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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 956 में से

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पृष्ठ 674

दूसरा अध्याय ६२९
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
[ अर्जुनने जो कारण दिखलाया था, वह निर्मूल हो जाता है। इसी अर्थको
अब और अधिक स्पष्ट करते हैं :- ]
( १९ ) ( शरीरके स्वामी या आत्मा ) कोही जो मारनेवाला मानता है, या जो
ऐसा समझता है, कि वह मारा जाता है; उन दोनोंकोभी सच्चा ज्ञान नहीं है।
( क्योंकि ) यह ( आत्मा ) न तो मारता है और न माराभी जाता है।
[ क्योंकि यह आत्मा नित्य और स्वयं अकर्ता है. सब खेल तो प्रकृतिकाही
है। कठोपनिषदमें यह और अगला श्लोक आया है ( कठ. २. १८, १९ )। इसके
अतिरिक्त महाभारतके अन्य स्थानोंमेंभी ऐसा वर्णन है, कि कालसे सब ग्रसे
हुए हैं; कालकी इस क्रीडाकोही 'मारने और मरने' की लौकिक संज्ञाएं हैं
( शां. २५. १५ )। गीतामेंभी ( गीता ११. ३३ ) आगे भक्ति-मार्गकी भाषामे
यही तत्त्व भगवानने अर्जुनको फिर बतलाया है, कि भीष्म-द्रोण आदिको
कालस्वरूपसे मैनेही पहले मार डाला है, तू केवल निमित्त हो जा । ]
( २० ) यह ( आत्मा ) न तो कभी जन्मता है और न मरताभी है; ऐसाभी नहीं
है, कि यह ( एक बार ) होकर फिर होनेका नहीं: यह अज, नित्य, शाश्वत और
पुरातन है, एवं शरीरका वध हो जाय तोभी मारा नहीं जाता । ( २१ ) हे पार्थ !
जिसने जान लिया, कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय है, वह पुरुष
किसीको कैसे मरवायेगा और किसीको कैसे मारेगा ? ( २२ ) जिस प्रकार कोई
मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर दूसरे नये ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात्
शरीरका स्वामी आत्मा पुराने शरीर त्यागकर दूसरे नये शरीर धारण करता है ।
( २३ ) इसे अर्थात् आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते; इसे आग जला नहीं सकती;
वैसेही इसे पानी भिगा या गला नहीं सकता और वायु सुखाभी नहीं सकती है ।