श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
चौथा अध्याय ६८७
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
| इंद्रियाँ कर्म तो करती हैं, पर बुद्धि सम रहनेके कारण उन कर्मोंका पाप-पुण्य
| कर्ताको नहीं लगता । ]
(२२) यदृच्छासे जो प्राप्त हो जाय, उसमें संतुष्ट, (हर्ष-शोक आदि) द्वंद्वोंसे
मुक्त, निर्मत्सर, और (कर्मकी) सिद्धि या असिद्धिको एक-सा-ही माननेवाला पुरुष
(कर्म) करकेभी (उनके पाप-पुण्यसे) बद्ध नहीं होता । (२३) आसंगरहित,
(राग-द्वेषसे) मुक्त, (साम्य-बुद्धिरूप) ज्ञानमें स्थिर चित्तवाले और (केवल)
यज्ञहीके लिये (कर्म) करनेवाले पुरुषका कर्म समग्र विलीन हो जाता है !
| [ तीसरे अध्यायमें (गीता ३. ९) जो यह भाव है, कि मीमांसकोंके मतमें
| यज्ञके लिये किये हुए कर्म बंधक नहीं होते; और आसक्ति छोड़ कर करनेसे
| वेही कर्म स्वर्गप्रद न होकर मोक्षप्रद होते हैं, वही इस श्लोकमें बतलाया
| गया है । "समग्र विलीन हो जाता है" में 'समग्र' पद महत्त्वका है । मीमांसक
| लोग स्वर्गसुखकोही परम-साध्य मानते हैं; और उनकी दृष्टिसे स्वर्गसुखको
| प्राप्त करा देनेवाले कर्म बंधक नहीं होते । परंतु गीताकी दृष्टि स्वर्गसे परे
| अर्थात् मोक्षपर है; और इस दृष्टिसे स्वर्गप्रद कर्मभी बंधकही होते हैं । अतएव
| कहा है, कि यज्ञार्थ कर्मभी अनासक्त-बुद्धिसे करनेपर 'समग्र' लय पाते हैं अर्थात्
| स्वर्गप्रदभी न हो कर मोक्षप्रद हो जाते हैं । तथापि इस अध्यायके यज्ञप्रकरणके
| प्रतिपादनमें और तीसरे अध्यायवाले (यज्ञ-प्रकरणके) प्रतिपादनमें एक बड़ा
| भारी भेद है । तीसरे अध्यायमें कहा है, कि श्रौतस्मार्त अनादि यज्ञचक्रको स्थिर
| रखना चाहिये । परंतु अत्र भगवान् कहते हैं, कि यज्ञका इतनाही संकुचित अर्थ
| न समझो, कि देवताके उद्देश्यसे अग्निमें केवल तिल, चावल या पशुका हवन कर
| दिया जावें, अथवा चातुर्वर्ण्यके कर्म स्वधर्मके अनुसार, पर काम्य-बुद्धिसे किये
| जावें; अग्निमें आहुति छोड़ते समय अंतमे 'इदं न मम' - यह मेरा नहीं - इन
| शब्दोंका उच्चारण किया जाता है; इनमें स्वार्थत्यागरूप निर्ममत्वका जो तत्त्व
| है, वही यज्ञका प्रधान भाग है । इस रीतिसे 'न मम' कह कर अर्थात् ममतायुक्त
| बुद्धि छोड़कर, ब्रह्मार्पणपूर्वक जीवनके समस्त व्यवहार करनाभी एक बड़ा यज्ञ
| या होमही हो जाता है, और इस यज्ञसे देवाधिदेव परमेश्वर अथवा ब्रह्मका यजन
| हुआ करता है । सारांश, मीमांसकोंके द्रव्ययज्ञसंबंधी जो सिद्धान्त हैं, वे इस बड़े
| यज्ञके लियेभी उपयुक्त होते हैं; और लोकसंग्रहके निमित्त जगतके कर्म आसक्ति-
६८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥
| विरहित करनेवाला पुरुष कर्मके 'समग्र' फलसे मुक्त होता हुआ अंतमें मोक्ष
| पाता है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३४६-३५०)। ब्रह्मार्पणरूपी इस बड़े यज्ञकाही
| वर्णन अगले श्लोकमें पहले किया गया है; और फिर उसकी अपेक्षा कम
| योग्यताके अनेक लाक्षणिक यज्ञोंका स्वरूप बतलाया गया है; एवं तेंतीसवें
| श्लोकमें समग्र प्रकरणका उपसंहार कर कहा गया है, कि ऐसा "ज्ञानयज्ञही
| सबमें श्रेष्ठ है," ]
(२४) अर्पण अर्थात् हवन करनेकी क्रिया ब्रह्म है, हवि अर्थात् अर्पण
करनेका द्रव्य ब्रह्म है, ब्रह्माग्निमें ब्रह्मने हवन किया है - (इस प्रकार) जिसकी
बुद्धिमें (सभी) कर्म ब्रह्ममय, हैं, उसको ब्रह्मही मिलता है।
| [शांकरभाष्यमे 'अर्पण' शब्दका अर्थ "अर्पण करनेका साधन अर्थात्
| आचमनी इत्यादि" है; परंतु यह जरा कठिन है। इसकी अपेक्षा, अर्पण =
| अर्पण करनेकी या हवन करनेकी क्रिया, यह अर्थ अधिक सरल है। यह
| ब्रह्मार्पणपूर्वक अर्थात् निष्कामबुद्धिसे यज्ञ करनेवालोंका वर्णन हुआ। अब देव-
| ताके उद्देश्यसे अर्थात् काम्य-बुद्धिसे किये हुए यज्ञका स्वरूप बतलाते हैं:- ]
(२५) कोई कोई (कर्म)-योगी (ब्रह्मबुद्धिके बदले) देवता आदिके उद्देश्यसे
यज्ञ किया करते हैं; और कोई ब्रह्माग्निमें यज्ञसेही यज्ञका यजन करते हैं।
| [पुरुषसूक्तमें विराट्रूपी यज्ञपुरुषके देवताओं द्वारा, यजन होनेका जो
| वर्णन है - "यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ।" (ऋ. १०. ९०. १६), उसीको लक्ष्य-
| कर इस श्लोकका उत्तरार्ध कहा गया है 'यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति' ये पद ऋग्वेदके
| 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त' के समानार्थकही दीख पड़ते हैं। प्रकट है, कि इस यज्ञमे,
| जो सृष्टिके आरंभमें हुआ था, जिस विराट्रूपी पशुका हवन किया गया था, वह
| पशु, और जिस देवताका यजन किया गया था, वह देवता, ये दोनों ब्रह्मस्वरूपीही
| होंगे। सारांश, चौबीसवें श्लोकका यह वर्णनही तत्त्वदृष्टिसे ठीक है, कि सृष्टिके
| सब पदार्थोंमें सदैवही ब्रह्म भरा हुआ है, इस कारण इच्छारहित बुद्धिसे सब
| व्यवहार करते करते ब्रह्मसेही ब्रह्मका सदा यजन होता रहता है; केवल बुद्धि
| वैसी होनी चाहिये। पुरुषसूक्तको लक्ष्य कर गीतामे वही एक श्लोक नहीं है;
| प्रत्युत आगे दसवें अध्यायमेंभी (१०. ४२) इस सूक्तके अनुसार वर्णन है।
| देवताके उद्देश्यसे किये हुए यज्ञका वर्णन हो चुका; अब अग्नि, हवि इत्यादि
चौथा अध्याय ६८९
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
। शब्दोंके लाक्षणिक अर्थ लेकर बतलाते हैं, कि प्राणायाम आदि पातंजलयोगकी
। क्रियाएँ अथवा तपश्चरणभी एक प्रकारका यज्ञ होता है :— ]
(२६) और कोई श्रोत्र आदि ( कान, आँख आदि ) इंद्रियोंका संयमरूप अग्निमें
होम करते हैं; और कुछ लोग इंद्रियरूप अग्निमें ( इंद्रियोंके ) शब्द आदि विषयोंका
हवन करते हैं । (२७) और कुछ लोग इंद्रियों तथा प्राणोंके सब कर्मोंको अर्थात्
व्यापारोंको ज्ञानसे प्रज्वलित आत्मसंयमरूपी योगकी अग्निमें हवन किया करते हैं ।
। [ इन श्लोकोंमें दो-तीन प्रकारके लाक्षणिक यज्ञोंका वर्णन है । जैसे
। (१) इंद्रियोंका संयमन करना अर्थात् उनको योग्य मर्यादाके भीतर अपने अपने
। व्यवहार करने देना; (२) इंद्रियोंके विषय अर्थात् उपभोगके पदार्थ सर्वथा
। छोड़कर, इंद्रियोंको बिलकुल मार डालना; (३) न केवल इंद्रियोंके व्यापारोंको,
। प्रत्युत प्राणोंकेभी व्यापारोंको बंद कर, अर्थात् पूरी समाधि लगा करके, केवल
। आत्मानंदमेंही मग्न रहना । अब इन्हें यज्ञकी उपमा दी जाय, तो पहले प्रकारमें
। इंद्रियोंको मर्यादित करनेकी क्रिया ( संयमन ) अग्नि हुई, क्योंकि दृष्टान्तसे
। यह कहा जा सकता है, कि इस मर्यादाके भीतर जो कुछ आ जाय, उसका
। उसमें हवन हो गया । इसी प्रकार दूसरेमें साक्षात् इंद्रियाँ और तीसरे प्रकारमें
। इंद्रियाँ एवं प्राण मिलकर दोनों होम करनेके द्रव्य हो जाते हैं और आत्मसंयम
। अग्नि है; इसके अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे हैं, जो निरा प्राणायामही किया करते
। हैं; उनका वर्णन उनतीसवें श्लोकमें हैं। 'यज्ञ' शब्दके मूल अर्थ द्रव्यात्मक यज्ञको
। लक्षणासे विस्तृत और व्यापक कर तप, संन्यास, समाधि एवं प्राणायाम प्रभृति
। भगवत्प्राप्तिके सब प्रकारके साधनोंका एक 'यज्ञ' शीर्षकमेंही समावेश कर
। देनेकी भगवद्गीताकी यह कल्पना कुछ अपूर्व नहीं है । मनुस्मृतिके चौथे अध्यायमें
। गृहस्थाश्रमके वर्णनके सिलसिलेमें पहले यह बतलाया गया है, कि ऋषियज्ञ,
। देवयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ – इन स्मार्त पंचमहायज्ञोंको कोई
। गृहस्थ न छोड़े; और फिर कहा है, कि इनके बदले कोई कोई " इंद्रियोंमें वाणीका
। हवनकर, अथवा वाणीमें प्राणका हवन करके या अंतमे ज्ञानयज्ञमेभी परमेश्वरका
। यजन करते हैं" ( मनु. ४. २१–२४ ) । इतिहासकी दृष्टिसे देखें, तो विदित
। होता है, कि इंद्र-वरुण प्रभृति देवताओंके उद्देश्यसे जो द्रव्यमय यज्ञ श्रौत ग्रंथोंमे
। कहे गये हैं, उनका प्रचार धीरे धीरे घटता गया; और जब पातंजलयोगसे,
गी. र. ४४
६९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
संन्याससे अथवा आध्यात्मिक ज्ञानसे परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेके मार्ग अधिका-
धिक प्रचलित होने लगे, तब 'यज्ञ' शब्दका अर्थ विस्तृतकर उसीमें मोक्षके
समग्र उपायोंका लक्षणासे समावेश करनेका आरंभ हुआ होगा। इसका मर्म
यही है, कि पहले जो शब्द धर्मकी दृष्टिसे प्रचलित हो गये थे, उन्हीका उपयोग
अगले धर्ममार्गके लियेभी किया जावे। कुछभी हो; मनुस्मृतिके विवेचनसे यह
स्पष्ट हो जाता है, कि गीताके पहले या कम-से-कम उस कालमें तो उक्त कल्पना
सर्वमान्य हो चुकी थी।]
(२८) इस प्रकार तीक्ष्ण व्रतका आचरण करनेवाले यति अर्थात् संयमी पुरुष कोई
द्रव्यरूप, कोई तपरूप, कोई योगरूप, कोई स्वाध्याय अर्थात् नित्य स्वकर्मानुष्ठानरूप,
और कोई ज्ञानरूप यज्ञ किया करते हैं। (२९) प्राणायाममें तत्पर होकर प्राण और
अपानकी गतिको रोक करके, कोई प्राणवायुका अपानमें (हवन किया करते हैं)
और कोई अपानवायुका प्राणमें हवन किया करते हैं।
[इस श्लोकका तात्पर्य यह है, कि पातंजलयोगके अनुसार प्राणायाम
करनाभी एक यज्ञही है। यह पातंजलयोगरूप यज्ञ उनतीसवें श्लोकमें बतलाया
गया है, अतः अठ्ठाईसवें श्लोकके 'योगरूप यज्ञ' पदका अर्थ कर्मयोगरूपी यज्ञ
करना चाहिये। प्राणायाम शब्दके 'प्राण' शब्दसे श्वास और उच्छ्वास, दोनों
क्रियाएँ प्रकट होती हैं; परंतु जब प्राण और अपानका भेद करना होता है, तब
प्राण = बाहर जानेवाला अर्थात् उच्छ्वास वायु, और अपान = भीतर आनेवाला
श्वास, यह अर्थ किया जाता है (वे. सू. शां. भा. २. ४. १२; छांदोग्य. शां.
भा. १. ३. ३)। ध्यान रहे, कि प्राण और अपानके ये अर्थ प्रचलित अर्थोंसे
भिन्न हैं। इस अर्थमेंसे अपानमें अर्थात् भीतर खींचे हुए श्वासमें प्राणका -
उच्छ्वासका - होम करनेसे पूरक नामका प्राणायाम होता है; और इसके
विपरीत प्राणमें अपानका होम करनेसे रेचक प्राणायाम होता है। प्राण और
अपान, इन दोनोंकेही निरोधसे वही प्राणायाम कुम्भक हो जाता है। अब
इनके सिवा व्यान, उदान और समान ये तीन वायु बचे रहे। इनमेंसे व्यान,
प्राण और अपानके संधिस्थलोंमें रहता है, धनुष्य खींचने, वजन उठाने आदि
दम रोककर या आधे श्वासका दमन करके शक्तिके काम करते समय व्यक्त
होता है (छां. १. ३. ५)। मरणसमयमें निकल जानेवाले वायुको उदान
चौथा अध्याय ६९१
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
। कहते हैं ( प्रश्न ३.७), और शरीरके सब स्थानोंपर एक-सा अन्नरस पहुँचाने-
। वाले वायुको समान कहते हैं (प्रश्न. ३.५) – इस प्रकार वेदान्त-
। शास्त्रमें इन शब्दोंके सामान्य अर्थ दिये गये हैं। परंतु कुछ स्थलोंपर इनसे
। निराले अर्थ अभिप्रेत होते हैं; उदाहरणार्थ, महाभारतके वनपर्वके २१२ वें
। अध्यायमें प्राण आदि वायुओंके निरालेही लक्षण दिये गये हैं और उसमें कहा
। है, कि प्राण मस्तकका वायु है और अपान नीचे सरकनेवाला वायु है (प्रश्न.
। ३.५ मैत्र्यु. २.६ ) । ऊपरके श्लोकमें जो वर्णन है, उसका यह अर्थ है, कि
। इनमेंसे जिस वायुका निरोध करते हैं, उसका अन्य वायुओमें होम होता है । ]
(३०-३१) और कुछ लोग आहारको नियमित कर प्राणोंकाही प्राणोंमें होम
किया करते हैं। ये सभी लोग सनातन ब्रह्ममें जा मिलते हैं, कि जो यज्ञके जाननेवाले
हैं, जिनके पाप यज्ञसे क्षीण हो गये हैं, (और जो) अमृतका अर्थात् यज्ञसे बचे
हुएका उपभोग करनेवाले हैं। यज्ञ न करनेवालेको (जब) इस लोगमें सफलता
नहीं होती। (तब) फिर हे कुरुश्रेष्ठ ! (उसे) परलोक कहांसे (मिलेगा) ?
। [सारांश, यज्ञ करना यद्यपि वेदकी आज्ञाके अनुसार मनुष्यका कर्तव्य
। है, तोभी यह यज्ञ एकही प्रकारका नहीं होता। प्राणायाम करो, तप करो,
। वेदका अध्ययन करो, अग्निष्टोम करो, पशुयज्ञ करो, तिल-चावल अथवा घीका
। हवन करो, पूजापाठ करो या नैवेद्य-वैश्वदेव आदि पाँच गृहयज्ञ करो; फला-
। सक्तिके छूट जानेपर ये सब व्यापक अर्थमें यज्ञही हैं और फिर यज्ञशेष-
। भक्षणके विषयमें मीमांसकोंके जो सिद्धान्त हैं, वे सब इनमेंसे प्रत्येक यज्ञके
। लिये उपयुक्त हो जाते हैं। इनमेंसे पहला नियम यह है, कि "यज्ञके अर्थ किया
। हुआ कर्म बंधक नहीं होता", और इसका वर्णन तेईसवें श्लोकमें हो चुका है
। (गीता ३. ९ पर टिप्पणी देखो) । अब दूसरा नियम यह है, कि प्रत्येक
। गृहस्थ पंचमहायज्ञ कर अतिथि आदिके भोजन कर चुकनेपर फिर अपनी पत्नी-
। सहित भोजन करे; और इस प्रकार बर्तनेसे गृहस्थाश्रम सफल होकर सद्गति
। देता है। "विघसं भुक्तशेषं तु यज्ञशेषमथामृतम्” (मनु. ३. २८५) –
। अतिथि वगैरहके भोजन कर चुकनेपर जो बचे, उसे 'विघस' और यज्ञ करनेसे
। जो शेष रहे, उसे 'अमृत' कहते हैं; इस प्रकार व्याख्या करके मनुस्मृति और
। अन्य स्मृतियोंमेंभी कहा है, कि प्रत्येक गृहस्थको नित्य विघसाशी और अमृताशी
। होना चाहिये (गीता ३. १३; गीतारहस्य प्र. १०, पृ. २९४) । अब भगवान्
६९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
| कहते हैं कि सामान्य गृहयज्ञको उपयुक्त होनेवाला यह सिद्धान्तही सब प्रकारके ,
| उक्त यज्ञोंको उपयोगी होता है। यज्ञके अर्थ किया हुआ कोईभी कर्म बंधक नहीं
| होता, यही नहीं, बल्कि उन कर्मोंमेंसे अवशिष्ट काम यदि अपने निजी उपयोगमें
| आ जावें, तोभी वे बंधक नहीं होते ( गीतार. प्र. १२, पृ. ३८६ ) । “ बिना
| यज्ञके इहलोकभी सिद्ध नहीं होता ” यह अंतिम वाक्य मार्मिक और महत्त्वका
| है। उसका अर्थ इतनाही नहीं है, कि यज्ञके बिना पानी नहीं बरसता; और
| पानीके न बरसनेसे इस लोककी गुजर नहीं होती; किंतु 'यज्ञ' शब्दका
| व्यापक अर्थ लेकर, इस सामाजिक तत्त्वकाभी उसमें पर्यायसे समावेश हुआ है,
| कि अपनी कुछ प्यारी बातोंको छोड़े बिना न तो सबको एक-सी सुविधा मिल
| सकती है; और न जगतके व्यवहारभी चल सकते हैं। उदाहरणार्थ, पश्चिमी
| समाजशास्त्रप्रणेता जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि हरएकके अपनी स्वतंत्रताको
| परिमित किये बिना औरोंको एक-सी स्वतंत्रता नही मिल सकती है, वही इस
| तत्त्वका उदाहरण है; और, यदि गीताकी परिभाषामें इसी अर्थको कहना हो,
| तो इस स्थलपर ऐसी यज्ञप्रधान भाषाकाही प्रयोग करना पड़ेगा, कि “ जबतक
| प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वतंत्रताके कुछ अंशकाभी यज्ञ न करे, तबतक इस लोकके
| व्यवहार चल नहीं सकते । ” इस प्रकारके व्यापक और विस्तृत अर्थसे जब यह
| निश्चय हो चुका, कि यज्ञही सारी समाजरचनाका आधार है, तब कहना नहीं
| होगा, कि केवल कर्तव्यकी दृष्टिसे उक्त 'यज्ञ' करना जबतक प्रत्येक मनुष्य न
| सीखेगा, तबतक समाजकी व्यवस्था ठीक न रहेगी । ]
( ३२ ) इस प्रकार भाँति भाँतिके यज्ञ ब्रह्मके ( ही ) मुखमें जारी हैं। यह जान,
कि वे सब कर्मसे निष्पन्न होते हैं। यह ज्ञान हो जानेसे तू मुक्त हो जायगा ।
| [ ज्योतिष्टोम आदि द्रव्यमय श्रौतयज्ञ अग्निमें हवन करके किये जाते
| हैं और शास्त्रमें कहा है, कि देवताओंका मुख अग्नि है, इस कारण ये यज्ञ उन
| देवताओंको मिल जाते हैं। परंतु यदि कोई शंका करे, कि देवताओंके मुख -
| अग्नि - में उक्त लाक्षणिक यज्ञ नहीं होते, अतः लाक्षणिक यज्ञोंसे श्रेयःप्राप्ति
| होगी कैसे, तो उसे दूर करनेके लिये, कहा है, कि अब ये यज्ञ साक्षात् ब्रह्मकेही
| मुखमें होती हैं। दूसरे चरणका भावार्थ यह है, कि जिस पुरुषने यज्ञविधिके इस
| व्यापक स्वरूपको - केवल मीमांसकोंके संकुचित अर्थकोही नहीं - जान लिया,
| उसकी बुद्धि संकुचित नही रहती, किंतु वह ब्रह्मके स्वरूपको पहचाननेका अधि-
| कारी हो जाता है। अब बतलाते हैं, कि इन सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ यज्ञ कौन है :- ]
चौथा अध्याय ६९३
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
§ § तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४ ॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
( ३३ ) हे परंतप ! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योकि, हे पार्थ !
सब प्रकारके समस्त कर्मोंका पर्यवसान ज्ञानमें होता है।
| [ 'ज्ञानयज्ञ' शब्द आगेभी दो बार गीतामें आया है ( गीता ९. १५;
| १८. ७० ) । हम जो द्रव्यमय यज्ञ करते हैं, वह परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये
| किया करते हैं। परंतु परमेश्वरकी प्राप्ति, उसके स्वरूपका ज्ञान हुए बिना नहीं
| होती। अतएव परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर, उस ज्ञानके अनुसार
| आचरण करके परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेके मार्ग या साधनको 'ज्ञानयज्ञ'
| कहते हैं। यह यज्ञ मानस और बुद्धिसाध्य है, अतः द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा
| इसकी योग्यता अधिक समझी जाती है। मोक्षशास्त्रमें ज्ञानयज्ञका यह ज्ञानही
| मुख्य है, और इसी ज्ञानसे सब कर्मोंका क्षय हो जाता है, कुछभी हो; गीताका
| यह स्थिर सिद्धान्त है, कि अंतमें परमेश्वरका ज्ञान होना चाहिये, बिना ज्ञानके
| मोक्ष नहीं मिलता। तथापि "कर्मका पर्यवसान ज्ञानमें होता है" इस वचनका
| यह अर्थ नहीं है, कि ज्ञानके पश्चात् कर्मोंको छोड़ देना चाहिये - यह बात
| गीतारहस्यके दसवें और ग्यारहवें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक प्रतिपादन की गई
| है। अपने लिये नहीं, तो लोकसंग्रहके निमित्त कर्तव्य समझकर सभी कर्म
| करनेही चाहिये; और जब कि वे ज्ञान एवं समबुद्धिसे किये जाते हैं, तब उनके
| पापपुण्यकी बाधा कर्ताको नहीं होती (आगे ३७ वाँ श्लोक देखो) और यह
| ज्ञानयज्ञ मोक्षप्रद होता है। अतः गीताका सब लोगोंको यही उपदेश है, कि यज्ञ
| करो, किंतु ज्ञानपूर्वक निष्काम बुद्धिसे करो । ]
( ३४ ) ध्यानमें रख, कि प्रणिपातसे, प्रश्न करनेसे और सेवा करनेसे
तत्त्ववेत्ता ज्ञानी पुरुष तुझे उस ज्ञानका उपदेश करेंगे; ( ३५ ) जिस ज्ञानको
पाकर, हे पांडव ! फिर तुझे ऐसा मोह नहीं होगा, और जिस ज्ञानके योगसे समस्त
प्राणियोंको तू अपनेमें और मुझमें भी देखेगा ।
| [ सब प्राणियोंको अपनेमें और अपनेको सब प्राणियोंमें देखनेका, समस्त
| प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताका आगे जो जो ज्ञान, वर्णित है ( गीता ६. २९ ),
६९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
§§ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
| उसीका यहाँ उल्लेख किया गया है । मूलमें आत्मा और भगवान्, दोनों एकरूप
| हैं, अतएव आत्मामें सब प्राणियोंका समावेश होता है, अर्थात् भगवान्मेंभी
| उनका समावेश होकर, आगे आत्मा (मैं), अन्य प्राणी और भगवान् यह
| त्रिविध भेद नष्ट हो जाता है । इसीलिये भागवत पुराणमें भगवद्भक्तोंका
| लक्षण देते हुए कहा है, कि " सब प्राणियोंको भगवान्में और अपनेमें जो देखता
| है, उसे उत्तम भागवत कहना चाहिये " ( भाग. ११. २. ४५ ) । इस महत्त्वके
| नीतितत्त्वका अधिक स्पष्टीकरण गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमें ( पृ. ३९१-
| ३९९) और भक्ति-दृष्टिसे तेरहवें प्रकरणमें (पृ. ४३०-४३१) किया गया है । ]
( ३६ ) सब पापियोंसे यदि अधिक पाप करनेवाला हो, तोभी ( इस ) ज्ञान-
नौकासेही तू सब पापोंको पारकर जावेगा । (३७) जिस प्रकार प्रज्वलित की हुई
अग्नि (सब) ईंधनको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार हे अर्जुन ! (यह) ज्ञानरूप
अग्नि सब कर्मोंको ( शुभ-अशुभ बंधनोंको ) जला डालती है ।
| [ज्ञानकी महत्ता बतला दी । अब बतलाते हैं, कि इस ज्ञानकी प्राप्ति
| किन उपायोंसे होती है :-]
(३८) इस लोकमें ज्ञानके समान पवित्र सचमुचही और कुछभी नहीं है ।
काल पाकर जिसको योग अर्थात् कर्मयोग सिद्ध हो गया है वह पुरुष आप-ही उस
ज्ञानको अपनेमें प्राप्त कर लेता है ।
| [३७ वें श्लोकमें 'कर्मों'का अर्थ 'कर्मका बंधन' है ( गीता ४. १९
| देखो)। अपनी बुद्धिसे आरंभ किये हुए निष्काम कर्मोंके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति
| कर लेना, ज्ञानकी प्राप्तिका मुख्य या बुद्धिगम्य मार्ग है । परंतु जो स्वयं इस
| प्रकार अपनी बुद्धिसे ज्ञानको प्राप्त न कर सके, उसके लिये अब श्रद्धाका दूसरा
| मार्ग बतलाते हैं :- ]
(३९) जो श्रद्धावान् पुरुष इंद्रियसंयम करके उसीके पीछे पड़ा रहे, उसे (भी) यह
चौथा अध्याय ६९५
अज्ञाश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
§ § योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
ज्ञान मिल जाता है; और ज्ञान प्राप्त हो जानेसे तुरंतही उसे परम शांति प्राप्त
होती है ।
। [ सारांश, बुद्धिसे जो ज्ञान और शांति प्राप्त होगी, वही श्रद्धासेभी
। मिलती है ( गीता १३. २५ ) । परंतु जिसके अपनी बुद्धि नहीं और श्रद्धाभी
। नहीं, वह :- ]
(४०) परंतु जिसे न स्वयं ज्ञान है और न श्रद्धाभी है, उस संशयग्रस्त मनुष्यका
नाश हो जाता है । संशयग्रस्तको न यह लोक है (और) न परलोक, एवं सुखभी
नहीं है ।
। [ ज्ञानप्राप्तिके ये दो मार्ग बतला चुके; एक अपनी बुद्धिका और दूसरा
। श्रद्धाका । अब ज्ञान और कर्मयोगका पृथक् उपयोग दिखलाकर समस्त विषयका
। उपसंहार करते हैं :- ]
(४१) हे धनंजय ! उस आत्मज्ञानी पुरुषको कर्म बद्ध नहीं कर सकते, कि
जिसने ( कर्म-) योगके आश्रयसे कर्म अर्थात् कर्मबंधन त्याग दिये हैं, और ज्ञानसे
जिसके (सब) संदेह दूर हो गये हैं । (४२) इसलिये अपने हृदयमें अज्ञानसे
उत्पन्न हुए इस संशयको ज्ञानरूप तलवारसे काटकर, ( कर्म-) योगका आश्रय कर ।
(और) हे भारत ! ( युद्धके लिये ) खड़ा हो !
। [ ईशावास्य उपनिषदमें 'विद्या' और 'अविद्या' का पृथक् उपयोग दिखला
। कर जिस प्रकार दोनोंको बिना छोड़ेही आचरण करनेके लिये कहा गया है
। ( ईश. ११; गीतार. प्र. ११, पृ. ३५७ ) ; उसी प्रकार गीताके इन दो श्लोकोंमें
। ज्ञान और (कर्म-) योगका पृथक् उपयोग दिखलाकर उनके अर्थात् ज्ञान और
। योगके समुच्चयसेही कर्म करनेके विषयमें अर्जुनको उपदेश दिया गया है । इन
। दोनोंका पृथक् पृथक् उपयोग यह है, कि निष्काम बुद्धियोगके द्वारा कर्म करनेपर
६९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
| उनके बंधन टूट जाते हैं; और वे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते; एवं ज्ञानसे
| मनके संदेह दूर होकर मोक्ष मिलता है। अतः अंतिम उपदेश यह है, कि अकेले
| कर्म या अकेले ज्ञानको स्वीकार न कर; किंतु ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक कर्मयोगका
| आश्रय करके युद्ध कर। योगका आश्रय करके युद्धके लिये खड़ा रहना था,
| इस कारण गीतारहस्यके प्र. ३, पृ. ५६ में दिखलाया गया है, कि योग शब्दका
| अर्थ यहाँ 'कर्मयोग' ही लेना चाहिये। ज्ञान और योगका यह मेलही 'ज्ञानयोग-
| व्यवस्थितिः' पदसे आगे दैवी संपत्तिके लक्षणमें ( गीता १६. १ ) फिर
| बतलाया गया है। ]
इस प्रकार श्रीभगवान्के गाये हुए-अर्थात् कहे हुए-उपनिषदमें, ब्रह्म-
विद्यान्तर्गत योग-अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ।
| [ध्यान रहे, कि 'ज्ञान-कर्म-संन्यास' पदमें 'संन्यास' शब्दका अर्थ स्वरूपतः
| 'कर्मत्याग' नहीं है, किंतु निष्काम बुद्धिसे परमेश्वरमें कर्मका संन्यास अर्थात्
| 'अर्पण करना' अर्थ है; और आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें उसीका
| स्पष्टीकरण किया गया है।]
पाँचवाँ अध्याय ६९७
पंचमोऽध्यायः ।
अर्जुन उवाच ।
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
तच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच ।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ :
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
पाँचवाँ अध्याय
[ चौथे अध्यायके सिद्धान्तपर संन्यास-मार्गवालोंकी जो शंका हो सकती है,
उसेही अर्जुनके मुखसे, प्रश्नरूपसे कहलाकर, इस अध्यायमें, भगवानने उसका स्पष्ट
उत्तर दिया है । यदि समस्त कर्मोंका पर्यवसान ज्ञान है (गी. ४. ३३), यदि
ज्ञानसेही संपूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (४. ३७) ; और यदि द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा
ज्ञानयज्ञही श्रेष्ठ है (४. ३३) ; तो दूसरेही अध्यायमें यह कहकर, कि “धर्म्य
युद्ध करनाही क्षत्रियको श्रेयस्कर है” (गी. २. २१), चौथे अध्यायके उपसंहारमें
यह बात क्यों कही गई है, कि “अतएव तू कर्मयोगका आश्रय कर, युद्धके लिये उठ
खड़ा हो” (गी. ४. ४२) ? इस प्रश्नका गीता यह उत्तर देती हैं, कि समस्त संदेहोंको
दूरकर मोक्षप्राप्तिके लिये ज्ञानकी आवश्यकता है, और यदि मोक्षके लिये कर्म
आवश्यक न हों, तोभी कभी न छूटनेके कारण वे लोकसंग्रहार्थ आवश्यक है; इस
प्रकार ज्ञान और कर्म, दोनोंकेही समुच्चयकी नित्य अपेक्षा है (४. ४१) । परंतु
इसपरभी शंका होती है, कि यदि कर्मयोग और सांख्य, दोनों मार्ग शास्त्रमें विहित
हैं, तो उनमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सांख्यमार्गको स्वीकारकर कर्मोंका त्याग
करनेमें हानि क्या है ? अर्थात् इसकाभी पूरा निर्णय हो जाना चाहिये, कि इन दोनों
मार्गोंमें श्रेष्ठ कौन-सा है; और अर्जुनके मनमें यही शंका हुई है । उसने तीसरे
अध्यायके आरंभमें जैसा प्रश्न किया था, वैसा ही अबभी वह पूछता है, कि :-]
(१) अर्जुनने कहा :- हे कृष्ण ! (तुम) एक बार संन्यासको और दूसरी
बार कर्मोंके योगको (अर्थात् कर्म करते रहनेके मार्गकोही) उत्तम बतलाते हो;
अब निश्चय कर मुझे एकही (मार्ग) बतलाओ, कि जो इन दोनोंमें सचमुचही
श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशस्त हो । (२) श्रीभगवानने कहा :- कर्म-संन्यास और
कर्मयोग, (दोनों निष्ठाएँ या मार्ग) निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्ष प्राप्त करा देनेवाले
६९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
हैं; परंतु ( अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंकी योग्यता समान होने परभी ) इन
दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है ।
[ उक्त प्रश्न और उत्तर, दोनों निःसंदिग्ध और स्पष्ट हैं। व्याकरणकी
दृष्टिसे पहले श्लोकके 'श्रेय' शब्दका अर्थ अधिक प्रशस्त या बहुत अच्छा
है; और दोनों मार्गोंके तारतम्य-भावविषयक अर्जुनके प्रश्नकाही यह उत्तर है,
कि “कर्मयोगो विशिष्यते” - कर्मयोगकी योग्यता विशेष है ! तथापि यह सिद्धान्त
सांख्यमार्गको इष्ट नहीं है, क्योंकि उसका कथन है, कि ज्ञानके पश्चात् सब
कर्मोंका स्वरूपतः संन्यासही करना चाहिये; इस कारण इन स्पष्ट-अर्थवाले प्रश्नों-
तरोंकी कुछ लोगोने व्यर्थ खींचातानी की है; और जब यह खींचातानी करने-
परभी निर्वाह न हुआ, तब उन लोगोंने यह तुर्रा लगाकर किसी प्रकार अपना
समाधान कर लिया है, कि 'विशिष्यते' (योग्यता या विशेषता) पदसे भगवानने
कर्मयोगकी अर्थवादात्मक अर्थात् कोरी स्तुति कर दी है, असलमें भगवानका ठीक
अभिप्राय वैसा नहीं है ! यदि भगवानका यह मत होता, कि ज्ञानके पश्चात् कर्मोंकी
आवश्यकता नहीं है; तो क्या वे अर्जुनको यह उत्तर नहीं दे सकते थे, कि “ इन
दोनोंमें संन्यास श्रेष्ठ है ?” परंतु ऐसा न करके उन्होने दूसरे श्लोकके पहले चरणमें
बतलाया है, कि “ कर्मोंका करना और कर्मोंको छोड़ देना “ ये दोनों मार्ग एक-हीसे
मोक्षदाता हैं;” और आगे 'तु' अर्थात् 'परंतु' पदका प्रयोग करके जब भगवानने
यह निःसंदिग्ध विधान किया है, कि 'तयोः' अर्थात् इन दोनों मार्गोंमें कर्म छोड़नेके
मार्गकी अपेक्षा कर्म करनेका पक्षही अधिक प्रशस्त (श्रेय) है; तब पूर्णतया सिद्ध
हो जाता है, कि भगवानको यही मत ग्राह्य है, कि साधनावस्थामें ज्ञानप्राप्तिके
लिये किये जानेवाले निष्काम कर्मोंकोही, ज्ञानी पुरुष आगे सिद्धावस्थामेंभी लोक-
संग्रहके अर्थ मरणपर्यंत कर्तव्य समझकर करता रहे। यही अर्थ गीता ३.७ में
वर्णित है और यही 'विशिष्यते' पद वहाँभी है, और उसके अगले श्लोकमें अर्थात्
गीता ३.८ में ये स्पष्ट शब्द फिरभी हैं, कि “अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है।”
इसमें संदेह नहीं, कि उपनिषदोंमें कई स्थलों पर ( बृ. ४.४.२२ ) वर्णन है,
कि ज्ञानी पुरुष लोकैषणा और पुत्रैषणा प्रभृति न रख कर भिक्षा माँगते हुए घूमा
करते हैं। परंतु उपनिषदोंमेंभी यह नहीं कहा है, कि ज्ञानके पश्चात् यह एक-ही
मार्ग है दूसरा नहीं है। अतः केवल उल्लिखित उपनिषद्-वाक्यसेही गीताकी एक-
वाक्यता करना उचित नहीं है। गीताका यह कथन नहीं है, कि उपनिषदोंमें वर्णित
यह संन्यास-मार्ग मोक्षप्रद नही है; किंतु यद्यपि कर्मयोग और संन्यास, दोनों
मार्ग एक-सेही मोक्षप्रद है, तथापि, अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंका फल एकही
होने परभो, जगतके व्यवहारका विचार करनेपर गीताका यह निश्चित मत है,
कि ज्ञानके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेका मार्गही अधिक प्रशस्त
या श्रेष्ठ है। हमारा किया हुआ यह अर्थ गीताके बहुतेरे टीकाकारोंको मान्य नहीं
पाँचवाँ अध्याय ६९९
§ § ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥
| है; उन्होंने कर्मयोगको गौण निश्चित किया है। परंतु हमारी समझमें ये अर्थ
| सरल नहीं हैं; और गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (विशेषकर पृ. ३०६-३१५) में
| इसके कारणोंका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है, इस कारण यहाँ उसके दुहरानेकी
| आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार दोनोंमेंसे अधिक प्रशस्त मार्गका निर्णय कर
| दिया गया; अब यह सिद्ध कर दिखलाते हैं, कि ये दोनों मार्ग व्यवहारमें
| यदि लोगोंको भिन्न दीख पड़े तोभी तत्त्वतः वे दो नहीं हैं:- ]
(३) जो (किसीकाभी) द्वेष नहीं करता और (किसीकीभी) इच्छा
नहीं करता, उस पुरुषको (कर्म करनेपरभी) नित्यसंन्यासी समझना चाहिये;
क्योंकि, हे महाबाहु अर्जुन ! जो ( सुखःदुख आदि ) द्वंद्वोंसे मुक्त हो जाय, वह
अनायासही (कर्मोंके सब) बंधोंसे मुक्त हो जाता है। (४) मूर्ख लोग कहते हैं,
कि सांख्य (कर्मसंन्यास) और योग (कर्मयोग) भिन्न भिन्न हैं, परंतु पंडित
लोग ऐसा नहीं कहते। किसीभी एक मार्गका भलीभाँति आचरण करनेसे दोनोंका
फल मिल जाता है। (५) जिस (मोक्ष-)स्थानमें सांख्य-(मार्गवाले लोग)
पहुँचते हैं, वहीं योगी अर्थात् कर्मयोगीभी जाते हैं। (इस रीतिसे) जिसने यह जान
लिया, कि सांख्य और योग, (ये दोनों मार्ग) एकही हैं उसीने (ठीक तत्त्वको)
पहचाना। (६) हे महाबाहु ! योग अर्थात् कर्मके बिना संन्यासको प्राप्त कर लेना
कठिन है। जो मुनि कर्मयोगयुक्त हो गया, उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेमें विलंब नहीं
लगता।
| [सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवे अध्यायतक इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन
| किया गया है, कि सांख्यमार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसे अर्थात् कर्मोंके
| न छोड़नेपरभी मिलता है। यहाँ तो इतनाही कहना है, कि मोक्षकी दृष्टिसे
| दोनोंमें कुछ फर्क नहीं है, इस कारण अनादि कालसे चलते आये हुए इन
| दोनों मार्गोंका भेदभाव बढ़ाकर झगड़ा करना उचित नहीं है; और आगेभी
७०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
। यही युक्तियाँ पुनः पुनः आई हैं (गीता ६. २ ; १८ . १, २ एवं उनकी टिप्पणी
। देखो) । "एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति" यही श्लोक कुछ
। शब्दभेदसे महाभारतमेंभी दो वार आया है (शां. ३०५ . १९ ; ३१६. ४) ।
। संन्यास-मार्गमें ज्ञानको प्रधान मान लेनेपरभी उस ज्ञानकी सिद्धि कर्म किये बिना
। नहीं होती; और कर्म-मार्गमें यद्यपि कर्म किया करते हैं, तोभी वे ज्ञानपूर्वक
। होते हैं, इस कारण ब्रह्मप्राप्तिमें कोई बाधा नहीं होती (गीता ६. २) ; फिर
। इस झगड़ेको बढ़ानेमें क्या लाभ है, कि दोनों मार्ग भिन्न भिन्न हैं? यदि कहा
। जाय, कि कर्म करनाही बंधक है, तो अब बतलाते हैं, कि वह आक्षेपभी निष्काम
। कर्मके विषयमें नहीं किया जा सकता :- ]
(७) जो (कर्म-) योगयुक्त हो गया, जिसका अंतःकरण शुद्ध हो गया, जिसने
अपने मन और इंद्रियोंको जीत लिया, और सब प्राणियोंका आत्माही जिसका आत्मा
हो गया, वह ( सब कर्म ) करता हुआभी ( कर्मोंके पाप-पुण्यसे ) अलिप्त रहता है।
(८) योगयुक्त तत्त्ववेत्ता पुरुषको समझना चाहिये, कि "मैं कुछभी नहीं करता;
(और) देखनेमें, सुननेमें, स्पर्श करनेमें, खानेमें, सूंघनेमें, चलनेमें, सोनेमें, साँस
लेनेछोड़नेमें, (९) बोलनेमें, विसर्जन करनेमें, लेनेमें, आँखोंके पलक खोलने और
बंद करनेमेंभी, वह ऐसी बुद्धि रख कर (व्यवहार करे) कि (केवल) इंद्रियाँ अपने
अपने विषयोंमें वर्तती हैं।
। [ अंतके दो श्लोक मिल कर एक-ही वाक्य बना है और उसमें बतलाये
। हुए सब कर्म भिन्न भिन्न इंद्रियोंके व्यापार हैं; उदाहरणार्थ, विसर्जन करना
। गुदका, लेना हाथका, पलक हिलाना प्राणवायुका, देखना आँखोंका इत्यादि । “मैं
। कुछभी नहीं करता” इसका यह मतलब नहीं, कि इंद्रियोंको चाहे जो करने
। दे; किंतु मतलब यह है, कि 'मैं' इस अहंकार-बुद्धिके छूट जानेसे अचेतन इंद्रियाँ
। आपही आप कोई बुरा काम नहीं कर सकतीं, और वे आत्माके काबूमें रहती
। हैं। सारांश, कोई पुरुष ज्ञानी हो जाय, तोभी श्वासोच्छ्वास आदि इंद्रियोंके कर्म
। उसकी इंद्रियाँ करतीही रहेंगी। यही क्यों पलभर जीवित रहनाभी कर्मही है।
। फिर यह भेद कहाँ रह गया, कि संन्यास-मार्गका ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ता है और
पाँचवाँ अध्याय ७०१
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
| कर्मयोगी करता है ? कर्म तो दोनोंकोभी करनाही पड़ता है । पर अहंकारयुक्त
| आसक्ति छूट जानेसे वेही कर्म बंधक नहीं होते, इस कारण आसक्तिका छोड़-
| नाही इसका मुख्य तत्त्व है; और उसीका अब अधिक निरूपण करते हैं :- ]
(१०) जो ब्रह्ममें अर्पण कर आसक्तिविरहित कर्म करता है, उसको वैसेही पाप
नहीं लगता, जैसे कि कमलके पत्तेको पानी नहीं लगता । (११) (अतएव) कर्मयोगी
( ऐसी अहंकारबुद्धि न रखकर, कि 'मै करता हूँ' - केवल ) शरीरसे, ( केवल)
मनसे, (केवल) बुद्धिसे और (केवल) इंद्रियोंमेभी आसक्ति छोड़ कर आत्मशुद्धिके
लिये कर्म किया करते हैं ।
| [ कायिक, वाचिक, मानसिक आदि, कर्मोंके भेदोंको लक्ष्यकर इस श्लोक-
| में शरीर, मन और बुद्धि शब्द आये है । मूलमें यद्यपि 'केवलः' विशेषण 'इंद्रियैः'
| शब्दके पीछे है, तथापि वह शरीर, मन और बुद्धिको'भी लागू है (गीता ४. २१)
| इसीसे अनुवादमें उसे 'शरीर' शब्दके समानही अन्य शब्दोंकेभी पीछे लगा दिया
| है । जैसे ऊपरके आठवें और नवें श्लोकमें कहा है, वैसेही यहाँभी कहा है, कि
| अहंकारबुद्धि एवं फलाशाके विषयमें आसक्ति छोड़ कर केवल कायिक, केवल
| वाचिक या केवल मानसिक, कोईभी कर्म किया जाय, तोभी कर्ताको उसका
| दोष नहीं लगता ( गीता ३. २७; १३. २९; १८. १६ ) । अहंकारके न रहनेसे
| जो कर्म होते हैं, वे सिर्फ़ इंद्रियोंके हैं, और मन आदिक सभी इंद्रियाँ प्रकृतिकेही
| विकार हैं, अतः ऐसे कर्मोंका बंधन कर्ताको नहीं लगता । अब इसी अर्थको शास्त्रा-
| नुसार सिद्ध करते हैं :- ]
(१२) जो युक्त अर्थात् योगयुक्त हो गया, वह कर्मफल छोड़कर अंतकी पूर्ण शांति
पाता है; और जो अयुक्त है अर्थात् योगयुक्त नहीं है, वह कामसे अर्थात् वासनासे
फलके विषयमें सक्त हो कर ( पाप-पुण्यसे ) बद्ध हो जाता है । (१३) सब कर्मोंका
७०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
§ § ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
मनसे (प्रत्यक्ष नहीं) संन्यास कर, जितेन्द्रिय देहवान् (पुरुष) नौ द्वारोंके इस
(देहरूपी) नगरमें न कुछ करता और न कराता हुआ आनंदसे पड़ा रहता है ।
। [अर्थात् वह जानता है, कि आत्मा अकर्ता है, सब खेल तो प्रकृतिका
। है; और इसका कारण स्वस्थ या उदासीन पड़ा रहता है (गीता १३.२०;
। १८.५९) । दोनों आँखें, दोनों कान, नासिकाके दोनों छिद्र, मुख, मूत्रेन्द्रिय और
। गुद - ये शरीरके नौ द्वार या दरवाजे समझे जाते हैं। अध्यात्म-दृष्टिसे यही
। उपपत्ति बतलाते हैं, कि कर्मयोगी कर्मोंको करकेभी युक्त कैसे बना रहता है :-]
(१४) प्रभु अर्थात् आत्मा या परमेश्वर लोगोंके कर्तृत्वको, उनके कर्मोंको
(या उनको प्राप्त होनेवाले) कर्मफलके संयोगकोभी निर्माण नहीं करता। स्वभाव
अर्थात् प्रकृतिही (सब कुछ) किया करती है। (१५) विभु अर्थात् सर्वव्यापी
आत्मा या परमेश्वर किसीका पाप और किसीका पुण्यभी नहीं लेता। ज्ञानपर
अज्ञानका पर्दा पड़ा रहनेके कारण (अर्थात् मायासे) प्राणी मोहित हो जाते हैं।
। [इन दोनों श्लोकोंका तत्त्व असलमें सांख्यशास्त्रका है (गीतार. प्र. ७,
। पृ. १६४-१६७) और वेदान्तियोंके मतसे आत्माका अर्थ परमेश्वर है, अतः
। वेदान्ती लोग परमेश्वरके विषयमेंभी "आत्मा अकर्ता है" इस तत्त्वका उप-
। योग करते हैं। प्रकृति और पुरुष ऐसे दो मूल तत्त्व मानकर सांख्यमतवादी
। समग्र कर्तृत्व प्रकृतिका मानते हैं; और आत्माको उदासीन कहते हैं। परंतु
। वेदान्ती लोग इसके आगे बढ़ कर यह मानते हैं, कि इन दोनोंकाभी मूल एक
। निर्गुण परमेश्वर है, और वह सांख्यवालोंके आत्माके समान उदासीन और
। अकर्ता है, एवं सारा कर्तृत्व माया (अर्थात् प्रकृति) का है (गीतार. प्र. ९,
। पृ. २६७) । अज्ञानके कारण साधारण मनुष्यको ये बातें जान नहीं पड़तीं;
। परंतु कर्मयोगी कर्तृत्व और अकर्तृत्वका भेद जानता है, इस कारण अब यही
। कहते, हैं कि वह कर्म करकेभी अलिप्तही रहता है :-]
(१६) परंतु ज्ञानसे जिनका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, उनके लिये
उन्हींका ज्ञान परमार्थतत्त्वको, सूर्यके समान, प्रकाशित कर देता है।
पाँचवाँ अध्याय ७०३
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
§ § विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
(१७) और उस परमार्थतत्त्वमें ही जिनकी बुद्धि रंग जाती है, वहीं जिनका
अंतःकरण रम जाता हैं और जो तन्निष्ठ एवं तत्परायण हो जाते हैं, उनके पाप
ज्ञानसे बिलकुल धुल जाते हैं और वे फिर जन्म नहीं लेते ।
। [ इस प्रकार जिसका अज्ञान नष्ट हो जाय, उस कर्मयोगीकी (संन्यासीकी
। नहीं ) ब्रह्मभूत या जीवन्मुक्त अवस्थाका अब अधिक वर्णन करते हैं :- ]
(१८) पंडितोंकी अर्थात् ज्ञानियोंकी दृष्टि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय,
हाथी, तैसेही कुत्ता और चांडाल, इन सभीके विषयमें समान रहती है !
(१९) इस प्रकार जिनका मन साम्यावस्थामें स्थिर हो जाता है, वे वहींके वहीं
अर्थात् मरणकी प्रतीक्षा न कर, मृत्युलोकको जीत लेते हैं। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और
सम है, अतः साम्य-बुद्धिवाले ये पुरुष ( सदैव ) ब्रह्ममें स्थित अर्थात् यहींके यही
ब्रह्मभूत हो जाते हैं।
। [ जिसने इस तत्त्वको जान लिया, कि “आत्मस्वरूपी परमेश्वर अकर्ता
। है”, और सारा खेल प्रकृतिका है, वह 'ब्रह्मसंस्थ' हो जाता है। और
। उसीको मोक्ष मिलता है – “ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छां. २. २३. १) यह वर्णन
। उपनिषदोंमें है, और उसीका अनुवाद ऊपरके श्लोकोंमें किया गया है। परंतु
। इस अध्यायके १-१२ श्लोकोंसे गीताका यह अभिप्राय प्रकट होता है, कि इस
। अवस्थामेंभी कर्म नहीं छूटते । शंकराचार्यने छांदोग्य उपनिषदके उक्त वाक्यका
। संन्यासप्रधान अर्थ किया है। परंतु मूल उपनिषदका पूर्वापार संदर्भ देखनेसे
। विदित होता है, कि 'ब्रह्मसंस्थ' होनेपरभी तीनों आश्रमोंके कर्म करनेवालेके
। विषयमेंही यह वाक्य कहा गया होगा; और इस उपनिषदके अंतमें यही अर्थ
। स्पष्टरूपसे बतलाया गया है (छा. ८. १५. १) । ब्रह्मज्ञान हो चुकनेपर यह
। अवस्था जीते जी प्राप्त हो जाती है, अतः इसेही जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं
। (गीतार. प्र. १०, पृ. २९७-३०२) । अध्यात्मविद्याकी यही पराकाष्ठा है
। और चित्तवृत्ति-निरोधरूपी जिन योगसाधनोंसे यह अवस्था प्राप्त हो सकती
। है, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन अगले अध्यायमें किया गया है। इस अध्यायमें
। अब केवल इसी अवस्थाका अधिक वर्णन है :- ]
७०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
§ § योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
( २० ) प्रिय अर्थात् इष्ट वस्तुको पाकर प्रसन्न न हो जावे, और अप्रियको पानेसे
खिन्नभी न होवे । ( इस प्रकार ) जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहमें नही फँसता
( कहना चाहिये, कि ) वही ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित हुआ । ( २१ ) बाह्य पदार्थोंके
( इंद्रियोंसे होनेवाले ) संयोगमें अर्थात् विषयोपभोगमें जिसका मन आसक्त नहीं,
उसे ( ही ) आत्मसुख मिलता है; और वह ब्रह्मयुक्त पुरुष अक्षय सुखका अनुभव
करता है । ( २२ ) ( बाहरी पदार्थोंके ) संयोगसेही उत्पन्न होनेवाले भोगोंका
आदि और अंत है, अतएव वे दुःखकेही कारण हैं; हे कौन्तेय ! उनमें पंडित
लोग रत नहीं होते । ( २३ ) शरीर छूटनेके पहले अर्थात् मरणपर्यंत कामक्रोधसे
होनेवाले वेगको इस लोकमेही सहन करनेमें ( इंद्रियसंयमसे ) जो समर्थ होता है,
वही युक्त और वही ( सच्चा ) सुखी है ।
| [ गीताके दूसरे अध्यायमें भगवानने कहा है, कि तुझे सुख-दुःख सहने
| चाहिये ( गीता. २. १४) . यह उसीका विस्तार और निरूपण है । गीता
| २. १४ मे सुख-दुःखोंको 'आगमापायिनः' विशेषण लगाया है, तो यहाँ २२ वें
| श्लोकमें उनको 'आद्यन्तवन्तः' कहा है, और 'मात्रा' शब्दके बदले 'बाह्य' शब्दका
| प्रयोग किया है । इसीमें 'युक्त' शब्दकी व्याख्याभी आ गई है । सुख-दुखोंका
| त्याग कर सम-बुद्धिसे उनको सहते रहनाही युक्तताका सच्चा लक्षण है । ( गीता
| २. ६१ की टिप्पणी देखो ) । ]
( २४ ) इस प्रकार ( बाह्य सुख-दुःखोंकी अपेक्षा न कर ) जो अंतःसुखी
अर्थात् अंतःकरणमेंही सुखी हो जाय, जो अपने आपमेंही आराम पाने लगे, और
ऐसेही जिसे ( यह ) अतःप्रकाश मिल जाय, वह ( कर्म-)योगी ब्रह्मरूप हो जाता है,
एवं उसेही ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेका मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।
पाँचवाँ अध्याय ७०५
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
जिन ऋषियोंकी द्वंद्वबुद्धि छूट गई है, अर्थात् जिन्होंने इस तत्त्वको जान लिया है,
कि सब स्थानोंमें एकही परमेश्वर है, जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, और जो
आत्मसंयमसे सब प्राणियोंका हित करनेमें रत हो गये हैं, उन्हें यह ब्रह्मनिर्वाणरूप
मोक्ष मिलता है। (२५) कामक्रोधविरहित, आत्मसंयमी और आत्मज्ञानसंपन्न
यतियोंको 'अभितः' अर्थात् आसपास या सन्मुख रखा हुआ-सा (अर्थात् बैठे-बिठाये)
ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। (२७) बाह्य पदार्थोंके (इंद्रियोंके सुख-
दुःखदायक) संयोगसे अलग होकर, दोनों भौहोंके बीचमें दृष्टिको जमाकर और
नाकसे चलनेवाले प्राण एवं अपानको सम करके, (२८) जिसने इंद्रियों, मन
और बुद्धिका संयम कर लिया है, तथा जिसके भय, इच्छा और क्रोध छूट गये हैं, वह
मोक्षपरायण मुनि सदा-सर्वदा मुक्तही है।
। [ गीतारहस्यके नवम (पृ. २३४, २४८) और दशम (पृ. ३००)
। प्रकरणोंसे ज्ञात होगा, कि यह वर्णन जीवन्मुक्तावस्थाका है। परंतु हमारी रायमें
। टीकाकारोंका यह कथन ठीक नहीं, कि यह वर्णन संन्यास-मार्गके पुरुषका है।
। संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्गोंमें शांति तो एक-ही-सी रहती है, और उतनेहीके
। लिये यह वर्णन संन्यासमार्गको उपयुक्त हो सकेगा। परंतु इस अध्यायके
। आरंभमें कर्मयोगको श्रेष्ठ निश्चित कर फिर २५ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि
। ज्ञानी पुरुष सब प्राणियोंका हित करनेमें प्रत्यक्ष मग्न रहते हैं, उससे प्रकट
। होता है, कि यह समस्त वर्णन कर्मयोगी जीवन्मुक्तकाही है, संन्यासीका नहीं है
। (गीतार. प्र. १२, पृ. ३५८ देखो)। कर्ममार्गमेंभी सर्वभूतान्तर्गत परमेश्वरको
। पहचाननाही परमसाध्य है, अतः भगवान् अंतमें कहते हैं, कि :- ]
गी. र. ४५
७०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
§ § भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे
संन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
(२९) जो मुझको (सब) यज्ञों और तपोंका भोक्ता, (स्वर्ग आदि) सब
लोकोंका बड़ा स्वामी, एवं सब प्राणियोंका मित्र जानता है, वही शांति पाता है।
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म
विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें
संन्यासयोग नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।