्रतिपादन किया गया है। अब यदि यह देखें, कि भागवत धर्ममें सृष्टिकी उत्पत्तिकी
। कल्पना किस प्रकारकी थी, तो पता लगेगा, कि मरीचि आदि सात ऋषियोंके
। पहले वासुदेव (आत्मा), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन), और अनिरुद्ध
। (अहंकार) ये चार मूर्तियाँ उत्पन्न हो गई थीं, और कहा है, कि आगे इनमेंसे
। पिछले अनिरुद्धसे अर्थात् ब्रह्मदेवसे मरीचि आदि पुत्र उत्पन्न हुए (मभा. शां.
। ३३९. ३४-४०, ६०-७२; ३४०. २७-३१)। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और
। अनिरुद्ध इन्हीं चार मूर्तियोंको 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और भागवत धर्मके एक
। पंथका मत है, कि ये चारों मूर्तियाँ स्वतंत्र थीं; तथा दूसरे कुछ लोग इनमेंसे तीन
। अथवा दोकोही प्रधान मानते हैं। किंतु भगवद्गीताको ये कल्पनाएँ मान्य नहीं
। हैं; और हमने गीतारहस्य प्र. ८, पृ. १९६ और परि. ५३९-५४० में दिखलाया
। हैं, कि गीता एकव्यूह-पंथकी है, अर्थात् एकही परमेश्वरसे चतुर्व्यूह आदि सब
। कुछकी उत्पत्ति मानती है। अतः व्यूहात्मक वासुदेव आदि मूर्तियोंको स्वतंत्र न
। मानकर इस श्लोकमें दर्शाया है, कि ये चारों व्यूह एकही परमेश्वर अर्थात्
। सर्वव्यापी वासुदेवके (गीता ७. १९) 'भाव' हैं। इस दृष्टिसे देखनेपर विदित
। होगा, कि भागवत धर्मके अनुसार 'पहलेके चार' इन शब्दोंका उपयोग वासुदेव

दसवाँ अध्याय ७७१
§§ एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
| आदि चतुर्व्यूहके लिये किया गया है, कि जो सप्तर्षियोंके पूर्व उत्पन्न हुए थे ।
| भारतमेंही लिखा है, कि भागवत धर्मके चतुर्व्यूह आदि भेद पहलेमेही प्रचलित
| थे (मभा. शां. ३४८. ५७) । यह कल्पना कुछ हमारीही नई नहीं है । सारांश,
| भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके अनुसार हमने इस श्लोकका अर्थ यों लगाया
| है – 'सात महर्षि' अर्थात् मरीचि आदि; 'पहलेके चार' अर्थात् वासुदेव आदि
| चतुर्व्यूह; और 'मनु' अर्थात् जो उस समयसे पहले हो चुके थे और वर्तमान, सब
| मिला कर स्वायंभुव आदि सात मनु । अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार आदि चार
| मूर्तियोंको परमेश्वरके पुत्र माननेकी कल्पना भारतके अन्य स्थानोंमेंभी पाई
| जाती है ( मभा. शां. ३११. ७, ८ ) । परमेश्वरके भावोंका वर्णन हो चुका; अब
| बतलाते हैं, कि इन्हें जानकर उपासना करनेसे क्या फल मिलता है :- ]
(७) जो मेरी इस विभूति अर्थात् विस्तारके, और योग अर्थात् इस विस्तार
करनेकी युक्ति या सामर्थ्यके तत्त्वको जानता है, उसे निस्संदेह स्थिर (कर्म-)योग
प्राप्त होता है। (८) यह जानकर, कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ, और मुझसे
सब वस्तुओंकी प्रवृत्ति होती है, ज्ञानी पुरुष भावयुक्त होते हुए मुझको भजते रहते
हैं। (९) (वे) मुझमें मन जमाकर और प्राणोंको लगाकर, परस्पर बोध करते
हुए एवं मेरी कथाएँ कहते हुए, ( उसीमें ) सदा संतुष्ट और रममाण रहते हैं।
(१०) इस प्रकार सदैव युक्त होकर अर्थात् समाधानसे रह कर जो लोग मुझे
प्रीतिपूर्वक भजते हैं, उनको मैंही ऐसी (समत्व-)बुद्धिका योग देता हूँ, कि जिससे
वे मुझे पा लेंगे। (११) और उनपर अनुग्रह करनेके लियेही मैं उनके आत्मभाव
अर्थात् अंतःकरणमें पैठकर तेजस्वी ज्ञानदीपसे ( उनके मनके ) अज्ञानमूलक
अंधकारका नाश करता हूँ।

७७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अर्जुन उवाच ।
§ § परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
[ सातवें अध्यायमें कहा है, कि भिन्न भिन्न देवताओंकी श्रद्धाभी पर-
मेश्वरही देता है ( ७. २१) । उसी प्रकार अब ऊपरके दसवें श्लोकमेंभी वर्णन
है, कि भक्ति-मार्गमें लगे हुए मनुष्यकी समत्व-बुद्धिको उन्नत करनेका कामभी
परमेश्वरही करता है; और पहले (गीता ६. ४४) यह जो वर्णन आया है,
कि जब मनुष्यके मनमें एक बार कर्मयोगकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है, तब
कोल्हूमें धरे हुएके समान वह आप-ही-आप पूर्ण सिद्धिकी ओर खींचा चला जाता
है, उसके साथ भक्ति-मार्गका यह सिद्धान्त समानार्थक है। ज्ञानकी दृष्टिसे अर्थात्
कर्मविपाक-प्रक्रियाके अनुसार कहा जाता है, कि यह कर्तृत्व आत्माकी स्वतंत्रतासे
मिलता है। पर आत्माभी तो परमेश्वरही है, इस कारण भक्ति-मार्गमें ऐसा
वर्णन हुआ करता है, कि ये फल अथवा बुद्धि परमेश्वरही प्रत्येक मनुष्यके पूर्व-
कर्मोंके अनुसार देता है (गीता ७. २०; गीतार. प्र. १३, पृ. ४२८) । इस
प्रकार भगवानके भक्ति-मार्गका तत्त्व बतला चुकने पर :- ]
अर्जुनने कहा :- (१२-१३) तुम्हीं परम ब्रह्म, श्रेष्ठ स्थान और परम पवित्र
वस्तु (हो); सब ऋषि, ऐसेही देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यासभी तुमको
दिव्य एवं शाश्वत पुरुष, आदिदेव, अजन्म, सर्वविभु अर्थात् सर्वव्यापी कहते हैं;
और स्वयं तुमभी मुझसे वही कहते हो। (१४) हे केशव ! तुम मुझसे यह जो
कहते हो, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् ! तुम्हारी व्यक्ति अर्थात्
तुम्हारा मूल देवताओंको विदित नहीं और दानवोंको विदित नहीं । (१५) सब
भूतोंके उत्पन्न करनेवाले हे भूतेश ! हे देवदेव जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! तुम
स्वयंही अपने आपको जानते हो। (१६) अतः तुम्हारी जो दिव्य विभूतियां हैं,

दसवाँ अध्याय ७७३
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
श्रीभगवानुवाच ।
§§ हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
जिन विभूतियोंसे इन सब लोकोंको तुम व्याप्तकर रहे हो, उन्हें आप-ही (कृपा
कर) मुझे पूर्णतासे बतलावें । (१७) हे योगिन् ! (मुझे यह बतलाइये, कि) सदा
तुम्हारा चिंतन करता हुआ मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ; और हे भगवन् ! मैं किन
किन पदार्थोंमें तुम्हारा चिंतन करूँ ? (१८) हे जनार्दन ! अपनी विभूति और योग
मुझे फिर विस्तारसे बतलाओ, क्योंकि अमृततुल्य (तुम्हारे इस भाषणको)
सुनते सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती ।
| [ विभूति ओर योग, ये दोनों शब्द इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये
| हैं। और यहाँ अर्जुनने उन्हींको दोहरा दिया है। 'योग' शब्दका अर्थ पहले
| (गीता ७. २५) दिया जा चुका है, उसे देखो। भगवान्‌की विभूतियोंको अर्जुन
| इसलिये नहीं पूछता, कि भिन्न भिन्न विभूतियोंका ध्यान देवता समझ कर किया
| जावे; किंतु सत्रहवें श्लोकके इस कथनको स्मरण रखना चाहिये, कि उक्त
| विभूतियोंमें सर्वव्यापी परमेश्वरकीही भावना रखनेके लिये पूछता है। क्योंकि
| भगवान् यह पहलेही बतला चुके हैं (गीता ७. २०-२५; ९. २२-२८), कि
| एकही परमेश्वरको सब स्थानोंमें विद्यमान जानना एक बात है, और परमेश्वरकी
| भिन्न-भिन्न विभूतियोंको भिन्न-भिन्न देवता मानना दूसरी बात है; इन दोनोंमें
| भक्ति-मार्गकी दृष्टिसे महान् अंतर है।]
श्रीभगवानने कहा :- (१९) अच्छा; तो अब हे कुरुश्रेष्ठ ! अपनी दिव्य
विभूतियोंमेंसे तुम्हें मुख्य मुख्य बतलाता हूँ; क्योकि मेरे विस्तारका अंत नहीं है।
| [ इस विभूति-वर्णनके समानही महाभारतके अनुशासनपर्वमें (अनु. १४.
| ३११-३३१) और अनुगीतामें (अश्व. ४३, ४४) परमेश्वरके रूपका वर्णन
| है। परंतु गीताका वर्णन उसकी अपेक्षा अधिक सरस है, इस कारण उसीकी
| पुनरुक्ति और स्थलोंमेंभी मिलती है। उदाहरणार्थ, भागवत-पुराणके एकादश
| स्कंधके सोलहवें अध्यायमें इसी प्रकारका विभूति-वर्णन भगवानने उद्धवको

७७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
| समझाया है; और वही (भाग. ११. १६. ६-८) प्रारंभमें कह दिया है, कि यह
| वर्णन गीताके इस अध्यायवाले वर्णनके अनुसार है । ]
(२०) हे गुडाकेश ! सब भूतोके भीतर रहनेवाला आत्मा मैं हूँ; और (सब)
भूतोका आदि, मध्य और अंतभी मैं हूँ। (२१) (बारह) आदित्योंमेंसे विष्णु मैं
हूँ; तेजस्वियोंमें किरणमाली सूर्य, (सात अथवा उनचास) मरुतोंमें मरीचि और
नक्षत्रोंमें चंद्रमा मैं हूँ। (२२) मैं वेदोंमें सामवेद हूँ; देवताओंमें इंद्र हूँ; और
इंद्रियोंमें मन हूँ; भूतोंमें चेतना अर्थात् प्राणकी चलन-शक्ति मैं हूँ।
| [ यहाँ वर्णन है, कि मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, अर्थात् सामवेद मुख्य है; ठीक
| ऐसाही महाभारतके अनुशासनपर्वमेंभी (१४. ३१७) “सामवेदश्च वेदानां
| यजुषां शतरुद्रियम्” कहा है। पर अनुगीतामें “ॐकारः सर्ववेदानां ०” (अश्व.
| ४४. ६) इस प्रकार सब वेदोंमें ॐकारकोही श्रेष्ठता दी है; तथा गीतामेंभी
| (गीता ७. ८) पहले “प्रणवः सर्ववेदेषु” कहा है। ऐसेही गीता ९. १७ के
| “ऋक्सामयजुरेव च” इस वाक्यमें सामवेदकी अपेक्षा ऋग्वेदको अग्रस्थान
| दिया गया है और साधारण लोगोंकी समझभी ऐसीही है। इन परस्पर-विरोधी
| वर्णनोंपर कुछ लोगोंने अपनी कल्पनाओंको खूब सरपट दौड़ाया है। छांदोग्य
| उपनिषदमें ॐकारहीका नाम 'उद्गीथ' है, और लिखा है, कि यह उद्गीथ साम-
| वेदका सार है और सामवेद ऋग्वेदका सार है” (छां. १. १. २)। इस विषयके
| भिन्न भिन्न उक्त विधानोंका मेल छांदोग्यके इस वाक्यसे, सब वेदोंमें कौन वेद
| श्रेष्ठ है, हो सकता है। क्योंकि सामवेदके मंत्रभी मूल ऋग्वेदसेही लिये गये हैं।
| पर इतनेसे संतुष्ट न हो कर कुछ लोग कहते हैं, कि गीतामें सामवेदको यहाँ पर
| जो प्रधानता दी गयी है, उसका कुछ-न-कुछ गूढ कारण होना चाहिये। यद्यपि
| छांदोग्य उपनिषदमें सामवेदको प्रधानता दी है, तथापि मनुने कहा है, कि
| “सामवेदकी ध्वनि अशुचि है” (मनु. ४. १२४)। अतः एकने अनुमान किया
| है, कि सामवेदको प्रधानता देनेवाली गीता मनुसे पहलेकी होगी; और दूसरा
| कहता है, कि गीता बनानेवाला सामवेदी होगा, इसीसे उसने यहाँपर सामवेदको
| प्रधानता दी होगी। परंतु हमारी समझमें ‘मैं वेदोंमें सामवेद हूँ’ इसकी

दसवाँ अध्याय ७७५
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
| उपपत्ति लगानेके लिये इतनी दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। भक्ति-मार्गमें
| परमेश्वरकी गानयुक्त स्तुतिको सदैव प्रधानता दी जाती है। उदाहरणार्थ
| नारायणीय धर्ममें नारदने भगवान्‌का वर्णन किया है, कि "वेदेषु सपुराणेषु
| सांगोपांगेषु गीयसे" (मभा. शां. ३३४. २३), और वसु राजा ‘ ‘जप्यं
| जगौ” - जप्य गाता था (शां. ३३७. २७;, ३४२. ७०, ८१)- इस प्रकार 'गै'
| धातुकाही प्रयोग फिर किया गया है। अतएव भक्ति-प्रधान धर्ममें, यज्ञयाग आदि
| क्रियात्मक वेदोंकी अपेक्षा, गान-प्रधान वेद अर्थात् सामवेदको अधिक महत्त्व
| दिया गया हो, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं; और “मैं वेदोंमें सामवेद हूँ”
| इस कथनका हमारे मतमें सीधा और सहज कारण यही है।]
(२३) (ग्यारह) रुद्रोंमें शंकर मैं हूँ; यक्ष और राक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ; (आठ)
वसुओंमें पावक मैं हूँ; (और सात) पर्वतोंमें मेरु मैं हूँ। (२४) हे पार्थ!
पुरोहितोंमें मुख्य, बृहस्पति मुझको समझ। मैं सेनानायकोंमें स्कंद (कार्तिकेय), और
जलाशयोंमें समुद्र हूँ। (२५) महर्षियोंमें भृगु हूँ; वाणीमें एकाक्षर अर्थात् ॐकार
मैं हूँ। यज्ञोंमें जप-यज्ञ मैं हूँ; स्थावर अर्थात् स्थिर पदार्थोंमें हिमालय मैं हूँ।
| [ 'यज्ञोंमें जप-यज्ञ मैं हूँ' यह वाक्य महत्त्वका है। अनुगीतामें (मभा.
| अश्व. ४४. ८) कहा है, कि “यज्ञानां हुतमुत्तमम्” अर्थात् यज्ञोंमें (अग्निमें)
| हवि समर्पण करके सिद्ध होनेवाला यज्ञ उत्तम है; और वैदिक कर्मकांडवालोंका
| वही मत है। पर भक्ति-मार्गमें हविर्यज्ञकी अपेक्षा नाम-यज्ञ या जप-यज्ञका
| विशेष महत्त्व है, इसीसे गीतामें “यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि" कहा है। मनुनेभी
| एक स्थानपर (मनु. २.८७) कहा है, कि “और कुछ करे या न करे,
| केवल जपसेही ब्राह्मण सिद्धि पाता है।" भागवतमें "यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं"
| पाठ है।]
(२६) मैं सब वृक्षोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपल, और देवर्षियोंमें मैं नारद हूँ; गंधर्वोंमें

परिशिष्ट: गीता रचनाकाल, श्लोक अन्वय व सटीक अनुवाद

७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
चित्ररथ, और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ । (२७) घोड़ोंमें, अमृतमंथनके समय
निकला हुआ, उच्चैःश्रवा मुझे समझ । मैं गजेंद्रोंमें ऐरावत, और मनुष्योंमें राजा
हूँ । (२८) मैं आयुधोंमें वज्र, गौओमें कामधेनु, और प्रजा उत्पन्न करनेवाला
काम हूँ; सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ । (२९) नागोंमें अनंत मैं हूँ; यादस् अर्थात् जलचर
प्राणियोंमें वरुण, और पितरोंमें अर्यमा मैं हूँ; मैं नियमन करनेवालोंमें यम हूँ ।
| [ वासुकि = सर्पोंका राजा और अनंत = 'शेष' ये अर्थ निश्चित हैं, और
| अमरकोश तथा महाभारतमेंभी ये अर्थ दिये गये हैं (महा. आदि. ३५-३९
| ३९) । परंतु निश्चयपूर्वक नहीं बतलाया जा सकता, कि नाग और सर्पमें क्या
| भेद है । महाभारतके अस्ति-उपाख्यानमें इन शब्दोंका प्रयोग समानार्थकही
| है : तथापि जान पड़ता है, कि यहांपर सर्प और नग शब्दोंसे सर्पके साधारण
| वर्गकी दो भिन्न-भिन्न जातियां विवक्षित हैं । श्रीधर-टीकामें सर्पको विषैला और
| नागको विषहीन कहा है, एवं रामानुज-भाष्यमें सर्पको एक सिरवाला और
| नागको अनेक सिरोंवाला कहा है । परंतु ये दोनों भेद ठीक नहीं जँचते । क्योंकि
| कुछ स्थलोंपर नागोंकेही प्रमुख कुल बतलाते हुए उनमें अनंत और वासुकीको
| पहले गिनाया है; और वर्णन किया है, कि दोनोंभी अनेक सिरोंवाले एवं
| विषधर हैं, किंतु अनंत है अग्निवर्णका और वासुकि. है पीला ।। भागवतका
| पाठ गीताके समानही है । ]
(३०) दैत्योंमें प्रल्हाद मैं हूँ; मैं ग्रसनेवालोंमें काल, पशुओंमें मृगेन्द्र अर्थात् सिंह,
और पक्षियोंमें गरुड हूँ । (३१) मैं वेगवानांमे वायु हूँ; मैं शस्त्रधारियोंमें राम,
मछलियोंमें मगर, और नदियोंमें भागीरथी हूँ ।

दसवाँ अध्याय ७७७
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
(३२) हे अर्जुन ! सृष्टिमात्रका आदि, अन्त और मध्यभी मैं हूँ;
विद्याओंमें अध्यात्मविद्या, और वाद करनेवालोंका वाद मैं हूँ।
। [ पीछे २० वें श्लोकमें बतला दिया है, कि सचेतन भूतोंका आदि, मध्य
। और अंत मैं हूँ; तथा अब कहते हैं, कि सब चराचर सृष्टिका आदि, मध्य और
। अंत मैं हूँ; यही भेद है । ]
(३३) मैं अक्षरोंमें अकार, और समासोंमें (उभयपदप्रधान) द्वंद्व हूँ; (निमेष,
मुहूर्त आदि) अक्षय काल मैंही हूँ और सर्वतोमुख अर्थात् चारों ओरसे मुखोंवाला
धाता याने ब्रह्मा मैं हूँ; (३४) सबको क्षय करनेवाली मृत्यु, और आगे जन्म
लेनेवालोंका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ; स्त्रियोंमें कीर्ति, श्री और वाणी, स्मृति, मेधा,
धृति, तथा क्षमा मैं हूँ।
। [ कीर्ति, श्री, वाणी इत्यादि शब्दोंसेही देवियाँ, विवक्षित हैं। महाभारतमें
। (आदि. ६६. १३, १४) वर्णन है, कि इनमेंसे वाणी और क्षमाको छोड़
। शेष पाँच और दूसरी पाँच (पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, लज्जा और मति) दोनों
। मिलकर कुल दशों दक्षकी कन्याएँ हैं, और धर्मके साथ ब्याही जानेके कारण
। उन्हें धर्मपत्नी कहते हैं।]
(३५) साम अर्थात् गानेके योग्य वैदिक स्तोत्रोंमें बृहत्साम, (और) छंदोंमें
गायत्री छंद मैं हूँ; महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसंत मैं हूँ।
। [महीनोंमें मार्गशीर्षको प्रथम स्थान इसलिये दिया गया है, कि उन
। दिनोंमें बारह महीनोंको मार्गशीर्षसेही गिननेकी रीति थी। जैसे कि आजकल
। चैत्रसे है (मभा. अनु. १०६, १०९; एवं वाल्मीकिरामायण ३. १६) ।
। भागवत ११. १६. २७ मेंभी ऐसाही उल्लेख है। हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें
। लिखा है, कि मृगशीर्ष नक्षत्रको अग्रहायणी अथवा वर्षारंभका नक्षत्र कहते थे;
। जब मृगादि नक्षत्रगणनाका प्रचार था, तब मृगनक्षत्रको प्रथम अग्रस्थान मिला।

७७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
§ § यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
। और उसीसे आगे मार्गशीर्ष महीनेकोभी श्रेष्ठता मिली होगी । इस विषयको
। यहाँ विस्तारके भयसे अधिक बढ़ाना उचित नहीं है । ]
( ३६ ) मैं छलियोँका द्यूत हूँ; तेजस्वियोंका तेज, ( विजयशाली पुरुषोंकी )
विजय, ( निश्चयी पुरुषोंका ) निश्चय और, सत्त्वशीलोंका सत्त्व मैं हूँ । ( ३७ )
मैं यादवोंमें वासुदेव, पांडवोंमें धनंजय, मुनियोंमें व्यास, और कवियोंमें शुक्राचार्य
कवि हूँ । ( ३८ ) मैं शासन करनेवालोंका दंड, जयकी इच्छा करनेवालोंकी नीति,
और गुह्योंमें मौनभी हूँ । ज्ञानियोंका ज्ञान मैं हूँ । ( ३९ ) इसी प्रकार हे अर्जुन !
सब भूतोंका जो कुछ बीज है, वह मैं हूँ; ऐसा कोई चर-अचर भूत नहीं है, जो मुझे
छोड़े हो । ( ४० ) हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अंत नहीं है । विभूतियोंका
यह विस्तार मैने ( केवल ) दिग्दर्शनार्थ बतलाया है ।
। [ इस प्रकार मुख्य मुख्य विभूतियाँ बतलाकर, अब इस प्रकरणका
। उपसंहार करते हैं :- ]
( ४१ ) जो जो वस्तु वैभव, लक्ष्मी, या प्रभावसे युक्त है, उसको तू मेरे
तेजके अंशसे उपजी हुई समझ । ( ४२ ) अथवा हे अर्जुन ! तुझे इस सबको

दसवाँ अध्याय ७७९
जानकर करना क्या है ? ( संक्षेपमें बतलाये देता हूँ, कि ) मैं अपने एक ( ही )
अंशसे इस सारे जगतको व्याप्त कर रहा हूँ।
| [ अंतका श्लोक पुरुषसूक्तकी इस ऋचाके आधारपर कहा गया है -
| “ पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ” ( ऋ. १०. ९०. ३ ) ;
| और यह मंत्र छांदोग्य उपनिषदमेंभी ( छां. ३, १२. ६ ) है । 'अंश' शब्दके
| अर्थका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें ( पृ. २४७, २४८ )
| किया गया है। प्रकट है, कि जब भगवान् अपने एकही अंशसे इस जगतमें व्याप्त
| हो गये हैं, तब इसकी अपेक्षा भगवानकी पूरी महिमा बहुतही अधिक होगी ;
| और उसे बतलानेके हेतुसेही अंतिम श्लोक कहा गया है। पुरुषसूक्तमें तो
| स्पष्टही कह दिया है, कि “ एतावान् अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः ”
| इतनी इसकी वह महिमा हुई, पुरुष तो इसकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है । ]
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म-
विद्यान्तर्गत योग अर्थात् कर्मयोगशास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें,
विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

७८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
एकादशोऽध्यायः।
अर्जुन उवाच ।
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
ग्यारहवाँ अध्याय
[ जब पिछले अध्यायमें भगवानने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया, तब
उसे सुनकर अर्जुनको परमेश्वरका वह विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई । भगवानने
उसे जिस विश्वरूपका दर्शन कराया, उसका वर्णन इस अध्यायमें है। यह वर्णन
इतना सरस है, कि गीताके उत्तम भागोंमें इसकी गिनती होती है और अन्यान्य
गीताओंकी रचना करनेवालोंने इसीका अनुकरण किया है। अर्जुन प्रथम पूछता
है, कि :- ]
अर्जुनने कहा :-( १ ) मुझपर अनुग्रह करनेके लिये तुमने अध्यात्मसंज्ञक जो
परम गुप्त बात बतलायी, उससे मेरा यह मोह जाता रहा । ( २ ) इसी प्रकार हे
कमलपत्राक्ष ! भूतोंकी उत्पत्ति, लय और, ( तुम्हारा ) अक्षय माहात्म्यभी मैंने तुमसे
विस्तारसहित सुन लिया । ( ३ ) अब, हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा वर्णन
किया है, हे पुरुषोत्तम ! मैं तुम्हारे उस प्रकारके ईश्वरी स्वरूपको ( प्रत्यक्ष )
देखना चाहता हूँ । ( ४ ) हे प्रभो ! यदि तुम समझते हो, कि उस प्रकारका रूप
मैं देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर ! तुम अपना अव्यय स्वरूप मुझे दिखलाओ !
[ सातवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानके निरूपण आरंभकर सातवें और आठवेंमें
परमेश्वरके अक्षर अथवा अव्यक्त रूपका, तथा नवें एवं दसवेंमें अनेक व्यक्त
रूपोंका जो ज्ञान बतलाया है, उसीही अर्जुनने पहले श्लोकमें 'अध्यात्म' कहा
है । एक अव्यक्तसे अनेक व्यक्त पदार्थोंके निर्मित होनेका जो वर्णन सातवें
( ७. ४-१२ ), आठवें ( ८. १६-२१ ), और नवें ( ९. ४-८ ) अध्यायोंमें

ग्यारहवाँ अध्याय ७८१
श्रीभगवानुवाच ।
§ § पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
। है, वही “ भूतोंकी उत्पत्ति और लय ” इन शब्दोंसे दूसरे श्लोकमें अभिप्रेत है ।
। तीसरे श्लोकके दोनों अर्धांशोंको दो भिन्न-भिन्न वाक्य मानकर कुछ लोग उनका
। ऐसा अर्थ करते हैं, कि “ हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा ( स्वरूप-वर्णन किया,
। वह सत्य है ( अर्थात् मैं समझ गया ) ; अब हे पुरुषोत्तम ! ” मैं तुम्हारे ईश्वरी
। स्वरूपको देखना चाहता हूँ ।” ( गीता १०. १४ ) । परंतु दोनों पंक्तियोंको
। मिलाकर एकही वाक्य मानना ठीक जान पड़ता है; और परमार्थप्रपा टीकामें
। ऐसा कियाभी गया है। चौथे श्लोकमें जो 'योगेश्वर' शब्द है, उसका अर्थ
। ( योगियोंका नही ) ईश्वर है ( १८. ७५ ) । योगका अर्थ ( गीता ७. २५;
। ९. ५ ) अव्यक्त रूपसे व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी सामर्थ्य अथवा युक्ति
। पहले की जा चुकी है; अब उस सामर्थ्यसेही विश्वरूप दिखलाना है, इस कारण
। यहाँ 'योगेश्वर' संबोधनका प्रयोग सहेतुक है । ]
श्रीभगवानने कहा :- ( ५ ) हे पार्थ ! मेरे अनेक प्रकारके, अनेक रंगोंके
और आकारोंके ( इन ) सैकड़ो अथवा हजारो दिव्य रूपोंको देख । ( ६ ) ये देख,
( बारह ) आदित्य, ( आठ ), वसु, ( ग्यारह ) रुद्र, ( दो ) अश्विनीकुमार
और ( उनचास ) मरुद्गण ! हे भारत ! ये अनेक आश्चर्य देख, कि जो पहले कभी
न देखे होंगे ।
। [ नारायणीय धर्ममें नारदको जो विश्वरूप दिखलाया गया है, उसमें यह
। विशेष वर्णन है, कि बाईं ओर बारह आदित्य, सन्मुख आठ वसु, दाहिनी ओर
। ग्यारह रुद्र और पिछली ओर दो अश्विनीकुमार थे ( शां. ३३९. ५०-५२ ) ।
। परंतु यही वर्णन सर्वत्र विवक्षित नही दिखाई देता ( मभा. उ. १३० ) ।
। आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण ये वैदिक देवता हैं; और
। महाभारतमें ( शां. २०८. २३, २४ ) देवताओंके चातुर्वर्ण्यका भेद यों बतलाया
। है, कि इनमेंसे आदित्य क्षत्रिय हैं, मरुद्गण वैश्य हैं, और अश्विनीकुमार रुद्र
। हैं, शतपथब्राह्मण १४. ४. २.. २३ ) । ]
( ७ ) हे गुडाकेश ! मेरी ( इस ) देहमें सब चर-अचर जगतको आज यहाँपर

७८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
संजय उवाच ।
§ § एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभाषत ॥ १४ ॥
एकत्रित देख ले, और दूसराभी जो कुछ तुझ देखनेकी लालसा हो, उसेभी उसमें
देख ले !
(८) परंतु तू अपनी इसी दृष्टिसे मुझे देख न सकेगा, तुझे मैं दिव्य दृष्टि देता
हूं; (उससे) मेरे इस ईश्वरी योग अर्थात् योगसामर्थ्यको देख ।
संजयने कहा :-(९) हे राजा धृतराष्ट्र ! इस प्रकार कह करके फिर
योगोंके बड़े ईश्वर हरिने अर्जुनको (अपना) श्रेष्ठ ईश्वरी रूप अर्थात्
विश्वरूप दिखलाया । (१०) उसके अर्थात् उस विश्वरूपके अनेक मुख और
नेत्र थे और उसमें अनेक अद्भुत दृश्य दीख पड़ते थे; (और) उसपर अनेक
प्रकारके दिव्य अलंकार थे और उसमें नाना प्रकारके दिव्य आयुध सज्जत थे ।
(११) उस अनंत, सर्वतोमुख और सब आश्चर्योंसे भरे हुए देवताके दिव्य
सुगंधित उबटन लगा हुआ था, और वह दिव्य पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए
था । (१२) यदि आकाशमें एक हजार सूर्योंकी प्रभा एकसाथ हो, तो वह
उस महात्माकी क्रांतिके समान (कुछ कुछ) दीख पड़े ! (१३) तब अर्जुनको
देवधिदेवके इस शरीरमें नाना प्रकारसे बँटा हुआ सारा जगत् एकत्रित दिखाई
दिया । (१४) फिर आश्चर्यसे चकित होकर उसके शरीरपर रोमांच खड़े हो