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सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 274
१८ जून, १८८३परिच्छेद ४२२५१

अब श्रीरामकृष्ण सहज दशा में आ गये हैं। नवद्वीप से कहते हैं -

"मुझे यह जो अवस्था (समाधि-अवस्था) होती है, इसे कोई कोई रोग कहते हैं। इस पर मेरा कहना यह है कि जिसके चैतन्य से जगत् चैतन्यमय है उसकी चिन्ता कर कोई अचैतन्य कैसे हो सकता है?"

मणि सेन अभ्यागत ब्राह्मणों और वैष्णवों को बिदा कर रहे हैं - उनकी मर्यादा के अनुसार किसी को एक रुपया, किसी को दो रुपये बिदाई देते हैं। श्रीरामकृष्ण को पाँच रुपये देने आये। आप बोले, "मुझे रुपये न लेने चाहिए।" तो भी मणि सेन नहीं मानते। तब श्रीरामकृष्ण ने कहा, "यदि रुपये दोगे तो तुम्हें तुम्हारे गुरु की शपथ है।" मणि सेन इतने पर भी देने आये। तब श्रीरामकृष्ण ने अधीर होकर मास्टर से कहा, "क्यों जी, लेना चाहिए?" मास्टर ने बड़ी आपत्ति करते हुए कहा, "जी नहीं! किसी हालत में न लें!"

मणि सेन के घरवालों ने तब आम और मिठाई खरीदने के नाम पर राखाल के हाथ में रुपये दिए।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - मैंने गुरु की शपथ दी है - मैं अब मुक्त हूँ। राखाल ने रुपये लिए हैं - अब वह जाने!

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठे - दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे।

निराकार ध्यान और श्रीरामकृष्ण

मार्ग में मोती शील का मन्दिर है। श्रीरामकृष्ण बहुत दिनों से मास्टर से कहते आए हैं कि एक साथ आकर इस मन्दिर की झील को देखेंगे - यह सिखलाने के लिए कि निराकार ध्यान कैसे करना चाहिए।

श्रीरामकृष्ण को खूब सर्दी हुई है, तथापि भक्तों के साथ मन्दिर देखने के लिए गाड़ी से उतरे।

मन्दिर में श्रीगौरांग की पूजा होती है। अभी सन्ध्या होने में कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ गौरांग-मूर्ति के सम्मुख भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया।

अब मन्दिर के पूर्व की ओर जो झील है, उसके घाट पर आकर झील का पानी और मछलियों को देख रहे हैं। कोई इन मछलियों की हिंसा नहीं करता। कुछ चारा फेंकने पर बड़ी बड़ी मछलियाँ झुण्ड के झुण्ड सामने आकर खाने लगती हैं - फिर निर्भय होकर आनन्द से पानी में घूमती-फिरती हैं।

श्रीरामकृष्ण मास्टर से कहते हैं, "यह देखो कैसी मछलियाँ हैं! चिदानन्द-सागर में इन मछलियों की तरह आनन्द से विचरण करो।"

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