श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ७८१
श्रीभगवानुवाच ।
§ § पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
। है, वही “ भूतोंकी उत्पत्ति और लय ” इन शब्दोंसे दूसरे श्लोकमें अभिप्रेत है ।
। तीसरे श्लोकके दोनों अर्धांशोंको दो भिन्न-भिन्न वाक्य मानकर कुछ लोग उनका
। ऐसा अर्थ करते हैं, कि “ हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा ( स्वरूप-वर्णन किया,
। वह सत्य है ( अर्थात् मैं समझ गया ) ; अब हे पुरुषोत्तम ! ” मैं तुम्हारे ईश्वरी
। स्वरूपको देखना चाहता हूँ ।” ( गीता १०. १४ ) । परंतु दोनों पंक्तियोंको
। मिलाकर एकही वाक्य मानना ठीक जान पड़ता है; और परमार्थप्रपा टीकामें
। ऐसा कियाभी गया है। चौथे श्लोकमें जो 'योगेश्वर' शब्द है, उसका अर्थ
। ( योगियोंका नही ) ईश्वर है ( १८. ७५ ) । योगका अर्थ ( गीता ७. २५;
। ९. ५ ) अव्यक्त रूपसे व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी सामर्थ्य अथवा युक्ति
। पहले की जा चुकी है; अब उस सामर्थ्यसेही विश्वरूप दिखलाना है, इस कारण
। यहाँ 'योगेश्वर' संबोधनका प्रयोग सहेतुक है । ]
श्रीभगवानने कहा :- ( ५ ) हे पार्थ ! मेरे अनेक प्रकारके, अनेक रंगोंके
और आकारोंके ( इन ) सैकड़ो अथवा हजारो दिव्य रूपोंको देख । ( ६ ) ये देख,
( बारह ) आदित्य, ( आठ ), वसु, ( ग्यारह ) रुद्र, ( दो ) अश्विनीकुमार
और ( उनचास ) मरुद्गण ! हे भारत ! ये अनेक आश्चर्य देख, कि जो पहले कभी
न देखे होंगे ।
। [ नारायणीय धर्ममें नारदको जो विश्वरूप दिखलाया गया है, उसमें यह
। विशेष वर्णन है, कि बाईं ओर बारह आदित्य, सन्मुख आठ वसु, दाहिनी ओर
। ग्यारह रुद्र और पिछली ओर दो अश्विनीकुमार थे ( शां. ३३९. ५०-५२ ) ।
। परंतु यही वर्णन सर्वत्र विवक्षित नही दिखाई देता ( मभा. उ. १३० ) ।
। आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण ये वैदिक देवता हैं; और
। महाभारतमें ( शां. २०८. २३, २४ ) देवताओंके चातुर्वर्ण्यका भेद यों बतलाया
। है, कि इनमेंसे आदित्य क्षत्रिय हैं, मरुद्गण वैश्य हैं, और अश्विनीकुमार रुद्र
। हैं, शतपथब्राह्मण १४. ४. २.. २३ ) । ]
( ७ ) हे गुडाकेश ! मेरी ( इस ) देहमें सब चर-अचर जगतको आज यहाँपर