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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 956 में से

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पृष्ठ 270

अध्यात्म २२३
परंतु वेदान्तियोंको यह मत मान्य नहीं है । वेदान्तसूत्रों ( वे. सू. २. २. २८-३२) में
आचार्य बादरायणने और इन्हीं सूत्रोंके भाष्यमें श्रीमच्छंकराचार्यने इस मतका
खंडन किया है। यह तो झूठ नहीं, कि मनुष्यके मनपर जो संस्कार होते हैं, अंतमें वही
उसे विदित रहते हैं; और इसीको हम ज्ञान कहते हैं । परंतु अब प्रश्न होता है, कि
यदि इस ज्ञानके अतिरिक्त और कुछ हैही नहीं; तो 'गाय'संबंधी ज्ञान जुदा है, 'घोडा'-
संबंधी ज्ञान जुदा है, और 'मैं'-विषयक ज्ञान जुदा है - इस प्रकार ज्ञान-ज्ञानकीही
यह जो भिन्नता हमारी बुद्धिको ज्ञात होती है, उसका कारण क्या है ? माना कि, ज्ञान
होनेकी मानसिक क्रिया सर्वत्र एकही है। परंतु यदि कहा जाय, कि इसके सिवा
और कुछ हैही नहीं; तो गाय, घोड़ा इत्यादि भिन्न भिन्न भेद आ गये कहाँसे ? यदि
कोई कहे, कि स्वप्नकी सृष्टिके समान मन अपने आप, अपनी मर्जीसे ज्ञानके ये भेद
बनाया करता है; तो स्वप्नकी सृष्टिसे पृथक् जागृत अवस्थाके ज्ञानमें जो एक प्रकारकी
सुसंगति मिलती है, उसका कारण बतलाते नहीं बनता ( वे. सू. शां. भा. २. २. २९;
३. २. ४ ) । अच्छा; यदि कहें कि ज्ञानको छोड़ दूसरी कोईभी वस्तु नहीं है; और
'द्रष्टा'का मनही सारे भिन्न भिन्न पदार्थोंको निर्मित करता है; तो प्रत्येक द्रष्टाको
'अहंपूर्वक' यह सारा ज्ञान होना चाहिये, कि "मेरा मन यानी मेंही खंभा हूँ"; अथवा
"मैंही गाय हूँ"। परंतु ऐसा होता कहाँ है ? इसीसे शंकराचार्यने सिद्धान्त किया
है, कि जब सभीको यह प्रतीति होती है, कि मैं अलग हूँ, और मुझसे खंभा और
गाय प्रभृति पदार्थभी अलग हैं; तब द्रष्टाके मनमें समूचा ज्ञान होनेके लिये, इस
आधारभूत बाह्य सृष्टिमें कुछ-न-कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ अवश्य होनी चाहिये ( वे. सू.
शां.भा.२२.२८ ) । कांटका मतभी इसी प्रकारका है। उसने स्पष्ट कह दिया है, कि
सृष्टिका ज्ञान होनेके लिये यद्यपि मनुष्यकी बुद्धिका एकीकरण आवश्यक है, तथापि
बुद्धि इस ज्ञानको सर्वथा अपनीही गाँठसे - अर्थात् निराधार या नये सिरेसे नहीं
उत्पन्न कर देती । उसे सृष्टिकी बाह्य वस्तुओंकी सदैव अपेक्षा रहती है । यहाँ कोई
प्रश्न करे, कि "क्योंजी ! शंकराचार्य एक बार बाह्य सृष्टिको मिथ्या कहते हैं; और
दूसरी बार बौद्धोंका खंडन करने उसी बाह्यसृष्टिके अस्तित्वको, 'द्रष्टा'के अस्तित्वके
समानही सत्य प्रतिपादन करते हैं। इन बेमेल बातोंका मिलान होगा कैसे ? "
पर इस प्रश्नका उत्तर पहलेही बतला चुके हैं। आचार्य जब बाह्यसृष्टिको.
मिथ्या या असत्य कहते हैं, तब उसका इतनाही अर्थ समझना चाहिये, कि बाह्य
सृष्टिका दृश्य नामरूप असत्य अर्थात् विनाशवान् है। नामरूपात्मक बाह्य दृश्य
मिथ्या बना रहे; पर उससे सिद्धान्तमें रत्तीभरभी आँच नहीं लगती, कि उस
बाह्यसृष्टिके मूलमें कुछ-न-कुछ इंद्रियातीत सत्यवस्तु है । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें जिस
प्रकार यह सिद्धान्त किया है; कि देहेंद्रिय आदि विनाशवान् नामरूपोंके मूलमें
कोई नित्य आत्मतत्त्व है; उसी प्रकार कहना पड़ता है, कि नामस्वरूपात्मक बाह्य
सृष्टिके मूलमेंभी कुछ-न-कुछ नित्य आत्मतत्त्व है। अतएव वेदान्तशास्त्रने निश्चित