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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ शुइ-सिद्ध ] पद्य सूची 521
शुइया रहिला घरे कपाट 12/120 षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम 7/21 सबे एइ आस्वाद कर करि' 16/114
शुकाञा मैलेह कारे पानी 20/23 षोडशोपचार-पूजाय तत सुख 6/302 सब-लोके निस्तारिला जङ्गम 5/153
शुद्ध कृपा कर, गोसाञि 9/139 सबे कृपा करि' इँहारे 1/199
'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्ध 7/39 स सबे कृष्ण भजन करे 13/133
'शुद्धवैष्णव' नहे, वैष्णवेर प्राय' 6/198 सबे गाय,—“जय जय 11/99
'शुद्धभक्ति' देह' मोरे, कृष्ण 20/30 सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण 20/9 सबे चारि-दण्ड आहार 6/310
शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन 7/30 सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार 20/13 सबे देखि—हय मोर कृष्ण 14/78
शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध 7/30 संख्या-कीर्त्तन पूरे नाहि 11/19 सबे रामानन्द जाने, ताँर 5/7
शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय 19/111 संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् 3/113 समुद्रेर मध्ये येन एक 20/81
शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित 12/31 संख्या-नाम पूर्ण मोर 7/79 सर्वज्ञ, कृपालु तुमि—ईश्वर 4/74
शुनिया आनन्द हैल रघुनाथेर 6/51 संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ 3/238 सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा 6/125
शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते 12/21 संख्या लागि' दुइ-हाते 9/57 सर्वनाश हबे तोर, ना हबे 3/200
शुष्क-ब्रह्मते नाहि कृष्णेर 8/25 सकल जगते हय उच्च 3/71 सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण 11/54
श्रद्धा करि' एइ लीला 5/163 सकल मङ्गल ताहे, खण्डे 4/44 सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य 17/69
श्रद्धा करि' शुन इहा, शुनिते 19/110 सखि हे, कृष्णगन्ध जगत् 19/93 सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार 2/3
श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्य 11/107 सचेतन रहु दूरे, अचेतन 16/124 सर्व-लोक निन्दा करे 8/25
श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय 20/26 सत्कुल-विप्र नहे भजनेर 4/66 सर्वशक्ति नामे दिला करिया 20/19
श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु देशे देशे 5/153 सनातन ग्रन्थ कैला 4/219 सर्वशास्त्रे कृष्णभक्त्ये नाहि 7/18
श्रीकृष्णचैतन्य-लीला—अमृतेर 5/162 सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि 4/55 सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर 20/11
'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते 11/56 सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्त 5/86 'सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति 7/42
श्रीचैतन्यचरितामृत—नित्य 19/111 सनातनेर क्लेदे आमार घृणा 4/187 'सहज' धर्म कहे तैं हो 8/82
श्रीचैतन्यलीला एइ—अमृतेर 5/88 संन्यास करिया सदा सेवेन 19/14 सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र 8/49
श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु 7/130 संन्यासी, पण्डितगणेर करिते 5/84 सहस्र-वदने यबे कहये 18/13
श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 7/128 संन्यासी विरक्त तोमार का 9/68 सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे 9/57
श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका 7/128 संन्यासी मानुष आमार भूमिते 13/15 सहिते ना पारे प्रभु, मने 5/97
श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' 7/129 संन्यासीर तबे सिद्ध हय 8/64 सात्त्विक-सेवा एइ—शुद्धभावे 6/296
श्रीधरानुगत कर भागवत 7/132 संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय 8/62 साधक ना पाय ता'ते 4/60
श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव 2/34 संन्यासीरे एत खाओयाञा 8/14 'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' 3/264
श्रीभागवत-शास्त्र—ताहाते 5/44 संन्यासी हञा करे मिष्टान्न 8/42 सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार 6/312
श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय 20/99 सब जीव प्रेमे भासे 3/252 सामान्य भाग्य हैते तार 16/99
श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते 19/107 सब त्यजि' भजि याँरे 19/51 साहजिक प्रेमधर्म 1/149
श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम 5/87 सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद 6/144 सिंहद्वारे आसिं प्रभु पसारिर 11/73
श्रोतार पदरेणु करौं मस्तक 20/152 सब मुक्त करि' तुमि 3/78 सिंहद्वारे भिक्षा-वृत्ति—वेश्यार 6/284
षड्दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम 7/21 सब लोक मान्य करि' 7/131 सिद्ध-देह तुमि, साधने 11/24

522 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला सिद्ध-स्वपन ]
सिद्धदेह-तुल्य, ताते 5/51 | सेइ ठाकुर धन्य तारे 4/47 | सेइ हय 'पुरुषोत्तम' 5/144
सिद्धान्तविरुद्ध शुनिते ना 5/102 | सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर 20/9 | से कार्य कराइबे तोमा 4/95
सिद्धान्तसार ग्रन्थ कैला 4/220 | सेइ दश दशा हय प्रभुर 14/52 | सेकाले ए दुइ रहेन 14/8
“सुकृति-लभ्य फेला-लव” 16/96 | सेइ दशा कहेन भक्त 18/78 | से फेलार एक लव 16/131
'सुकृति'-शब्दे कहे 16/100 | सेइ देह करे तार 4/193 | 'सेवा' लागि' कोटि 'अपराध' 10/96
सुख करि' माने विषय-विषे 6/197 | सेइद्वारा आर सब लोके 7/163 | सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' 2/95
सुदृढ़ सरलभावे आमारे 7/158 | सेइ प्रभु धन्य, ये ना 4/46 | से यैछे तृष्णाय पिये 20/90
सुस्थ हओ, हरिदास बलि' 11/21 | सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष-चैतन्य 8/34 | स्तम्भिल सूर्येर गति 20/57
सूक्ष्मजीवे पुनः कर्मे उद्बुद्ध 3/78 | सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते 3/143 | “स्त्री-गान” बलि' गोविन्द 13/83
सेइ अपराधे इँहार 'वासना' 8/24 | सेइ बुझे, गौरचन्द्रे याँर 7/165 | स्त्री-नाम शुनि' प्रभुर 13/84
सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत 3/219 | सेइ बुझे, ताँर पदे याँर 9/151 | स्त्री, पुरुष, के गाय 13/80
सेइ कर्म कराय, याते हय 6/199 | सेइ व्याख्या करेन याँहा 7/110 | 'स्थिर'-'चर' जीवेर 3/75
सेइ कर्म निरन्तर इँहार 8/75 | सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान 16/130 | स्नान, दर्शन, भोजन देह 15/6
से कार्य कराइबे तोमा 4/95 | सेइ भक्त धन्य, ये ना 4/46 | “स्वकर्मफलभुक् पुमान्” 2/163
सेइकाले कृष्ण तारे करे 4/192 | सेइ भावे आपनाके हय 14/14 | स्वतन्त्र ईश्वर तुमि हओ 11/29
सेइकाले देवदासी लागिला 13/78 | सेइ माने,-'कृष्णे मोर नाहि 20/28 | स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा,-कैला 11/94
सेइ कुण्डल काणे परि' 14/44 | सेइ याँर हय, 'फेला' पाय 16/100 | स्व-निमित्त 'अपराधाभासें' 10/96
सेइ कृपा 'कारण' हैल 3/169 | सेइ हैते अभ्यन्तरे ना 6/155 | स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री 2/144

[ स्व-हेन पद्य सूची 523
स्वभक्तेर गाढ़-अनुराग 2/168 | हरिदास आछिल पृथिवीर 11/97 | 'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ कैला 4/221
स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य 2/67 | हरिदास कहे, — “आजि करिमु 11/18 | 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' करि' 16/7
स्वरूप कहे, — “ऐछे अमृत 6/320 | हरिदास कहेन, — “केने करह 3/193 | हर्षे प्रभु कहेन, — “शुन, स्वरूप 20/8
स्वरूप कहे, — “तथापि मायावाद 2/98 | हरिदास कहेन, — “नामेर एइ 3/177 | हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे 20/93
स्वरूप कहे, — “सिंहद्वारे 6/283 | हरिदास कहेन, — “यैछे सूर्येर 3/182 | 'हा राम, हा राम' बलि' 3/53
स्वरूप गोसाञि, आर राय 2/106 | हरिदास कृपा करेन ताँहार 3/169 | हासे, कान्दे, नाचे, गाय 18/44
स्वरूप-गोसाञि तारे पुछेन 18/45 | हरिदास ठाकुर—महाभागवत 7/46 | हाहा कृष्ण प्राणधन, हाहा 17/60
स्वरूप, देह, —चिदानन्द 5/122 | हरिदास ठाकुरे तुजि कैलि 3/200 | हा हा कृष्ण प्राणनाथ 12/5
स्वरूप— 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ 14/10 | हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवे 11/74 | हाहा श्यामसुन्दर, हाहा 17/60
'स्वरूपेर रघु' — आजि हैते 6/203 | हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य 5/86 | हित-निमित्त आइलाङ आमि 4/140
स्वरूपेर सङ्गे पाइलूँ ए 7/45 | हरिदासे दिते गेला आनन्दित 11/16 | हुङ्कार करिया प्रभु तबहिँ 18/75
स्वहस्ते करेन मलमूत्रादि 8/26 | हरिदासेर अपराधे हैल असुर 3/145 | हृदय-उपरे धरौं, सेवा 20/58
स्वामी-आज्ञा पाले, —एइ 7/102 | हरिदासेर इच्छा यबे हइल 11/95 | हृदये धरिमु तोमार कमल 11/33
स्मरणेर काले गले परेन 6/290 | हरिदासेर कृपापात्र, ताते 3/166 | हृद्रोग-काम ताँर तत्काले 5/46
हरिदासेर कैल तेंह चरण 4/14 | हेनकाले 'गोपाल-वल्लभ'-भोग 16/88
ह | हरिदासेर पादोदक पिये भक्त 11/65 | हेन-चरण स्पर्श पाइल 12/29
हरिदासे समुद्र-जले स्नान 11/64 | हेन वंशे घृणा छाड़ि' 4/29
हंस-मध्ये बक येन किछु 5/129 | 'हरिबोल' 'हरिबोल' बलेन 11/68 | हेन 'रस' पान मोरे 5/76

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शब्दकोश
अ
अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान
अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी
सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली
अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो
अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके
अच्युत—जो च्युत नहीं हो
अज—अजन्मा
अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली
स्तनके जैसी चीज
अज्ञ—ज्ञानरहित
अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक,
जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म
हो जाता है
अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका
उल्लङ्घन
अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया
हुआ
अतिशय—अत्यधिक
अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर
कहना
अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
अत्युत्तम—अति उत्तम
अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात
अधिदैव—आराध्य देवता
अधिरूढ़—बढ़ा हुआ
अधिष्ठान—आधार, आश्रय
अनभिज्ञ—न जाननेवाला
अनवरत—निरन्तर
अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य
अनुक्षण—निरन्तर
अनुगत—अनुगामी, अधीन
अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन
अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य
अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न
अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना
अन्तर्भूत—अन्तर्गत
अन्त्य—अन्तका, आखिरी
अन्यतम—बहुतोंने से एक, सर्वश्रेष्ठ
अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध,
मेल
अन्वेषण—खोज, ढूँढना
अपकार—अहित
अपटुता—अकुशलता
अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो
अपरिमित—अगणित, अनगिनत
अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण
अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा
अप्राकट्य—अप्रकट होना
अप्राकृत—अलौकिक
अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न
भोगा जा रहा हो
अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध,
प्रसङ्गके विरुद्ध
अबाध—बाधारहित
अभयत्व—अभयता
अभिज्ञ—जाननेवाला
अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली
शब्द शक्ति
अभिधान—शब्दकोष
अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय

526 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला अभि-ईशि ]
अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य
अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत
अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना
अभिव्यक्ति-प्रकट करना
अभिसन्धि-जोड़, समझौता
अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना
अभिहित-कहा हुआ
अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर
अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया
अभ्युदय-उदय
अमित-अत्यधिक
अरण्य-वन
अवगत-जाना हुआ
अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ
अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना
अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट
अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना,
निश्चय करना
अवयव-अङ्ग, अंश
अवरुद्ध-रुका हुआ
अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना
अवलोकन-देखना
अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष
अवस्थान-रहना, अवस्थिति
अविचिन्त्य-अचिन्त्य
अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न
तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट
अव्यय-अविकारी
अव्याकृत-अव्यक्त
अशेष-सम्पूर्ण
अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ
असङ्ग-आसक्तिहीन
असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित
असङ्गति-मेलका ना होना
असंस्कृत-संस्कारहीन
असमोर्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर
कोई नहीं हो
असार-सारहीन
असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ
आख्यायिका-कहानी
आच्छन्न-ढका हुआ
आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी
आत्मसात्-अपने अधिकारमें
आत्यन्तिक-असीम
आदित्य-सूर्य
आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान
रखना
आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत
आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त
आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी
आपाततः-अचानक, अन्तमें
आप्त-पूर्ण, कुशल
आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश
आयुध-अस्त्र
आरूढ़-आसीन
आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना
आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा
आर्ष-ऋषियोंका
आलोचना-गुण-दोष निरूपण
आलोच्य-आलोचना योग्य
आह्लादित-आनन्दित
इ
इति-इस प्रकार, समाप्ति
इहलोक-यह लोक
ई
ईक्षण-दृष्टिपात
ईशिता-ईश्वरत्व

[ उच्छि-छन्द शब्दकोश 527
उ
उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त
उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ
उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित
उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ
उद्यत—तैयार
उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती
उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता
उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास
उपशम—विराग, विरक्ति
उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ
उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग
उपार्जित—कमाया हुआ
उपादान—साधन-सामग्री
उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी
उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव
उरु—विस्तृत, महान
उरुक्रम—विष्णु
उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका
स्तुतिगान किया गया हो
ए
एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे,
एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो
ऐ
ऐहिक—सांसारिक
औ
औत्सुक्य—उत्सुकता
औद्धत्य—उद्धतता, अख्खड़पन
औपाधिक—उपाधियुक्त
क
कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य
कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त
कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन
कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष
काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया
जानेवाला कर्म
कैतव—छल, धोखा
केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति
कैङ्कर्य—दासत्व
कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति
कौतूहलवश—उत्सुकतावश
क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत
क्लान्त—थका हुआ, क्षीण
क्ष
क्षिति—पृथ्वी
क्षेत्र—शरीर
क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा
परमात्मा
क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता
ग
ग्रथित—गूँथा हुआ
ग्रन्थि—गाँठ
ग्रास—आहार
ग्रीवा—गर्दन
घ
घ्राण—गन्ध, सूँघनेकी शक्ति
च
चित्तगुहा—हृदयरूपी कन्दरा
चित्-शक्ति—भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति
चिदालोचना—चित्-वस्तुकी आलोचना
चिन्तामल—चिन्तारूपी मल
चिन्मयत्व—चिन्मयता
चैतन्यत्व—चेतनता
चैतन्यनिष्ठ—चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है
चैतन्यहीन—चेतनारहित
छ
छन्दविद्या—अठारह विद्याओंमें एक

528 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला जर्ज–नैति ]
ज
जर्जरित—जो जर्जर हो गया हो
त
तत्त्वज्ञान—तत्त्ववस्तुका ज्ञान
तत्त्वतः—यथार्थतः
तत्त्वविद्—तत्त्वको जाननेवाला
तदीय—भगवत्-सम्बन्धी
तनय—पुत्र
तन्मय—तल्लीन
तादात्म्य—दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न
होनेका स्वभाव
तारतम्य—दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका
भाव
तिर्यग्—पशु-पक्षी
तैलधारावत्—तैलकी भाँति धारावाला
त्रिगुणातीत—तीनों गुणोंसे अतीत
त्रिवर्ग—धर्म, अर्थ और काम
द
दिक्पाल—दश दिशाओंके रक्षक देवता
दुर्ज्ञेय, दुर्बोध—कठिनाईसे जानने योग्य
दुर्निगृहीत—कठिनाईसे वशमें लाया हुआ
दुर्निवारित—कठिनाईसे निवारण किया हुआ
दुरुह—कठिन
दुस्त्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
देदीप्यमान—चकमता-दमकता हुआ
देहाध्यास—देहमें मिथ्या अभिमान
द्रव्यमययज्ञ—द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ
द्विजवर—ब्राह्मणश्रेष्ठ
द्वैतभाव—दो होनेका भाव
ध
धूसरित—धूलसे भरा हुआ
ध्वनित होना—पता चलना
न
नराकृति—मनुष्यके समान आकृति
नामाभास—नामका आभास
निःशक्तिक—शक्तिरहित
निःश्वास—प्राणवायु या साँसका बाहर
निकलना
निःसृत—निकला हुआ
निकृष्ट—तुच्छ
निकेतन—घर
निक्षेप करना—फेंकना
निगृहीत—निग्रह किया हुआ
निग्रह—संयम
निन्तान्त—अत्यन्त, एकदम
निमज्जित—डूबा हुआ, स्नात
नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य
निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित
निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं
निर्गत—बाहर निकला हुआ
निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत
निर्दिष्ट—निर्देशित
निर्वाण—मोक्ष
निर्विकल्प—विकल्पसे रहित
निर्विवाद—बिना विवादका
निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ
निरूपक—निरूपण करनेवाला
निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा
देना
निशा—रात्रि
निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म
निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है
निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की
सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद)
निस्तारक—निस्तार करनेवाला
निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत
निहत—मारा हुआ
नीलमणि—नीलम
नैतिक—नीति-सम्बन्धी

[ नैमि-प्राकृ शब्दकोश 529

नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न
नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव
नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता
प
पक्षान्तर—दूसरी ओर
पन्था—पथ
परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात
परिनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला
परदार—दूसरेकी स्त्री
परवर्ती—बादमें
पराक्रान्त—शक्तिशाली
परिग्रह—ग्रहण
पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति
पराभूत—पराजित
परिचर्या—सेवा
परिचालक—चलानेवाला
परिदृष्ट—दृष्ट
परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण
परिमित—सीमित
परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ
परिव्राजक—संन्यासी
परिवेष्टित—घिरा हुआ
पर्यन्त—तक
पर्यवसित—समाप्त
पाण्डित्य—विद्वता
पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी
पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी
पार्षद—परिकर
पाषण्डी—पाखण्डी
पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न
पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग
प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग
प्रकृत—यथार्थ
प्रकृष्ट—उत्तम
प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ

प्रच्छन्न—ढका हुआ
प्रजल्प—इधर-उधरकी बात
प्रज्ञा—बुद्धि
प्रणयन—रचना, निर्माण
प्रणत—शरणागत
प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले
प्रणति—प्रणाम, शरणागति
प्रताड़ित—सताया गया
प्रतिपादित—प्रमाणित
प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय
प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात
प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति
हो रही हो
प्रत्यगात्मा—जीवात्मा
प्रत्यवाय—दोष
प्रत्याहार—निरोध, रोकना
प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई
प्रदत्त—दिया हुआ
प्रधान—मायाकी एक वृत्ति
प्रधानतः—मुख्यरूपसे
प्रपत्ति—शरणागति
प्रभूत—अत्यधिक
प्रभृति—जैसा
प्रयोजनीयता—आवश्यकता
प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला
प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव
प्रवर—श्रेष्ठ
प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ
करनेवाला
प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव,
प्रभाव
प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य
प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा
प्रशामक—शान्त करनेवाला
प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी

530 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला प्राक्त-विक्षि ]
प्राक्तन-प्राचीन
प्रादुर्भूत-आविर्भूत, अवतरित
प्रादेशिक वाक्य-प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य
प्रापक-प्राप्त करने या करानेवाला
प्रापञ्चिक-जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी
प्राप्य-प्राप्त होने योग्य
प्रार्थित-प्रार्थना किया हुआ
प्रेमास्पद-प्रेमका स्थल
प्रेमोत्कर्ष-प्रेमका उत्कर्ष
ब
बाहुल्य-अधिकता
बाह्य अङ्ग-बाहरी अङ्ग
बहिर्वास-शरीरके ऊपरी भागको लपेटनेवाला
वस्त्र
बिद्ध-छेदा हुआ, आहत
बृहत्-बड़ा
बोधगम्य-समझमें आने योग्य
ब्रह्मलय-ब्रह्ममें लय होना
ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मको जाननेवाला
ब्रह्मानन्द-ब्रह्मका आनन्द
ब्रह्मानुभूति-ब्रह्मकी अनुभूति
भ
भक्तानन्दायिनी-भक्तोंको आनन्द देनेवाली
भोक्तृत्वभाव-भोक्ता होनेका भाव
म
मत्सम्बन्धी-मेरे सम्बन्धी
मत्सरता-डाह, जलन, द्वेष
मथन-मथनेका भाव
मधुरिमा-माधुर्य
मन्वन्तर-ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग
मन्तव्य-विचार, मत
मर्मार्थ-सार
महत्-बड़ा
मायाच्छन्न-मायाके द्वारा आच्छन्न
मुकुलित-आधा विकसित
मुमुक्षु-मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त-मेधावी
मोहान्ध-मोहसे अन्धा
म्लेच्छ-चारो वर्णोंसे भी नीच
य
यतिगण-संन्यासी लोग
याग-यज्ञ
यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक
युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण
युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ
युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार
योगमाया-भगवान्‌की परा शक्ति
योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता
र
रक्तिम-लालिमायुक्त
रञ्जित-रंगा हुआ
रूक्ष-रूखा, नीरस
ल
लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर
लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा
लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित
लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला
लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये
व
वञ्चक-वञ्चना करनेवाला
वयस-उम्र
वर्चस्व-अधिकार
वर्णविशिष्ट-वर्णवाला
वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न
वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय
वाचाल-अधिक बोलनेवाला
वागिन्द्रिय-जिह्वा
विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न

[ विगु-साम्य शब्दकोश 531
विगुण—गुणहीन
विच्युति—भूल, पतन, वियोग
विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है
विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला
विदित—मालूम
विधर्म—धर्मविरुद्ध
विधिवादिगण—नैतिक लोग
विधेय—करने योग्य
विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो
विन्यास—व्यवस्थित करना
विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता
विभूति—ऐश्वर्य
विरहकातर—विरहसे कातर
विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना
विलास—क्रीड़ा
विवक्षित—इच्छित, कथित
विवृत—स्पष्ट, व्यक्त
विशारद—निपुण
विशिष्ट—विशेषतायुक्त
विशिष्टता—विशेषता
विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है
विशेषत्व—विशेषता
विषयणी—विषयसे सम्बन्धित
विहित—आदेश किया हुआ
वृष्टि—वर्षा
वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला
वैषम्य—विषमता
व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग
हो
व्यतिक्रम—उल्लङ्घन
व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध
व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ
व्योम—आकाश
श
शोच्य—शोचनीय
शैव—शिवके उपासक
श्रुत—सुना हुआ
श्रोतव्य—सुनने योग्य
श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात
ष
षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण
स
सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव
संवरण—छिपाना
संवेदन—अनुभूति
संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श
संहर्त्ता—संहार करनेवाला
सङ्गति—मेल
सञ्चित—जमा किया हुआ
सदातन—विष्णु
सद्विवेकी—सद् विवेकवाला
समत्वभाव—समताका भाव
सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र
समाहर—समुच्चय, समूह
समाहित—संयमित, व्यवस्थित
सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला
सम्मत—सहमत, एक मत
समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध
सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह
सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त
सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे
सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात्
परमात्मा
सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला
सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता
सहस्र—हजार
साम—सामवेद
सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान्
साम्यलक्षण—समानताका लक्षण

532 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला सार-हृद ]
सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा
सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ स्फुरण—व्यक्त होना
एक ही लोकमें वास करना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी
साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी
हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, स्थायित्व—स्थिरता
वचन और मन) स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी
सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला स्वच्छन्द—स्वतन्त्र
सुदुराचारी—अति दुराचारी स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित
सुधा—अमृत स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न
सुरस—रसयुक्त स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण
सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह ह
सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट हत—मरा हुआ
सौम्य—सुन्दर, कोमल हतभागा—भाग्यहीन
स्खलित—गिरा हुआ हन्त—मारना
स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा
स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता हेयता—तुच्छता
स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना हृदगत—हृदय-सम्बन्धी