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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

17/276–283 ]
'स्त्री' हेन नाम प्रभु एइ अवतारे।
श्रवणो ना करिला-विदित संसारे॥29॥
अतएव यत महामहिम सकले।
'गौराङ्ग-नागर' हेन स्तव नाहि बले॥30॥
यद्यपि सकल स्तव सम्भव ताहाने।
तथापिह स्वभावे से गाय बुधगणे॥31॥"
"सबके साथ परिहास करनेपर भी महाप्रभु पर-स्त्रीके
साथ कभी परिहास नहीं करते थे, स्त्रीको देखकर वे
दूरसे ही एक ओर हट जाते थे। इस प्रकार महाप्रभु
सबके साथ चपलता करते रहते, किन्तु किसी भी
स्त्रीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे। संसारमें
प्रसिद्ध है कि इस अवतारमें महाप्रभुने 'स्त्री' नामका भी
श्रवण नहीं किया। इसलिये जितने भी महिमाशाली
महापुरुष हैं, उनमेंसे किसीने भी महाप्रभुकी स्तुति
'गौराङ्ग-नागर' कहकर नहीं की है। यद्यपि महाप्रभुके
लिये सभी प्रकारकी स्तुति सम्भव है, तथापि विद्वान
लोग महाप्रभुके तत्त्वके अनुकूल ही उनकी लीलाका
कीर्तन करते हैं।"
इन तीन पद्योंमें सुस्पष्ट रूपसे भक्तिसिद्धान्त विरोधी
दुराचार-पुष्ट कल्पित 'गौराङ्गनागरीवाद' का खण्डन
हुआ है।॥276-278॥
स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य
रूपोंमें गोपियोंकी प्रीति नहीं :-
श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ-गुञ्जा-विभूषण।
गोप-वेश, त्रिभङ्गिम, मुरली-वदन॥279॥
इहा छाड़ि' कृष्ण यदि हय अन्याकार।
गोपिकार भाव नाहि याय निकट ताहार॥280॥
अनुवाद-जिनका परम सुन्दर रूप श्याम वर्णका
है, सिरपर मयूर-पंख है, गलेमें गुञ्जाकी माला है,
गोप-वेश है और अधरोंपर मुरली धारणकर त्रिभङ्ग
ललित मुद्रामें खड़े हैं-ऐसे रूपको छोड़कर श्रीकृष्णका
यदि कोई अन्य आकार हो, तो गोपियोंका उनके प्रति
कान्त-भाव स्फुरित नहीं होता॥279-280॥
ललितमाधव (6/14)-
गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती
विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्।
आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि-
र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति॥281॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः
अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया,
जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया।
इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय-
पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको
कौन पण्डित समझ सकता है?॥281॥
अनुभाष्य-सूर्यपत्नी सवर्णाके प्रति विशाखाके वचन,-
गोपीनां दुरूहपदवीसञ्चारिणः (दुरूहायां पदव्यां सञ्चरितुं शीलं
यस्य तस्य) पशुपेन्द्र-नन्दनजुषः (पशुपेन्द्रस्य गोपराजस्य नन्दस्य
नन्दनं सूनुं जुषते सेवते यस्तस्य कृष्णसेवापरस्य) भावस्य तां
प्रक्रियां विज्ञातुं (बोद्धुं) कः कृति क्षमते (समर्थवान् भवति)?
[यतः] हन्त! जिष्णुभिः (जयशीलैः) चतुर्भिः भुजैः (धृतनारायण
विग्रहैः) अद्भुतरुचिं (अद्भुत-रुचिः शोभा यस्याः ताम् अलौकिकीं
कान्तिमयीं) वैष्णवीं तनुं आविष्कुर्वति (प्रकटयति सति)
तस्मिन् (कृष्णे) अपि यासां (गोपीनां) रागोदयः कुञ्चति
(विकाशं न लभते)।
श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य
है॥281॥
रासके समय आत्मगोपनकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा
गोपियोंको चतुर्भुज प्रदर्शन और संरक्षण :-
वसन्तकाले रासलीला करे गोवर्धने।
अन्तर्धान कैला सङ्केत करि' राधा-सने॥282॥
निभृतनिकुञ्जे बसि' देखे राधार बाट।
अन्वेषिते आइला ताहाँ गोपिकार ठाट॥283॥
अनुवाद-वसन्त ऋतुमें गोवर्धनमें रासके मध्य
श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके साथमें एकान्तमें विहारकी
इच्छासे उन्हें सङ्केत करके अन्तर्धान हो गये। श्रीकृष्ण
सतरहवाँ अध्याय | 261

[ 17/283-293
निभृतनिकुञ्जमें बैठकर राधाजीकी बाट जोहने लगे।
श्रीकृष्णको रासमें न देखकर सब गोपियाँ श्रीकृष्णको
ढूँढ़ती हुई तभी वहाँ आयीं ॥ 283 ॥
अनुभाष्य—'बाट'—वर्त्म अथवा पथ। 'ठाट'—श्रेणीबद्ध
सैन्य॥ 283 ॥
दूर हैते देखि' ताँरे बोले गोपीगण।
“एइ देख कुञ्जेर भितर व्रजेन्द्रनन्दन ॥"284 ॥
अनुवाद—दूरसे देखकर ही गोपियोंने कहा,—“वह
देखो, व्रजेन्द्रनन्दन इसी कुञ्जके भीतर हैं॥"284॥
गोपीगण देखि' कृष्णेर हइल साधवस।
लुकाइते नारिल, ताहे हैला विरस ॥ 285 ॥
चतुर्भुज मूर्त्ति करि' आछेन बसिया।
कृष्ण देखि' गोपी कहे निकटे आसिया ॥ 286 ॥
अनुवाद—गोपियोंको देखकर श्रीकृष्ण भयभीत हो
गये और उनसे छिपना चाहते थे, परन्तु छिपनेको कोई
स्थान न देखकर वे विवश हो गये। वे कहीं और जा
नहीं सकते थे, इसलिये वहीं चतुर्भुजरूप धारण करके
बैठ गये। उन्हें देखकर गोपियाँ उनके निकट आकर
कहने लगीं ॥ 285-286॥
अनुभाष्य—'साध्वस'—भय, त्रास, शङ्का, मनका आवेग,
सम्भ्रम ॥ 285 ॥
गोपियोंका नारायण-स्तव :-
'इहों कृष्ण नहे, इहों नारायण-मूर्त्ति।'
एत बलि' सबे ताँरे करे नति-स्तुति ॥ 287 ॥
“नमो नारायण, देह' करह प्रसाद।
कृष्णसङ्ग देह' मोरे, घुचाह विषाद ॥" 288 ॥
एत बलि नमस्करि' गेला गोपीगण।
हेनकाले राधा आसि' दिला दरशन ॥ 289 ॥
अनुवाद—'अरे ! ये तो श्रीकृष्ण नहीं हैं, ये तो
भगवान् नारायण हैं।' यह कहकर वे सब उन्हें प्रणाम
करके उनकी स्तुति करने लगीं,—“हे नारायण ! आपको
हम नमस्कार करती हैं। आप कृपा करें और हमें
श्रीकृष्णका सङ्ग प्रदान करके हमारे हृदयकी विरह-वेदनाको
दूर करें।" यह कहकर गोपियोंने उन्हें नमस्कार किया
और तभी राधाजी वहाँ उपस्थित हुईं ॥ 287-289 ॥
अनुभाष्य—'मोरे'—हमें ॥ 288 ॥
श्रीमती राधिकाके आगमन-मात्रसे ही चतुर्भुजका
अन्तर्धान, द्विभुज-मूर्ति अथवा स्वयंरूप :-
राधा देखि' कृष्ण ताँरे हास्य करिते।
सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन राखिते ॥ 290 ॥
लुकाइला दुइ भुज राधार अग्रेते।
बहु यत्न कैला कृष्ण, नारिल राखिते ॥ 291 ॥
अनुवाद—राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज
रूपमें रहकर उनसे परिहास करना चाहते थे, परन्तु
बहुत प्रयास करनेपर भी राधाजीके सामने वे उस
रूपकी रक्षा नहीं कर सके और उनकी दो भुजाएँ
अन्तर्हित हो गयीं ॥ 290-291 ॥
श्रीराधाका अचिन्त्य कृष्णप्रेम :-
राधार विशुद्ध-भावेर अचिन्त्य-प्रभाव।
ये कृष्णेरे कराइला द्विभुज-स्वभाव ॥ 292 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति राधाजीके विशुद्ध-भावका
यह अचिन्त्य प्रभाव है कि उसने श्रीकृष्णको उनके
मूल द्विभुजरूपमें आनेपर विवश कर दिया ॥ 292 ॥
श्रीराधाके सामने कृष्ण-चातुर्यकी पराजय,
नित्य स्वयंरूप श्यामसुन्दर :-
उज्ज्वलनीलमणिमें नायिकाभेद-प्रकरणमें छठे अङ्कमें—
रासारम्भाविधौ निलीयवसता कुञ्जे मृगाक्षीगणै-
दृष्टं गोपयितुं स्वमुद्धुरधिया या सुष्ठु सन्दर्शिता।
राधायाः प्रणयस्य हन्त महिमा यस्य श्रिया रक्षितुं
सा शक्या प्रभविष्णुनापि हरिणा नासीच्चतुर्बाहुता ॥ 293 ॥
262 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/293-299 ]
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ 293 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—रासके आरम्भमें कौतुकवशतः
श्रीकृष्ण कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको
उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर अपना मनोहर
चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने
केवल यही कहा, - 'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं
हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी आश्चर्यमयी महिमा!
श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी
उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये ॥ 293 ॥
अनुभाष्य-[गोवर्द्धनोपत्यकायां परासौलीति ख्यातानाम्नां
रासस्थल्यां वसन्तकाले] रासारम्भविधौ (रासस्य आरम्भविधौ
प्रवृत्तिकल्पे) कुञ्जे निलोयवसता (संलग्नावस्थितेन) हरिणा
(श्रीकृष्णेन) मृगाक्षिगणैः (कुरङ्गनयनाभिः गोपीभिः)
[प्रविष्टक-नामारण्ये पेठाख्ये] दृष्टं स्वम् (आत्मानं) गोपयितुं
(बह्वीभिस्ताभिः सर्वतः आवृतात् तस्मात् कुञ्जात्
सहसापसर्पणासम्भवात्) उद्बुद्धधिया (उत्कृष्टबुद्ध्या) या चतुर्बाहुता
सुष्ठु सन्दर्शिता, यस्य (कृष्णप्रणयमहिम्नः) श्रिया प्रहविष्णुना
(कृष्णेन) अपि या चतुर्बाहुता रक्षितुं न शक्या आसीत्-हन्त!
(भोः!) राधायाः प्रणयस्य महिमा (माहात्म्यम्)- [एतादृगचिन्त्यम्!]
(गौतमीये—'गोवर्द्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम्।' भगवतोऽपि
प्रेमाधीनत्वात् प्रेमणोऽग्रे ऐश्वर्यं न तिष्ठतीति न शक्यते वक्तु
तस्य नित्यत्वात्, किन्तु तिरोभवति)।
श्लोक भावानुवाद-वसन्तकालमें गोवर्धनके प्रान्तमें
रसौली नामक रास-स्थलीमें रासके आरम्भमें कौतुकवशतः
श्रीकृष्ण पेठा नामक वनमें एक कुञ्जमें छिपकर बैठे
थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने
शङ्कित होकर चातुर्यपूर्वक अपना मनोहर चतुर्भुजरूप
उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने यही कहा,-'ये
हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके
प्रेमकी अचिन्त्य महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही
श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख
पाये। (गौतमीय-तन्त्रमें-रम्य गोवर्धनमें स्थित रासरसोत्सुक
भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रेमके अधीन हैं, प्रेमके आगे वे
भी अपने नित्य ऐश्वर्यको धारण करनेमें असमर्थ
हैं) ॥ 293 ॥

नन्द-जगन्नाथ मिश्र, यशोदा-शची :-
सेइ व्रजेश्वर-इहाँ जगन्नाथ पिता।
सेइ व्रजेश्वरी-इहाँ शचीदेवी माता ॥ 294 ॥
व्रजके कानाइ-बलाइ-गौड़के गौर-निताइ :-
सेइ नन्दसुत-इहँ चैतन्य-गोसाञि।
सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द-भाइ ॥ 295 ॥
अनुवाद-वे व्रजेश्वर नन्द महाराज इनके (महाप्रभुके)
पिता श्रीजगन्नाथ हैं और वे व्रजेश्वरी यशोदा इनकी
माता शचीदेवी हैं। वे नन्दनन्दन ही ये चैतन्य-महाप्रभु
हैं और वे श्रीबलदेव ही उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु
हैं ॥ 294-295 ॥
मधुररसके अतिरिक्त अन्य रसोंमें
श्रीनित्यानन्द-रामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :-
वात्सल्य, दास्य, सख्य-तिन भावमय।
सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य-सहाय ॥ 296 ॥
प्रेमभक्ति दिया तैं हो भासाल जगते।
ताँर चरित्रचित्र लोके ना पारे बुझिते ॥ 297 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु वात्सल्य, दास्य और
सख्य-ये तीन भाव महाप्रभुके प्रति रखते हैं और वे
सदा महाप्रभुकी लीलाओंमें सहायक हैं। प्रेमाभक्ति प्रदान
करके उन्होंने समस्त जगत्को उसमें डुबो दिया है।
उनके अलौकिक चरित्रको साधारण लोग समझ नहीं
पाते हैं ॥ 296-297 ॥
भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्यका शुद्धभक्ति-प्रचार :-
अद्वैत-आचार्य-गोसाञि भक्त-अवतार।
कृष्ण अवतारिया कैला भक्तिर प्रचार ॥ 298 ॥
श्रीअद्वैताचार्यकी दो भावोंमें श्रीगौरकृष्णसेवा :-
सख्य, दास्य,-दुइ भाव सहज ताँहार।
कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु-व्यवहार ॥ 299 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई भक्तावतार हैं, उन्होंने
श्रीकृष्णको अवतरित करवाकर जगत्में भक्तिका प्रचार
सतरहवाँ अध्याय | 263

[ 17/298-302
किया है। सख्य और दास्य-ये दो उनके महाप्रभुके
प्रति स्वाभाविक भाव हैं, परन्तु महाप्रभु कभी-कभी उन्हें
गुरुके समान मानकर व्यवहार करते हैं॥298-299॥
श्रीवासादि शुद्धभक्तोंका दास्य :-
श्रीवासादि यत महाप्रभुर भक्तगण।
निज निज भावे करेन चैतन्य-सेवन॥300॥
श्रीगदाधर-स्वरूप-रामानन्द-श्रीरूपादि शक्तियोंकी
मधुररसमें श्रीगौरकृष्णसेवा :-
पण्डित-गोसाञि आदि याँर सेइ रस।
सेइ सेइ रसे कृष्ण हय ताँर वश॥301॥
अनुवाद-श्रीवासादि जितने भी भक्त हैं, वे अपने-अपने
भावोंके अनुरूप महाप्रभुकी सेवा करते हैं। श्रीवास
पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूप, श्रीरूप-सनातनादि
गोस्वामीका श्रीकृष्णके प्रति जो-जो भाव है, श्रीकृष्ण
उसी भावके द्वारा उन भक्तोंके वशीभूत होते हैं॥300-301॥
अनुभाष्य-इन सब (296-301) पद्योंमें श्रीनित्यानन्द
प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी परम चमत्कारमय
गौरसेवा-भाव-वैचित्रीके तारतम्यका वर्णन हुआ है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 11-13वें श्लोक)-
“भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः।
भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः।
भक्तावतार आचार्योऽद्वैतो यः श्रीसदाशिवः।
भक्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ते भक्तरूपिणः।
भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः॥11॥
श्रीमद्विश्वम्भराद्वैतनित्यानन्दावधूतकाः ।
अत्र त्रयः समुन्नेया विग्रहाः प्रभवश्च ते।
एको महाप्रभुर्ज्ञेयः श्रीचैतन्यो दयाम्बुधिः।
प्रभू द्वौ श्रियुतौ नित्यानन्दाद्वैतौ महाशयौ।
गोस्वामिनो विग्रहाश्च ते द्विजश्च गदाधरः।
पञ्चतत्त्वात्मका एते श्रीनिवासश्च पण्डितः॥12॥
यदुक्तं तत्र गोस्वामि श्रीस्वरूपपदाम्बुजैः।
“त्रयोऽत्र विग्रहा ज्ञेयाः प्रभवश्चात्र ते त्रयः।
एको महाप्रभुर्ज्ञेयो द्वौ प्रभु सम्मतौ सताम्॥”13॥
“यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने पञ्चतत्त्वके
अर्थका विस्तृत वर्णन किया है, तथापि यहाँपर उसे
संक्षेपमें लिखा जा रहा है-
जो श्रीनन्दनन्दन हैं, वे ही भक्तरूपमें श्रीगौरचन्द्र
हैं। जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही
भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। जो सदाशिव हैं, वे
ही भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य हैं। श्रीवासादि भक्तवृन्द ही
भक्ताख्य अर्थात् शुद्धभक्तके रूपमें प्रसिद्ध हैं। द्विजश्रेष्ठ
श्रीगदाधर पण्डित ही भक्तशक्ति हैं। यद्यपि पञ्चतत्त्वके
अन्तर्गत आनेवाले श्रीमान् विश्वम्भर, श्रीअद्वैताचार्य
और अवधूत श्रीनित्यानन्द-तीनों ही भगवद्-विग्रह
अर्थात् विष्णुत्तत्त्व और महाप्रभावशाली होनेके कारण
प्रभु हैं, तथापि इन तीनोंमेंसे दयाके सागर श्रीचैतन्यदेव
'महाप्रभु' तथा श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य 'प्रभु' के
नामसे प्रसिद्ध हैं। (भक्तोंके द्वारा) ये गोस्वामी (अर्थात्
श्रीचैतन्य गोसाईं, श्रीनित्यानन्द गोसाईं तथा श्रीअद्वैत
गोसाईं) के नाम से भी जाने जाते हैं। अन्य दो
तत्त्वोंमेंसे श्रीगदाधर 'द्विज' और श्रीनिवास 'पण्डित' के
नामसे प्रसिद्ध हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी पादने भी
ऐसा ही कहा है कि यद्यपि भगवद्-विग्रह होनेके कारण
ये तीनों ही 'प्रभु' हैं, तथापि साधुओंकी सम्मत रीतिके
अनुसार उनमेंसे एक 'महाप्रभु' तथा अन्य दोनों 'प्रभु'
हैं-ऐसा समझना चाहिये। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 23-24वाँ
श्लोक)-
“तस्य शिष्योऽभवच्च्छ
कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः॥23॥
अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे।
श्रीमान् रङ्गपुरी ह्येष वात्सल्ये यः समाश्रितः॥24॥”
“श्रीईश्वरपुरी शृङ्गाररसके, श्रीअद्वैतप्रभु दास्य और
सख्यरसके एवं श्रीरङ्गपुरी शुद्धवात्सल्यरसके सेवक थे।”
चैःचः आदिलीला, 7/10-17 संख्या द्रष्टव्य है॥296-301॥
व्रजमें मुरलीधारी गोपबालक श्यामलीला, गौड़में
ब्राह्मण-संन्यासी वेशधारी कीर्तन-विग्रह गौरलीला :-
तिँह श्याम,-वंशीमुख, गोपविलासी।
इहँ गौर-कभु द्विज, कभु त' संन्यासी॥302॥
264 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/302-308 ]
अनुवाद-व्रजमें वे (श्रीकृष्ण) श्यामवर्णके हैं,
उनके मुखपर वंशी सुशोभित होती है और वे
गोपबालकके रूपमें विलास करते हैं। [वे ही श्रीकृष्ण]
नवद्वीपमें [महाप्रभुके रूपमें] गौर वर्णके हुए हैं, ये कभी
ब्राह्मण (गृहस्थ) और कभी संन्यासीकी लीला करते
हैं॥ 302 ॥
गोपीभावयुक्त श्रीकृष्णका श्रीगौररूपमें
श्रीकृष्णप्रेमास्वादन :-
अतएव आपने प्रभु गोपीभाव धरि'।
व्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' करि' ॥ 303 ॥
अनुवाद-इसलिये स्वयं महाप्रभुने गोपीभावको अङ्गीकार
किया है और वे व्रजेन्द्रनन्दनको अपना 'प्राणनाथ'
मानते हैं॥ 303 ॥
रूपानुगजनोंके आनुगत्यके बिना श्रीगौरका
विप्रलम्भरस सुदुर्लभ :-
सेइ कृष्ण, सेइ गोपी, - परम विरोध।
अचिन्त्य चरित्र प्रभुर अति सुदुर्बोध ॥ 304 ॥
अनुवाद-वे ही श्रीकृष्ण हैं और वे ही गोपी हैं,
यह तो परस्पर परम विरोधी बात है, परन्तु महाप्रभुके
अचिन्त्य चरित्रको समझना अत्यन्त कठिन है॥ 304 ॥
अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 17/276-278 संख्या
द्रष्टव्य है॥ 303-304 ॥
श्रीगौरके परमवैचित्र्य-चमत्कारमय
अचिन्त्यभाव तर्कसे अतीत :-
इथे तर्क करि' केह ना कर संशय।
कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति एइ मत हय ॥ 305 ॥
अनुवाद-इसमें तर्क करके कोई संशय मत करो,
क्योंकि श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिका प्रभाव इसी प्रकार
है॥ 305 ॥
अचिन्त्य, अद्भुत कृष्णचैतन्य-विहार।
चित्र भाव, चित्र गुण, चित्र व्यवहार ॥ 306 ॥
तार्किककी दुर्गति- “संशयात्मा विनश्यति" :-
तर्के इहा नाहि माने, येइ दुराचार।
कुम्भीपाके पचे सेइ, नाहिक निस्तार ॥ 307 ॥
अनुवाद- श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाएँ अचिन्त्य और
अद्भुत हैं। उनके भाव, गुण और व्यवहार सभी
आश्चर्यजनक हैं। जो दुराचारी कुतर्कसे इसको नहीं
मानता, वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है और
वहाँसे उसका उद्धार नहीं होता है॥ 306-307 ॥
अनुभाष्य-'कुम्भीपाक'- एक विशेष प्रकारका नरक।
पापी व्यक्तिको 'कुम्भी' नामके एक विशेषपात्र में पकाया
जाता है। (भाः 5/26/13)-
“यस्तिह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति
तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचराः कुम्भीपाके
तप्ततैल उपरन्धयन्ति ॥"
“प्राणियोंका वध करनेवाले जीवको यमराज दण्डके
रूपमें कुम्भीपाक नरकमें तप्त तेलमें राँधते हैं॥"307॥
महाभारतमें भीष्मपर्वमें (5/12)-
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।
प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ 308 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 308 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृतिसे अतीत जो तत्त्व है,
उसका लक्षण ही [प्राकृत इन्द्रियों, मन और बुद्धिके
द्वारा वह] अचिन्त्य है। तर्क तो प्राकृत है, इसलिये वह
तत्त्वको स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिये अचिन्त्यभावोंको
समझनेके लिये तर्क मत करो॥ 308 ॥
इति अमृतप्रवाह-भाष्ये सप्तदश परिच्छेद।
सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ।
अनुभाष्य-नदी-पर्वत-वनादि भूतलपर स्थित पदार्थोंके
नामोंको श्रवण करनेकी इच्छा होनेपर धृतराष्ट्र
उत्तरमें सञ्जयने कहा,-
ये भावाः अचिन्त्याः (प्राकृत-भोगमय-चिन्तातीताः) खलु
(निश्चयं) तान् अचिन्त्यभावान् तर्केण न योजयेत् (ते हेतुभिः
सतरहवाँ अध्याय | 265

[ 17/308-317
न हन्तव्याः इत्यर्थः); यत् च प्रकृतिभ्यः परं (भिन्नम् अतीतम्
अप्राकृतमिति यावत्) तत् एव अचिन्त्यस्य लक्षणम्।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य
है॥308॥
श्रद्धावान्‌को ही सेवा-प्राप्ति :-
अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार विश्वास।
सेइ जन याय चैतन्येर पद-पाश॥309॥
अनुवाद—अद्भुत चैतन्यलीलामें जिसका दृढ़ विश्वास
है, वही व्यक्ति श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंको प्राप्त
कर सकता है॥309॥
प्रसङ्गे करिल एइ सिद्धान्तेर सार।
इहा येइ शुने, शुद्धभक्ति हय तार॥310॥
अनुवाद—प्रसङ्गवश मैंने सभी सिद्धान्तोंके सारको
कहा है। इसे जो श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके हृदयमें
शुद्धभक्ति उदित होती है॥310॥
पुनरावृत्ति :-
लिखित ग्रन्थेर यदि करि अनुवाद।
तबे से ग्रन्थेर अर्थ पाइबे आस्वाद॥311॥
अनुवाद—लिखित ग्रन्थका यदि अन्तमें संक्षेपरूपमें
वर्णन किया जाय, तो ग्रन्थके सभी विषयोंका एक साथ
आस्वादन किया जा सकता है॥311॥
भागवतमें श्रीव्यास-रीतिके अनुसार अध्याय-वर्णन :-
अतएव भागवते व्यासेर आचार।
कथा कहि' अनुवाद करे बार बार॥312॥
अनुवाद—इसलिये श्रीमद्भागवतमें श्रीव्यासदेवका ऐसा
ही आचरण देखा जाता है। उन्होंने श्रीमद्भागवतके शेषमें
उसके विषयका पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है॥312॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवतके
अन्तमें बारहवें स्कन्धके बारहवें अध्यायमें बावन
श्लोकोंमें प्रारम्भसे अन्त तक सम्पूर्ण भागवतको जिस
प्रकार प्रतिछायारूपमें (संक्षेपमें) वर्णन करके ग्रन्थ
समाप्त किया है, उन महाजनके द्वारा प्रदर्शित पथका
अनुसरण करते हुये ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास) ने भी
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी आदिलीलाको संक्षेपरूपमें पुनः
वर्णन किया है॥312॥
संक्षेपमें अध्यायोंमें वर्णित विषयोंकी पुनरावृत्ति :-
ताते आदिलीलार करि परिच्छेद गणन।
प्रथम परिच्छेदे कैलुँ 'मङ्गलाचरण'॥313॥
अनुवाद—इसलिये मैं भी आदिलीलाके सभी अध्यायोंके
विषयोंकी सूची गणना कर रहा हूँ। पहले अध्यायमें
मैंने 'मङ्गलाचरण' किया गया है॥313॥
द्वितीय परिच्छेदे 'चैतन्यतत्त्व-निरूपण'।
स्वयं भगवान् येइ व्रजेन्द्रनन्दन॥314॥
तेंहो त' चैतन्य-कृष्ण-शचीर नन्दन।
तृतीय परिच्छेदे जन्मेर् 'सामान्य' कारण॥315॥
तहिँ मध्ये प्रेमदान-'विशेष' कारण।
युगधर्म-कृष्णनाम-प्रेम-प्रचारण॥316॥
अनुवाद—दूसरे अध्यायमें चैतन्यतत्त्वका निरूपण
किया है। व्रजेन्द्रनन्दन जो स्वयं भगवान् हैं, वे ही तो
शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं।
तीसरे अध्यायमें उनके जन्मका 'सामान्य' कारण कहा
है, उसके मध्यमें प्रेमदानको विशेष कारण बतलाया है।
श्रीकृष्णनाम और उसके द्वारा प्रेमका प्रचाररूपी युगधर्मका
भी इस अध्यायमें वर्णन हुआ है॥314-316॥
चतुर्थे कहिलुँ जन्मेर् 'मूल' कारण।
स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस-आस्वादन॥317॥
अनुवाद—चौथे अध्यायमें महाप्रभुके जन्मका 'मूल'
कारण अपने माधुर्य और प्रेमानन्दरसके आस्वादनको
कहा है॥317॥
266 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/318-327 ]
पञ्चमे 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्व निरूपण।
नित्यानन्द हैला राम रोहिणीनन्दन ॥ 318 ॥
अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्वका
निरूपण हुआ है, रोहिणीनन्दन श्रीबलराम ही अब
श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ 318 ॥
षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत-तत्त्वे'र विचार।
अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु-अवतार ॥ 319 ॥
अनुवाद—छठे अध्यायमें 'श्रीअद्वैत-तत्त्व' का विचार
हुआ है। श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णुके अवतार हैं॥ 319 ॥
सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वे'र आख्यान।
पञ्चतत्त्व मिलि' यैछे कैला प्रेमदान ॥ 320 ॥
अनुवाद—सातवें अध्यायमें 'पञ्चतत्त्व' का वर्णन
है। इन पाँच-तत्त्वोंने मिलकर कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका
दान किया, इसका वर्णन हुआ है॥ 320 ॥
अष्टमे 'चैतन्यलीला-वर्णन'-कारण।
एक कृष्णनामेर महा-महिमा-कथन ॥ 321 ॥
अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने
श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका कारण कहा है। इसी
अध्यायमें श्रीकृष्णनामकी महामहिमाकी कथा भी वर्णित
है॥ 321 ॥
नवमेते 'भक्तिकल्पवृक्षे'र वर्णन'।
श्रीचैतन्य-माली कैला वृक्ष आरोपण ॥ 322 ॥
अनुवाद—नौवें अध्यायमें 'भक्तिकल्पवृक्ष' का वर्णन
है। श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी मालीने इस वृक्षका आरोपण
किया है॥ 322 ॥
दशमेते मूल-स्कन्धेर 'शाखादि-गणन'।
सर्वशाखागणेर यैछे फल-वितरण ॥ 323 ॥
अनुवाद—दसवें अध्यायमें इस भक्तिकल्पवृक्षके मूल
स्कन्धकी शाखाओं-उपशाखाओंकी गणना हुई है और
उनके द्वारा प्रेमरूपी फलके वितरणका वर्णन हुआ
है॥ 323 ॥
एकादशे 'नित्यानन्दशाखा-विवरण'।
द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध शाखार वर्णन' ॥ 324 ॥
अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्दशाखा' का
विवरण और बारहवें अध्यायमें 'श्रीअद्वैतस्कन्धकी शाखा'
का वर्णन हुआ है॥ 324 ॥
त्रयोदशे महाप्रभुर 'जन्म-विवरण'।
कृष्णनाम-सह यैछे प्रभुर जनम ॥ 325 ॥
अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुके 'जन्मका विवरण'
हुआ है और कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णनामके कीर्तनके साथ
महाप्रभुका जन्म हुआ॥ 325 ॥
चतुर्दशे 'बाल्यलीला'र किछु विवरण।
पञ्चदशे 'पौगण्डलीला'र सङ्क्षेपे कथन ॥ 326 ॥
अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें कुछ 'बाल्यलीला' का
वर्णन हुआ है और पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुकी
'पौगण्डलीला' का संक्षेपमें वर्णन किया है॥ 326 ॥
षोड़शे कहिलुँ 'कैशोरलीला'र उद्देश।
सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ विशेष ॥ 327 ॥
अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुकी
'कैशोरलीला' के उद्देश्यको बतलाया है। सतरहवें अध्यायमें
'यौवनलीला' का विशेष वर्णन किया है॥ 327 ॥
अनुभाष्य—313से 327पयर संख्यामें अध्यायोंकी
गणना लिखी है—
पहले अध्यायमें-गुरु आदिके वन्दनरूपी मङ्गलाचरण।
दूसरे अध्यायमें-गौरतत्त्वनिर्देश मङ्गलाचरण।
तीसरे अध्यायमें-अवतारका सामान्य कारण; प्रेमदान।
सतरहवाँ अध्याय | 267

[ 17/313–334
चौथे अध्यायमें—अवतारका मूलकारण।
पाँचवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्दतत्त्व-निरूपण।
छठे अध्यायमें—श्रीअद्वैततत्त्व-निर्देश।
सातवें अध्यायमें—पञ्चतत्त्व-निर्देश और प्रचार।
आठवें अध्यायमें—उपक्रमणिका और नाम-महिमा।
नौवें अध्यायमें—भक्तिकल्पवृक्ष-वर्णन-प्रचार।
दसवें अध्यायमें—गौरगणोंकी गणना।
ग्यारहवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंकी गणना।
बारहवें अध्यायमें—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधरगणोंकी
गणना।
तेरहवें अध्यायमें—गौरजन्मलीला।
चौदहवें अध्यायमें—बाल्यलीला।
पन्द्रहवें अध्यायमें—पौगण्डलीला।
सोलहवें अध्यायमें—कैशोरलीला।
सतरहवें अध्यायमें—यौवनलीला ॥ 313-327 ॥
एइ सप्तदश प्रकार 'आदि-लीला'र प्रबन्ध।
द्वादश प्रबन्ध, ताते ग्रन्थ-मुखबन्ध ॥ 328 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सतरह अध्यायोंमें 'आदिलीला'
का वर्णन है, इनमेंसे पहले बारह अध्यायोंमें आदिलीलाकी
भूमिका है॥ 328 ॥
पञ्चप्रबन्धे पञ्चवयस चरित।
संक्षेपे कहिलुँ अति,—ना कैलुँ विस्तृत ॥ 329 ॥
वृन्दावनदास इहा 'चैतन्यमङ्गले'।
विस्तारि' वर्णिला नित्यानन्द-आज्ञा-बले ॥ 330 ॥
अनुवाद—शेष पाँच अध्यायोंमें महाप्रभुकी पाँच
विभिन्न अवस्थाके अनुरूप (जन्म, बाल्य, पौगण्ड,
कैशोर और यौवन) लीला-चरित्रका वर्णन है। मैंने
आदिलीला अति संक्षेपमें कही है, इसे विस्तारमें नहीं
कहा है, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञाके बलपर
श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल' में इनका विस्तारसे वर्णन
किया है॥ 329-330 ॥
अनुभाष्य—आदिलीलामें सतरह अध्याय अथवा
प्रबन्ध हैं, उनमेंसे पहले बारह अध्याय ग्रन्थकी भूमिका
अथवा उपक्रमणिका मात्र हैं। बादके तेरहसे सतरह
अध्याय तक 'जन्म', 'बाल्य', 'पौगण्ड', 'कैशोर' और
'युवा',— पाँच प्रकारकी अवस्थाकी कथा पाँच प्रबन्धोंके
रूपमें पाँच अध्याय हैं॥ 329 ॥
श्रीगौरलीला अपार :—
श्रीकृष्णचैतन्यलीला—अद्भुत, अनन्त।
ब्रह्मा-शिव-शेष याँर नाहि पाय अन्त ॥ 331 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यलीला तो अद्भुत-अनन्त है,
जिसका ब्रह्मा-शिव-शेषादि भी अन्त नहीं पा पाते ॥ 331 ॥
अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 21/10,12 संख्या और
भागवत 2/7/41 एवं 10/14/7 आदि श्लोक द्रष्टव्य
हैं ॥ 331 ॥
श्रीगौरलीलाके श्रवण-कीर्तनकारीको
चरम मङ्गलकी प्राप्ति :—
येइ येइ अंश कहे, येइ शुने धन्य।
अचिरे मिलिबे तारे श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 332 ॥
अनुवाद—जो उस अनन्त लीलाके जिस भी अंशको
कहेगा अथवा जो उसे सुनेगा, उसे अति शीघ्र ही
श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥ 332 ॥
श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द।
श्रीवासादि गदाधरादि यत भक्तवृन्द ॥ 333 ॥
वृन्दावनवासी भक्तोंकी वन्दना :—
यत यत भक्तगण कैसे/बैसे वृन्दावने।
नम्र हञा शिरे धरौँ ताँहार चरणे ॥ 334 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु,
श्रीअद्वैताचार्य; तथा श्रीवासादि और श्रीगदाधरादि जितने
भक्त हैं तथा जो-जो भक्त वृन्दावनमें वास कर रहे हैं,
अति विनीत भावसे मैं उन सबके चरणकमलोंमें अपने
शीशको नत करता हूँ॥ 333-334 ॥
268 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/335-336 ]
श्रीगुरु-प्रणाम :-
कृपाकी आशा रखकर यह कृष्णदास चैतन्यचरितामृतका गान कर रहा है॥ 335-336॥
श्रीस्वरूप-श्रीरूप-श्रीसनातन।
श्रीरघुनाथदास, आर श्रीजीव-चरण॥ 335॥
अनुभाष्य-‘श्रीस्वरूप’-श्रीदामोदर-स्वरूप; चैःचः मध्यलीला, 10/102-127संख्या और अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 335॥
शिरॆ धरि वन्दौँ, नित्य करौँ ताँर आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 336॥
इति अनुभाष्ये सप्तदश परिच्छेद।
सतरहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे यौवनलीलासूत्र-वर्णनं नाम सप्तदशपरिच्छेदः।
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें यौवनलीलासूत्र-वर्णन नामक सतरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण करते हुए, उनकी वन्दना करते हुए और नित्य उनकी
इति आदिलाीला समाप्ता॥
यह आदिलाीला समाप्त हुई॥
सतरहवाँ अध्याय | 269

270 | श्रीचैतन्यचरितामृत

श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]
अद्वैताऽङ्घ्यब्जभृङ्गांस्तान् 12/1 | ज्ञानतः सुलभा मुक्ति 8/17 | पौगण्ड-लीला चैतन्य 15/4
अचिन्त्याः खलु ये भावा 17/308 | तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं 9/1 | प्रकृतिभ्यः परं यच्च 17/308
अनुवादमनुक्त्वा तु न 16/58 | तदश्मसारं हृदयं 8/25 | प्रसभं नर्त्तते चित्रं 8/1
अमानिना मानदेन 17/31 | तया हि सहितः सर्वान् 15/27 | प्राणिनामुपकाराय यदेवेह 9/43
अम्बुजमम्बुनि जातं 16/82 | तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः 13/1 | प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय 9/42
अश्वमेधं गवालम्भं 17/164 | तस्य श्रीकृष्णचैतन्य 11/4 | प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो 17/4
अस्त्वेवमङ्ग भजतां 8/19 | तृणादपि सुनीचेन तरोरिव 17/31 | ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं 17/78
अहो एषां वरं जन्म 9/46 | त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरो 14/15 | मयानुमोदितः सोऽसौ 14/69
आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि 17/281 | दाता भोक्ता तत्फलानां 9/6 | महत्त्वं गङ्गायाः 16/41
ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः 11/4 | देवेरेण सुतोत्पत्तिं कलौ 17/164 | मालाकारः स्वयं कृष्ण 9/6
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिना 9/42 | द्वितीय-श्रीलक्ष्मीविव 16/41 | मुरभिदि तद्विपरीतं पाद 16/82
ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् 13/77 | न गृहं गृहमित्याहुः 15/27 | यवनाः सुमनायन्ते कृष्ण 17/1
कथञ्चन स्मृते यस्मिन् 14/1 | नत्वाखिलान् तेषु मुख्या 11/1 | यस्यां श्रीकृष्णचैतन्यो 13/19
कथञ्चिदाश्रयाद् येषां 10/1 | न विक्रियेताथ यदा 8/25 | यस्यानुकम्पया श्वापि 9/1
कर्मणा मनसा वाचा 9/43 | न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 17/76 | यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्य 8/58
कलौ नास्त्येव नास्त्येव 17/21 | न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् 16/58 | रसालङ्कारवत् काव्यं 16/71
कुमनाः सुमनस्त्वं हि 15/1 | ना साधयति मां योगो 17/76 | राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां 8/19
कृपासुधा-सरिद्व्यस्य 16/1 | नित्यानन्द-पदाम्भोज 11/1 | राधायाः प्रणयस्य हन्त 17/293
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् 17/78 | नीचगैव सदा भाति 16/1 | रासारम्भविधौ निलीय 17/293
गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दन 17/281 | नैतच्चित्रं भगवति 13/77 | लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या 16/3
जीयात् कैशोर-चैतन्यो 16/3 | पञ्चदीर्घः पञ्चसूक्ष्मः 14/15 | लौकिकीमपि तामीश 14/5

वन्दे चैतन्यकृष्णस्य 14/5 | शाखारूपान् भक्तगणान् 10/7 | सुजनस्येव येषां वै 9/46
वन्दे चैतन्यदेवं तं भगवन्तं 8/1 | श्रीचैतन्यपदाम्भोज 10/1 | सुमनोऽर्पणमात्रेण तं 15/1
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य 10/7 | श्रीचैतन्यामरतरोर्द्वितीय 12/3 | सेयं साधनसाहस्रैर्हरि 8/17
वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं 17/1 | श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखा 12/3 | स्याद्वपुः सुन्दरमपि 16/71
विद्यारम्भमुखा पाणिग्रहणा 15/4 | सङ्कल्पो विदितः साध्यो 14/69 | हरावभक्तस्य कुतो 8/58
विद्या-सौन्दर्य-सद्देश 17/4 | स प्रसीदतु चैतन्यदेवो 13/1 | हरेर्नाम हरेर्नाम हरे 17/21
विस्मृते विपरीतं स्यात् 14/1 | सर्वसद्गुणपूर्णां तां 13/19 | हित्वाऽसारान् सारभृतो 12/1

272 | श्रीचैतन्यचरितामृत

प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ अतएव दुइगणे दुँहार 11/15 अनन्तदास, कानुपण्डित 12/61
अतएव प्रभु ताँरे बले 13/78 अनन्त नित्यानन्दगण-के 11/57
अङ्के लञा शची ताँरे 14/10 अतएव पुनः कहों 8/13 अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्ड 17/105
अङ्गसेवा गोविन्देर दिलेन 10/141 अतएव बाल्यलीला संक्षेपे 14/96 अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा 11/59
अञ्जलि अञ्जलि भरि' 9/30 अतएव भज, लोक, चैतन्य 8/43 अनायासे पाइल सेइ 12/74
अ-कलङ्क गौरचन्द्र 13/91 अतएव भागवते व्यासेर 17/312 अनायासे भवक्षय, कृष्णेर 8/28
अकिञ्चन प्रभुर प्रिय 10/66 अतएव 'विश्वरूप' नाम 13/76 अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि 10/85
अक्रूर बलि' प्रभु याँरे 10/76 अतएव शब्दालङ्कार 16/75 अनुपम वल्लभ, श्रीरूप 10/84
अग्नि उल्का मोर मुखे 17/189 अतएव सब फल देह' 9/39 अन्तरीक्षे देवगण 13/106
अचिन्त्य, अद्भुत कृष्ण 17/306 अतएव 'हरि' 'हरि' बले 13/24 अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे 11/10
अचिन्त्य चरित्र प्रभुर 17/304 अतएव हिन्दुमात्र ना करे 17/159 अन्तरे जानिला प्रभु 16/22
अचिरे मिलिबे तारे 17/332 अतएव हैल ताँर 13/25 अन्तरे विस्मित शची 14/30
अच्युतानन्द-अद्वैत 10/150 अतिथि-विप्रेर अन्न खाइल 14/37 अन्तर्धान कैला सङ्गेत 17/282
अच्युतानन्द-प्राय, चैतन्य 12/75 अत्यन्त विरक्त, सदा 11/31 अन्न-जल त्याग कैल 10/98
अच्युतानन्द-बड़ शाखा 12/13 'अद्भुतगुणा'-एइ पुनराय 16/66 अन्यथा ये माने, तार 17/25
अट्ट अट्ट हासे, करे 17/180 अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार 17/309 अन्य लोक नाहि जाने 17/87
अतएव अवश्य आमि 17/265 अद्यापि याँहार कृपा-महिमा 11/11 अन्वेषिते आइला ताहाँ 17/283
अतएव आदिखण्डे 13/18 अद्यापिह देख चैतन्य 8/22 अपत्य-विरहे मिश्रेर 13/73
अतएव आपने प्रभु 17/303 अद्वैत आचार्य, आर पण्डित 13/55 अपरश याय गोसाञि 10/142
अतएव आमि आज्ञा 9/36 अद्वैत-आचार्येर स्थाने 13/63 अपराध नाहि, कैले लोकेर 17/97
अतएव गोवध करे बड़ 17/158 अद्वैत-आचार्य-गोसाञि 17/298 अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल 12/86
अतएव गोवध केह ना 17/163 अद्वैत-आचार्य-भार्या 13/111 अयाचित-वृत्ति, किम्बा 17/29
अतएव जरद्गव मारे 17/161 अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु 17/319 अलङ्कार नाहि पड़, नाहि 16/92
अतएव तटे रहि' चाकि 12/94 अद्वैत पाइल विश्वरूप 17/10 अलौकिक ऐछे प्रभुर 10/59
अतएव ताँ-सबार वन्दिये 12/92 अध्ययन-लीला प्रभुर दास 15/7 अलौकिक प्रेम ताँर 11/24
अतएव ताँ-सबारे करि' 10/6 अनन्त आचार्य, कविदत्त 12/80 अलौकिक वृक्ष करे 9/32
अतएव दण्ड करि' 12/35 अनन्त चैतनलीला क्षुद्र 13/44 अल्पकाले हैला पञ्जी 15/6
अतएव दिङमात्र इहाँ 15/33 अनन्त चैतन्यभक्त ना 10/121 अल्प दिने द्वादश-फला 14/94

[ अवतीर्ण-आर

अवतीर्ण हैते मने 13/52
अवश्य पाइबे तबे 17/33
अविचार काव्ये अवश्य 16/85
अविचारे देह दोष 14/29
'अविमृष्ट-विधेयांश'-एइ 16/61
'अविमृष्ट-विधेयांश'-दुइ 16/55
अष्ट कन्या क्रमे हैल 13/72
अष्टमास रहिल भिक्षा देन 10/156
अष्टमे चैतन्यलीला-वर्णन' 17/321
अष्टादश वत्सर रहिला 13/13
अष्ठि-वल्कल नाहि 17/85
असंख्य अनन्त गण 11/7
असंख्य अद्वैत-शाखा 12/65
असंख्य भक्तेर कराइला 13/62
असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये 17/46
असाररे नामे इँहा नाहि 12/11

आ

आँखि मुदि' काँपि आमि 17/182
आउलाय सकल अङ्ग 8/23
आकाशे उड़िया याङ, पाङ 10/20
आगे अवतारिल ये गुरु 13/53
“आगे केन इहा, माता 14/33
आगे ता' करिब, शुन 9/20
आगे विस्तारिया ताहा 10/104
आगे सम्प्रदाये नृत्य करे 17/136
आचार्य कहे,–“इहाके 12/47
आचार्य-गोसाञि मने 12/53
आचार्य गोसाञि याँरे 10/44
आचार्य गोसाञिर शिष्य 8/70
आचार्य-गोसाञिरे प्रभु करे 17/66
'आचार्यरत्न'-नाम धरे 10/12
आचार्यरत्न, विद्यानिधि 13/55
आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति 11/42
आचार्य-व्यवहार सब 12/28
आचार्यरत्न, श्रीनिवास 13/102
आचार्यरत्न, श्रीनिवास 13/108
आचार्यरत्नेर नाम 10/13
आचार्य शेखर ताँरे 17/118
आचार्य-स्थाने मातार 17/71
आचार्येर अभिप्राय 12/54
आचार्येर आज्ञा पाञा 13/111
आचार्येर आर पुत्र 12/27
आचार्येर दुःखे वैष्णव 12/24
आचार्येर मत येइ, सेइ 12/10
आचार्येर लज्जा-धर्म 12/49
आचार्येरे स्थापियाछे करिया 12/34
आजन्म आज्ञाकारी तेंहो 10/74
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर 11/39
आजन्म सेविला तेंहो 12/13
आजि आमि क्षमा करि' 17/127
आजि ताँरे निवेदिब, करि' 16/96
आजि दिन भाल,–करिब 14/18
आजि बासा' याह, कालि 16/104
आज्ञा पाञा मिश्र कैल 16/17
आज्ञामाला पाञा आमार 8/77
आटचल्लिश वत्सर 13/8
आत्म-इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि 9/38
आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ 1/57
आत्म लुकाइते प्रभु 14/33
आत्मवृत्ति करि' करे कुटुम्ब 10/50
आदिलीला-मध्ये प्रभुर 13/15
आदिलीला-सूत्र लिखि 13/51
आधुनिक आमार शास्त्र 17/169
आनन्दे विह्वल मन 13/102
आनन्दित हञा आइल 12/43
आनन्दित हञा सबे 12/26
आनिया नैवेद्य तारा 14/60
आपन-इच्छाय कैल 17/89
आपना शोधिते कहि 11/7
आपनि चन्दन परि' 14/51
आपनि निरभिमानी, अन्ये 17/26
आपने चैतन्यमाली स्कन्ध 9/11
आपने दुइ भाइ हैला 17/229
आपने महाप्रभु गाय याँर 10/18
आमाके प्रणति करे, हय 17/263
आमा देखि' लुकाइला 17/145
आमा सबार पक्षे इहा 14/53
आमा हैते प्रसादपात्र 12/44
आमार महिमा देख, ब्राह्मण 17/42
आमार लिखन येन शुकेर 8/78
आमार हृदय हैते गेला 13/85
आमारे पूजिले पाबे 14/66
आमारेह कभु येइ 12/45
आमि कहि,–'आमार 15/19
आमि त' करिब 15/15
आमि ना लओयाइले 17/261
आमि ना शिखाले 14/87
आमि बालक,–संन्यासेर 15/19
आम्रमहोत्सव प्रभु करे 17/88
आर अर्थालङ्कार आछे 16/78
आर एक दोष आगे 16/61
“आर एक प्रश्न करि 17/172
आर एक विप्र आइल 17/60
आर कोन उपाय नाहि 17/267

274 | श्रीचैतन्यचरितामृत

आर-एइ ]
आर चब्बिंश वत्सर कैल १०/११ इत्यादि पूर्वसङ्गी बड़ १०/१२७ उ
आर दिन एक भिक्षुक १७/१०१ इथि लागि' कृपार्द्र ८/१०
आर दिन प्रभुके कहे १७/६१ इथे तर्क करि' केह १७/३०५
आर दिन शिवभक्त शिव १७/९९ इथे दोष नाहि, आचार्य १२/३४ उच्च करि' गाय गीत १७/२०७
आर दिने ज्योतिष १७/१०३ इदं-शब्दे 'अनुवाद' १६/५६ उच्छिष्ट-गर्त्ते त्यक्त-हाण्डीर १४/७३
आर पुत्र-'स्वरूप' १२/२७ इहँ गौर-कभु द्विज १७/३०२ उच्छिष्ट दिया नारायणीर १७/२३०
आर म्लेच्छ कहे, शुन १७/२०१ इह माटि, सेह माटि १४/२८ उच्छिष्ट-मार्जन आर पाद १०/१५५
आर म्लेच्छ कहे १७/१९४ इहा छाड़ि' कृष्ण यदि १७/२८० "उठह, गोपाल-बल १२/२५
आर यत भक्तगण १०/१२८ इहा येइ शुने तार १७/२२६ उठिल गोपाल प्रभुर स्पर्श १२/२६
आर यत वृन्दावने ८/७१ इहा येइ शुने, शुद्धभक्ति १७/३१० उठिल वैष्णव सब करि १७/२२३
आर यदि कीर्त्तन १७/१२८ इहा विस्तारियाछेन दास १४/९५ उडुम्बर-वृक्ष येन फले ९/२५
“आरे पापि, भक्तद्वेषि १७/५१ इहा शुनि' ता-सबार १४/५९ उद्धत लोक भाङ्गे काजीर १७/१४२
आलिङ्गन करि' ताँरे १०/१३२ इहा शुनि' दिग्विजयी १६/९५ उन्मादेर चेष्टा करे १३/४०
आवेशेते महाप्रभु वंशी १७/२३३ इहा शुनि' महाप्रभु अति १६/९३ उपमालङ्कार गुण, किछु १६/४६
आसि' कहे,-'गेलुँ १७/१८९ इहा शुनि' माताके कहिल १४/७५ उपरि उपरि शाखा ९/१७
आसि' कहे,-'हिन्दुर १७/२०४ इहा हैते हबे दुइ १४/१७ उर्द्धबाहु करि' कहों १७/३२
आ-सिन्धुनदी-तीर १०/८७ इहार मध्ये मालि-पाछे १२/६७
आसिया श्रीरूप-गोसाञिर १०/१५७ इहार विचार नाहि जाने ९/२९
आसि' रूप-सनातनेर १०/९५ इहाते विरोध नाहि, विरोध १६/८१ ऋ
आस्ते-व्यस्ते पिता-माता १५/१७ इहाते सन्तुष्ट हबेन १५/२०
आस्ते व्यस्ते भक्तगण १७/२५१ 'इहाँ विष्णुपादपद्मे गङ्गार १६/८०
आस्वादिया पूर्ण कैल १३/४३ 'इहाँ कृष्ण नहे १७/२८७
आस्वादिल एसब रस १०/६० ऋण शोधिबारे चाहि १२/३२
आस्वादेन रामानन्द-स्वरूप १३/४२
ई
ए
इ ईश्वर-अचिन्त्यशक्त्ये १६/८१
ईश्वरत्वे आचार्येरे करियाछे १२/३१ एइ आज्ञा कैल यदि ९/४७
ईश्वरपुरीर शिष्य-ब्रह्मचारी १०/१३८ एइ आदीलीला कैल १७/२७४
इँहा सबार यैछे हैल १०/१०४ ईश्वरपुरीर सङ्गे तथाइ १७/८ एइ कृपा कर,-येन १७/२२०
इँहा-सबार श्रीचरण १३/१२४ ईश्वर हइया कहाय महा ११/९ एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे ८/७८
इच्छा नाहि, तबु बले १७/२०० ईश्वरेर दैन्य करि' करियाछे १२/३५ एइ त' करिबे वैष्णव १४/१७
एइ त' कहिल ग्रन्थारम्भे १३/६
पद्य सूची | 275

[ एइ-एतकाल

एइ त' कहिलाङ आचार्य १२/७६ | एइमत लीला दुँहे १४/७० | एकदिन नैवेद्य-ताम्बुल १५/१६
एइ त' कहिलुँ प्रेमफल ९/५४ | एइमत वैष्णव कारे १७/२९ | एकदिन प्रभु विष्णुमण्डपे १७/११५
एइ त' कैशोर-लीला १६/४ | एइ मत शिशुलीला करे १४/९३ | एकदिन प्रभु सब भक्तगण १७/७९
एइ त' निश्चय करि' आइल १०/९५ | एइमत संख्यातीत चैतन्य १०/१५९ | एक दिन बले किछु १७/४७
एइ त' पौगण्ड-लीलार १५/३१ | एइमत सब शाखा १०/१६ | एकदिन प्रभु श्रीवासे आज्ञा १७/९०
एइ त' प्रस्तावे आछे बहुल १२/५५ | एइ मते काजीरे प्रभु १७/२२६ | एकदिन महाप्रभुर नृत्य १७/२४३
एइ त' संक्षेपे कहिलाङ १२/८८ | एइमते दुँहे करेन धर्मेर १४/९० | एकदिन मातार पदे करिया १५/८
एइ तिन शाखा वृक्षर १०/८४ | एइमते नाना छले ऐश्वर्य १४/३६ | एकदिन मिश्र पुत्रेर चापल्य १४/८३
एइ तिन स्कन्धेर कैलुँ १२/९० | एइमते निज-घरे गेला १६/१०५ | एकदिन वल्लभाचार्य-कन्या १४/६२
एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी १०/७१ | एइ 'मध्यलीला'-नाम १३/३७ | एकदिन विप्र, नाम १७/३७
एइ दुइजनेर सूत्र देखिया १३/१७ | एइ मालाकार खाय एइ ९/५१ | एकदिन शची खइ-सन्देश १४/२४
“एइ देख कुओर भितर १७/२८४ | एइ मालीर-एइ वृक्षर १०/३ | एकदिन शची-देवी पुत्रेरे १४/७२
एइ देख, नखचिह्न आमार १७/१८६ | एइ मासे पुत्र हबे १३/८८ | एक दिन श्रीवासेर मन्दिरे १७/२२७
एइ दृढ़ युक्ति करि' १७/२६८ | एइ लागि' श्लोकेर अर्थ १६/५७ | एक दोषे सब अलङ्कार १६/६९
एइ नव मूल निकसिल ९/१५ | एइ शिक्षा सबाकारे, सबे १२/५३ | एक पड़ुया आइल १७/२४८
एइ नव मूले वृक्ष ९/१६ | एइ शिशु सर्वलोके करिबे १४/१६ | एक पादे नाहि, एइ १६/६७
एइ नव मूले वृक्ष ९/१५ | एइ शिशु अङ्गे देखि १४/१४ | एक फल खाइले रसे १७/८५
एइ पञ्चदोषे श्लोक कैल १६/६८ | “एइ श्लोकेर अर्थ कर” १६/४२ | एकफलेर मूल्य करि' ताहा ९/२८
एइ पञ्चपुत्र तोमार-मोर १०/१३४ | एइ सप्तदश प्रकार 'आदि १७/३२८ | एक ब्राह्मणी आसि' १७/२४३
एइ पापे नवद्वीप हइबे १७/२११ | एइ सब चन्द्रोदये तमः १३/४ | एक-भावे चब्बिश प्रहर १०/१७
एइ पितार वाक्य शुनि' १२/१४ | एइ सब ना माने येबा ८/७ | एक श्लोकेर अर्थ यदि १६/३९
एइमत आचार करे भक्ति १७/३० | एइ सब महाशाखा-चैतन्य १०/७९ | एक श्वेतकुष्ठे यैछे १६/७०
एइमत कीर्त्तन करि' १७/१३९ | एइ सब मोर निन्दा १७/२६१ | एकला उठाञा दिते हय ९/३५
एइ मत चापल्य सब १४/६१ | एइसब लीला करे शचीर १७/८७ | एकला मालाकार आमि ९/३४
एह मत दुँहार कथा १७/१५१ | एइ सर्वशाखा पूर्ण-पक्व ११/५८ | एकला मालाकार आमि ९/३७
एइ मत नाना लीला १५/२२ | एक 'अद्वैत' नाम, आर ९/२१ | एकला वा कत फल ९/३४
एइमत नृत्य हइल चारि १७/१२० | एक आम्रबीज प्रभु अङ्गने १७/८० | एकादशे 'नित्यानन्दशाखा १७/३२४
एइमत प्रतिदिन फले १७/८६ | एक एक शाखार शक्ति १०/१६२ | एकैक शाखाते उपशाखा ९/१९
एइ मत बङ्गे प्रभु १६/२० | एक 'कृष्णनामे' करे ८/२६ | एकैक-शाखाते लागे १०/१६०
एइ मत बङ्गेर लोकेर १६/१९ | एक कृष्णनामेर फले ८/२८ | एत कहि आचार्य ताँरे १२/४३
एइ मत बारमास कीर्त्तन १७/८८ | एक कृष्णनामेर महा १७/३२१ | एत कहि' सिंह गेल १७/१८६
एइ मत भक्तयति १३/१०३ | एकजनेर पेट भरे-खाइले १७/८३ | एत कहि' सन्ध्याकाले १७/१३५
एइ मत भक्तिवृक्षे ९/२५ | एकदिन गोपीभावे गृहेते १७/२४७ | “एतकाल प्रकटे केह ना १७/१२६

276 | श्रीचैतन्यचरितामृत

एत-कह ]
एत चिन्ति' लैला प्रभु 9/8 | ए-सब ना माने 8/6 | कतदिन रहि' मिश्र गेला 15/23
एत चिन्ति' विवाह करिते 15/26 | एसब पाषण्डी तबे 17/267 | कत दिने कैल प्रभु 16/8
एत जानि' चन्द्रे राहु 13/92 | एसब-प्रसादे लिखि 9/5 | कत दिने मिश्र पुत्रेर हाते 14/94
एत भावि' कहे,—"शुन 16/91 | ए सब लीला वर्णियाछेन 16/109 | कथा कहि' अनुवाद करे 17/312
एत बलि' काजी गेल 17/129 | | कथाय सभा उज्ज्वल करे 8/64
एत बलि' काजी निज 17/187 | | कन्यागण आइला ताँहा 14/48
एत बलि' गेला प्रभु 17/54 | ऐ | कन्यागण-मध्ये प्रभु 14/49
एत बलि' गेला शची 14/25 | | कन्या मागि' विवाह दिते 15/11
एत बलि' जननीर 14/35 | | कन्य़ारे कहे,—"आमा पूज 14/50
एत बलि' दुँहे रहे 13/86 | ऐछे आर शाखा-उपशाखार 12/88 | कपाट दिया कीर्त्तन करे 17/35
एत बलि नमस्करि' गेला 17/289 | ऐछे कर्म ना करिह 12/52 | कभु दक्षिण, कभु गौड़ 13/12
एत बलि' भारती गोसाञि 17/272 | ऐछे कर्म हेथा कैल 17/43 | कभु दुर्गा, लक्ष्मी हय 17/242
एत बलि' श्रीवास करिल 17/98 | ऐछे ग्रन्थ करि' तेंहो 8/40 | कभु पुत्रसङ्गे शची करिला 14/76
एत बलि' सबे ताँरे 17/287 | ऐछे देवेर वरे केह हय 16/44 | कभु प्रभु करेन ताँरे 17/299
एत शुनि' काजीर दुइ 17/219 | ऐछे प्रभु शची-घरे 13/122 | कभु भक्ति ना देन 8/18
एत शुनि' ता सभारे 17/203 | ऐछे यदि पुनः कर 17/185 | कभु भेद देखि, एड़ 17/113
एत शुनि' द्विज गेला 14/91 | ऐछे शची-जगन्नाथ 13/119 | कभु मृदुहस्ते कैल 14/45
एत शुनि' महाप्रभु हासिते 12/46 | | कभु शिशु-सङ्गे स्नान 14/48
एत शुनि' महाप्रभु हासिया 17/216 | | कमलाकर पिप्पलाइ 11/24
एत शुनि' महाप्रभुर हइल 17/50 | ओ | 'कमलाकान्त विश्वास' 12/28
एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे 16/20 | | 'कमले गङ्गार जन्म' 16/79
"एथा हैते विश्वरूप मोरे 15/18 | | कराइल जातकर्म 13/108
एबे कहि चैतन्य-लीला 13/6 | | कलानिधि, सुधानिधि 10/133
एबे कहि बाल्यलीला 14/4 | ओरे मूढ़ लोक, शुन 8/33 | कलार पात उपरे थुइल 17/39
एबे तुमि शान्त हैले 17/147 | | कलिक़ाले तैछे शक्ति 17/163
एबे ये उद्यम चालाओ 17/126 | | कलिक़ाले नामरूपे कृष्ण 17/22
एबे ये ना कर माना 17/174 | क | कल्पित आमार शास्त्र 17/170
एबे शुन, फलदाता ये 9/54 | | कवि कहे,—"कह देखि 16/53
एबे शुन मुख्य-शाखार 10/3 | | कवि कहे,—"ये कहिले 16/49
एबे से जानिलाङ, आर 14/34 | | कविचन्द्र, आर कीर्त्तनीया 10/109
ए वृक्षर अङ्ग हय 9/33 | कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ 13/57 | कवित्व-करणे शक्ति 16/102
एसब जीवेरे अवश्य 17/264 | कंसारि सेन, रामसेन 11/51 | कवि रात्रे कैल सरस्वती 16/105
एसब दुर्जनेर कैछे 17/262 | कत दिन प्रभु चित्ते 15/25 | कह तोमार श्लोके किवा 16/47
पद्य सूची | 277

[ कहिते-केशव
कहिते चाहये किछु ना 16/88 | किबा कोलाहल करे 14/81 | कृष्णपूजा करे तुलसी 13/70
कहिते लागिला प्रभु 17/216 | किशोर-वयसे आरम्भिला 13/31 | कृष्णप्रेममय-तनु, उदार 8/59
कहिते लागिला लोके 17/132 | कीर्त्तन करिते प्रभु करिला 17/224 | कृष्णप्रेम-लीलामृते 13/13
कहिते, शुनिते ऐछे 17/240 | कीर्त्तन करिते प्रभु, आइला 17/89 | कृष्णप्रेमा दिते, निते 11/26
काजी कहे,-"आज्ञा 17/152 | कीर्त्तन करिलुँ माना 17/178 | कृष्णप्रेमामृत वर्षे, ये 11/30
काजी कहे,-"इहा 17/11 | कीर्त्तन ना वर्ज्जिया घरे 17/191 | कृष्णप्रेमे पुलकाश्रु-विह्वल 8/22
काजी कहे,-"तुमि 17/146 | कीर्त्तन शुनि' बाहिरे तारा 17/36 | कृष्ण-बलराम दुइ 13/78
काजी कहे,-"तोमार 17/155 | कीर्त्तने नर्त्तन करे बड़ 12/20 | कृष्ण बलिले अपराधीर 8/24
काजी कहे,-"मोर 17/222 | कीर्त्तनेर कैल प्रभु तिन 17/135 | कृष्णभक्ति पाय, ताँरे 11/29
काजी कहे,-"यबे 17/178 | कीर्त्तनेर ध्वनिते काजी 17/141 | कृष्णमिश्र-नाम आर 12/18
काजीगणेर मुखे येंह 10/53 | कुम्भीपाके पचे सेइ 17/307 | कृष्ण यदि छुटे भक्ते 8/18
काजी-पाशे आसि' सब 17/124 | कुलाधिदेवता मोर 8/80 | कृष्णलीला भागवते कहे 8/34
काजी बले,-"सबे 17/175 | कुलीनग्रामवासी सत्यराज 10/80 | कृष्णवश-हेतु एक 17/75
काजीर भये स्वच्छन्द 17/131 | कुलीनग्रामीर भाग्य कहेन 10/83 | कृष्णसङ्ग देह' मोरे 17/21
काजीरे बसाइला प्रभु 17/144 | कृतघ्न हइला, ताँरे 12/68 | कृष्णस्मृति बिना हय 12/51
काजीरे विदाय दिल 17/225 | कृपा करि' कर मोर 17/270 | 'कृष्ण' 'हरि' नाम 13/23
काटिलेह तरु येन किछु 17/28 | कृपा करि' कर यदि 16/35 | कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति 17/305
कान्दिया बलेन शिशु 14/27 | कृष्ण अवतरि' करेन 13/69 | कृष्णेर आह्वान करे सघन 13/71
कायमनोवाक्ये करे 8/62 | कृष्ण अवतारिते आचार्य 13/70 | कृष्णेर कीर्त्तन करे नीच 17/211
कार पदचिह्न घरे, ना 14/8 | कृष्ण अवतारिया कैला 17/298 | कृष्णेर ये साधारण सद्गुण 8/57
काला-कृष्णदास बड़ 11/37 | कृष्णकथा, कृष्णपूजा 13/66 | कृष्णेर वियोगे यत प्रेम 13/43
काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र 10/131 | कृष्ण-कृपा नाहि तार 8/7 | “के आछिलुँ पूर्वजन्मे 17/104
काशीश्वर गोसाञिर शिष्य 8/66 | 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' 13/92 | के करिते पारे ताँहा 12/93
काष्ठ-पाषाण द्रवे याहार 11/19 | कृष्णदास-नाम शुद्ध 10/145 | "केने चुरि कर, केने 14/42
काठेर पुत्तली येन कुहके 8/79 | कृष्णदास ब्रह्मचारी 12/84 | केने पर-घरे याह 14/42
काँहा तुमि सर्वशास्त्रे 16/34 | कृष्णदास वैद्य, आर 10/109 | केमने ए सब अर्थ करिले 16/92
काहाँ आमि सबे शिशु 16/34 | 'कृष्णनाम' करे अपराधेर 8/24 | केमने ए सर्वलोकेर 13/68
काहाके वा स्तुति करे 14/81 | कृष्णनाम-बीज ताहे ना 8/30 | केबा आसे केबा याय 13/107
कि-कारणे लीला,-इहा 15/22 | कृष्णनाम-सह यैछे प्रभुर 17/325 | के वर्णिते पारे, ताहा 13/44
किछुमात्र करि' कहि' 12/77 | कृष्णनामे भासाइल 13/30 | केवल ए गण-प्रति 12/71
किन्तु ताँर दैवे किछु 12/32 | कृष्ण देखि' गोपी कहे 17/286 | केवल नीलाचले प्रभुर 10/123
किन्तु सर्वलोक देखि' 13/67 | "कृष्णनाम ना लओ केने 17/249 | 'केवल'-शब्दे पुनरपि 17/24
कि पण्डित, कि तपस्वी 12/72 | कृष्ण नाहि माने, ताते 8/9 | केशव भारती आइला 17/268
278 | श्रीचैतन्यचरितामृत

केशव-गोसाञिदास ]
केशव भारती, आर 13/54
केह करिवारे नारे 10/5
केह कीर्त्तन ना करिह 17/127
केह केह-कृष्णदास 17/198
केह गड़ागड़ि याय, केह 9/50
केह त' आचार्येर आज्ञाय 12/9
केह पाय, केह ना पाय 9/35
केह-हरिदास, सदा बले 17/199
कैशोर-लीलार सूत्र करिल 17/3
कोटिजन्म एइ मते कीड़ाय 17/51
कोटि जन्म हबे तोर 17/52
कौटिल्य-मात्सर्य-हिंसा 8/56
कोन कन्या पलाइल नैवेद्य 14/57
“कोन किछु जाने, किबा 14/59
कोन पाके सेइ पत्री 12/30
कोन वाञ्छा पूरण लागि' 13/52
कोन् बले कर तुमि 17/154
कोन् वा मानुष हय 17/256
क्रन्दनेर छले बलाइल 14/22
क्रमे आमि कहि, शुन, 16/॥54
क्रु
क्रु
क्रोधावेशे प्रभु तारे कैल 17/67
क्रोधावेशे बले तारे तर्ज्जन 17/50
क्रोधे कन्यागण कहे, 14/52
क्रोधे सन्ध्याकाले काजी एक 17/125
क्ष
क्षुधा लागे यबे, तबे 14/34
ख
खइ-सन्देश-अन्न, यतेक 14/28
खण्डवासी मुकुन्ददास, 10/78
खण्डिबे संसार-दुःख 8/43
खण्डिल ताहार चित्ते सब 17/65
खण्डिलेक दुःख-शोक 13/107
खाड़या नैवेद्य तारे इष्टवर 14/60
खाइया हउक् लोक 9/39
खाटे बसि' प्रभु कैल 17/11
खाटे बसि' भक्तगणे दिल 17/242
खोला-बेचा श्रीधर प्रभुर 10/67
ग
गङ्गाजल-पात्र आनि' 17/116
'गङ्गाते कमल जन्मे' 16/79
गङ्गादास पण्डित, गुप्त 13/61
गङ्गादास पण्डित-स्थाने 15/5
गङ्गा-दुर्गा-दासी मोर 14/50
गङ्गाघाटे वृक्षतले रहे 17/47
गङ्गामन्त्री, मामु ठाकुर 12/80
'गङ्गार महत्त्व'-श्लोके 16/56
गङ्गार महत्त्व-साध्य 16/83
गङ्गास्नान कर याइ' 14/74
गङ्गास्नान करि' पूजा 14/49
गङ्गारे वन्दन करि' 16/29
गणिते लागिला सर्वज्ञ 17/104
गणि' ध्याने देखे सर्वज्ञ 17/105
गदाधर, जगदानन्द, शङ्कर 10/125
गदाधर दास गोपीभावे 11/17
गम्भीर चैतन्य-लीला के 14/70
गया हैते आसिया चालाय 17/206
गरुड़ पण्डित लय श्रीनाम 10/75
गार्हस्थ्ये प्रभुर लीला-'आदि' 13/14
गीता-भागवत कहे आचार्य 13/64
गुण्डिचा-मन्दिरे महाप्रभुर 12/20
गुप्ते बोलाइल नीलाम्बर 14/12
गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल 10/140
गृहस्थ हइया करि पितृ 15/20
गृहस्थ हइलाम, एबे चाहि 15/25
गृहिणी बिना गृहधर्म ना 15/26
गृहे दुइ जन देखि' 14/7
गो-अङ्गे यत लोम, तत 17/166
गोपगृहे जन्म छिल, गाभीर 17/111
गोप-वेश, त्रिभङ्गिम, मुरली 17/279
गोपाल आचार्य आर विप्र 10/114
गोपाल गोविन्द राम 17/122
गोपिका-भावेरे एइ 17/278
गोपिकार भाव नाहि याय 17/280
गोपीगण देखि' कृष्णेर 17/285
'गोपी' 'गोपी' नाम लय 17/247
'गोपी' 'गोपी' नाम शुनि' 17/248
'गोपी' 'गोपी' बलिले 17/249
गोपीनाथ सिंह-एक चैतन्येर 10/76
गोपी-भाव याते प्रभु 17/277
गोवर्धने त्यजिब देह भृगुपात 10/94
गोविन्द, माधव, वासुदेव 10/115
गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द 11/51
गोविन्देर आज्ञाय सेवा 10/144
गोविन्देर प्रियसेवक ताँर 8/66
गोविन्देर सङ्गे सेवा करे 10/143
गोविन्देरे आज्ञा दिल, - 'इँहा 12/36
गोसाञिदास आनि' माला 8/76
पद्य सूची | 279

[ गोसाञिदास-चौद्दशत

गोसाञिदास पूजारी करे8/74चक्रवर्त्ती शिवानन्द सदा12/87चैतन्य-नित्यानन्दे नाहि8/31
गौड़देश-भक्तेर कैल संक्षेप10/121चतुर्थ-चरणे चारि 'भ'16/75चैतन्य-पार्षद-श्रीआचार्य10/30
गौड़े पूर्वे भृत्य प्रभुर प्रिय10/149चतुर्थे कहिलुँ जन्मेर् 'मूल'17/317चैतन्यभक्ति-मण्डपे11/10
गौरकथा बिना ताँर8/68चतुर्द्दशे 'बाल्यलीला'र17/326चैतन्य-मङ्गल' यँहो11/54
गौरचन्द्र-बले लोक प्रश्रय17/140चतुर्भुज मूर्त्ति करि'17/286चैतन्यमङ्गल सुने यदि8/38
गौरचन्द्र बिना नाहि10/11चतुर्विध भक्त-भाव करे17/275चैतन्यमङ्गले' कैल विस्तारित15/7
गौरप्रभु दयामय, ताँरे13/122चन्द्रशेखर-गृहे कैल10/154'चैतन्यमङ्गले' सर्वलोके15/33
गौरलीलामृत-सिन्धु-अपार12/93चन्द्रशेखर वैद्य, आर10/152चैतन्य-महिमा याते जानिबे8/33
'गौरहरि' बलि' तारे हासे13/25चब्बिश वत्सर ऐछे13/33चैतन्यमालीर कहि लीला12/92
गौराङ्गेर शेषलीला वर्णिवार8/65चब्बिश वत्सर छिला करिया13/34चैतन्य-मालीर कृपाजलेर12/5
ग्रन्थ-बाहुल्येर भये नारि12/55चब्बिश वत्सर प्रभु कैल13/10चैतन्य-रहित देह-शुष्क12/70
ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला13/49चब्बिश वत्सर शेषे करिया13/11चैतन्य-लीलाते व्यास11/55
“ग्राम-सम्बन्धे आमि तोमार17/48चमत्कार हैया लोक13/93चैतन्यलीलाते 'व्यास'-वृन्दावन8/82
ग्राम-सम्बन्धे चक्रवर्त्ती हय17/148चरणेर धूलि सेइ लय17/244चैतन्य-लीलार व्यास8/34
ग्राम-सम्बन्धे हओ तुमि आमा14/52चलिते चरणे नूपुर बाजे14/78चैतन्य-लीलार व्यास,-दास13/48
ग्रामेर ठाकुर तुमि, सब17/213चुरि करि' द्रव्य खाय14/40चैतन्य-विमुख येइ, तार12/72
चैतन्य-गोसाञि बैसे12/18चैतन्य-विमुख येइ सेइ12/71
“चैतन्य गोसाञिर गुरु12/14चैतन्येर शेष-लीला8/48
चैतन्य-गोसाञिर भक्त रहे11/13चारि दण्ड निद्रा, सेइ10/102
घचैतन्य-गोसाञिर यत10/4चारि भाइर दास-दासी10/9
चैतन्य-गोसाञिर लीला16/110चिकित्सा करेन यारे10/51
घटी एके शत श्लोक16/36चैतन्यचन्द्रेर लीला अनन्त8/46चिह्न देखि' चक्रवर्त्ती14/13
घरे आइला प्रभु बहु16/23चैतन्य-चरण बिनु नाहि10/52चित्र भाव, चित्र गुण17/306
घरे गया सब लोक17/131चैतन्यचरण बिनु नाहि10/36चित्रवर्ण पट्टसाड़ी13/113
घरे घरे सङ्कीर्त्तन करिते17/121चैतन्य-चरिते ताँर8/61चिरकालेर पड़ुया जिने15/6
घरे पाठाइया देय धन13/82चैतन्यचरिते तैँहो अति8/67चोरे लञा गेल प्रभुके14/38
घरे बसि' चिन्तेन ता'17/259चैतन्य-चापल्य देखि' प्रेमे14/71चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य12/16
चैतन्यदास, रामदास, आर10/62चौद्दशत छय शके शेष13/80
चचैतन्य ना मानिले तैछे8/9चौद्दशत पञ्चान्ने हइल13/9
चैतन्य-निताइर याते8/36चौद्दशत सात शके जन्मेर्13/9
चैतन्य-नित्यानन्द गाय11/11चौद्दशत सात शके13/89
चक्रपाणि आचार्य, आर12/58चैतन्य-नित्यानन्द भज8/13
चैतन्य-नित्यानन्दे ताँर8/61

280 | श्रीचैतन्यचरितामृत