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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

१८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
माने गये हैं। परंतु वर्गीकरणकी उक्त भिन्नताके कारण किसीके मनमें कुछ भ्रम
न हो जाय, इसलिये ये तीनों वर्गीकरण कोष्टकके रूपमें एकत्र करके आगे दिये गये
हैं। गीताके तेरहवें अध्याय (गीता १३.५) में वर्गीकरणके झगड़ेमें न पड़ कर,
सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका वर्णन ज्यों-का-त्यों पृथक् पृथक् किया गया है; और
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि चाहे वर्गीकरणमें कुछ भिन्नता हो; तथापि
तत्त्वोंकी संख्या दोनों स्थानोंपर बराबरही है।
पचीस मूलतत्त्वोंका वर्गीकरण
सांख्योंका वर्गीकरण । तत्त्व । वेदान्तियोंका वर्गीकरण । गीताका वर्गीकरण
न-प्रकृति न-विकृति १ पुरुष परब्रह्मका श्रेष्ठ स्वरूप परा प्रकृति
मूल प्रकृति १ प्रकृति \ अपरा प्रकृति
१ महान् परब्रह्मका कनिष्ठ } अपरा प्रकृतिके
७ प्रकृति-विकृति १ अहंकार स्वरूप } आठ प्रकार
५ तन्मात्राएँ (आठ प्रकारका) /
१ मन \ विकार होनेके कारण \ विकार होनेके
५ बुद्धींद्रियाँ } इन सोलह तत्त्वोंको | कारण गीतामें इन
१६ विकार ५ कर्मेंद्रियाँ } वेदान्ती मूल तत्त्व | पंद्रह तत्त्वोंकी
५ महाभूत / नहीं मानते। | गणना मूल तत्त्वोंमें
२५ / नहीं की गई है।
यहाँतक इस बातका विवेचन हो चुका, कि पहले मूलसाम्यावस्थामें रहने-
वाली एकरूप अवयवरहित अव्यक्त जड़ प्रकृतिमें व्यक्तसृष्टि उत्पन्न करनेकी
अस्वयंवेद्य 'बुद्धि' कैसे प्रकट हुई; फिर उसमें 'अहंकार'से अवयवसहित विविध
समता कैसे उपजी; और इसके बाद 'गुणोंसे गुण' इस गुणपरिणामवादके अनुसार
एक ओर सात्त्विक (अर्थात् सेंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह सूक्ष्म इंद्रियाँ
तथा दूसरी ओर तामस (अर्थात् निरिंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत पांच सूक्ष्मतन्मात्राएँ
कैसे निर्मित हुई। अब इसके बादकी सृष्टि (अर्थात् स्थूल पंचमहाभूतों या उनसे
उत्पन्न होनेवाले अन्य जड़ पदार्थोंकी) उत्पत्तिके क्रमका वर्णन किया जावेगा।
सांख्यशास्त्रमें सिर्फ़ यही कहा है, कि सूक्ष्मतन्मात्राओंसे 'स्थूल पंचमहाभूत'
अथवा 'विशेष', गुणपरिणामके कारण, उत्पन्न हुए हैं। परंतु वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें
इस विषयका अधिक विवेचन किया गया है; इसलिये प्रसंगानुसार उसकाभी
संक्षिप्त वर्णन - इस सूचनाके साथ, कि यह वेदान्तशास्त्रका मत है, सांख्योंका नहीं

  • यहाँ कह देना आवश्यक जान पड़ता है। "स्थूल पृथ्वी, पानी, तेज, वायु और
    आकाश" को पंचमहाभूत अथवा विशेष कहते हैं। इनका उत्पत्तिक्रम तैत्तिरी-
    योपनिषद्में इस प्रकार है :- "आत्मनः आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । बायो-
    रग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः ।" इत्यादि (तै. उ. २. १)-

विश्वकी रचना और संहार १८५
अर्थात् पहले परमात्मासे (मूलजड़ प्रकृतिसे नहीं; जैसा कि सांख्यवादियोंका कथन
है) आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे पानी और फिर पानीसे
पृथ्वी उत्पन्न हुई है। तैत्तिरीयोपनिषद्में यह नहीं बतलाया गया, कि इस क्रमका
कारण क्या है। परंतु प्रतीत होता है, कि उत्तर-वेदान्तग्रंथोंमें पंचमहाभूतोंके
उत्पत्तिक्रमके कारणोंका विचार सांख्यशास्त्रोक्त गुणपरिणामके तत्त्वपरही किया
गया है। इन उत्तर-वेदान्तियोंका यह कथन है, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" इस
न्यायसे पहले एकही गुणका पदार्थ उत्पन्न हुआ। उससे दो गुणोंके और फिर तीन
गुणोंके पदार्थ उत्पन्न हुए - इसी प्रकार वृद्धि होती गई। पंचमहाभूतोंमेंसे
आकाशका केवल शब्दही एक गुण मुख्य है, इसलिये पहले आकाश उत्पन्न हुआ।
इसके बाद वायुकी उत्पत्ति हुई, क्योंकि उसमें शब्द और स्पर्श दो गुण है। जब
वायु जोरसे चलती है, तब उसकी आवाज सुन पड़ती है; और हमारी स्पर्शेंद्रियकोभी
उसका ज्ञान होता है। वायुके बाद अग्निकी उत्पत्ति होती है। क्योंकि शब्द और
स्पर्शके अतिरिक्त उसमें तीसरा गुण रूप है। इन तीनों गुणोंके साथही साथ
पानीमें चौथा गुण रुचि या रस होता है। इसलिये उसका प्रादुर्भाव अग्निसेही
होना चाहिये। और अंतमें, इन चारों गुणोंकी अपेक्षा पृथ्वीमें 'गंध' नामक विशेष
गुण होनेसे यह सिद्धान्त किया गया है, कि पानीसे बादमें पृथ्वी उत्पन्न हुई है।
यास्काचार्यका यही सिद्धान्त है (निरुक्त १४.४)। तैत्तिरीयोपनिषद्में आगे चल कर
कहा गया है, कि उक्त क्रमसे स्थूल पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति हो चुकनेपर फिर -
"पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः।" पृथ्वीसे वनस्पति, वन-
स्पतिसे अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ (तै. २.१)। यह सृष्टि पंचमहा-
भूतोंके मिश्रणसे बनती है, इसलिये इस मिश्रणक्रियाको वेदान्तग्रंथोंमें 'पंचीकरण'
कहते हैं। पंचीकरणका अर्थ "पंचमहाभूतोंमेंसे प्रत्येकका न्यूनाधिक भाग ले कर
उन सबके मिश्रणसे किसी नये पदार्थका बनना" है। अतः यह पंचीकरण, स्वभा-
वतः अनेक प्रकारका सकता है। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने अपने 'दासबोध'के
नौवें तथा ग्यारहवें दशकमें जो वर्णन किया है, वहभी इसी बातको सिद्ध करता
है। देखिये : "काला और सफ़ेद मिलानेसे नीला बनता है, और काला और
पीला मिलानेसे हरा बनता है" (दा. ९.६.४०)। पृथ्वीमें अनंत कोटि बीजोंकी
जातियां होती हैं। पृथ्वी और पानीका मेल होनेपर उन बीजोंसे अंकुर निकलते
हैं। अनेक प्रकारकी बेलें होती हैं, पत्र-पुष्प होते हैं, और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट
फल होते हैं।... अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, सबका बीज पृथ्वी और
पानी है। यही सृष्टिरचनाका अद्भुत चमत्कार है। इस प्रकार चार खानियां,
चार वाणियां, चौरासी लाख* जीवयोनियां, तीन लोक, पिंड, ब्रह्मांड सब निर्मित

  • यह बात स्पष्ट है, कि चौरासी लाख योनियोंकी कल्पना पौराणिक है,
    और वह अंदाज़से की गई है। तथापि, वह निरी निराधारभी नहीं है। उत्क्रांति-

१८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
हुए हैं। (दा. १३. ३. १०-१५) परंतु पंचीकरणसे केवल जड़ पदार्थ अथवा जड़
शरीरही उत्पन्न होते हैं। ध्यान रहे, कि जब इस जड़ देहका संयोग प्रथम सूक्ष्म
इंद्रियोंसे और फिर आत्मासे अर्थात् पुरुषसे होता है, तभी इस जड़ देहसे सचेतन
प्राणी हो सकता है।
यहाँ यहभी बतला देना चाहिये, कि उत्तर वेदान्त-ग्रंथोंमें वर्णित यह
पंचीकरण प्राचीन उपनिषदोंमें नहीं है। छांदोग्योपनिषदमें पाँच तन्मात्राएँ या
पाँच महाभूत नहीं माने गये हैं, किंतु कहा है, कि "तेज, आप (पानी) और अन्न
(पृथ्वी)" इन्हीं तीन सूक्ष्म मूलतत्त्वोंके मिश्रणसे अर्थात् 'त्रिवृत्करण'से सब
विविध सृष्टि बनी है। और, श्वेताश्वतरोपनिषद्में कहा है कि, "अजामेकां
लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः" (श्वेता. ४. ५) अर्थात् लाल
(तेजोरूप), सफ़ेद (जलरूप) और काले (पृथ्वीरूप) रंगोंकी (अर्थात् तीन
तत्त्वोंकी) एक अजा (बकरी) से नामरूपात्मक प्रजा (सृष्टि) उत्पन्न हुई। छांदो-
ग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें श्वेतकेतु और उसके पिताका संवाद है। संवादके आरंभ-
तत्त्वके अनुसार पश्चिमी आधिभौतिकशास्त्री यह मानते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें
उपस्थित एक छोटेसे सजीव सूक्ष्म गोल जंतुसे मनुष्यप्राणी उत्पन्न हुआ। इस कल्पनासे
यह बात स्पष्ट है, कि सूक्ष्म गोल जंतुका स्थूल गोल जंतु बननेमें, स्थूल जंतुका पुनश्च
छोटा छोटा कीड़ा होनेमें, छोटे कीड़ेके बाद उसका अन्य प्राणी होनेमें, प्रत्येक योनि
अर्थात् जातिकी अनेक पीढ़ियाँ बीत गई होंगी। इससे एक आंग्ल जीवशास्त्रज्ञने
गणितके द्वारा सिद्ध किया है, कि पानीमें रहनेवाली छोटी छोटी मछलियोंके गुण-
धर्मोंका विकास होते होते उन्हींको अंतमें मनुष्यस्वरूप प्राप्त होनेमें, भिन्न भिन्न जाति-
योंकी लगभग ५३ लाख ७५ हज़ार पीढ़ियाँ बीत चुकी हों; और संभव है, कि इन
पीढ़ियोंकी संख्या कदाचित इसमे दस गुणाभी हो। ये हुई पानीमें रहनेवाले जल-
चरोंसे लेकर मनुष्यतककी योनियाँ। अब यदि इनमेंही छोटे जलचरोंसे पहलेके
सूक्ष्म जंतुओंका समावेश कर दिया जाय तो न मालूम और कितनी लाख पीढ़ियोंकी
कल्पना करनी होगी। इससे मालूम हो जायगा, कि हमारे पुराणोंमें वर्णित चौरासी
लाख योनियोंकी कल्पना की अपेक्षा आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंके पुराणोंमें वर्णित पीढ़ी-
यांकी कल्पना कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। कल्पनासंबंधी यह न्यायकाल (समय) कोभी
उपयुक्त हो सकता है। भूगर्भगतजीव-शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि इस बातका स्थूल
दृष्टिसे निश्चय नहीं किया जा सकता कि, सजीवसृष्टिके सूक्ष्म जंतु इस पृथ्वीपर
कब उत्पन्न हुए। और सूक्ष्म जलचरोंकी उत्पत्ति तो कई करोड़ वर्षोंके पहले हुई
है। इस विषयका विवेचन The Last Link by Ernst Haeckel, with notes,
etc. by Dr. H. Gadow (1898) नामक पुस्तकमें किया गया है। डॉक्टर गेडोने
इस पुस्तकमें जो दो-तीन उपयोगी परिशिष्ट जोड़ें हैं, उनसेही उपर्युक्त बातें ली
गई हैं। हमारे पुराणोंमें चौरासी योनियोंकी गिनती इस प्रकार की गई है- ९ लाख
जलचर, १० लाख पक्षी, ११ लाख कृमि, २० लाख पशु, ३० लाख स्थावर और ४
लाख मनुष्य (दासबोध २०. ६)।

हीमें श्वेतकेतुके पिताने उससे स्पष्ट कह दिया है, कि "अरे, इस जगत्के आरंभमें
'एकमेवाद्वितीय सत्' के अतिरिक्त - अर्थात् जहाँ तहाँ रूप सब एक जगह और
नित्य परब्रह्मके अतिरिक्त और कुछभी नहीं था। जो असत् (अर्थात्-हैही नहीं)
उससे सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? अतएव, आदिमें सर्वत्र सत्‌ही व्याप्त था।
इसके बाद उसे अनेक अर्थात् विविध रूप होनेकी इच्छा हुई। और उससे क्रमशः सूक्ष्म
तेज (अग्नि), आप (पानी) और अन्न (पृथ्वी) की उत्पत्ति हुई। पश्चात् इन
तीन तत्त्वोंमेंही जीवरूपसे परब्रह्मका प्रवेश होनेपर उनके त्रिवृत्करणसे जगतकी अनेक
नामरूपात्मक वस्तुएँ निर्मित हुईं। स्थूल अग्नि, सूर्य या विद्युल्लताकी ज्योतिमें,
जो लाल (लोहित) रंग है, वह सूक्ष्म तेजोरूपी मूलतत्त्वका परिणाम है, जो सफ़ेद
(शुक्ल) रंग है, वह सूक्ष्म आप-तत्त्वका परिणाम है; और जो काला (कृष्ण) रंग
है, वह सूक्ष्म पृथ्वी-तत्त्वका परिणाम है। इसी प्रकार मनुष्य जिस अन्नका सेवन
करता है, उसमेंभी सूक्ष्म तेज, सूक्ष्म आप और सूक्ष्म अन्न (पृथ्वी) येही तीन तत्त्व
होते हैं। जैसे दहीको मथनेसे मक्खन ऊपर आ जाता है, वैसे ही उक्त तीन सूक्ष्म
तत्त्वोंसे बना हुआ अन्न जब पेटमें जाता है, तब उसमेंसे तेज-तत्त्वके कारण मनुष्यके
शरीरमें स्थूल, मध्यम और सूक्ष्म परिणाम - जिन्हें क्रमशः अस्थि, मज्जा, और
वाणी कहते हैं - उत्पन्न हुआ करते हैं। इसी प्रकार आप अर्थात् जलतत्त्वसे मूत्र,
रक्त और प्राण; तथा अन्न अर्थात् पृथ्वी-तत्त्वसे पुरीष, माँस और मन ये तीन द्रव्य
निर्मित होते हैं, (छां. ६. २-६। छांदोग्योपनिषदकी यही पद्धति वेदान्तसूत्रोंमें
(वे. सू. २. ४. २०) भी कही गई है, कि मूल महाभूतोंकी संख्या पाँच नहीं, केवल
तीनही है; और उनके त्रिवृत्करणसे सब दृश्य पदार्थोंकी उत्पत्तिभी मालूम की जा
सकती है। परंतु बादरायणाचार्य तो पंचीकरणका नाम तक नहीं लेते। तथापि
तैत्तिरीय (२. १), प्रश्न (४. ८), बृहदारण्यक (४. ४. ५) आदि अन्य उप-
निषदोंमें, और विशेषतः श्वेताश्वतर (२. १२), वेदान्तसूत्र (२२. ३. १-१४)
तथा गीता (७. ४; १३. ५) मेंभी तीनके बदले पाँच महाभूतोंका वर्णन है।
गर्भोपनिषदके आरंभहीमें कहा है, कि मनुष्य देह 'पंचात्मक' है; और महाभारत
तथा पुराणोंमें तो पंचीकरणका वर्णन स्पष्ट तया किया गया है (महा. शां. १८४-
१८६)। इससे यही सिद्ध होता है, कि यद्यपि त्रिवृत्करण प्राचीन है, तथापि जड़
महाभूतोंकी संख्या तीनके बदले पाँच मानी जाने लगी, तब त्रिवृत्करणके उदा-
हरणहीसे पंचीकरणकी कल्पनाका प्रादुर्भाव हुआ; और त्रिवृत्करण पीछे रह गया।
एवं अंतमें पंचीकरणकी कल्पना सब वेदान्तियोंको ग्राह्य हो गई। आगे चल कर
इसी पंचीकरण शब्दके अर्थमें यह बातभी शामिल हो गई, कि मनुष्यका शरीर
केवल पंचमहाभूतोंसे ही नहीं बना है; किंतु उन पंचमहाभूतोंमेंसे हर एक पाँच
प्रकारसे शरीरमें विभाजितभी हो गया है। उदाहरणार्थ, त्वक्, माँस, अस्थि, मज्जा
और स्नायु ये पाँच विभाग अन्नमय पृथ्वीतत्त्वके हैं,. इत्यादि (महा. शां. १८४.

१८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

२०-२५; और दासबोध १७. ८)। प्रतीत होता है, कि यह कल्पनाभी उपर्युक्त
छांदोग्योपनिषदके त्रिवृत्करणके वर्णनसे सूझ पड़ी है। क्योंकि वहाँभी अंतिम वर्णन
यही है, कि “तेज, आप और पृथ्वी” इन तीनोंमेंसे प्रत्येक, तीन-तीन प्रकारसे
मनुष्यकी देहमें पाया जाता है।
इस बातका विवेचन हो चुका, कि मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्त-
सिद्धान्तके अनुसार परब्रह्मसे अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले सृष्टिके अचेतन
अर्थात् निर्जीव या जड़ पदार्थ कैसे बने हैं। अब इसका विचार करना चाहिये, कि
सृष्टिके सचेतन अर्थात् सजीव प्राणियोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सांख्यशास्त्रका विशेष
कथन क्या है, और फिर यह देखना चाहिये, कि वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे उसका
कहाँतक मेल है। जब मूलप्रकृतिसे प्रादुर्भूत पृथ्वी आदि स्थूल पंचमहाभूतोंका
संयोग सूक्ष्म इंद्रियोंके साथ होता है, तब उससे सजीव प्राणियोंका शरीर बनता है।
परंतु यद्यपि यह शरीर सेंद्रिय हो, तथापि वह जड़ही रहता है। इन इंद्रियोंको
प्रेरित करनेवाला तत्त्व जड़ प्रकृतिसे भिन्न होता है, जिसे 'पुरुष' कहते हैं।
सांख्योंके इन सिद्धान्तोंका वर्णन पिछले प्रकरणमें किया जा चुका है, कि यद्यपि
मूलतः 'पुरुष' अकर्ता है, तथापि प्रकृतिके साथ उसका संयोग होनेपर सजीव
सृष्टिका आरंभ होता है; और “मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ” यह ज्ञान हो जानेपर पुरुषका
प्रकृतिसे संयोग छूट जाता है; तथा वह मुक्त हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता,
तो जन्म-मरणके चक्करमें उसे घूमना पड़ता है। परंतु इस बातका विवेचन तब
नहीं किया गया, कि जिस 'पुरुष'की 'प्रकृति' और 'पुरुष'की भिन्नताका ज्ञान
हुए बिनाही मृत्यु हो जाती है, उसके आत्मा, अर्थात् सांख्य परिभाषाके अनुसार
'पुरुष'को ये नये जन्म कैसे प्राप्त होते हैं। अतएव यहाँ उस विषयका कुछ
अधिक विवेचन करना आवश्यक जान पड़ता है। यह स्पष्ट है, कि जो मनुष्य
बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है, उसकी आत्मा प्रकृतिके चक्रसे सदाके
लिये छूट नहीं सकती। क्योंकि यदि ऐसा हो, तो ज्ञान अथवा पाप-पुण्यका
कुछभी महत्त्व नहीं रह जायगा। और फिर चार्वाकके मतानुसार यह कहना पड़ेगा
कि मृत्युके बाद हर एक मनुष्य प्रकृतिके फंदेसे छूट जाता है — अर्थात् वह मोक्ष
पा जाता है। अच्छा; यदि यह कहें, कि मृत्युके बाद केवल आत्मा अर्थात् पुरुष बच
जाता है; और वही स्वयं नये नये जन्म लिया करता है, तो यह मूलभूत सिद्धान्त -
कि पुरुष अकर्ता और उदासीन है, और सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है — मिथ्या प्रतीत
होने लगता है। इसके सिवा यदि हम यह मानते हैं, कि आत्मा स्वयंही नये नये
जन्म लिया करती है, तो वह उसका गुण या धर्म हो जाता है; और तब तो ऐसी
अनवस्था प्राप्त हो जाती है, कि वह जन्म-मरणके आवागमनसे कभी छूटही नहीं
सकता। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि यदि बिना ज्ञान प्राप्त किये कोई मनुष्य मर
जाय तोभी उसकी आत्माको नया जन्म प्राप्त करा देनेके लिये उससे प्रकृतिका

विश्वकी रचना और संहार १८९

संबंध अवश्य रहनाही चाहिये। तथापि मृत्युके बाद स्थूल देहका नाश हो जाया
करता है। इसलिये यह प्रकट है, कि अब उक्त संबंध स्थूल महाभूतात्मक प्रकृतिके
साथ नहीं रह सकता। परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि प्रकृति केवल स्थूल
पंचमहाभूतोंहीसे बनी है। प्रकृतिसे कुल तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं; और स्थूल
पंचमहाभूत उन तेईसोंमेंसे अंतिम पाँच हैं। इन अंतिम पाँच तत्त्वों ( स्थूल पंच-
महाभूतों ) को तेईस तत्त्वोंमेंसे अलग करनेपर अठारह तत्त्व शेष रहते हैं। अतएव
अब यह कहना चाहिये, कि जो पुरुष बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है;
वह यद्यपि पंचमहाभूतात्मक स्थूल-शरीरसे - अर्थात् अंतिम पाँच तत्त्वोंसे - छूट
जाता है, तथापि इस प्रकारकी मृत्युसे प्रकृतिके अठारह अन्य तत्त्वोंके साथ उसका
संबंध कभी छूट नहीं सकता। वे अठारह तत्त्व ये हैं :- महान्, ( बुद्धि ), अहंकार,
मन, दस इंद्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ ( इस प्रकरणमें दिया गया ब्रह्मांडका
वृक्षवंश पृष्ठ १८० )। ये सब तत्त्व सूक्ष्म हैं। अतएव इन तत्त्वोंके साथ पुरुषका
संयोग स्थिर होकर जो शरीर बनता है, उसे स्थूलशरीरके विरुद्ध सूक्ष्म अथवा
लिंग-शरीर कहते हैं ( सां. का. ४० )। जब कोई मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्त कियेही
मर जाता है, तब मृत्युके समय उसको आत्माके साथही प्रकृतिके उक्त अठारह
तत्त्वोंसे बना हुआ यह लिंग-शरीरभी स्थूल देहसे बाहर हो जाता है। और जबतक
उस पुरुषको ज्ञानकी प्राप्ति हो नहीं जाती, तबतक उस लिंगशरीरहीके कारण उसको
नये नये जन्म लेने पड़ते हैं। इसपर कुछ लोगोंका यह प्रश्न है, कि मनुष्यकी मृत्युके
बाद जीवके साथ साथ इस जड़ देहमें बुद्धि, अहंकार, मन और दस इंद्रियोंके
व्यापारभी नष्ट होते हुए, हमें प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं। इस कारण लिंगशरीरमें इन
तेरह तत्त्वोंका समावेश किया जाना तो उचित है; परंतु इन तेरह तत्त्वोंके साथ
पाँच सूक्ष्म तन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमें क्यों किया जाना चाहिये ?
इसपर सांख्योंका उत्तर यह है, कि ये तेरह तत्त्व-निरी बुद्धि, निरा अहंकार, मन
और दस इंद्रियाँ - प्रकृतिके केवल गुण हैं। और, जिस तरह छायाको किसी-न-
किसी पदार्थका - तथा चित्रको दीवार, काग़ज आदिका - आश्रय आवश्यक है; उसी
तरह इन गुणात्मक तेरह तत्त्वोंकोभी एकत्र रहनेके लिये किसी द्रव्यके आश्रयकी
आवश्यकता होती है। अब आत्मा ( पुरुष ) स्वयं निर्गुण और अकर्ता है;
इसलिये वह स्वयं किसीभी गुणका आश्रय हो नहीं सकता। मनुष्यकी जीविता-
वस्थामें उसके शरीरके स्थूल पंचमहाभूतही इन तेरह तत्त्वोंके आश्रयस्थान हुआ
करते हैं - परंतु मृत्युकेबाद अर्थात् स्थूल शरीरके नष्ट हो जाने पर स्थूल पंच-
महाभूतोंका यह आधार छूट जाता है। तब उस अवस्थामें इन तेरह गुणात्मक
तत्त्वोंके लिये किसी अन्य द्रव्यात्मक आश्रयकी आवश्यकता होती है। यदि मूल
प्रकृतिहीको आश्रय मान लें, तो वह अव्यक्त और अविकृत अवस्थामें - अर्थात्
अनंत और सर्वव्यापी - होनेके कारण एक छोटेसे लिंगशरीरके अहंकार, बुद्धि आदि

१९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
गुणोंका आधार नहीं हो सकती। अतएव मूलप्रकृतिकेही द्रव्यात्मक विकारोंमेसे,
स्थूल पंचमहाभूतोंके बदले उनके मूलभूत पाँच सूक्ष्म तन्मात्र द्रव्योंका समावेश
उपर्युक्त तेरह गुणोंके साथ-ही-साथ उनके आश्रयस्थानकी दृष्टिसे लिंगशरीरमें
करना पड़ता है (सां. का. ४१)। बहुतेरे सांख्य ग्रंथकार, लिंगशरीर और स्थूल
शरीरके बीच एक और तीसरे शरीर (पंचतन्मात्राओंसे बने हुए) की कल्पना
करके प्रतिपादन करते हैं, कि यह तीसरा शरीर लिंगशरीरका आधार है। परंतु
हमारा मत यह है, कि सांख्यकारिकाकी इकतालीसवीं आर्याका यथार्थ भाव वैसा
नहीं है, पर टीकाकारोंने भ्रमसे तीसरे शरीरकी कल्पना की है। हमारे मतानुसार
उस आर्याका उद्देश्य सिर्फ इस बातका कारण बतलानाही है, कि बुद्धि आदि तेरह
तत्त्वोंके साथ पंचतन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमे क्यों किया गया। इसके
अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नही है।*
कुछ विचार करनेसे प्रतीत हो जायगा, कि सूक्ष्म अठारह तत्त्वोंके सांख्योक्त
लिंगशरीरमें और उपनिषदोंमें वर्णित लिंगशरीरमें विशेष भेद नही है। बृहदा-
रण्यकोपनिषद्में कहा है, कि - “जिस प्रकार जोंक (जलायुका) घासके तिनकेके
छोरतक पहुँचनेपर दूसरे तिनकेपर (सामनेके पैरोंसे) अपने शरीरका अग्रभाग रखती
है; और फिर पहले तिनके परसे अपने शरीरके अंतिम भागको खींच लेती है; उसी
प्रकार आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है” (बृ. ४. ४. ३)। परंतु
केवल इस दृष्टांतसे ये दोनों अनुमान सिद्ध नहीं होते, कि निरा आत्माही दूसरे
शरीरमें जाता है और वहभी एक शरीरसे छूटतेही चला जाता है। क्योंकि बृह-
दारण्यकोपनिषद् (बृ. ४. ४. ६) में आगे चलकर यह वर्णन किया गया है, कि
आत्माके साथ साथ पाँच (सूक्ष्म) भूत, मन, इंद्रियाँ, प्राण और धर्माधर्मभी शरीरसे
बाहर निकल जाते हैं। और यहभी कहा है, कि आत्माको अपने कर्मके अनुसार
भिन्न भिन्न लोक प्राप्त होते हैं, एवं वहाँ उसे कुछ कालपर्यंत निवास करना पड़ता

  • भट्ट कुमारिलकृत ‘मीमांसाश्लोकवार्तिक’ ग्रंथके एक श्लोकसे (आत्म-
    वाद, श्लोक ६२) देखी पड़ेगा, कि उन्होंने इस आर्याका अर्थ हमारे अनुसारही किया
    है। वह श्लोक यह है :—
    अंतराभवदेहो हि नेष्यते विंध्यवासिना ।
    तदस्तित्वे प्रमाणं हि न किंचिदवगम्यते ॥ ६२ ॥
    “अंतराभव अर्थात् लिंगशरीर और स्थूलशरीरके बीचवाले शरीरसे विंध्य-
    वासी सहमत नहीं है। यह माननेके लिये कोई प्रमाण नहीं है, कि उक्त प्रकारका
    कोई शरीर है।” ईश्वरकृष्ण विंध्याचलपर रहता था; इसलिये उसको विंध्यवासी
    कहा है। अंतराभवशरीरको ‘गंधर्व’ भी कहते हैं (अमरकोश ३. ३. १३२.) और
    उसपर श्री. कृष्णाजी गोविंद ओक द्वारा प्रकाशित क्षीरस्वामीकी टीका तथा उस
    ग्रंथकी प्रस्तावना पृष्ठ ८ देखो।

विश्वकी रचना और संहार १९१
है (बृ. ६. २. १४ और १५)। इसी प्रकार, छांदोग्योपनिषद्मेंभी आप (पानी)
मूल तत्त्वके साथ जीवकी जिस गतिका वर्णन किया है (छांदो. ५. ३. ३; ५. ९. १),
उससे और वेदान्तसूत्रोंमें उसके अर्थका जो निर्णय किया गया है (वे. सू. ३ १. १-७)
उससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि लिंग-शरीरमें - पानी, तेज और अन्न - इन तीनों
मूलतत्त्वोंका समावेश किया जाना छांदोग्योपनिषदकोभी अभिप्रेत है। सारांश,
यही दीख पड़ता है, कि महदादि अठारह सूक्ष्म तत्त्वोंसे बने हुए सांख्योंके 'लिंग-
शरीर' मेंही प्राण और धर्माधर्म अर्थात् कर्मकोभी शामिल कर देनेसे वेदान्तमता-
नुसार लिंग-शरीर हो जाता है। परंतु सांख्यशास्त्रके अनुसार प्राणका समावेश ग्यारह
इंद्रियोंकी वृत्तियोंमेंही, और धर्म-अधर्मका समावेश बुद्धिंद्रियोंके व्यापारमेंही हुआ
करता है। अतएव उक्त भेदके विषयमें यह कहा जा सकता है, कि वह केवल
शाब्दिक है - वस्तुतः लिंगशरीरके घटकावयवके संबंधमें वेदान्त और सांख्यमतोंमें
कुछभी भेद नहीं है। इसीलिये मैत्र्युपनिषद्में (मै. ६. १०) "महदादि सूक्ष्मपर्यन्त"
यह सांख्योक्त लिंगशरीरका लक्षण 'महदाद्यविशेषास्तं' इस पर्यायसे ज्यों-का-
त्यों रख दिया है * भगवद्गीतामें (गीता १५. ७) पहले यह बतलाकर, कि
'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि' - मन और पाँच ज्ञानेंद्रियोंहीका सूक्ष्म शरीर होता है - आगे
ऐसा वर्णन किया है, कि 'वायुर्गन्धानिवाशयात्' (गीता १५. ८) - जिस प्रकार
हवा फूलोंकी सुगंध हर लेती है, उसी प्रकार जीव स्थूलशरीरका त्याग करते समय
इस लिंग-शरीरको अपने साथ ले जाता है। तथापि, गीतामें जो अध्यात्मज्ञान है, वह
उपनिषदोंहीमेंसे लिया गया है। इसलिये कहा जा सकता है, कि "मनसहित छः
इंद्रियाँ" इन शब्दोंमेंही पांच कर्मेंद्रियाँ, पंचतन्मात्राएँ, प्राण और पाप-पुण्यका
संग्रह भगवान्को अभिप्रेत है। मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. १६, १७). यह वर्णन
किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको, इस जन्ममें किये हुए पाप-पुण्यका फल
भोगनेके लिये, पंचतन्मात्रात्मक सूक्ष्मशरीर प्राप्त होता है। गीताके 'वायुर्गन्धा-

  • आनंदाश्रम, पूनाने प्रकाशित द्वात्रिंशदुपनिषदोंकी पोथी मैत्र्युपनिषद्में
    उपर्युक्त ग्रंथका "महदाद्यं विशेषान्तं" पाठ है; और उसीको टीकाकारनेभी
    माना है। यदि यह पाठ लिया जाय तो लिंग-शरीरमें आरंभके महत्तत्त्वका समावेश
    करके विशेषास्त पदसे सूचित विशेष अर्थात् पंचमहाभूतोंको ले लेना और विशेषान्त-
    मेंसे विशेषकों छोड़ देना चाहिये। परंतु जहाँ आद्यंतका उपयोग किया जाता है,
    वहाँ उन दोनोंको छोड़ना युक्त होता है। अतएव प्रो. डॉयसेनका कथन है, कि मह-
    दाद्यं पदके अंतिम अक्षरका अनुस्वार निकालकर 'महदाद्यविशेषान्तम्' (महदादि +
    अविशेषान्तम्) पाठ कर देना चाहिये। ऐसा करनेपर अविशेष पद बन जानेसे
    अहत् और अविशेष अर्थात् आदि और अंत दोनोंकोभी एकही न्याय पर्याप्त होगा;
    और लिंगशरीरमें दोनोंका समावेश किया जा सकेगा। यही इस पाठका विशेष गुण
    है। परंतु स्मरण रहे, कि पाठ कोईभी लिया जाय, अर्थमें भेद नहीं पड़ता।

१९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
'निवाशयात्' इस दृष्टान्तसे केवल इतनाही सिद्ध होता है, कि यह शरीर सूक्ष्म है।
परंतु उससे यह नहीं मालूम होता, कि उसका आकार कितना बड़ा है। महाभारतके
सावित्री-उपाख्यानमें यह वर्णन पाया जाता है, कि सत्यवान्‌के (स्थूल) शरीरमेंसे
अंगूठेके बराबर एक पुरुषको यमराजने बाहर निकाला - "अंगुष्ठमात्रं पुरुषं
निश्चकर्ष यमो बलात्" (मभा. वन. २९७. १६) । इससे प्रतीत होता है, कि
दृष्टान्तके लियेही क्यों न हो, लिंगशरीर अंगूठेके आकारका माना जाता था।
इस बातका विवेचन हो चुका, कि यद्यपि लिंगशरीर हमारे नेत्रोंको गोचर
नहीं है, तथापि उसका अस्तित्व किन अनुमानोंसे सिद्ध हो सकता है, और उस
शरीरके घटकावयव कौनसे हैं। परंतु केवल यह कह देनाही यथेष्ट प्रतीत नहीं होता,
कि प्रकृति और पाँच स्थूल महाभूतोंके अतिरिक्त शेष अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे
लिंगशरीर निर्माण होता है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि जहाँ जहाँ लिंग-शरीर
रहेगा, वहाँ वहाँ यह अठारह तत्त्वोंका समुच्चय अपने अपने गुणधर्मके अनुसार
माता-पिताके स्थूलशरीरमेंसे तथा आगे स्थूलसृष्टिके अन्नसे, हस्तपाद आदि स्थूल
अवयव या स्थूल इंद्रियाँ उत्पन्न करेगा; अथवा उनका पोषण करेगा। परंतु अबतक
यह बतलाना है, कि अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे बना हुआ लिंगशरीर पशु, पक्षी,
मनुष्य आदि भिन्न भिन्न देह क्यों उत्पन्न करता है। सजीव सृष्टिके सचेतन तत्त्वको
सांख्यवादी 'पुरुष' कहते हैं; और सांख्यमतानुसार ये पुरुष चाहे असंख्यभी हों;
तथापि प्रत्येक पुरुष स्वभावतः उदासीन तथा अकर्ता है। इसलिये पशु-पक्षी आदि
प्राणियोंके भिन्न भिन्न शरीर उत्पन्न करनेका कर्तृत्व पुरुषके हिस्सेमें नहीं आ सकता।
वेदान्तशास्त्रमें कहा है, कि पापपुण्य आदि कर्मोंके परिणामसे ये भेद उत्पन्न हुआ
करते हैं। इस कर्म-विपाकका विवेचन आगे चलकर किया जायगा। सांख्यशास्त्रके
अनुसार कर्मको - पुरुष और प्रकृतिसे भिन्न - तीसरा तत्त्व नहीं मान सकते; और
जब कि पुरुष उदासीनही है, तब कहना पड़ता है, कि कर्म प्रकृतिके सत्त्व-रज-
तमोगुणोंकाही विकार है। लिंगशरीरमें जिन अठारह तत्त्वोंका समुच्चय है, उनमेंसे
बुद्धितत्त्व प्रधान है। इसका कारण यह है, कि बुद्धिहीसे आगे अहंकार आदि सत्रह
तत्त्व उत्पन्न होते हैं। अर्थात् जिसे वेदान्तमें कर्म कहते हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें
सत्त्व-रज-तम गुणोंके न्यूनाधिक परिमाणसे उत्पन्न होनेवाला बुद्धिका व्यापार,
धर्म या विकार कहते हैं। बुद्धिके इस धर्मका नाम 'भाव' है और सत्त्व-रज-तम
गुणोंके तारतम्यसे ये 'भाव' कई प्रकारके हो जाते हैं। जिस प्रकार फूलमें गंध या
कपड़ेमें रंग लिपट रहता है, उसी प्रकार लिंगशरीरमें ये भावभी लिपटे रहते हैं।
(सां. का. ४०)। इन भावोंके अनुसार, अथवा वेदान्त परिभाषा में कर्मके अनुसार,
लिंगशरीर नये नये जन्म लिया करता है; और ये जन्म लेते समय, माता-पिताओंके
शरीरोंमेंसे जिन द्रव्योंको वह आकर्षित किया करता है, उन द्रव्योंमेंभी दूसरे भाव
आ जाया करते हैं। "देवयोनि, मनुष्ययोनि, पशुयोनि तथा वृक्षयोनि" ये सब

विश्वकी रचना और संहार १९३
भेद इन भावोंकी समुच्चयताकेही परिणाम हैं (सां. का. ४३-५५) । इन सब
भावोंमें सात्त्विक गुणका उत्कर्ष कारण होनेसे जब मनुष्यको ज्ञान और वैराग्यकी
प्राप्ति होती है, और उसके कारण प्रकृति और पुरुषकी भिन्नता समझमें आने
लगती है, तब पुरुष अपने मूलस्वरूप अर्थात् कैवल्यपदको पहुँच जाता है; और
तबतक लिंगशरीर छूट जाता है। एव मनुष्यके दुःखोंका पूर्णतया निवारण हो जाता
है। परंतु प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताका ज्ञान न होते हुए, यदि केवल सात्त्विक
गुणहीका उत्कर्ष हो, तो लिंगशरीर देवयोनिमें अर्थात् स्वर्गमें जन्म लेता है;
रजोगुणकी प्रबलता हो, तो मनुष्ययोनिमें अर्थात् पृथ्वीपर पैदा होता है; और
तमोगुणकी अधिकता हो जानेसे उसे तिर्यग्योनिमें प्रवेश करना पड़ता है (गीता
१४. १८) “गुणा गुणेषु जायन्ते” इस तत्त्वकेही आधारपर सांख्यशास्त्रमें वर्णन
किया गया है, कि मानवयोनिमें जन्म होनेके बाद रेत-बिंदुमें क्रमानुसार कलल,
बुद्बुद, मांस, पेशी और भिन्न भिन्न स्थूल इंद्रियाँ कैसे बनती जाती हैं।
(सां. का. ४३; मभा. शां. ३२०) गर्भोपनिषदका वर्णन प्रायः सांख्यशास्त्रके
उक्त वर्णनके समानही है। उपर्युक्त विवेचनसे यह बात मालूम हो जायगी. कि
सांख्यशास्त्रमें 'भाव' शब्दका जो पारिभाषिक अर्थ बतलाया गया है, वह यद्यपि
वेदान्त-ग्रंथोंमें विवक्षित नहीं है, तथापि भगवद्गीतामें (गीता १०. ४, ५;
७. १२) “बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः” इत्यादि गुणोंको (इसके
आगेके श्लोकमें) जो 'भाव' नाम दिया है, वह प्रायः सांख्यशास्त्रकी परिभाषाको
सोचकरही दिया गया होगा ।
इस प्रकार सांख्यशास्त्रके मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्तके अनुसार
मूल सद्ब्रह्मी परब्रह्ममे सृष्टिके सब सजीव और निर्जीव व्यक्त पदार्थ क्रमशः उत्पन्न
हुए । और जब सृष्टिके संहारका समय आ पहुँचता है, तब सृष्टिरचनाका जो
गुणपरिणामक्रम ऊपर बतलाया गया है, ठीक इसके विरुद्ध क्रमसे सब व्यक्त पदार्थ
अव्यक्त प्रकृतिमें अथवा मूल ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। यह सिद्धान्त सांख्य और
वेदान्त दोनों शास्त्रोंको मान्य है (वे. सू २. ३. १४; मभा. शां. २३२) । उदाहर-
णार्थ, पंचमहाभूतोंमेंसे पृथ्वीका लय पानीमे, पानीका अग्निमें, अग्निका वायुमें,
वायुका आकाशमें, आकाशका तन्मात्राओंमें, तन्मात्राओंका अहंकारमें, अहंकारका
बुद्धिमें, और बुद्धि या महान् का लय प्रकृतिमें हो जाता है; तथा वेदान्तके अनुसार
प्रकृतिका लय मूल ब्रह्ममें हो जाता है। सांख्यकारिकामें किमीभी स्थानपर यह नही
बतलाया गया है, कि सृष्टिकी उत्पत्ति या रचना हो जानेपर उसका लय या संहार
होनेतक बीचमें कितना समय बीत जाता है। तथापि, ऐसा प्रतीत होता है कि मनु-
संहिता (१. ६६-७३), भगवद्गीता (८. १७) तथा महाभारत (शा. २३१) में
णित कालगणना सांख्योंकोभी मान्य है। हमारा उत्तरायण देवताओंका दिन है
व गी. र. १३

१९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि, स्मृतिग्रंथोंमें और ज्योतिषशास्त्रकी
संहिता (सूर्यसिद्धान्त १. ३३; १२. ३५, ६७) मेंभी यही वर्णन है, कि देवता
मेरुपर्वतपर अर्थात् उत्तरध्रुवमें रहते हैं। अर्थात् दो अयनोंका हमारा एक वर्ष
देवताओंके एक दिन-रातके बराबर है; और हमारे ३६० वर्ष देवताओंके ३६०
दिन-रातें अथवा एक वर्षके बराबर हैं। कृत, त्रेता, द्वापर कलि, हमारे चार
युग हैं। युगोंकी कालगणना इस प्रकार है- कृतयुगमें चार हज़ार वर्ष, त्रेतायुगमें
तीन हज़ार, द्वापरमें दोन हज़ार और कलिमें एक हज़ार वर्ष। परंतु एक युग समाप्त
होतेही दूसरा युग एकदम आरंभ नहीं हो जाता। बीचमें, दो युगोंके संधिकालमें कुछ
वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृतयुगके आदि और अंतमें, प्रत्येक ओर चार सौ
वर्षका, त्रेतायुगके आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्षका, द्वापरके पहले और
बाद प्रत्येक ओर दो सौ वर्षका, और कलियुगके पूर्व तथा अनंतर प्रत्येक ओर सौ
वर्षका संधिकाल होता है। सब मिलाकर चारों युगोंका आदि-अंत-सहित संधिकाल
दो हज़ार वर्षका होता है। ये दो हज़ार वर्ष पहले बतलाये हुए सांख्यमतानुसार
चारों युगोंके दस हज़ार वर्ष मिलाकर कुल बारह हज़ार वर्ष होते हैं। ये बारह
हज़ार वर्ष मनुष्योंके है या देवताओंके ? यदि मनुष्योंके माने जायें, तो कलियुगका
आरंभ हुए पाँच हज़ारसे अधिक वर्ष बीत चुकनेके कारण यह कहना पड़ेगा, कि
हज़ार मानवी वर्षोंका कलियुग पूरा हो चुका है। और उसके बाद फिरसे आनेवाला
कृतयुगभी समाप्त हो गया; और हमने अब त्रेतायुगमें प्रवेश किया है ! यह विरोध
मिटानेके लिये पुराणोंमें निश्चित किया है, कि ये बारह हज़ार वर्ष देवताओंके
हैं। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष, मनुष्योंके ३६० × १२ ००० = ४३२०,०००
(पैंतालीस लाख बीस हज़ार) वर्ष होते हैं; वर्तमान पंचांगोंका युगपरिमाण इसी
पद्धतिसे निश्चित किया जाता है। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष मिलकर मनुष्योंका
एक महायुग या देवताओंका युग होता है। देवताओंके इकहत्तर युगोंको मन्वंतर कहते
हैं; और ऐसे मन्वंतर चौदह हैं। परंतु पहले मन्वंतरके आरंभ तथा अंतमें, और आगे
चलकर प्रत्येक मन्वंतरके आखिरमें दोनों ओर कृतयुगकी बराबरीका एक एक ऐसे
१५ संधिकाल जाते हैं। ये पंद्रह संधिकाल और चौदह मन्वन्तर मिलकर देवताओंके
एक हज़ार युग अथवा ब्रह्मदेवका एक दिन होता है (सूर्यसिद्धान्त १. १९-२०);
और मनुस्मृति तथा महाभारतमें लिखा है, कि ऐसेही हज़ार युग मिलकर ब्रह्मदेवकी
रात होती है (मनु. १. ६९-७३ और ७९; मभा. शां. २३१. १८-३१ और
यास्कका निरुक्त १४. ९)। इस गणनाके अनुसार ब्रह्मदेवका एक दिन मनुष्योंके
चार अब्ज बत्तीस करोड़ वर्षके बराबर होता है; और इसीका नाम है कल्प। *

  • ज्योतिःशास्त्रके आधारपर युगादि गणनाका विचार स्वर्गीय शंकर बाळकृष्ण
    दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' नामक (मराठी) ग्रंथमें किया है,
    पृ. १०३-१०५; १९३ इत्यादि देखो।

विश्वकी रचना और संहार १९५
भगवद्गीता ( १. १८ ) और ( ९. ७ ) में कहा है, कि जब ब्रह्मदेवके इस दिन
अर्थात् कल्पका आरंभ होता है तब :-
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
“अव्यक्तसे सृष्टिके सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और जब ब्रह्मदेवकी
रात्रि आरंभ होती है, तब वे सब व्यक्त पदार्थ पुनश्च अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं।”
स्मृतिग्रंथ और महाभारतमेंभी यही बतलाया है। इसके अतिरिक्त पुराणादिकोंमें
अन्य प्रलयोंकाभी वर्णन है; परंतु इन प्रलयोंमें सूर्य-चंद्र आदि सारी सृष्टिका नाश
नहीं हो जाता; इसलिये ब्रह्मांडकी उत्पत्ति और संहारका विवेचन करते समय इनका
विचार नहीं किया जाता। कल्प ब्रह्मदेवका एक दिन अथवा रात्रि है; और ऐसे ३६०
दिन तथा ३६० रात्रियाँ मिलकर ब्रह्मदेवका एक वर्ष होता है। इसीसे पुराणादिकों
(विष्णुपुराण १. ३) में यह वर्णन पाया जाता है, कि ब्रह्मदेवकी आयु उनके सौ
वर्षकी है। उसमेंसे आधी बीत गई। शेष आयुके अर्थात् इक्यावनवें वर्षके पहले दिनका
अथवा श्वेतवाराह नामक कल्पका अब आरंभ हुआ है; और इस कल्पके चौदह
मन्वन्तरोंमेंसे छः मन्वन्तर बीत चुके हैं, तथा सातवें (अर्थात् वैवस्वत) मन्वन्तरके
७१ महायुगोंमेंसे २७ महायुग पूरे हो गये हैं। एवं अब २८वें महायुगके कलियुगका
प्रथम चरण अर्थात् चतुर्थ भाग जारी है। संवत् १९५६ (शक १८२१) में इस
कलियुगके ठीक ५००० वर्ष बीत चुके थे। इस प्रकार गणित करनेसे मालूम होगा,
कि इस कलियुगका प्रलय होनेके लिये संवत् १९५६में मनुष्यके ४ लाख २७ हजार
वर्ष शेष थे; फिर वर्तमान मन्वन्तरके अंतमें अथवा वर्तमान कल्पके अंतमें होनेवाले
महाप्रलयकी बातही क्या ! मानवी चार अब्ज बत्तीस करोड वर्षका जो ब्रह्मदेवका
दिन इस समय जारी है, उसका पूरा मध्याह्नभी नही हुआ। अर्थात् सात मन्वंतरभी
अबतक नहीं बीते हैं।
सृष्टिकी रचना और संहारका जो अबतक विवेचन किया गया, वह वेदान्तके
और परब्रह्मको छोड़ देनेसे सांख्यशास्त्रके - तत्त्वज्ञानके आधारपर किया गया है।
इसलिये सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी इसी परंपराको हमारे शास्त्रकार सदैव प्रमाण मानते
हैं; और यही क्रम भगवद्गीतामेंभी दिया हुआ है। इस प्रकरणके आरंभहीमें बतला
दिया गया है, कि सृष्ट्युत्पत्तिक्रमके बारेमें कुछ भिन्न भिन्न विचार पाये जाते हैं। जैसे
श्रुतिस्मृतिपुराणोंमें कही कहीं कहा है, कि प्रथम ब्रह्मदेव या हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ;
अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ और उसमें परमेश्वरके बीजसे एक सुवर्णमय अंडा
निर्मित हुआ। परंतु इन सब विचारोंको गौण तथा उपलक्षणात्मक समझकर जब
उनकी उपपत्ति बतलानेका समय आता है तब यही कहा जाता है, कि हिरण्यगर्भ
अथवा ब्रह्मदेवही प्रकृति है। भगवद्गीता (गीता १४. ३) में त्रिगुणात्मक प्रकृतिहीको
ब्रह्म कहा है - “मम योनिर्महत् ब्रह्म।” और भगवानने यहभी कहा है, कि हमारे

१९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
बीजसे इस प्रकृतिमें त्रिगुणोंके द्वारा अनेक मूर्तियाँ उत्पन्न होती है। अन्य स्थानोंमें
ऐसा वर्णन है, कि ब्रह्मदेवसे आरंभमें दक्षप्रभृति सात मानसपुत्र अथवा सात मनु
उत्पन्न हुए; और उन्होंने आगे सब चर-अचर सृष्टिका निर्माण किया। (मभा. आ.
६५-६७; मभा. शां. २०. ७; मनु. १. ३४-६३); और इसीका गीतामेंभी एक-
बार उल्लेख किया गया है (गीता. १०. ६)। परंतु वेदान्तग्रंथ यह प्रतिपादन करते
हैं, कि इन सब भिन्न भिन्न वर्णनोंका, ब्रह्मदेवकोही प्रकृति मान लेनेसे, उपर्युक्त
तात्त्विक सृष्ट्युत्पत्तिक्रमसे मेल हो जाता है; और यही न्याय अन्य स्थानोंमेंभी उप-
योगी हो सकता है। उदाहरणार्थ, शैव अथवा पाशुपत दर्शनोंमे शिवको निमित्तकारण
मानकर यह कहते हैं, कि उसीसे कार्यकारणादि पाँच पदार्थ उत्पन्न हुए। और नारा-
यणीय या भागवतधर्ममें वासुदेवको प्रधान मानकर यह वर्णन किया है, कि पहले
वासुदेवसे संकर्षण (जीव) उत्पन्न हुआ, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन), और प्रद्युम्नसे
अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। परंतु वेदान्तशास्त्रके अनुसार जीव प्रत्येक समय
नये सिरेसे उत्पन्न नहीं होता। वह नित्य और सनातन परमेश्वरका नित्य-अतएव
अनादि-अंश है। इसलिये वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पाद (वे. सू. २. २.
४२-४५) में भागवतधर्ममें वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक उपर्युक्त मतका खंडन
करके कहा है, कि वह वेदविरुद्ध अतएव त्याज्य है। गीता (गीता. १३. ४; १५.७) में
वेदान्तसूत्रोंके इसी सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है। इसी प्रकार सांख्यवादी प्रकृति
और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र तत्त्व मानते हैं; परंतु इस द्वैतको स्वीकार न कर वेदान्ति-
योंने यह सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुष-दोनों तत्त्व एकही नित्य और
निर्गुण परमात्माकी विभूतियाँ हैं। यही सिद्धान्त भगवद्गीताकोभी ग्राह्य है (गीता
९. १०)। परंतु इसका विस्तारपूर्वक विवेचन अगले प्रकरणमें किया जायगा।
यहाँपर केवल इतनाही बतलाया है, कि भागवत या नारायणीय धर्ममें वर्णित वासु-
देवभक्तिका और प्रवृत्तिप्रधान धर्मका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको मान्य है, तथापि
गीता भागवतधर्मकी इस कल्पनासे सहमत नहीं है, कि पहले वासुदेवसे संकर्षण या
जीव उत्पन्न हुआ; और उससे आगे प्रद्युम्न (मन) तथा प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका
(अहंकार) का प्रादुर्भाव हुआ। संकर्षण, प्रद्युम्न या अनिरुद्धका नाम तक गीतामें
नहीं पाया जाता। पांचरात्रमें बतलाये हुए भागवतधर्ममें और गीता-प्रतिपादित
भागवतधर्ममें यही महत्त्वका भेद है। इस बातका उल्लेख यहाँ जान-बूझकर किया गया
है; क्योंकि केवल इतनेहीसे-कि "भगवद्गीतामें भागवतधर्म बतलाया गया है"
-कोई यह न समझ लें, कि सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम-विषयक अथवा जीव-परमेश्वर-स्वरूप-
विषयक भागवत आदि भक्तिसंप्रदायके मतभी गीताको मान्य हैं। अब इस बातका
विचार किया जायगा, कि सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृति और पुरुषकेभी परे सब व्यक्ता-
व्यक्त तथा क्षराक्षर जगतके मूलमें कोई और तत्त्व है या नहीं। इसीको अध्यात्म
या वेदान्त कहते हैं।

नौवाँ प्रकरण
अध्यात्म
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ *
— गीता ८.२०
पिछले दो प्रकरणोंका सारांश यही है, कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचारमें जिसे क्षेत्रज्ञ कहते
हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहते हैं। सब क्षर-अक्षर या चर-अचर सृष्टिके
संहार और उत्पत्तिका विचार करनेपर सांख्यशास्त्रके अनुसार अंतमें केवल प्रकृति
और पुरुष यही दो स्वतंत्र तथा अनादि मूलतत्त्व रह जाते हैं; और पुरुषको अपने
क्लेशोंकी निवृत्ति कर लेने तथा मोक्षानंद प्राप्त कर लेनेके लिये प्रकृतिसे अपना
भिन्नत्व अर्थात् कैवल्य जानकर त्रिगुणातीत होना चाहिये । प्रकृति और पुरुषका
संयोग होनेपर प्रकृति अपना बाजार पुरुषके सामने किस प्रकार लगाया करती है, इस
विषयका क्रम अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रवेत्ताओंने सांख्यशास्त्रसे कुछ निराला बतलाया
है; और संभव है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंकी ज्यों ज्यों उन्नति होगी, त्यों त्यों इस
क्रममें औरभी सुधार होते जावेंगे ।। जोभी हो; इस मूलसिद्धान्तमें कभी कोई फ़र्क
नहीं पड़ सकता, कि केवल एक अव्यक्त प्रकृतिसेही सारे व्यक्त पदार्थ गुणोत्कर्षके
अनुसार क्रमक्रमसे निर्मित होते गये हैं। परंतु वेदान्तकेसरी इस विषयको अपना नही
समझता — यह अन्य शास्त्रोंका विषय है; इसलिये वह इस विषयपर वादविवादभी
नहीं करता । वह इन सब शास्त्रोंसे आगे बढ़कर यह बतलानेके लिये प्रवृत्त हुआ है,
कि पिंड-ब्रह्मांडकी जड़में कौनसा श्रेष्ठ तत्त्व है; और मनुष्य उस श्रेष्ठ तत्त्वमें कैसे
मिला जा सकता है – अर्थात् तद्रूप कैसे हो सकता है । वेदान्तकेसरी अपने इस
विषयप्रदेशमें किसी और शास्त्रकी गर्जना नहीं होने देता । सिंहके आगे गीदड़की
भाँति वेदान्तके सामने सारे शास्त्र चुप हो जाते हैं। अतएव किसी पुराने सुभाषित-
कारने वेदान्तका यथार्थ वर्णन यों किया है :–
तावत् गर्जन्ति शास्त्राणि जम्बुका विपिने यथा ।
न गर्जति महाशक्तिः यावद्वेदान्तकेसरी ॥
सांख्यशास्त्रका कथन है, कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करनेपर निष्पन्न होनेवाला

  • “ जो दूसरा अव्यक्त पदार्थ उस ( सांख्य ) अव्यक्तसेभी श्रेष्ठ तथा सनातन
    है; और सब प्राणियोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, वही अंतिम
    गति है।”

१९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
'द्रष्टा' अर्थात् पुरुष या आत्मा, और क्षर-अक्षर-सृष्टिका विचार करनेपर निष्पन्न
होनेवाली सत्त्व-रज-तम-गुणमयी अव्यक्त प्रकृति, ये दोनों स्वतंत्र हैं; और इस
प्रकार जगत्के मूलतत्त्वको द्विधा मानना आवश्यक है। परंतु वेदान्त इसके आगे जा
कर यों कहता है, कि सांख्योंके 'पुरुष' निर्गुण भलेही; तोभी वे असंख्य हैं। इसलिये यह
मान लेना उचित नहीं, कि इन असंख्य पुरुषोंका लाभ जिस बातमें हो, उसे जानकर
प्रत्येक पुरुषके साथ तदनुसार बर्ताव करनेकी सामर्थ्य प्रकृतिमें है। ऐसा माननेकी
अपेक्षा सात्त्विक तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे तो यही अधिक युक्तिसंगत होगा, कि जो
एकीकरणकी ज्ञानक्रिया “अविभक्तं विभक्तेषु"के अनुसार नीचेसे ऊपर तककी
श्रेणियोंमें दीख पड़ती है; ओर जिसकी सहायतासेही सृष्टिके अनेक व्यक्त पदार्थोंका
एक अव्यक्त प्रकृतिमें समावेश किया जाता है उसी एकीकरणकी ज्ञान-क्रियाका अंत-
तक निरपवाद उपयोग किया जावेः और प्रकृति तथा असंख्य पुरुषोंका एकही
परमतत्त्वमें अविभक्तरूपसे समावेश किया जावेः। (गीता १८. २०-२२)।
भिन्नता होना अहंकारका परिणाम है; और पुरुष यदि निर्गुण है, तो असंख्य पुरुषोंके
अलग अलग रहनेका गुण उसमें रह नहीं सकता। अथवा यह कहना पड़ता है, कि
वस्तुतः पुरुष असंख्य नहीं है और केवल प्रकृतिकी अहंकाररूपी उपाधिसे उनमें अनेकता
दीख पड़ती है। दूसरा एक प्रश्न यह उठता है, कि स्वतंत्र पुरुषका स्वतंत्र पुरुषके साथ
जो संयोग हुआ है, वह सत्य है या मिथ्या ? यदि सत्य मानें, तो वह संयोग कभीभी
छूट नहीं सकता। अतएव सांख्यमतानुसार आत्माको मुक्ति कभी प्राप्त नहीं हो
सकती। और यदि मिथ्या माने, तो यह सिद्धान्तही निर्मूल या निराधार हो जाता है
कि पुरुषके संयोगसे प्रकृति अपना बाजार उसके आगे लगाया करती है। और यह
दृष्टान्तभी ठीक नहीं, कि जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, उसी प्रकार
पुरुषके लाभके लिये प्रकृति सदा कार्यरतपर रहती है। क्योंकि, बछड़ा गायके पेटसेही
पैदा होता है, इसलिये उसपर पुत्रवात्सल्यके प्रेमका उदाहरण जैसे संगठित होता है,
वैसे प्रकृति और पुरुषके विषयमें नहीं कहा जा सकता (वे. सू. शां. भा. २. २. ३)।
सांख्यमतके अनुसार प्रकृति और पुरुष - दोनों तत्त्व मूलतः अत्यंत भिन्न हैं- एक
जड़ है, दूसरा सचेतन। अच्छा; जब ये दोनों पदार्थ सृष्टिके उत्पत्तिकालसेही एक
दूसरेसे अत्यंत भिन्न और स्वतंत्र हैं, तो फिर एककी प्रवृत्ति दूसरेके फायदेहीके लिये
क्यों होनी चाहिये ? यह तो कोई समाधानकारक उत्तर नहीं कि उनका स्वभावही
वैसा है। स्वभावही मानना हो, तो फिर उनमेंसे हेकेलका जड़ाद्वैतवाद क्यों बुरा
है? हेकेलकाभी सिद्धान्त यही है न, कि मूलप्रकृतिके गुणोंकी वृद्धि होते होते उसी
प्रकृतिमें अपने आपको देखनेकी और अपने विषयमें विचार करनेकी चैतन्यशक्ति
उत्पन्न हो जाती है - अर्थात् यह प्रकृतिका स्वभावही है। परंतु इस मतका स्वीकार
न कर सांख्यशास्त्रने यह भेद किया है, कि 'द्रष्टा' अलग है; और दृश्यसृष्टि अलग
है। अब यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि सांख्यवादी जिस न्यायका अवलंबन कर

अध्यात्म १९९
'द्रष्टा पुरुष' और 'दृश्य सृष्टि' में भेद बतलाते हैं, उसी न्यायका उपयोग करते हुए और
आगे क्यों न चलें ? दृश्य सृष्टिकी कोई कितनीही सूक्ष्मतासे परीक्षा करें; और यह
जान लें, कि जिन नेत्रोंसे हम पदार्थोंको देखते परखते हैं, उनके मज्जातंतुओंमें अमुक
अमुक गुण-धर्म हैं। तथापि इन सब बातोंको जाननेवाला (या 'द्रष्टा') भिन्नही रह
जाता है, क्या उस 'द्रष्टा'के विषयमें - जो 'दृश्य सृष्टि' से भिन्न है - विचार करनेके
लिये कोई साधन या उपाय नहीं है ? और यह जाननेके लियेभी कोई मार्ग है या नहीं,
कि इस सृष्टिका सच्चा स्वरूप जैसा हम अपनी इंद्रियोंसे देखते हैं वैसाही है; या
उससे भिन्न है ? सांख्यवादी कहते हैं, कि इन प्रश्नोंका निर्णय होना असंभव है।
अतएव यह मान लेना पड़ता है, कि प्रकृति और पुरुष, दोनों तत्त्व मूलहीमें स्वतंत्र
और भिन्न हैं। और यदि केवल आधिभौतिक शास्त्रोंकी प्रणालीसे विचार कर देखें,
तो सांख्यवादियोंका यह मत अनुचित नहीं कहा जा सकता। कारण यह है, कि
सृष्टिके अन्य पदार्थोंको जैसे हम अपनी इंद्रियोंसे देखभाल करके उनके गुणधर्मोंका
विचार करते हैं, वैसे यह 'द्रष्टा पुरुष' या देखनेवाला - अर्थात् जिसे वेदान्तमें 'आत्मा'
कहा है, वह - द्रष्टाकी ( अर्थात् अपनीही ) इंद्रियोंको भिन्न रूपमें कभी गोचर
हो नहीं सकता। और जिस पदार्थका इस प्रकार इंद्रियगोचर होना असंभव है, यानी
जो वस्तु इंद्रियातीत है उसकी परीक्षा मानवी इंद्रियोंसे कैसे हो सकती है? उस
आत्माका वर्णन भगवान्ने गीतामें (गीता २. २३ ) इस प्रकार किया है :-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
अर्थात्, आत्मा ऐसा कोई पदार्थ नहीं कि यदि हम सृष्टिके अन्य पदार्थोंके समान उस-
पर तेजाब आदि द्रव पदार्थ डालें तो वह द्रवरूप हो जाय, अथवा प्रयोगशालाके पैने
शस्त्रोंसे काट-छांटकर उसका आंतरिक स्वरूप देख लें, या आगपर धर देनेसे उसका
धुआँ हो जाय, अथवा हवामें रखनेसे वह सूख जाय ! सारांश, सृष्टिके पदार्थोंकी
परीक्षा करनेके आधिभौतिक शास्त्रवेत्ताओंने जितने कुछ उपाय ढूंढ़े हैं, वे सब यहाँ
निष्फल हो जाते हैं तो फिर आत्माका परीक्षण होगाभी तो कैसे ? प्रश्न है तो बिकट,
पर विचार करनेसे कुछ कठिनाई दीख नहीं पड़ती। भला, सांख्यवादियोंनेभी 'पुरुष'-
को निर्गुण और स्वतंत्र कैसे जाना ? केवल अपने अंतःकरणके अनुभवसेही जाना
है न ? फिर उसी रीतिका उपयोग प्रकृति और पुरुषके सच्चे स्वरूपका निर्णय करनेके
लिये क्यों न किया जावें ? आधिभौतिकशास्त्र और अध्यात्मशास्त्रमें जो बड़ा भारी
भेद है, वह यही है। आधिभौतिकशास्त्रोंके विषय इंद्रियगोचर होते हैं; और अध्यात्म-
शास्त्रका विषय इंद्रियातीत अर्थात् केवल स्वसंवेद्य है; यानी अपने आपही जानने
योग्य है। कोई यह कहें, कि यदि 'आत्मा' स्वसंवेद्य है, तो प्रत्येक मनुष्यको उसके
विषयमें जैसा ज्ञान होवे, वैसा होने दो; अध्यात्मशास्त्रकी आवश्यकताही क्या है ?
हाँ; यदि प्रत्येक मनुष्यका मन या अंतःकरण समान रूपसे शुद्ध हो, तो फिर यह

२०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
प्रश्न ठीक होगा । परंतु जब कि हमारा यह प्रत्यक्ष अनुभव है, कि प्रत्येक पुरुषके मन
या अंतःकरणकी शुद्धि अथवा शक्ति एक-सी नहीं होती, तब जिन लोगोंके मन
अत्यंत शुद्ध, पवित्र और विशाल हो गये हैं; उन्हींकी प्रतीति इस विषयमें हमारे
लिये प्रमाणभूत होनी चाहिये । योंही 'मुझे ऐसा मालूम होता है' 'तुझे ऐसा
मालूम होता है' कह कर निरर्थक वाद करनेसे कोई लाभ न होगा । वेदान्तशास्त्र
तुम्हें युक्तिवादका उपयोग करनेसे बिलकुल नहीं रोकता । वह सिर्फ़ यही कहता है,
कि अध्यात्मशास्त्रके विषयमें निरी युक्तियाँ वहीं तक मानी जावेंगी जहाँतक कि
इन युक्तियोंसे अत्यंत विशाल, पवित्र और निर्मल अंतःकरणवाले महात्माओंके इस
विषयसंबंधी साक्षात् अनुभवका विरोध न होता हो । क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका विषय
स्वसंवेद्य है - अर्थात् केवल आधिभौतिक युक्तियोंमें उसका निर्णय नहीं हो सकता ।
जिस प्रकार आधिभौतिक शास्त्रोंमें वे अनुमान त्याज्य माने जाते हैं, कि जो प्रत्यक्षके
विरुद्ध हों, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्रमें युक्तियोंकी अपेक्षा उपर्युक्त स्वानुभवकी
अर्थात् आत्मप्रतीतिकी योग्यताही अधिक मानी जाती है। जो युक्ति इस अनुभवके
अनुकूल हो, उसे वेदान्ती अवश्य मानते हैं। श्रीमान् शंकराचार्यने अपने वेदान्त-
सूत्रोंके भाष्यमें यही सिद्धान्त दिया है। अध्यात्मशास्त्रका अभ्यास करनेवालोंको
इसपर हमेशा ध्यान रखना चाहिये :-
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ।
प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥
"जो पदार्थ इंद्रियातीत हैं और इसीलिये जिनका चिंतन नहीं किया जा सकता,
उनका निर्णय केवल तर्क या अनुमानसे नहीं कर लेना चाहिये । सारी सृष्टिकी
मूल प्रकृतिसेभी परे जो पदार्थ है, वह इस प्रकार अचिंत्य है" - यह एक पुराना
श्लोक है, जो महाभारतमें (महा. भीष्म. ५. १२) पाया जाता है; और जो
शंकराचार्यके वेदान्तभाष्यमेंभी 'साधयेत्'के बदले 'योजयेत्'के पाठभेदसे पाया जाता
है (वे. सू. शां. भा. २. १. २७) । मुंडक और कठोपनिषद्मेंभी लिखा है, कि
आत्मज्ञान केवल तर्कहीसे नहीं प्राप्त हो सकता (मुं. ३. २, ३; कठ. २. ८, ९ और
२२) । अध्यात्मशास्त्रमें उपनिषद्-ग्रंथोंका विशेष महत्त्वभी इसीलिये है। मनको
एकाग्र करनेके उपायोंके विषयमें प्राचीन कालमें हमारे हिंदुस्थानमें बहुत चर्चा हो
चुकी है; और अंतमें इस विषयपर, (पातंजल) योगशास्त्र नामक एक स्वतंत्र
शास्त्रही निर्मित हो गया है। जो बड़े बड़े ऋषि इस योगशास्त्रमें अत्यंत प्रवीण थे
तथा जिनके मन स्वभावहीसे अत्यंत पवित्र और विशाल थे, उन महात्माओंने
मनको अंतर्मुख करके आत्माके स्वरूपके विषयमें जो अनुभव प्राप्त किया - अथवा
आत्माके विषयमें इनको शुद्ध और शांत बुद्धिमें जो स्फूर्ति हुई - उसका वर्णन
उन्होंने उपनिषद्-ग्रंथोंमें किया है। इसलिये किसीभी अध्यात्म तत्त्वका निर्णय करनेमें
इन श्रुतिग्रंथोंमें कहे गये अनुभविक ज्ञानका सहारा लेनेके अतिरिक्त कोई दूसरा

अध्यात्म २०१
उपाय नहीं है ( कठ. ४. १)। मनुष्य केवल अपनी बुद्धिकी तीव्रतासे उक्त आत्म
प्रतीतिकी पोषक भिन्न भिन्न युक्तियाँ बतला सकेगा; परंतु इससे उस मूल
प्रतीतिकी प्रामाणिकतामें रत्तीभरभी न्यूनाधिकता नहीं हो सकती। भगवद्गीताकी
गणना स्मृतिग्रंथोंमें की जाती है सही; परंतु पहले प्रकरणके आरंभहीमें हम कह
चुके हैं, कि इस विषयमें गीताकी योग्यता उपनिषदोंकी बराबरीकी मानी जाती है।
अतएव इस प्रकरणमें अब आगे चल कर सिर्फ़ यह बतलाया जायगा, कि प्रकृतिके
परे जो अचिंत्य पदार्थ है, उसके विषयमें गीता और उपनिषदोंमें कौन-कौनसे
सिद्धान्त किये गये हैं; और उनके कारणोंका ( अर्थात् शास्त्ररीतिसे उनकी
उपपत्तिका ) विचार पीछे किया जायगा।
सांख्यवादियोंका द्वैत - प्रकृति और पुरुष - भगवद्गीताको मान्य नहीं है।
भगवद्गीताके अध्यात्मज्ञानका और वेदान्तशास्त्रकाभी पहला सिद्धान्त यह है, कि
प्रकृति और पुरुषसेभी परे एक सर्वव्यापक, अव्यक्त और अमृत तत्त्व है, जो चर-अचर
सृष्टिका मूल है। सांख्योंकी प्रकृति यद्यपि अव्यक्त है, तथापि वह त्रिगुणात्मक अर्थात्
सगुण है। परंतु प्रकृति और पुरुषका विचार करते समय भगवद्गीताके आठवें
अध्यायके बीसवें श्लोकमें (इस प्रकरणके आरंभमेंभी यह श्लोक दिया गया है)
कहा है, कि जो सगुण है वह नाशवान् है; इसलिये इस अव्यक्त और सगुण प्रकृति-
काभी नाश हो जानेपर अंतमें जो कुछ अव्यक्त शेष रह जाता है, वही सारी सृष्टिका
सच्चा और नित्य तत्त्व है। और आगे पन्द्रहवें अध्यायमें (गीता. १५. १६) क्षर
और अक्षर - व्यक्त और अव्यक्त - इस भाँति सांख्यशास्त्रके अनुसार दो तत्त्व
बतलाकर यह वर्णन किया है :-
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
अर्थात्, जो इन दोनोंसेभी भिन्न है, वही उत्तम पुरुष है; उसीको परमात्मा कहते हैं;
वही अव्यय और सर्वशक्तिमान् है; और वही तीनों लोगोंमें व्याप्त हो कर उनकी
रक्षा करता है। यह पुरुष क्षर और अक्षर (अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त) इन दोनोंसेभी
परे है। इसलिये इसे 'पुरुषोत्तम' कहा है (गीता. १५. १८)। महाभारतमेंभी भृगु
ऋषिने भरद्वाजमे 'परमात्मा' शब्दकी व्याख्या बतलाते हुए कहाँ है :-
आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः ।
तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥
अर्थात् "जब आत्मा प्रकृतिमें या शरीरमें बद्ध रहता है, तब उसे क्षेत्रज्ञ या जीवात्मा
कहते हैं; और वही प्राकृत गुणोंसे यानी प्रकृति या शरीरके गुणोंसे मुक्त होनेपर
'परमात्मा' कहलाता है" (मभा. शां. १८७. २४)। संभव है, कि 'परमात्मा' की
उपर्युक्त दो व्याख्याएं भिन्न भिन्न जान पड़ें; परंतु वे भिन्न भिन्न नहीं हैं। क्षर-अक्षर
सृष्टि और जीव (अथवा सांख्यशास्त्रके अनुसार अव्यक्त प्रकृति और पुरुष) इन

२०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

दोनोंसेभी परे एकही परमात्मा है। इसलिये यह कहा जाता है, कि वह क्षर-अक्षरके
परे है; और कभी कहा जाता है, कि वह जीवके या जीवात्माके (पुरुषके) परे है।
एवं एकही परमात्माकी ऐसी द्विविध व्याख्याएं कहनेमें वस्तुतः कोई भिन्नता नहीं हो
जाती। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर कालिदासनेभी कुमारसंभवमें परमेश्वरका
वर्णन इस प्रकार किया है - “पुरुषके लाभके लिये उद्युक्त होनेवाली प्रकृतिभी तूही
है; और स्वयं उदासीन रह कर उस प्रकृतिका द्रष्टाभी तूही है” (कुमा. २. १३)
इसी भाँति गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “मम योनिर्महद्ब्रह्म” यह प्रकृति मेरी
योनि या मेरा एक स्वरूप है (१४. ३) और जीव या आत्माभी मेराही अंश है
(१५. ७) सातवें अध्यायमेंभी कहा गया है :-
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
अर्थात् “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - इस तरह आठ
प्रकारकी मेरी प्रकृति है; और इसके सिवा (अपरेयमितस्त्वन्यां) सारे संसारका
धारण जिसने किया है, वह जीवभी मेरीही दूसरी प्रकृति है” (गीता ७. ४. ५)।
महाभारतके शांतिपर्वमें सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका कई स्थलोंपर विवेचन है; परंतु
वहीं अंतमें यहभी कह दिया गया है, कि इन पचीस तत्त्वोंके परे एक छब्बीसवाँ
(षड्विंश) परमतत्त्व है; जिसे पहचाने बिना मनुष्य 'बुद्ध' नहीं हो सकता (मभा.
शां. ३०८)। सृष्टिके पदार्थोंका जो ज्ञान हमें अपनी ज्ञानेंद्रियोंसे होता है, वही
हमारी सारी सृष्टि है। अतएव प्रकृति या सृष्टीहीको कई स्थानोंपर 'ज्ञात' कहा
है और इसी दृष्टिसे पुरुष 'ज्ञाता' कहा जाता है (मभा. शां. ३०६. ३५-४१)।
परंतु जो सच्चा ज्ञेय है (गीता १३. १२) वह प्रकृति और पुरुष - ज्ञान और
ज्ञातासेभी - परे है। इसलिये भगवद्गीतामें उसे परमपुरुष कहा है। तीनों लोकोंको
व्याप्त कर उन्हें सदैव धारण करनेवाला जो यह परमपुरुष या परपुरुष है, उसे
पहचानो; वह एक है, अव्यक्त है, नित्य है, अक्षर है - यह बात केवल भगवद्-
गीताही नहीं, किंतु वेदान्तशास्त्रके सारे ग्रंथ एक स्वरसे कह रहे हैं। सांख्यशास्त्रमें
'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दों या विशेषणोंका प्रयोग प्रकृतिके लिये किया जाता
है। क्योंकि सांख्योंका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिकी अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और कोई
भी मूलकारण इस जगत्‌का नहीं है (सां. का. ६१)। परंतु यदि वेदान्तकी
दृष्टिसे देखें, तो परब्रह्मही एक अ-क्षर है, यानी उसका कभी नाश नहीं होता;
और वही अव्यक्त है - अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं है। अतएव इस भेदपर पाठक
सदा ध्यान रखें, कि भगवद्गीतामें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दोंका उपयोग प्रकृ-
तिसे परेके परब्रह्मके स्वरूपको दिखलानेके लियेभी किया गया है (गीता ८. २०;
११. ३७; १२. १६, १७)। जब इस प्रकार वेदान्तकी दृष्टिका स्वीकार किया
गया तब इसमें संदेह नहीं, कि प्रकृतिको 'अक्षर' कहना उचित नहीं है - चाहे

अध्यात्म २०३
वह प्रकृति अव्यक्त भलेही हो । सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके विषयमें सांख्योंके सिद्धान्त
गीताकोभी मान्य हैं। इसलिये उनकी निश्चित परिभाषामें कुछ अदलाबदल न कर,
उन्हींके शब्दोंमें क्षर-अक्षर या व्यक्त-अव्यक्त-सृष्टिका वर्णन गीतामें किया गया है।
परंतु स्मरण रहे, कि इस वर्णनसे प्रकृति और पुरुषके परे जो तीसरा उत्तम पुरुष
है, उसके सर्वशक्तित्वमें कुछभी बाधा नहीं होने पाती। इसका परिणाम यह हुआ है,
कि जहाँ भगवद्गीतामें परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन किया गया है, वहाँ सांख्य और
वेदान्तके मतान्तरका संदेह मिटानेके लिये (सांख्य) अव्यक्तकेभी परेका अव्यक्त
और (सांख्य) अक्षरसेभी परेका अक्षर, इस प्रकारके शब्दोंका उपयोग करना
पड़ा है। उदाहरणार्थ, इस प्रकरणके आरंभमें जो श्लोक दिया गया है, उसे देखो।
सारांश, गीता पढ़ते समय इस बातका सदा ध्यान रखना चाहिये, कि 'अव्यक्त' और
'अक्षर' ये दोनों शब्द कभी सांख्योंकी प्रकृतिके लिये और कभी वेदान्तियोंके
परब्रह्मके लिये अर्थात् दो प्रकारसे - गीतामें प्रयुक्त हुए हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे,
सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिकेभी परेका दूसरा अव्यक्त तत्त्व जगतका मूलही है।
जगत्के आदितत्त्वके विषयमें सांख्य और वेदान्तमें उपर्युक्त भेद है। आगे इस
विषयका विवरण किया जायगा, कि इसी भेदसे अध्यात्मशास्त्रप्रतिपादित मोक्ष-
स्वरूपभी सांख्योंके मोक्षस्वरूपसे कैसे भिन्न हो गया है।
सांख्योंके द्वैत - प्रकृति और पुरुष - को न मानकर, जब यह मान लिया गया,
कि इस जगतकी जड़में परमेश्वररूपी अथवा पुरुषोत्तमरूपी एक तीसराही नित्य
तत्त्व है; और प्रकृति तथा पुरुष दोनों उसकी विभूतियाँ हैं; तब सहजही यह
प्रश्न उत्पन्न होता है, कि उस तीसरे मूलभूत तत्त्वका स्वरूप क्या है: और प्रकृति
तथा पुरुषसे उसका कौन-सा संबंध है ? प्रकृति, पुरुष और परमेश्वर इसी त्रयीको
अध्यात्मशास्त्रमें क्रमसे जगत्, जीव और परब्रह्म कहते हैं, और इन तीनों वस्तुओंके
स्वरूप तथा इनके पारस्परिक संबंधका निर्णय करनाही वेदान्तशास्त्रका प्रधान कार्य
है। एवं उपनिषदोंमेंभी सर्वत्र यही चर्चा की गई है। परंतु सब वेदान्तियोंका मत इस
त्रयीके विषयमें एक नहीं है। कोई कहते हैं, कि ये तीनों पदार्थ मूलमें एकही हैं, और
कोई यह मानते हैं, कि जीव और जगत् परमेश्वरसे मूलहीमें थोड़े या अत्यंत भिन्न
हैं। इसीसे वेदान्तियोंमें अद्वैती, विशिष्टाद्वैती, और द्वैती इस प्रकार भेद उत्पन्न हो गये
हैं। यह सिद्धान्त सब लोगोंको एक-सा ग्राह्य है, कि जीव और जगतके सारे व्यवहार
परमेश्वरकी इच्छासे होते हैं। परंतु कुछ लोग तो मानते हैं,' कि जीव, जगत् और
परब्रह्म, इन तीनोंका मूलस्वरूप आकाशके समान एकरूप और अखंडित है, तथा
दूसरे वेदान्ती कहते हैं, कि जड़ और चैतन्यका एक होना संभव नहीं। अतएव अनार
या दाड़िमके फलमें यद्यपि अनेक दाने होते हैं, तोभी उससे जैसे फलकी एकता नष्ट नहीं
होती, वैसेही जीव और जगत् यद्यपि परमेश्वरमें भरे हुए हैं, तथापि ये मूलमें उससे,
भिन्न हैं; और उपनिषदोंमें जब ऐसा वर्णन आता है, कि तीनों 'एक' हैं; तब उसका