श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
। 'नाभावो'में यदि अभाव शब्दही लेना पड़ता है, तो प्रकट है, कि पहले चरणमें
। भाव शब्दही रहना चाहिये। इसके अतिरिक्त यह कहनेके लिये, कि असत् और
। सत् ये दोनों नित्य है: 'अभाव' और 'विद्यते' इन पदोंके दो वार प्रयोग करनेकी
। कोई आवश्यकता न थी। किंतु मध्वाचार्यके कथनानुसार यदि इस द्विरुक्तिको
। आदरार्थक मानभी ले, तोभी आगे अठारहवें श्लोकमें स्पष्टही कहा है, कि व्यक्त
। या दृश्यसृष्टिमें आनेवाला मनुष्यका शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य है। अतएव
। आत्माके साथही भगवद्गीताके अनुसार, देहकोभी नित्य नहीं मान सकते; प्रकट
। रूपसे यह सिद्ध होता है, कि एक नित्य है और दूसरा अनित्य। पाठकोंको यह
। दिखलानेके लिये कि, सांप्रदायिक दृष्टिसे खेंचातानी कैसे की जाती है, हमने
। नमूनेके ढंगपर यहाँ इस श्लोकका मध्वभाष्यवाला अर्थ लिख दिया है - अस्तु;
। जो सत् है, वह कभी नष्ट होनेवाला नहीं, अतएव मत्स्वरूपी आत्माका शोक न
। करना चाहिये; और तत्त्वकी दृष्टिसे नामरूपात्मक देह आदि अथवा सुखदुःख
। आदि विकार मूलमेही विनाशी हैं, इसलिये उनके नाश होनेका शोक करनाभी
। उचित नहीं। फलतः आरंभमें अर्जुनसे जो यह कहा है, कि "जिसका शोक न
। करना चाहिये, उसका तू शोक कर रहा है", वह सिद्ध हो गया। अब
। 'सत्' और 'असत्'के अर्थोंकोही अगले दो श्लोकोंमें औरभी स्पष्ट कर
। बतलाते हैं -
(१७) स्मरण रहे, कि यह संपूर्ण ( जगत् ) जिसने फैलाया अथवा व्याप्त किया
है, वह ( मूल आत्मस्वरूप ब्रह्म ) अविनाशी है। इस अव्यक्त तत्त्वका विनाश
करनेके लिये कोईभी समर्थ नहीं है।
। [ पिछले श्लोकमें जिसे सत् कहा है, उसीका यह वर्णन है। यह बतलाकर,
। कि शरीरका स्वामी अर्थात् आत्मा इसी 'नित्य' श्रेणीमें आता है; अब यह
। बतलाते हैं, कि अनित्य या सत् किसे कहना चाहिये :- ]
(१८) कहा है, कि जो शरीरका स्वामी ( आत्मा ) नित्य, अविनाशी और
अचिन्त्य है, उसे प्राप्त होनेवाले ये शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य हैं। अतएव हे
भारत ! तू युद्ध कर !
। [ सारांश, इस प्रकार नित्य-अनित्यका विवेक करनेसे तो यह भावही
। झूठा होता है, कि "मैं अमुकको मारता हूँ", और युद्ध न करनेके लिये