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सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 627

६०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ सितम्बर, १८८४

हाथ पर रहता है कि कहीं ढेंकी न गिर जाय।

“बारह आना मन ईश्वर पर रखकर चार आने से काम करना चाहिए।”

श्रीरामकृष्ण शशधर पण्डित की बात भक्तों से कह रहे हैं – “देखा, एकरुखा आदमी है। केवल सूखा ज्ञान और विचार लेकर है।

“जो नित्य में पहुँचकर लीला लेकर रहता है, उसका ज्ञान पक्का है, उसकी भक्ति भी पक्की है।

“नारदादि ने ब्रह्मज्ञान के पश्चात् भक्ति ली थी, इसी का नाम विज्ञान है।

“केवल ज्ञान शुष्क होता है – जैसे एकाएक फूट पड़नेवाले आतशबाजी के अनार – कुछ देर फूल छूटने पर तुरन्त फूट जाते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ज्ञान, जैसे अच्छे अनार। थोड़ी देर एक तरह के फूल निकलते हैं, फिर बन्द होकर दूसरी तरह के फूल निकलने लगते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ईश्वर पर प्रेम हुआ था। प्रेम सच्चिदानन्द को पकड़ने की रस्सी है।”

दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं।

बकुल के पेड़ के नीचे बैठने की जो जगह है, वहाँ दो-चार भक्त बैठे हुए गप्पें लड़ा रहे हैं। भवनाथ, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर, छोटे गोपाल, हाजरा आदि। श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जा रहे हैं, वहाँ जाकर जरा बैठे।

मुखर्जी – (हाजरा से) – आपने इनके पास से बहुत कुछ सीखा है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – नहीं बचपन से ही इनकी यह अवस्था है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौट रहे हैं। भक्तों ने देखा, भावावेश में हैं। पागल की तरह चल रहे हैं। जब कमरे में आये तब प्रकृतिस्थ हो गये।

(२)

गुरुवाक्य पर विश्वास। शास्त्रों की धारणा कब होती है?

श्रीरामकृष्ण के कमरे में बहुत से भक्तों का समागम हुआ है। कोन्नगर के भक्तों में एक साधक अभी पहले-पहल आये हैं। उम्र पचास के ऊपर होगी। देखने से मालूम होता है कि भीतर पाण्डित्य का पूरा अभिमान है। बातचीत करते हुए वे कह रहे, 'समुद्र-मंथन के पहले क्या चन्द्र न था? परन्तु इसकी मीमांसा कौन करे?'

मास्टर – (सहास्य) – देवी के एक गाने में है – जब ब्रह्माण्ड ही न था, तब मुण्डमाला तुझे कहाँ मिली होगी?

साधक – (विरक्ति से) – वह दूसरी बात है।

कमरे में खड़े होकर श्रीरामकृष्ण ने एकाएक कहा – 'वह आया था – नारायण।'