श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
तब अब तुम्हारे यहाँ आया हूँ । " इसको सनत्कुमारने यह उत्तर दिया, " कि तूने जो
कुछ सीखा है, वह तो सारा नामरूपात्मक है । सच्चा ब्रह्म इस नामब्रह्मसे बहुत परे
है ; " और फिर नारदको क्रमशः इस प्रकार पहचान करा दी, कि इन नामरूपोंके
अर्थात् सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वाणी, आशा, संकल्प, मन, बुद्धि ( ज्ञान )
और प्राणसेभी परे एवं उनसे बढ़-चढ़कर जो है, वही परमात्मारूपी अमृततत्त्व है ।
यहाँतक जो विवेचन किया गया, उसका तात्पर्य यह है, कि यद्यपि मनुष्यकी
इंद्रियोंको नामरूपोंके अतिरिक्त और किसीकाभी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता है, तोभी
इन अनित्य नामरूपोंके आच्छादनसे ढँका हुआ लेकिन आँखोंसे न दीख पड़नेवाला
अर्थात् कुछ-न-कुछ अव्यक्त नित्य द्रव्य रहनाही चाहिये; और इसी कारण
सारी सृष्टिका ज्ञान हमें एकतासे होता रहता है। जो कुछ ज्ञान होता है, सो
आत्माकोही होता है। इसलिये आत्माही ज्ञाता यानी जाननेवाला हुआ । और इस
ज्ञाताको नामरूपात्मक सृष्टिकाही ज्ञान होता है। अतः नामरूपात्मक बाह्य सृष्टि
ज्ञान हुई ( मभा. शां. ३०६. ४० ) और इस नामरूपात्मक सृष्टिके मूलमें जो कुछ
वस्तुतत्त्व है, वही ज्ञेय है। इसी वर्गीकरणको मानकर भगवद्गीताने ज्ञाताको क्षेत्रज्ञ
आत्मा और ज्ञेयको इंद्रियातीत नित्य परब्रह्म कहा है ( गीता १३. १२-१७ )।
और फिर आगे ज्ञानके तीन भेद करके कहा है, कि भिन्नता या नानात्वसे जो सृष्टि-
ज्ञान होता है, वह राजस है; तथा अंतमें इस नानात्वका जो ज्ञान एकत्वरूपसे होता
है, वह सात्त्विक ज्ञान है ( गीता १८. २०-२१ )। इसपर कुछ लोग यह युक्तिवाद
करते हैं, कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस प्रकार त्रिविध भेद करना ठीक नहीं है । एवं यह
माननेके लिये हमारे पास कुछभी प्रमाण नहीं है, कि हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसकी
अपेक्षा इस जगत्में औरभी कुछ है। गाय, घोड़े, प्रभृति जो बाह्य वस्तुएँ हमें दीख
पड़ती हैं, वहभी तो ज्ञानही है; जो कि हमें होता है। और यद्यपि यह ज्ञान सत्य है,
तोभी यह बतलानेके लिये - कि वह ज्ञान है काहे का - हमारे पास ज्ञानको छोड़
और कोई मार्गही नहीं रह जाता । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि इस ज्ञानके
अतिरिक्त बाह्य पदार्थके नाते कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; अथवा इन बाह्य वस्तुओंके
मूलमें और कोई स्वतंत्र तत्त्व है। क्योंकि जब ज्ञाताही न रहा, तब जगत् कहाँसे रहे ?
इस दृष्टिसे विचार करनेपर उक्त वर्गीकरणसे अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयमेंसे -
ज्ञेय नहीं रह जाता । ज्ञाता और उसको होनेवाला ज्ञान, यही दो बच जाते हैं; और
इसी युक्तिवादको और जरा-सा आगे ले चलें, तो 'ज्ञाता' या 'द्रष्टा'भी तो एक प्रकार
का ज्ञानही है। इसलिये अंतमें ज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुही शेष नहीं रहती। इसीको
'विज्ञानवाद' कहते हैं; और योगाचार पंथके बौद्धोंने इसेही प्रमाण माना है। इस
पंथके विद्वानोंने प्रतिपादन किया है, कि ज्ञाताके ज्ञानके अतिरिक्त इस जगत्में और
कुछभी स्वतंत्र नहीं है। और तो क्या ? दुनियाही नहीं है। जो कुछ है, मनुष्यका
ज्ञानही ज्ञान है। अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी ह्यूम जैसे पंडित इस ढंगके मतके पुरस्कर्ता हैं।