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सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१ जनवरी, १८८३

परिच्छेद २२

१४३

जायेंगे। अपनी प्रवृत्ति और निवृति, इन दो पत्नियों में से तू निवृति को साथ लेना और उसी के पुत्र विवेक से तत्त्व की बातें पूछना।।”

(४)

श्रीरामकृष्ण का श्रीराधा-भाव

श्रीरामकृष्ण दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में आकर बैठे हैं। प्राणकृष्ण आदि भक्त भी साथ साथ आये हैं। हाजरा महाशय बरामदे में बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हुए प्राणकृष्ण से कह रहे हैं –

“हाजरा कुछ कम नहीं है। अगर यहाँ (स्वयं को लक्ष्य करके) कोई बड़ी दरगाह हो तो हाजरा छोटी दरगाह है!” (सब हँसते हैं।)

नवकुमार आकर बरामदे के दरवाजे में खड़े हुए और भक्तों को देखते ही चले गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहंकार की मूर्ति है!”

दिन के आठ बज चुके हैं। प्राणकृष्ण ने प्रणाम करके चलने की आज्ञा ली; उन्हें कलकत्ते के मकान में लौट जाना है।

एक वैरागी गोपीयन्त्र (एकतारे की सूरत-शकल का) लेकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में गा रहे हैं। गीतों का आशय यह है –

(१) “नित्यानन्द का जहाज आया है। तुम्हें पार जाना हो तो इस पर आ जाओ। छः गोरे इसमें सदा पहरा देते हैं। उनकी पीठ ढाल से घिरी हुई है और कमर में तलवार लटक रही है। सदर दरवाजा खोलकर वे धनरत्न लुटा रहे हैं।”

(२) “इस समय घर छा लेना। इस बार वर्षा जोरों की होगी, सावधान हो जाओ, अदरक का पानी पीकर अपने काम पर डट जाओ। जब श्रावण लग जायगा तब कुछ भी न सूझेगा। छप्पर का टाट सड़ जायगा। फिर तुम घर न छा सकोगे। जब झकोरे लगेंगे, तब छप्पर उड़ जायगा। घर वीरान हो जायगा। तुम्हें भी फिर स्थान बदलना ही पड़ेगा।”

(३) “किसके भाव में नदिये में आकर दीन वेश धारण कर तुम स्वयं हरि होते हुए भी हरिनाम गा रहे हो? किसका भाव लेकर तुमने यह भाव और ऐसा स्वभाव धारण किया? कुछ समझ में नहीं आता।”

श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं, इसी समय श्री केदार चटर्जी आये और उन्होंने प्रणाम किया। वे आफिस की पोशाक में – चोगा, अचकन पहने और घड़ी चेन लगाये हुए आये हैं। परन्तु ईश्वरचर्चा होती है तो आपकी आँखों से आँसुओ की झड़ी लग जाती है। आप बड़े प्रेमी हैं। हृदय में गोपीभाव विराजमान है।

केदार को देखकर श्रीरामकृष्ण के मन में वृन्दावन की लीला का उद्दीपन होने लगा। आप प्रेमोन्मत्त हो गये। खड़े होकर केदार को सुनाते हुए इस मर्म का गाना गाने लगे –