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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 749

७०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
§ § योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
( २० ) प्रिय अर्थात् इष्ट वस्तुको पाकर प्रसन्न न हो जावे, और अप्रियको पानेसे
खिन्नभी न होवे । ( इस प्रकार ) जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहमें नही फँसता
( कहना चाहिये, कि ) वही ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित हुआ । ( २१ ) बाह्य पदार्थोंके
( इंद्रियोंसे होनेवाले ) संयोगमें अर्थात् विषयोपभोगमें जिसका मन आसक्त नहीं,
उसे ( ही ) आत्मसुख मिलता है; और वह ब्रह्मयुक्त पुरुष अक्षय सुखका अनुभव
करता है । ( २२ ) ( बाहरी पदार्थोंके ) संयोगसेही उत्पन्न होनेवाले भोगोंका
आदि और अंत है, अतएव वे दुःखकेही कारण हैं; हे कौन्तेय ! उनमें पंडित
लोग रत नहीं होते । ( २३ ) शरीर छूटनेके पहले अर्थात् मरणपर्यंत कामक्रोधसे
होनेवाले वेगको इस लोकमेही सहन करनेमें ( इंद्रियसंयमसे ) जो समर्थ होता है,
वही युक्त और वही ( सच्चा ) सुखी है ।
| [ गीताके दूसरे अध्यायमें भगवानने कहा है, कि तुझे सुख-दुःख सहने
| चाहिये ( गीता. २. १४) . यह उसीका विस्तार और निरूपण है । गीता
| २. १४ मे सुख-दुःखोंको 'आगमापायिनः' विशेषण लगाया है, तो यहाँ २२ वें
| श्लोकमें उनको 'आद्यन्तवन्तः' कहा है, और 'मात्रा' शब्दके बदले 'बाह्य' शब्दका
| प्रयोग किया है । इसीमें 'युक्त' शब्दकी व्याख्याभी आ गई है । सुख-दुखोंका
| त्याग कर सम-बुद्धिसे उनको सहते रहनाही युक्तताका सच्चा लक्षण है । ( गीता
| २. ६१ की टिप्पणी देखो ) । ]
( २४ ) इस प्रकार ( बाह्य सुख-दुःखोंकी अपेक्षा न कर ) जो अंतःसुखी
अर्थात् अंतःकरणमेंही सुखी हो जाय, जो अपने आपमेंही आराम पाने लगे, और
ऐसेही जिसे ( यह ) अतःप्रकाश मिल जाय, वह ( कर्म-)योगी ब्रह्मरूप हो जाता है,
एवं उसेही ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेका मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।