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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 956 में से

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पृष्ठ 247

२०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
प्रश्न ठीक होगा । परंतु जब कि हमारा यह प्रत्यक्ष अनुभव है, कि प्रत्येक पुरुषके मन
या अंतःकरणकी शुद्धि अथवा शक्ति एक-सी नहीं होती, तब जिन लोगोंके मन
अत्यंत शुद्ध, पवित्र और विशाल हो गये हैं; उन्हींकी प्रतीति इस विषयमें हमारे
लिये प्रमाणभूत होनी चाहिये । योंही 'मुझे ऐसा मालूम होता है' 'तुझे ऐसा
मालूम होता है' कह कर निरर्थक वाद करनेसे कोई लाभ न होगा । वेदान्तशास्त्र
तुम्हें युक्तिवादका उपयोग करनेसे बिलकुल नहीं रोकता । वह सिर्फ़ यही कहता है,
कि अध्यात्मशास्त्रके विषयमें निरी युक्तियाँ वहीं तक मानी जावेंगी जहाँतक कि
इन युक्तियोंसे अत्यंत विशाल, पवित्र और निर्मल अंतःकरणवाले महात्माओंके इस
विषयसंबंधी साक्षात् अनुभवका विरोध न होता हो । क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका विषय
स्वसंवेद्य है - अर्थात् केवल आधिभौतिक युक्तियोंमें उसका निर्णय नहीं हो सकता ।
जिस प्रकार आधिभौतिक शास्त्रोंमें वे अनुमान त्याज्य माने जाते हैं, कि जो प्रत्यक्षके
विरुद्ध हों, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्रमें युक्तियोंकी अपेक्षा उपर्युक्त स्वानुभवकी
अर्थात् आत्मप्रतीतिकी योग्यताही अधिक मानी जाती है। जो युक्ति इस अनुभवके
अनुकूल हो, उसे वेदान्ती अवश्य मानते हैं। श्रीमान् शंकराचार्यने अपने वेदान्त-
सूत्रोंके भाष्यमें यही सिद्धान्त दिया है। अध्यात्मशास्त्रका अभ्यास करनेवालोंको
इसपर हमेशा ध्यान रखना चाहिये :-
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ।
प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥
"जो पदार्थ इंद्रियातीत हैं और इसीलिये जिनका चिंतन नहीं किया जा सकता,
उनका निर्णय केवल तर्क या अनुमानसे नहीं कर लेना चाहिये । सारी सृष्टिकी
मूल प्रकृतिसेभी परे जो पदार्थ है, वह इस प्रकार अचिंत्य है" - यह एक पुराना
श्लोक है, जो महाभारतमें (महा. भीष्म. ५. १२) पाया जाता है; और जो
शंकराचार्यके वेदान्तभाष्यमेंभी 'साधयेत्'के बदले 'योजयेत्'के पाठभेदसे पाया जाता
है (वे. सू. शां. भा. २. १. २७) । मुंडक और कठोपनिषद्मेंभी लिखा है, कि
आत्मज्ञान केवल तर्कहीसे नहीं प्राप्त हो सकता (मुं. ३. २, ३; कठ. २. ८, ९ और
२२) । अध्यात्मशास्त्रमें उपनिषद्-ग्रंथोंका विशेष महत्त्वभी इसीलिये है। मनको
एकाग्र करनेके उपायोंके विषयमें प्राचीन कालमें हमारे हिंदुस्थानमें बहुत चर्चा हो
चुकी है; और अंतमें इस विषयपर, (पातंजल) योगशास्त्र नामक एक स्वतंत्र
शास्त्रही निर्मित हो गया है। जो बड़े बड़े ऋषि इस योगशास्त्रमें अत्यंत प्रवीण थे
तथा जिनके मन स्वभावहीसे अत्यंत पवित्र और विशाल थे, उन महात्माओंने
मनको अंतर्मुख करके आत्माके स्वरूपके विषयमें जो अनुभव प्राप्त किया - अथवा
आत्माके विषयमें इनको शुद्ध और शांत बुद्धिमें जो स्फूर्ति हुई - उसका वर्णन
उन्होंने उपनिषद्-ग्रंथोंमें किया है। इसलिये किसीभी अध्यात्म तत्त्वका निर्णय करनेमें
इन श्रुतिग्रंथोंमें कहे गये अनुभविक ज्ञानका सहारा लेनेके अतिरिक्त कोई दूसरा