सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

५६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ अगस्त, १८८२


है। शून्य दृष्टि, देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है। समझ में आ जाता है कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र क्या मुझे दिखा सकते हो?

मणि – जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा यदि कहीं मिल जाय।

(२)

गुरुशिष्य-संवाद – गुह्यकथा

शाम हो गयी। कालीमन्दिर, राधाकान्तजी के मन्दिर और अन्यान्य कमरों में बत्तियाँ जला दी गयीं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए जगन्माता का स्मरण कर रहे हैं। तदनन्तर वे ईश्वर का नाम जपने लगे। घर में धूनी दी गयी है। एक ओर दीवट पर दिया जल रहा है। कुछ देर बाद शंख घण्टा आदि बजने लगे। कालीमन्दिर में आरती होने लगी। तिथि शुक्ला दशमी है; चारों ओर चाँदनी छिटक रही है।

आरती हो जाने पर कुछ क्षण बाद श्रीरामकृष्ण मणि के साथ अकेले अनेक विषयों पर बातें करने लगे। मणि फर्श पर बैठे हैं।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”

श्रीरामकृष्ण – कर्म निष्काम करना चाहिए। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जो कर्म करता है वे अच्छे हैं; वह निष्काम कर्म करने की चेष्टा करता है।

मणि – जी हाँ। अच्छा; जहाँ कर्म है वहाँ क्या ईश्वर मिलते हैं? राम और काम क्या एक ही साथ रहते हैं? हिन्दी में मैंने पढ़ा है कि ‘जहाँ काम तहँ राम नहिं, जहाँ राम नहिं काम।’

श्रीरामकृष्ण – कर्म सभी करते हैं। उनका नाम लेना कर्म है – साँस लेना और छोड़ना भी कर्म है। क्या मजाल है कि कोई कर्म छोड़ दे! इसलिए कर्म करना चाहिए, किन्तु फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।

मणि – तो क्या ऐसी चेष्टा की जा सकती है कि जिससे अधिक धन मिले?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, की जा सकती है किन्तु यदि विद्या का परिवार हो, तो। अधिक धन कमाने का प्रयत्न करो, परन्तु सदुपाय से। उद्देश्य उपार्जन नहीं, ईश्वर की सेवा है। धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है तो उस धन में दोष नहीं है।

मणि – घरवालों के प्रति कर्तव्य कब तक रहता है?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें भोजनवस्त्र का अभाव न हो। सन्तान जब स्वयं समर्थ होगी, तब भार-ग्रहण की आवश्यकता नहीं। चिड़ियों के बच्चे जब खुद चुगने लगते हैं तब माँ के पास यदि खाने के लिए आते हैं तो माँ चोंच मारती है।

मणि – कर्म कब तक करना होगा?