श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
आठवाँ अध्याय 8/266-283 ]
अमृतप्रवाह भाष्य-रसराजरूप श्रीकृष्ण और
महाभावरूपा श्रीमती राधिका-दोनों मिलकर जो एकतत्त्व
हैं, वही स्वरूप दिखलाया-अर्थात् 'राधाभावद्युतिसुवलित
श्रीकृष्णस्वरूप' दिखलाया। इससे एक-तत्त्वमें दो और
दोनों-तत्त्व ही एक हैं, ऐसा एक अपूर्व स्वरूप
दिखलाया। जो श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीराधाकृष्ण-तत्त्व
जाननेमें समर्थ होते हैं, वे ही श्रीस्वरूप गोस्वामीकी
कृपासे उस नित्य स्वरूपकी सेवा कर पाते हैं॥ 281 ॥
श्रीरायकी आनन्द-मूर्च्छा :-
देखि' रामानन्द हैला आनन्दे मूर्च्छिते।
धरिते ना पारे देह, पड़िला भूमिते ॥ 282 ॥
चेतनता प्राप्त होनेपर महाप्रभुके
संन्यास वेशके दर्शनसे विस्मय :-
प्रभु ताँरे हस्त स्पर्शि' कराइला चेतन।
संन्यासीर वेष देखि' विस्मित हैल मन ॥ 283 ॥
अनुवाद-इस अपूर्व स्वरूपको देखते ही श्रीरामानन्द
अत्यधिक आनन्दसे मूर्च्छित हो गये, देहको सम्भाल न
पाये और भूमिपर गिर पड़े। महाप्रभुने उनको अपने
हस्तकमलोंसे स्पर्शकर उन्हें चेतन किया। चेतनावस्था
आनेपर पुनः उनका संन्यासीका वेश देखकर उनका
मन विस्मित हो गया ॥ 282-283 ॥
अमृताणुकणिका-“श्रीराय रामानन्द व्रजलीलामें विशाखा
सखी हैं। उन्होंने श्रीकृष्णको भी देखा है और
श्रीराधाको भी, किन्तु दोनों मिलकर एक हो गये और
कैसे श्यामकन्ति गौरकान्तिसे आवृत हो गयी-यह
इससे पूर्व उन्होंने नहीं देखा था। जिस वस्तुका प्रभाव
अधिक होता है, वही दूसरी वस्तुको आवृत कर सकती
है। श्रीराधा शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान्। शक्ति ही
शक्तिमान्को प्रकाशित करती है। इस अद्भुत मिलनसे
नीलमणि श्यामकन्ति स्वर्णकान्तिसे ढककर एक अद्भुत
कान्ति बन गयी।
अभी तक योगमायाके प्रभावसे महाप्रभुका स्वरूप
आच्छादित था। महाप्रभुकी कृपासे योगमाया तनिक-सी
हटी और श्रीराय रामानन्दने इस मिलित स्वरूपके दर्शन
किये। अब वे महाप्रभुके वार्त्तालाप और प्रश्न करनेकी
चतुरायीसे समझ गये कि ये अन्य कोई नहीं, स्वयं
श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण अत्यन्त चतुर हैं, किन्तु उनके
भक्त उनसे अधिक चतुर होते हैं। श्रीकृष्णने महाप्रभुके
संन्यासी स्वरूपमें स्वयंको छिपानेकी बहुत चेष्टा की,
परन्तु केवल वर्ण-कान्ति परिवर्तित होनेसे स्वरूप
परिवर्तित नहीं होता। श्रीराय रामानन्द अथवा विशाखा
सखीके समान श्रीकृष्णके अन्तरङ्ग परिकर उन्हें किसी
भी रूपमें पहचान लेते हैं। इसलिये श्रीराय रामानन्दने
कहा-'प्रभो! अब अपनी कपटता त्याग दीजिये और
इसका रहस्य मुझे बतलाइये।' महाप्रभु मुस्कुरा दिये कि
अब ये मेरे भावको समझ गये हैं और मेरी चोरीका
भेद खुल गया है। परन्तु फिर भी अपनेको गोपन
रखनेका प्रयास करते हुए वे कहने लगे- 'मैं तो ब्राह्मण
संन्यासी ही हूँ। तुम्हारी श्रीकृष्णके प्रति अगाध निष्ठा
है, इसलिये तुम सर्वत्र श्रीकृष्णको ही देख रहे हो।
महाभागवतका यही स्वभाव है कि उन्हें स्थावर-जङ्गम-
सभी वस्तुओंमें अपने इष्टदेवकी स्फूर्ति होती है।'
तब श्रीराय रामानन्दने कहा-'प्रभो! अब आप
अपनी इस चतुरायीको आप छोड़ दीजिये। मैं आपके
स्वरूपको पहचान गया हूँ। आप तो मेरा उद्धार करने
आये हैं, फिर कपटता क्यों कर रहे हैं? मैं जान गया
हूँ कि कृष्णरूपमें आपकी रसास्वादनकी इच्छा पूर्ण नहीं
हुई थी, इसलिये आपने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रेयसी श्रीराधाके
प्रेमकी महिमा और उस प्रेमके द्वारा आपके माधुर्यके
रसास्वानकी सीमाको अनुभव करनेके लिये उनके
मादनाख्य महाभावको चोरी किया है। इस भावके साथ
उनकी स्वर्ण-कान्तिका अटूट सम्बन्ध है, इसलिये
आपका वर्ण भी परिवर्तित हो गया। अब आप कपट
व्यवहार त्यागकर अपने स्वरूपको प्रकट कीजिये।'
महाप्रभु हँस दिये और उन्होंने श्रीराय रामानन्दको
अपने रसराज-महाभावके सम्मिलित स्वरूपके दर्शन
करवाये। श्रीराय रामानन्दने श्रीकृष्णको भी देखा है
। 331
[ 8/266–288 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और श्रीराधाको भी। परन्तु जब महाभाव-स्वरूपा
श्रीराधा और रसराज-स्वरूप श्रीकृष्णको एक रूपमें
देखा, तब उनके हृदयमें भावकी प्रबल तरङ्गें उठने
लगीं, जिनके आवेशमें वे अपनेको सम्भाल न सके
और मूर्च्छित हो गये। सुन्दर श्यामवर्ण किशोर गोप
श्रीकृष्ण और सुन्दरी गौरकान्तियुक्त किशोरी गोपी
श्रीराधा-दोनोंको एक-साथ संयुक्त होते देखकर वे
मूर्च्छित हो गये। यह मूर्च्छा अत्यन्त घनीभूत थी,
इसलिए महाप्रभुने अपने कोमल सुगन्धित हस्त-स्पर्शसे
उसे दूर किया।
श्रीकृष्णने श्रीराधाके मादनाख्य-महाभाव और
अङ्गकान्तिको चोरीसे ग्रहण किया था, परन्तु उनमें
आश्रय-विग्रहका विज्ञान नहीं था। श्रीराय रामानन्दसे
समस्त तत्त्व सुनकर उन्हें अनुभूति हुई कि 'मैं व्रजमें
वृषभानु महाराजकी पुत्री हूँ, एक किशोरी गोपी हूँ, मेरा
विवाह जावटमें हुआ, परन्तु मैं नन्द महाराजके पुत्रपर
आसक्त हूँ, वे मेरे प्रेमी और प्राण-प्रियतम हैं, मैं उनके
अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं जानती, तथा हमारा
मिलन छिप-छिपकर होता है।'
यहाँ श्रीकृष्णके अङ्ग और भाव ढक गये और
अब वे श्रीराधा हो गये। श्रीकृष्णमें एकादश भाव,
महाभाव, मादन-मोदन, प्रेम-वैचित्त्य, समस्त भाव-सम्पत्ति
सञ्चरित हो गयी। श्रीकृष्णकी आत्मा और मनकी
भावनाएँ—सभी राधामय हो गयीं; यही महाप्रभुका स्वरूप
है। शृङ्गार रसराज मूर्ति और महाभावमय—यही गौर-तत्त्व
है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 266–283 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको सान्त्वना, अपने कृष्ण-स्वरूपत्व
और राधाभावद्युतिमयत्वके उद्देश्य आदि समस्त गूढ़
कारणोंका अकपट रूपसे ज्ञापन :—
आलिङ्गन करि' प्रभु कैल आश्वासन।
“तोमा बिना एइ रूप ना देखे अन्यजन ॥ 284 ॥
मोर तत्त्वलीला-रस तोमार गोचरे।
अतएव एइ रूप देखाइलुँ तोमारे ॥ 285 ॥
गौर अङ्ग नहे मोर—राधाङ्ग-स्पर्शन।
गोपेन्द्रसुत बिना तैं हो ना स्पर्शे अन्यजन ॥ 286 ॥
ताँर भावे भावित करि' आत्म-मन।
तबे निज-माधुर्य करि आस्वादन ॥ 287 ॥
तोमार ठाञि आमार किछु गुप्त नाहि कर्म।
लुकाइले प्रेम-बले जान सर्व मर्म ॥ 288 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दका आलिङ्गन
किया और आश्वासन देते हुए कहने लगे,—“राय!
तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसीने मेरे इस रूपको नहीं
देखा है। मेरा स्वरूपतत्त्व एवं लीलारसतत्त्व, सब कुछ
तुम जानते हो, इसलिये मैंने तुम्हें यह अपना विशेष
रूप दिखलाया है। मेरा गौरवर्ण नहीं है, परन्तु राधाके
अङ्गस्पर्शसे मेरा गौरवर्ण हो गया है और राधा
गोपेन्द्रसुत अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त किसी अन्यका
कदापि स्पर्श नहीं करती हैं। राधाके भावोंमें अपने मन
एवं आत्माको अनुभावित करके ही मैं अपने माधुर्यका
आस्वादन कर सकता हूँ। तुम्हारे सम्मुख मेरा कोई भी
तत्त्व छिपा नहीं रह सकता। मैंने आत्मगोपनका प्रयास
अवश्य किया, परन्तु तुम्हारे प्रेमके अतिशय प्रभावके
कारण तुमने मेरा स्वरूपतत्त्व जान लिया अर्थात् मुझे
पहचान ही लिया ॥ 284–288 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे रामानन्द, तुम मुझे अलग
एक 'गौरपुरुष'के रूपमें देख रहे हो, मैं वह नहीं हूँ,
मैं वही गोपेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हूँ, राधा-अङ्ग-स्पर्शके
कारण मेरा यह गौरभाव ही नित्य है। राधिका कृष्णके
अतिरिक्त और किसीको स्पर्श नहीं करती। श्रीराधिकाके
भावमें अपने स्वरूप और मनको भावित करके मैं
अपने कृष्णमाधुर्यरसका आस्वादन करता हूँ॥ 286–287 ॥
अनुभाष्य—प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायके लोग पयार
संख्या 286के 'गौर अङ्ग नहे' वचनके द्वारा श्रीगौर और
श्रीकृष्णको अलग मानते हैं। वस्तुतः दोनों ही स्वयं
रूप-विग्रह हैं अर्थात् श्रीगौर ही 'श्रीकृष्णस्वरूपमें'
332 ।
आठवाँ अध्याय 8/284-294 ]
सम्भोगरसमें नागर अथवा विषय-विग्रह हैं। और
श्रीकृष्ण ही 'श्रीगौरस्वरूपमें' विप्रलम्भरसमें आश्रय-विग्रह-
श्रीराधा-भावकान्तिमय श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अप्राकृत
शृङ्गार-रसराज विग्रह 'धीर-ललित' नायक स्वयंरूप
श्रीनन्दनन्दनके अतिरिक्त अन्य कोई भी विष्णुविग्रह
श्रीकृष्णकी पूर्ण-चिद्-शक्ति अथवा स्वरूपशक्ति
महाभावस्वरूपा श्रीराधिकाके भोक्ता नहीं हो सकते।
क्योंकि श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य समस्त विष्णु-विग्रहोंमें
शृङ्गाररस एवं धीर-ललित नायकका भाव नहीं है और
ऐश्वर्यभावकी प्रबलता है। इसलिये श्रीमतीके नाम
“गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व,
सर्वकान्ता-शिरोमणि॥” हैं (आदिलीला 4/82 संख्या)।
आदिलीला 3/86-89 संख्या भी देखें॥284-288॥
गूढ़ भजनकी बात सर्वत्र प्रकाश योग्य नहीं :-
गुप्ते राखिह, काँहा ना करिह प्रकाश।
आमार वातुल-चेष्टा लोके उपहास॥289॥
महाप्रभु और श्रीराय, दोनों ही आश्रयके भावमें प्रमत्त :-
आमि-एक वातुल, तुमि - द्वितीय वातुल।
अतएव तोमाय-आमाय हइ समतुल ॥ *290॥
अनुवाद-तुम मेरे इस स्वरूप, तत्त्व एवं दर्शनको
गुप्त ही रखना, कहीं प्रकाशित मत करना। मेरी
उन्मत्तकी भाँति चेष्टाओंको लोग समझ न पानेके
कारण वे उपहास करेंगे। मैं एक पागल हूँ और तुम
दूसरे पागल हो, हम-तुम दोनों ही एक समान
हैं॥ *289-290॥
अनुभाष्य-केवल जड़ वस्तुओंमें आसक्तिके कारण
तर्कनिष्ठ लोग इन सब बातोंको न समझनेके कारण
उपहास करेंगे, इसलिये तुम इनको अभक्त अनधिकारीके
सामने प्रकाशित मत करना। जो श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो
जाता है, उसकी तर्कनिष्ठ सांसारिक जड़-चेष्टाएँ दूर
हो जाती हैं। यद्यपि रागानुगा-भावकी प्रेम-चेष्टाएँ
साधारण भोगी लोगोंके दृष्टिकोणसे 'पागलपन' मात्र
लगती हैं, तथापि यह पागलपन नहीं, प्रेमोन्मत्तता है।
सांसारिक लोगोंके विचारसे मैं भी पागल और तुम भी
पागल हो। दोनोंमें समानता रहनेसे हम दोनों ही
श्रीकृष्णप्रेमकी कथामें मत्त हैं। भक्तोंके दृष्टिकोणसे
श्रीकृष्णसे इतर जड़रस-रसिक पागल और उपहासके
पात्र हैं॥289-290॥
महाप्रभुका श्रीरायके साथ दस दिन तक वास :-
एइरूप दशरात्रि रामानन्द-सङ्गे।
सुखे गोङाइला प्रभु कृष्णकथा-रङ्गे॥291॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके
साथ दस रात्रियाँ सुखपूर्वक कृष्णकथाके आनन्दमें
बितायीं ॥ 291॥
महाप्रभु और श्रीरामानन्द-संवाद-एक बृहद् धातुकी खान,
उसके मूल्यके भेदसे बहुतसी धातुओंका प्रकाश :-
निगूढ़ व्रजेर रस-लीलार विचार।
अनेक कहिल, तार ना पाइल पार ॥ 292 ॥
अनुवाद-व्रजकी रसलीलाओंका विचार अति रहस्यमय
है-अनेक प्रकारसे इसका वर्णन किया जाय, तो भी
इनका पार नहीं पाया जा सकता ॥ 292 ॥
अप्राकृत पाँच रसोंकी उपमा :-
तामा, काँसा, रूपा, सोना, रत्नचिन्तामणि।
केह यदि काँहा पोता पाय एकखानि ॥ 293 ॥
क्रमे उठाइते सेह उत्तम वस्तु पाय।
ऐछे प्रश्नोत्तर कैल प्रभु-रामराय ॥ 294 ॥
अनुवाद-किसी व्यक्तिको एक ही खानमें जिस
प्रकार ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना, रत्न एवं चिन्तामणि
दबी हुई मिल जाँय, तो क्रमसे खोदनेपर उत्तरोत्तर
उत्तम वस्तु प्राप्त होती जाती है, ठीक इसी प्रकार
श्रीराय रामानन्दके साथ प्रश्नोत्तरमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर
तत्त्वकी प्राप्ति हुई है॥ 293-294॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरामानन्द रायने श्रीमन्महाप्रभुके
प्रश्नके पहले पाँच (इसी अध्यायकी 57 संख्यासे 67
। 333
[ 8/293-294 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तक) उत्तर दिये। उनमें पहला—ताँबेके समान साधारण
धातु; दूसरा—काँसेके समान उससे उत्कृष्ट धातु,
तीसरा—चाँदीके समान उससे भी उत्कृष्ट धातु,
चौथा—सर्वोत्कृष्ट स्वर्ण-धातु हैं। किन्तु पाँचवाँ—ज्ञानशून्य
भक्ति; वही रत्नचिन्तामणि अथवा साध्य वस्तु,—जिसके
प्रभावसे अन्य चार धातुएँ धातुत्व प्राप्त करती है। पुनः
छठे उत्तरको (68-81 संख्या तक) 'पहला' मानकर
उसके बाद एक-एक करके जो पाँच प्रेम विषयक
उत्तर दिये हैं, उनमें भी वैसी ही तुलना समझनी
चाहिये ॥ 293 ॥
अनुभाष्य—व्रजमें यमुनाजल, तटकी बालू,
कदम्ब-वृक्षादि, गो-छड़ी-वेणु आदि शान्त-रसके
विग्रहसमूह, चित्रक-पत्रक-रक्तकादि दास्यरसके
विग्रहसमूह, श्रीदाम-सुदामादि सख्यरसके विग्रहसमूह,
श्रीनन्द-यशोदादि वात्सल्यरसके विग्रहसमूह और श्रीमती
राधिका, ललितादि गोपरमणियाँ अपने-अपने रसमें धनी
हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—ये पाँचों
उत्तरोत्तर ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना और रत्न-
चिन्तामणिके तुल्य हैं।
'पोता'—भूमिके गर्भमें स्थित ॥ 293 ॥
अमृतानुकणिका—"भागवतमें देवताओं और दैत्योंके
द्वारा एक समुद्र मन्थनका वर्णन है। उसमें पहले
कालकूट विष निकला, उसके बाद सुन्दर-सुन्दर रत्न
निकले, फिर ऐरावत हाथी और फिर उसके बाद
कौस्तुभ मणि, लक्ष्मीजी और फिर धन्वन्तरिके सहित
अमृत निकला। श्रीचैतन्यचरितामृतमें भी एक समुद्रका
मन्थन हुआ है। समस्त धर्मशास्त्र, वेद, उपनिषदादिको
मिलाकर उस समुद्रका मन्थन गोदावरीके तटपर हुआ।
गोदावरीके तटपर मन्थनमें पहले विषके समान वर्णाश्रम-धर्म
निकला, अर्थात् लोग गृहस्थमें रहकर संसारमें अपनी
समृद्धिके लिये भगवान्का भजन करते हैं, यही वह
विष है। जो भी इसका पान करेगा, वह अवश्य ही
मरेगा अर्थात् जन्म-मरणके चक्रमें ही पड़ा रहेगा।
शङ्करजी इसका सामञ्जस्य कर सकते हैं। महाप्रभुके
गृहस्थ भक्त श्रीवास पण्डितादि, महाराज जनक, गोपियाँ
आदि—ये संसारमेंसे कुछ लाभ करके भगवान्का भजन
कर सकते हैं। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा। ऐसे
समुद्र मन्थन हो रहा था और भगवान्के चरणोंमें
कर्मार्पण, सर्वधर्मत्याग, ज्ञानमिश्रा-भक्ति आदि निकले।
जो इनके अधिकारी हैं, महाप्रभु उन्हें वह प्रदान करते
जा रहे थे। अर्थात् जो शुद्ध भक्तिके अधिकारी नहीं
है, सङ्गसिद्धा और आरोपसिद्धा भक्तिके ही अधिकारी
हैं, महाप्रभु उनको यह सब देते जा रहे थे। ज्ञानमिश्रा
भक्ति अर्थात् जो शत्रु-मित्रादि सबके प्रति समान है,
समदर्शी है, जिसकी कोई सांसारिक आकाङ्क्षाएँ नही हैं,
ऐसा व्यक्ति भक्त-सङ्गके द्वारा भगवान्की पराभक्तिको
लाभ करता है, परन्तु अभी प्राप्त नहीं किया है।
तब श्रीरायने ज्ञानशून्य भक्तिको साध्यसार कहा।
जो ज्ञानका प्रयास छोड़कर सन्तोंके मुखसे निकली
भगवद्-कथाका श्रवण करते हैं और उसे ही अपना
जीवन समझते हैं, वे ही प्रेमाभक्ति लाभ करते हैं।
भागवतकी कथा बड़ी रसीली कथा है और सभी तत्त्व
इसमें स्वयं आ जाते है। पृथक् रूपसे जाननेकी
आवश्यकता नहीं है कि जीव-तत्त्व, माया-तत्त्व,
ईश-तत्त्व आदि क्या हैं? ज्ञान, वैराग्य, तत्त्व-ज्ञानके
लिये भी प्रयासकी कोई आवश्यकता नहीं है, ये सब
सन्तोंके मुखसे झरनेकी भाँति उनके हृदयसे निकलकर
आ जाते हैं। प्रेमके साथमें श्रवण करनेसे, उन
कथाओंको नमस्कार करनेसे, कथावाचकको नमस्कार
करनेसे, कथाके स्थानको नमस्कार करनेसे, श्रोताओंको
नमस्कार करनेसे, वक्ताओंको भी नमस्कार करनेसे और
उनकी कथाओंका निरन्तर चिन्तन करनेसे अजित
भगवान् भी वशीभूत हो जाते हैं। इसके बाद श्रीरायने
क्रमशः दास्य, साख्य, वात्सल्य और अन्तमें मधुर
रसको साध्यसार कहा। समस्त शास्त्रोंका यही तात्पर्य
है कि श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंकी जैसी भक्ति है, उससे
बढ़कर उससे श्रेष्ठ और कोई भक्ति नहीं है। यही
अमृतकी खान है।
334 ।
आठवाँ अध्याय 8/294-302 ]
जैसा 'आराध्यो भगवान्...' श्लोकमें भी कहा है।
अतः समुद्र-मन्थनके अन्तमें महाप्रभुने यही प्रदान
किया है कि राधाजीका ही भाव ही सर्वोत्तम है। इससे
बढ़कर और कोई भाव नहीं है। जो भजन करना
चाहते हैं, उन्हें राधाजीकी अनुचरी बननेका लक्ष्य
रखना चाहिये। अर्थात् राधाजीकी जो सखियाँ हैं अथवा
दासियाँ हैं, उन दासियोंकी दासीकी दासीकी दासीके
रूपमें उनकी चरणोंकी धूलि ग्रहणकर उनकी किङ्करी
बन जाँय। यही सब शास्त्रोंका एकमात्र उद्देश्य है और
भागवतका भी यह एकमात्र प्रतिपाद्य विषय है। यथार्थ
समुद्र-मन्थन श्रीचैतन्यचरितामृतमें इस प्रकारसे दिया है।
इसी रूपमें इसे ग्रहण करना चाहिये।” - श्रीभक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी ॥ 294 ॥
श्रीरायसे महाप्रभुके द्वारा विदायी-ग्रहण
और आदेश देना :-
आर दिन राय-पाशे विदाय मागिला।
विदायेर काले ताँरे एइ आज्ञा दिला ॥ 295 ॥
श्रीरायको नीलाचल जानेका आदेश और वहाँ पुनः
मिलनेपर श्रीकृष्णकथा चर्चाका सुयोग :-
“विषय छाड़िया तुमि याह नीलाचले।
आमि तीर्थ करि' ताँहा आसिब अल्पकाले ॥ 296 ॥
दुइजने नीलाचले रहिब एकसङ्गे।
सुखे गोङाइब काल कृष्णकथा-रङ्गे ॥” 297 ॥
एत बलि' रामानन्दे करि' आलिङ्गन।
ताँरे घरे पाठाइया करिल शयन ॥ 298 ॥
अनुवाद - अगले दिन महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे
विदायी माँगी। विदायीके समय महाप्रभुने उन्हें यह
आज्ञा प्रदान की, - “सांसारिक विषयोंको छोड़कर अर्थात्
सब प्रकारके दायित्वसे मुक्त होकर आप नीलाचल चले
जाइये और मैं भी तीर्थभ्रमण करके थोड़े समयमें वहाँ
आ जाऊँगा। तब हम दोनों एक साथ नीलाचलमें रहेंगे
और परस्पर कृष्णकथाका श्रवण-कीर्तन करके सुखपूर्वक
समय बितायेंगे।” इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरामानन्दका
आलिङ्गन किया और उन्हें घर भेजकर स्वयं शयन
करने चले गये ॥ 295-298 ॥
बजरङ्गजीके दर्शन करके महाप्रभुके द्वारा दक्षिण-यात्रा :-
प्रातःकाले उठि' प्रभु देखि' हनुमान्।
ताँरे नमस्करि' प्रभु दक्षिणे करिला प्रयाण ॥ 299 ॥
अनुवाद - प्रातःकालमें उठकर महाप्रभुने श्रीहनुमानजीके
दर्शन किये और उन्हें प्रणामकर दक्षिण भारतके
तीर्थोंकी ओर प्रस्थान किया ॥ 299 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'हनुमान' - विद्यानगरमें श्रीहनुमानकी
मूर्ति-पूजा होती है। उन ग्राम्य-देवताको प्रणाम करके
महाप्रभु दक्षिण दिशाकी ओर गये ॥ 299 ॥
महाप्रभुके दर्शनसे सम्पूर्ण विद्यानगरवासीकी वैष्णवता :-
'विद्यापुरे' नाना-मत लोक बैसे जत।
प्रभु-दर्शने 'वैष्णव' हैल छाड़ि' निजमत ॥ 300 ॥
अनुवाद - 'विद्यापुर' में अनेक मतावलम्बी लोग थे,
परन्तु महाप्रभुका दर्शन करते ही वे लोग अपने मतको
छोड़कर वैष्णव बन गये ॥ 300 ॥
अनुभाष्य - 'विद्यापुरे'- विद्यानगरमें ॥ 300 ॥
महाप्रभुके विरहमें श्रीरायकी अवस्था :-
रामानन्द हैला प्रभुर विरहे विह्वल।
प्रभुर ध्याने रहे विषय छाड़िया सकल ॥ 301 ॥
अनुवाद - इधर श्रीराय रामानन्द महाप्रभुके विरहमें
अति व्याकुल हो गये और सारे विषयोंका त्याग करके
महाप्रभुजीके ध्यानमें लगे रहते थे ॥ 301 ॥
ग्रन्थमें महाप्रभु-श्रीरामानन्द संवादका संक्षिप्त वर्णन :-
संक्षेपे कहिलुँ रामानन्देर मिलन।
विस्तारि' वर्णिते नारे सहस्र-वदन ॥ 302 ॥
अनुवाद - (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस प्रकार
महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायके मिलनका मैंने
संक्षेपमें वर्णन किया। जिसका विस्तारपूर्वक वर्णन
। 335
[ 8/302–309 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अपने सहस्र मुखोंसे भगवान् श्रीशेष भी नहीं कर
सकते ॥ 302 ॥
चैतन्यलीला, श्रीराय-चरित्र और राधाकृष्णलीलाका
परस्पर सम्बन्ध एवं अति सौभाग्यशालीव्यक्तिका
ही इस लीलार्मे अधिकार और सुयोग :-
सहजे चैतन्य-चरित्र-घनदुग्धपूर ।
रामानन्द-चरित्र ताहे खण्ड प्रचुर ॥ 303 ॥
राधाकृष्णलीला-ताते कर्पूर-मिलन ।
भाग्यवान् येइ, सेइ करे आस्वादन ॥ 304 ॥
ये इहा एकबार पिये कर्णद्वारे।
तार कर्ण लोभे इहा छाड़िते ना पारे ॥ 305 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र स्वाभाविक
रूपसे घन-दुग्ध (रबड़ी) के सदृश है और श्रीराय
रामानन्दका चरित्र मीठी चीनीके समान है, जिससे
मिलनेसे रबड़ी मधुरतिमधुर हो गयी है। श्रीराधाकृष्णकी
लीला उसमें कर्पूरके समान मिश्रित है, जिसका
कोई-कोई भाग्यवान् ही आस्वादन कर सकता है। जो
भी मनुष्य अपने कर्ण-द्वारसे एक बार भी इसका पान
कर लेता है, फिर तो माधुर्यके लोभी उसके कान इसे
कभी छोड़ नहीं सकते ॥ 303-305 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुका चरित्र रबड़ी-स्वरूप
है, श्रीरामानन्दका चरित्र उसमें चीनीके समान है; एवं
(उसमें) श्रीराधाकृष्णकी लीला-चीनीयुक्त-रबड़ीमें श्रीकर्पूर
है॥ 303-304 ॥
आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
महाप्रभु-श्रीरामानन्द राय-संवाद-श्रवणके फलका वर्णन :-
'रसतत्त्व-ज्ञान' हय इहार श्रवणे ।
'प्रेमभक्ति' हय राधाकृष्णेर चरणे ॥ 306 ॥
चैतन्येर गूढ़तत्त्व जानि इहा हैते ।
विश्वास करि' शुन, तर्क ना करिह चित्ते ॥ 307 ॥
अनुवाद-इस मिलन-प्रसङ्गके श्रवणसे सम्पूर्ण
रसतत्त्वका ज्ञान हो जाता है और श्रीराधाकृष्णके
श्रीचरणकमलोंमें प्रेमभक्तिकी उपलब्धि हो जाती है।
श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व अत्यन्त रहस्यमय है-उस
रहस्यका ज्ञान इसके श्रवणसे ही होता है। अपने मनमें
किसी भी प्रकारका तर्क-कुतर्क न करके इसे
विश्वासपूर्वक सुनो ॥ 306-307 ॥
भगवान्का अचिन्त्यभाव-तर्कातीत :-
अलौकिक लीला एइ परम निगूढ़ ।
विश्वासे पाइये, तर्के हय बहुदूर ॥ 308 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी यह अलौकिक लीला अति
निगूढ़ और रहस्यमय है, जिसे विश्वास है, वही इसकी
उपलब्धि कर सकता है, तर्क करनेसे इससे बहुत दूर
रहोगे ॥ 308 ॥
श्रीनित्याइ-गौर-अद्वैतके एकान्तिक भक्तोंको
ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण।
याँहार सर्वस्व, ताँरे मिले एइ धन ॥ 309 ॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य
प्रभुके श्रीचरणकमलोंको जिन्होंने अपना सर्वस्व मान
लिया है, उनको ही इस रस-सम्पत्तिकी प्राप्ति हो
सकती है ॥ 309 ॥
अनुभाष्य-“विश्वासे मिलये कृष्ण, तर्के बहुदूर”
अर्थात् विश्वास रखनेवाले श्रद्धालुको क्रमशः आगे
बढ़ते हुए इस अलौकिक परम-गोपनीय वास्तव-वस्तु
श्रीकृष्णलीलाकी अनुभूति होती है। यह (श्रीकृष्णलीला)
गुरु-परम्पराको न माननेवाले, वास्तव-सत्यमें संशयशील
सेवा-विमुख जीवोंके सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनोधर्मसे
उत्पन्न और स्वेच्छानुसार गठन-योग्य काल्पनिक विचार
नहीं है। जड़़ीय तर्कका सहारा लेनेपर जड़-भोग
प्रवृत्तिकी प्रचुरताके कारण चिन्मयलीला उनसे दूर
रहती है। जैसे-(कठोपनिषद् 1/2/9)-
“नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।”
हे प्रियतम नचिकेत! इस भगवद्-विषयणी मतिको
336 ।
आठवाँ अध्याय 8/307-312 ]
तर्कके द्वारा नष्ट करना उचित नहीं है। यह अन्य इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रामानन्दराय-सङ्गोत्सवो
तत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा उपदिष्ट हुई है, इसलिये यह नामाष्टम-परिच्छेदः।
उत्तम ज्ञानका कारण होगी। अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके श्रीचरणकमलोंमें मैं
(मुण्डकोपनिषद् 3/2/3)— कोटि-कोटि बार प्रणाम करता हूँ, जिनके मुखारविन्दसे
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। महाप्रभुने प्रेमरस-सम्पत्तिका विस्तार करवाया है। इस
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” प्रकार मैंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके कड़चाके
इस परमात्म-वस्तुका बहुत तर्क, मेधा (बुद्धि) या अनुसार महाप्रभु और श्रीरामानन्द रायके मिलनकी
पाण्डित्यके द्वारा बोध नहीं होता। वे जिसको (भक्तिसे लीलाका वर्णन किया है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके
सन्तुष्ट होकर) वरण करते हैं, उसके द्वारा प्राप्य होती चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस
है। उसके निकट ही ये परमेश्वर अपनी श्रीमूर्त्ति श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥310-312॥
प्रकाश करते हैं। अनुभाष्य—ग्रन्थकार प्रायः प्रत्येक अध्यायके अन्तमें
(ब्रः सूः 2/1/11)— इस प्रकार श्रौत-पन्थामें अर्थात् गुरुके प्रति अपनी
“तर्काप्रतिष्ठानात्।” अचला (अटल) निष्ठा प्रदर्शित कर रहे हैं। यह
तर्कके द्वारा अप्राकृत तत्त्वकी क्या बात, प्राकृत 'महाप्रभु-रामानन्द-मिलन' घटना श्रील स्वरूप दामोदरके
विषयमें भी उसकी प्रतिष्ठा नहीं देखी जाती। कड़चाके अनुसार ही लिखित और वर्णित हुई है।
मानव प्राकृत लौकिक विचारपूर्ण ज्ञानकी सहायतासे सांसारिक लोग अपने अभिमानके कारण जैसे गुरुमुखसे
अलौकिक तत्त्वको समझनेका प्रयास करनेपर उस सुनी कथाका परित्याग करके स्वकपोल-कल्पित
तत्त्वसे दूर हो जाता है। यहाँ विचारणीय विषय (मनघड़न्त) कथा बोलते हैं, यह महाप्रभु-रामानन्द-मिलन
(श्रीकृष्णप्रेमरस)-अलौकिक है। जड़-सहजिया या लीला वैसी ग्रन्थकारकी दम्भपूर्ण चेष्टा नहीं है—यही
साहित्यिक व्यक्ति जो भी विचार अपने मन या बुद्धिसे ग्रन्थकारके प्रतिपादन (स्थापित) करनेका उद्देश्य है॥311॥
करेंगे, वह लौकिक होगा, इसलिये (अलौकिक वस्तुको
जाननेका) उनका प्रयास निरर्थक है। उस प्रकारके अष्टम अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥
विचारोंको त्याग करके जो विष्णु-तत्त्वमें ऐकान्तिक श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रामानन्दराय-सङ्गोत्सव
श्रद्धावान् होते हैं, उनका सम्बन्धज्ञान ही शुद्ध और नामक आठवाँ अध्याय समाप्त।
अनायास प्राप्य होता है॥307-309॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरायकी वन्दना :-
रामानन्द राये मोर कोटी नमस्कार।
याँर मुखे कैल प्रभु रसेर विस्तार॥310॥
दामोदर-स्वरूपेर कड़चा-अनुसारे।
रामानन्द-मिलन-लीला करिल प्रचारे॥311॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥312॥
। 337
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नौवाँ अध्याय
कथासार-इस अध्यायमें विद्यानगरसे महाप्रभुका
गौतमीगङ्गा, मल्लिकार्जुन, अहोबल-नृसिंह, सिद्धवट,
स्कन्दक्षेत्र, त्रिमठ, वृद्धकाशी, बौद्धस्थान, त्रिपति, त्रिमल्ल,
पाना-नृसिंह, शिवकाञ्ची, विष्णुकाञ्ची, त्रिकालहस्ती,
वृद्धकोल, शियालीभैरवी, कावेरीतट और कुम्भकर्णपालसे
होते हुए श्रीरङ्गक्षेत्र जाकर श्रीव्येङ्कट भट्टको सपरिवार
कृष्ण-भक्त बनानेका वृत्तान्त है। श्रीरङ्गम्से ऋषभपर्वतपर
गये और वहाँ श्रीपरमानन्द पुरी-गोसाईंके साथ मिलन
हुआ। श्रीपुरी-गोस्वामीने पुरुषोत्तमकी यात्रा की एवं
महाप्रभु सेतुबन्धकी ओर चल दिये। श्रीशैलपर्वतपर
ब्राह्मण-ब्राह्मणीके वेशमें रह रहे शिव-दुर्गाके साथ
बातचीत की। वहाँसे कामकोष्ठिपुरीको पार करके
दक्षिण मथुरामें पहुँचे। वहाँ रामभक्त वैरागी ब्राह्मणके
साथ वार्त्तालाप हुआ। बादमें कृतमालामें स्नान करके
महेन्द्र-पर्वतपर श्रीपरशुरामके दर्शन किये। वहाँसे महाप्रभु
सेतुबन्ध गये, वहाँ उन्होंने धनुस्तीर्थमें स्नान और
श्रीरामेश्वरके दर्शन करके कूर्मपुराणके मायासीता-सम्बन्धी
पुराने पन्नोंको संग्रह करके पूर्वोक्त रामदास ब्राह्मणको
लाकर दिये। उसके बाद पाण्डुदेशमें ताम्रपर्णी, बादमें
नयत्रिपदी, चियड़तला, तिलकाञ्ची, गजेन्द्र-मोक्षण, पानागड़ि,
चाम्तापुर, श्रीवैकुण्ठ, मलयपर्वत, धनुस्तीर्थ, कन्याकुमारी
होकर मल्लार देशमें उन्होंने भट्टथारी लोगोंको देखा।
उनके चङ्गुलसे काला-कृष्णदासका उद्धार करके लाये।
बादमें पयस्विनीके तटपर 'ब्रह्मसंहिता' (पाँचवाँ अध्याय)
संग्रह किया। वहाँसे पयस्विनी, शृङ्गवेर-पुरीमठ, मत्स्यतीर्थ
होकर उडुपी गाँवमें मध्वाचार्यके गोपालका दर्शन किया।
तत्त्ववादियोंको विचारमें पराजित करके फल्गुतीर्थ, त्रिकूप,
पञ्चाप्सरा, सूर्पारक, कोलापुर होकर पाण्डेरपुर पहुँचकर
श्रीरङ्गपुरीसे शङ्करारण्यकी सिद्धि प्राप्ति (अप्रकट होने)का
संवाद सुना। कृष्णवेण्वाके तटपर वैष्णव-ब्राह्मणोंके
समाजसे श्रीबिल्वमङ्गल-विरचित श्रीकृष्णकर्णामृत ग्रन्थका
संग्रह किया। वहाँसे ताप्ती, माहिष्मतीपुर, नर्मदा-तट,
ऋष्यमूक-पर्वत होकर दण्डकारण्यमें सप्ततालका उद्धार
किया। वहाँसे पम्पा-सरोवर, पञ्चवटी, नासिक, ब्रह्मगिरि,
गोदावरीके जन्मस्थान कुशावर्त्त आदि बहुतसे तीर्थोंके
दर्शन करके विद्यानगरमें पहुँचे। विद्यानगरसे पूर्व दिशावाले
मार्गसे आलालनाथके दर्शन करके श्रीक्षेत्रमें लौटे।
-(अमृतप्रवाहभाष्य)
अवैष्णवमतग्रस्त दक्षिण देशवासियोंका
उद्धार करनेवाले श्रीगौरहरि :-
नानामतग्राहग्रस्तान् दाक्षिणात्यजनद्विपान्।
कृपारिणा विमुच्यैतान् गौरश्चक्रे स वैष्णवान्॥ १॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥
अमृतप्रवाह भाष्य-बौद्ध-जैन-मायावादी आदि अनेक
प्रकारके मतरूपी मगरमच्छोंसे ग्रस्त गजेन्द्र-स्थानीय
दक्षिण भारतवासियोंको कृपारूपी चक्रके द्वारा श्रीगौरचन्द्रने
उद्धार करके वैष्णव बनाया था॥ १॥
अनुभाष्य-
सः गौरः नानामतग्राहग्रस्तान् (नानामतानि एव ग्राहाः
नक्रकुम्भीरमकराः तैः ग्रस्तान् कवलितान्) दाक्षिणात्यजनद्विपान्
(दाक्षिणात्यजनाः एव द्विपाः हस्तिनः तान्) कृपारिणा (कृपा-चक्रेण)
[तेभ्यः] विमुच्य (अवैष्णवमतवादात् उद्धृत्य) एतान् वैष्णवान्
(कृष्ण-पूजारतान्) चक्रे।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ २॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
। 339
[ 9/2-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥२॥
महाप्रभुकी दक्षिण-यात्रा :-
दक्षिणगमन प्रभुर अति विलक्षण।
सहस्र सहस्र तीर्थ कैल दरशन ॥ ३ ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी दक्षिण यात्रा बड़ी ही विलक्षण
थी। इस यात्रामें उन्होंने हजारों-हजारों तीर्थोंका दर्शन
किया था॥३॥
महाप्रभुके दर्शनोंके फलस्वरूप तीर्थोंका भी
महातीर्थ होना और उससे लोगोंका उद्धार :-
सेइ सब तीर्थ स्पर्शि’ महातीर्थ कैल।
सेइ छले सेइ देशेर लोक निस्तारिल ॥४॥
अनुवाद-महाप्रभुने उन सब तीर्थोंको स्पर्श करके
उन्हें महातीर्थ बना दिया। तीर्थ दर्शनके बहाने महाप्रभुने
दक्षिण भारतके लोगोंका उद्धार किया॥४॥
महाप्रभुके द्वारा दाँये-बाँये भ्रमणके फलस्वरूप वर्णनमें
भौगोलिक-क्रमभङ्ग, यहाँ केवल दिग्दर्शन मात्र :-
सेइ सब तीर्थेर क्रम कहिते ना पारि।
दक्षिण-वामे तीर्थ-गमन हय फेराफेरि ॥५॥
अतएव नाममात्र करिये गणन।
कहिते ना पारि तार यथा अनुक्रम ॥६॥
अनुवाद-(ग्रन्थकार कह रहे हैं) - महाप्रभु जिन-जिन
तीर्थोंमें गये, मैं काल और भौगोलिक क्रमानुसार उन
सबको नहीं लिख सकता, क्योंकि वे तीर्थ-भ्रमणमें
कभी दाहिनीसे बाँये दिशाकी ओर, और बाँयेसे दाहिनी
दिशाकी ओर जाते थे। इसलिये मैं केवल उन तीर्थोंके
नामोंका उल्लेख कर रहा हूँ, क्रमानुसार उन तीर्थोंका
वर्णन नहीं कर पाऊँगा॥ ५-६ ॥
महाप्रभुके दर्शनमात्रसे लोगोंमें वैष्णवता :-
पूर्ववत् पथे याइते ये पाय दरशन।
येइ ग्रामे याय, से ग्रामेर यत जन ॥७॥
सबेइ वैष्णव हय, कहे ‘कृष्ण’ ‘हरि’।
अन्य ग्राम निस्तारये सेइ ‘वैष्णव’ करि’॥८॥
अनुवाद-पहले जैसे वर्णन किया है, मार्गमें
महाप्रभुके दर्शन करनेवाले व्यक्ति और महाप्रभु जिस
गाँवमें जाते, उस गाँवके सभी लोग वैष्णव बनकर
‘कृष्ण’ ‘हरि’ कीर्तन करने लगते। इस प्रकार महाप्रभु
अन्य जिन भी ग्रामोंमें गये वहाँके वासी सभी वैष्णव
बन गये और उनका उद्धार हो गया॥ ७-८॥
उस समय दक्षिणदेशके लोगोंकी अवस्था :-
दक्षिण देशेर लोक अनेक प्रकार।
केह ज्ञानी, केह कर्मी, पाषण्डी अपार ॥९॥
अनुवाद-दक्षिण भारतमें अनेक प्रकारके लोग थे।
कोई तार्किक ज्ञानी, और कोई कर्मी थे तथा पाखण्डी
तो अपार थे॥९॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘पाषण्डी' - शुद्धभक्तिविरुद्ध ज्ञानी
और कर्मवादी ॥९॥
महाप्रभुकी कृपासे कर्मी, ज्ञानी और
पाखण्डीको भी वैष्णवताकी प्राप्ति :-
सेइ सब लोक प्रभुर दर्शनप्रभावे।
निज-निज-मत छाड़ि’ हइल वैष्णवे ॥१०॥
अनुवाद-वे सब लोग महाप्रभुके दर्शनके प्रभावसे
अपने-अपने मतको छोड़कर वैष्णव बन गये॥१०॥
रामोपासक माधव और ‘श्रीवैष्णवों'के
द्वारा कृष्णभजन आरम्भ :-
वैष्णवेर मध्ये राम-उपासक सब।
केह हय ‘तत्त्ववादी’, केह हय ‘श्रीवैष्णव’ ॥११॥
सेइ सब वैष्णव महाप्रभुर दर्शने।
कृष्ण-उपासक हैल, लय कृष्णनामे ॥ १२॥
अनुवाद-दक्षिण भारतके वैष्णवोंमें अधिकांश
श्रीरामचन्द्रके उपासक थे। अन्य कोई ‘तत्त्ववादी’ और
340 ।
नौवाँ अध्याय 9/11-12 ]
कोई 'श्रीवैष्णव' थे। महाप्रभुके दर्शनोंसे वे सब विभिन्न
वैष्णव श्रीकृष्णके उपासक बन गये और श्रीकृष्णनामका
कीर्त्तन करने लग गये ॥ 11-12 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'राम उपासक'—रामात् वैष्णव।
'तत्त्ववादी'—मध्वाचार्य-मतके तत्त्वको स्वीकारकर जो
शुद्धद्वैतवाद स्थापित करते हैं। 'श्रीवैष्णव'—रामानुज-
सम्प्रदायी वैष्णव ॥ 11 ॥
अनुभाष्य—'तत्त्ववादी'—श्रीमाध्व-वैष्णवोंको श्रीशाङ्कर-
मायावादियोंसे पृथक् करनेके लिये माध्व-वैष्णवोंको
'तत्त्ववादी' कहा है। तत्त्ववादी-आचार्यगण केवलाद्वैतवादके
काल्पनिक विचारोंसे पुष्ट निर्विशेष-'ब्रह्मवाद'का खण्डन
करके 'भगवद्-तत्त्व' स्थापित करते हैं।
'माध्व वैष्णवगण'—ब्रह्मवैष्णव (ब्रह्म सम्प्रदायके
अन्तर्भुक्त) हैं, इसलिये वे आदिगुरु ब्रह्माजीकी (दशम
स्कन्धमें वर्णित) मोहित अवस्थाको स्वीकार नहीं करते,
क्योंकि श्रीमन्मध्वाचार्यने स्वरचित 'भागवत-तात्पर्य' टीकामॆं
इस 'ब्रह्ममोहन-लीला'का वर्णन नहीं किया है।
श्रीमाध्व-वैष्णवोंमें एक प्रमुख वैष्णव श्रीमाधवेन्द्रपुरीने
तत्त्ववादके चरम उद्देश्य प्रेमभक्तिका प्रचार किया।
गौड़ीय-वैष्णव माध्व होनेपर भी 'तत्त्ववादी' नहीं कहलाते।
'श्रीवैष्णव'—श्रीरामानुजीय सम्प्रदायकी मूलगुरु 'लक्ष्मी'
होनेके कारण उस सम्प्रदायके वैष्णव 'श्रीवैष्णव'के
नामसे जाने जाते हैं।
'तत्त्ववादिगण' श्रीकृष्णके उपासक होनेपर भी और
'श्रीवैष्णवगण' श्रीलक्ष्मी-नारायणके उपासक होनेपर भी,
दोनोंमें ही श्रीरामचन्द्रकी उपासनाकी प्रबलता देखी जाती
है।
तत्त्ववादि-सम्प्रदायके वर्तमानकालके लेखक
श्रीपद्मनाभाचार्य कहते हैं,—हमारे प्रधान-प्रधान श्रीमाध्वमठोंमें
श्रीराम-सीता विग्रहोंकी ही विशेष रूपसे पूजा होती है।
'अध्यात्म-रामायण'—नामक ग्रन्थके बारहसे पन्द्रह अध्यायों
तकमें मूल श्रीराम-सीताकी मूर्त्तिकी कहानी इस प्रकार
लिखी है—'किसी ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीरामचन्द्रके
प्रतिदिन दर्शन किये बिना वे कुछ भी नहीं खायेंगे।
एक बार श्रीरामचन्द्र कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण एक
सप्ताह तक प्रजाके सामने नहीं आ सके; इसलिये
राम-दर्शननिष्ठ ब्राह्मणने सात दिन तक पानीकी एक
बूँद तक भी नहीं ग्रहण नहीं की। अन्तमें आठवे
दिनके बाद नौंवे दिनमें ब्राह्मणने श्रीरामचन्द्रके निकट
उपस्थित होकर उनके दर्शन प्राप्त किये। ब्राह्मणकी
निष्ठाको सुनकर श्रीरामचन्द्रने लक्ष्मणजीको आदेश
दिया कि वे अपने घरमें रखी हुई राम-सीताकी
युगलमूर्ति इस वास्तविक भक्त ब्राह्मणको दे दें। ब्राह्मण
लक्ष्मणजीसे दोनों श्रीविग्रहोंको प्राप्त करके अपने
जीवन भर उनकी सेवा करता रहा और शरीर त्यागते
समय उसने उन श्रीविग्रहोंको श्रीहनुमानको दे दिया।
श्रीहनुमानने इन दोनों विग्रहोंको बहुत समय तक वक्षपर
धारण करके उनकी सेवा की। बहुत समयके बाद
भीमसेन गन्धमादन पर्वतपर श्रीहनुमानके पास गये।
श्रीहनुमानने विदा करते समय इन दोनों विग्रहोंको
भीमसेनको प्रदान किया। भीमसेनने उन्हें लाकर अपने
राजमहलमें संरक्षित रखा। उस राजवंशके अन्तिम
राजा 'क्षेमाकान्त'के समय तक यह दोनों विग्रह
राजमहलमें ही सेवित हुए। बादमें वे उत्कल (उड़ीसा)के
गजपति-राजाओंके हाथोंमें आये तथा उनके राजकोषमें
संरक्षित थे। श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने शिष्य श्रीनरहरितीर्थको
राजकोषसे उन मूल रामसीता विग्रहोंको लेकर उनकी
सेवा करनेकी अनुमति दी। ये रामसीताके विग्रह
इक्ष्वाकु-राजाके समयसे सूर्यवंशीय राजाओंके द्वारा
महलोंमें सेवित होते थे। श्रीरामचन्द्रके जन्मके पहलेसे
ही दशरथ महाराज इनकी सेवा करते थे। बादमें
लक्ष्मणजी जब उन श्रीविग्रहोंकी सेवा करते थे, तब
उन्होंने श्रीरामचन्द्रके आदेशसे उन्हें पूर्वोक्त ब्राह्मणको
अर्पित किये थे।' श्रीमन्मध्वाचार्यने अपने तिरोभावसे तीन
मास सोलह दिन पहले इन दोनों विग्रहोंको प्राप्त करके
उडुपी गाँवके मूल-मठ उत्तर-राढ़ी-मठमें स्थापित किया,
तबसे श्रीमाध्व आचार्यगण उनके अधिकारी हैं।
। 341
[ 9/11-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
रामानुजीय-सम्प्रदायमें श्रीरामायणको गुरुके रूपमें
स्वीकार करनेकी पद्धति प्रचलित है। रामानुजीय भक्त
तिरुपति और अन्यान्य स्थानोंपर श्रीराममूर्तिकी पूजा
करते हैं। रामानुजीय-सम्प्रदायसे उत्पन्न 'रामानन्दी',
'जमायेत्' या 'रामात्'-सम्प्रदायमें श्रीरामसीताकी उपासना
प्रबलरूपसे प्रतिष्ठित हैं। रामानुजीय भक्त श्रीकृष्णकी
अपेक्षा श्रीरामके अधिक अनुगत हैं॥11॥
मार्गपर चलते हुए महाप्रभुके द्वारा गान :-
राम ! राघव ! राम ! राघव !
राम ! राघव ! पाहि माम्।
कृष्ण ! केशव ! कृष्ण ! केशव !
कृष्ण ! केशव ! रक्ष माम्॥13॥
गोमती गङ्गा :-
एइ श्लोक पथे पड़ि' करिला प्रयाण।
गौतमी-गङ्गाय याइ' कैल गङ्गास्नान॥14॥
अनुवाद— महाप्रभु मार्गमें यह गान करते चल रहे
थे—'हे राम! हे राघव! आप मेरा पालन कीजिये। हे
कृष्ण! हे केशव! आप मेरी रक्षा कीजिये।' चलते-चलते
महाप्रभु गौतमी-गङ्गा पहुँचे और उन्होंने वहाँ स्नान
किया॥13-14॥
अमृतप्रवाह भाष्य— श्रील कविराज गोस्वामीने जिस
तीर्थ दर्शनका वर्णन किया है, उसमें भौगोलिक क्रम
नहीं है, यह उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है।
गोविन्ददास-कृत कड़चेमें (?) जो क्रम प्राप्त होता है,
उसकी भौगोलिक विवरणके साथ बहुत कुछ समानता
है। पाठकवर्ग उसी ग्रन्थका क्रम देखकर विचार करेंगे।
गोविन्ददासके मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे महाप्रभु त्रिमन्दे
गये थे और वहाँसे दुण्डिराम तीर्थ गये। इस ग्रन्थके
मतानुसार राजमाहेन्द्रिसे गौतमी-गङ्गा जाकर महाप्रभुने
मल्लिकार्जुन तीर्थके लिये गमन किया॥14॥
अनुभाष्य— 'गौतमी गङ्गा'—गोदावरी नदीकी एक
धारा है। राजमाहेन्द्रिके दूसरे तटपर गौतम-ऋषिका
आश्रम था, इसलिये गोदावरीका नाम वहाँ गौतमी-गङ्गा
है॥14॥
मल्लिकार्जुन-तीर्थमें रामदास शम्भुका दर्शन :-
मल्लिकार्जुन-तीर्थे याइ' महेश देखिल।
ताँहा सब लोके कृष्णनाम लओयाइल॥15॥
अनुवाद— मल्लिकार्जुन-तीर्थमें जाकर महाप्रभुने
श्रीमहेशका दर्शन किया। महाप्रभुने उस तीर्थके सभी
लोगोंसे श्रीकृष्णनाम कीर्तन करवाया॥15॥
अनुभाष्य— 'मल्लिकार्जुन'—श्रीशैलम्; यह कर्णूलसे
सत्तर मील दूर कृष्णा नदीके दक्षिण तटपर अवस्थित
है। घिरी हुई चारदीवारीके केन्द्रमें प्रधानदेवता 'मल्लिकार्जुन'
शिवका मन्दिर है। यह ज्योतिर्लिङ्गोंमें एक प्रसिद्ध
शिवलिङ्ग है (कर्णुल म्यानुयेल)॥15॥
अहोबल नृसिंहका दर्शन :-
रामदास महादेवे करिल दरशन।
अहोबल-नृसिंहरे करिला गमन॥16॥
अनुवाद— रामदास महादेवके दर्शन करके महाप्रभु
अहोबल-नृसिंहदेवके दर्शनके लिये गये॥16॥
अनुभाष्य— 'अहोबल-नृसिंह'—मध्यलीला 1/106
देखें॥16॥
सिद्धवटमें श्रीराम और सीताके विग्रहोंका दर्शन :-
नृसिंह देखिया ताँरे कैल नति-स्तुति।
सिद्धवट गेला याँहा मूर्ति सीतापत्ति॥17॥
अनुवाद— महाप्रभुने नृसिंह भगवान्के दर्शन करके
उनको प्रणाम और स्तुति की। वहाँसे वे सिद्धवट
पहुँचे, जहाँ सीतापति श्रीरामचन्द्रका विग्रह विराजमान
है॥17॥
अनुभाष्य— 'सिद्धवट'—कुडापा नगरके दस मील
पूर्वमें स्थित है। यह स्थान 'सिधौट'—नामसे और पहले
किसी समय 'दक्षिण-काशी'के नामसे भी प्रसिद्ध था।
'आश्रम-वटवृक्ष'से इस नाम 'सिद्धवट'की उत्पत्ति हुई है
(कुडापा म्यानुयेल)॥17॥
342 ।
नौवाँ अध्याय 9/18-28 ]
वहाँ रामसेवक एक वैष्णव ब्राह्मणके द्वारा
महाप्रभुको भिक्षा प्रदान :-
रघुनाथ देखि' कैल प्रणति स्तवन।
ताँहा एक विप्र प्रभुर कैल निमन्त्रण॥ 18॥
सेइ विप्र रामनाम निरन्तर लय।
'राम' 'राम' बिना अन्य वाणी ना कहय॥ 19॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथजीके दर्शन करके
उन्हें प्रणामकर उनकी स्तव-स्तुति की। वहाँ एक
ब्राह्मणने महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण दिया। वह
ब्राह्मण निरन्तर रामनामका जप किया करता था। 'राम'
'राम'के अतिरिक्त वह मुखसे कुछ भी नहीं बोलता
था॥ 18-19॥
उसके घरमें एक दिन वास और उसपर कृपा :-
सेइ दिन ताँर घरे रहि' भिक्षा करि'।
ताँरे कृपा करि' आगे चलिला गौरहरि॥ 20॥
अनुवाद—उस दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घरमें
रहे और भिक्षा ग्रहण की। उसपर कृपा करके महाप्रभु
आगे यात्रापर चल पड़े॥ 20॥
स्कन्दक्षेत्रमें स्कन्द और त्रिमठमें वामन-विग्रहका दर्शन :-
स्कन्दक्षेत्र-तीर्थे कैल स्कन्द-दरशन।
त्रिमठ आइला ताँहा देखि' त्रिविक्रम॥ 21॥
अनुवाद—स्कन्दक्षेत्र-तीर्थमें आकर महाप्रभुने स्कन्द
(कार्तिकेय)का दर्शन किया। फिर त्रिमठमें आकर
उन्होंने श्रीत्रिविक्रम (वामन भगवान्)का दर्शन किया॥21॥
अनुभाष्य—'स्कन्द'—कार्तिकेय। यह तीर्थ हैदराबादमें
है॥ 21॥
पूर्वोक्त ब्राह्मणका रामनामके बदले कृष्णनाम ग्रहण :-
पुनः सिद्धवट आइला सेइ विप्र-घरे।
सेइ विप्र कृष्णनाम लय निरन्तरे॥ 22॥
अनुवाद—त्रिमठसे महाप्रभु पुनः सिद्धवटमें उसी
ब्राह्मणके घर लौटकर आये। तब वह ब्राह्मण निरन्तर
कृष्णनामका जप कर रहा था॥ 22॥
महाप्रभुके प्रश्न और विप्रका उत्तर :-
भिक्षा करि' महाप्रभु ताँरे प्रश्न कैल।
“कह विप्र, एइ तोमार कोन् दशा हैल ? ॥ 23 ॥
पूर्वे तुमि निरन्तर लैते रामनाम।
एबे केने निरन्तर लओ कृष्णनाम ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणके घर भिक्षा ग्रहण
करनेके बाद उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण ! कहो तुम्हारी
यह दशा कैसे हुई? पहले तो तुम निरन्तर रामनामका
जाप करते थे, अब क्यों निरन्तर कृष्णनामका कीर्तन
कर रहे हो? ॥” 23-24 ॥
विप्र बोले,—“एइ तोमार दर्शन-प्रभाव।
तोमा देखि' गेल मोर आजन्म-स्वभाव ॥ 25 ॥
बाल्यावधि रामनाम-ग्रहण आमार।
तोमा देखि' कृष्णनाम आइल एकबार ॥ 26 ॥
सेइ हैते कृष्णनाम जिह्वाते बसिला।
कृष्णनाम स्फुरे, रामनाम दूरे गेला ॥ 27 ॥
बाल्यकाल हैते मोर स्वभाव एक हय।
नामेर महिमा-शास्त्र करिये सञ्चय ॥ 28 ॥
अनुवाद—उस ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“यह आपके
दर्शनका प्रभाव है। आपके दर्शनसे मेरा आजन्म-स्वभाव
चला गया। मैं बाल्यकालसे ही श्रीरामनाम करता था,
परन्तु आपके दर्शनसे मेरे मुखमें एकबार श्रीकृष्णनाम
उदित हुआ। तभीसे श्रीकृष्णनाम मेरी जिह्वापर बैठ गया
और अब जिह्वापर श्रीकृष्णनाम ही स्फुरित होता है
और श्रीरामनाम दूर चला गया। बाल्यकालसे मेरा एक
स्वभाव है कि मैं शास्त्रोंसे नामकी महिमाको संग्रह
करता आया हूँ॥ 23-28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जन्मसे ही जो श्रीरामनाम-जप
। 343
[ 9/25-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेका स्वभाव था, वह परिवर्तित होकर
श्रीकृष्णनाम-जपका स्वभाव हो गया ॥ 25 ॥
'राम'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :-
(पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्रका आठवाँ श्लोक) -
रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ 29 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अनन्त सत्यानन्द-चिदात्मस्वरूप
परमतत्त्वमें सभी योगी रमण (आनन्द प्राप्त) करते हैं।
इसलिये परमब्रह्म-वस्तुको रामनामसे कहा जाता है॥29॥
अनुभाष्य-
योगिनः (विषयनिवृत्ताः) अनन्ते (जड़ातीते) सत्यानन्दे
चिदात्मनि (सच्चिदानन्दे) रमन्ते। इति [अतः] रामपदेन असौ
(रामचन्द्रः) परं ब्रह्म अभिधीयते (कथ्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥
'कृष्ण'-शब्दका व्युत्पत्तिगत अर्थ :-
श्रीधरस्वामी-उद्धृत महाभारतमें उः पः (71/4)-
कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः।
तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ 30 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष-धातु'-भू अर्थात् आकर्षक
सत्त्वा-वाचक है; ण-शब्द निवृत्ति अर्थात् परमानन्द-वाचक
है। कृष-धातुमें ण-प्रत्यय लगानेसे उन दोनोंके एक
होनेपर 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुए हैं॥30॥
अनुभाष्य-
कृषिः-शब्दः भूः-वाचकः (सत्ता-निर्धारकः) णश्च
निर्वृत्ति-वाचकः (आनन्दाभिधः); तयोः (द्वयोः) ऐक्यं कृष्णः
परं ब्रह्म इति अभिधीयते (कथ्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 30 ॥
रामनाम और कृष्णनामका लीलागत वैचित्र्य :-
परंब्रह्म दुइनाम समान हइल।
पुनः आर शास्त्रे किछु विशेष पाइल ॥ 31 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 31 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पूर्वोक्त दो श्लोकोंका तात्पर्य
लेनेपर, राम और कृष्ण नाममें परमब्रह्म समान
अर्थवाले हैं, तथापि शास्त्रोंमें और भी कुछ कहा गया
है, उसे बादमें कहा जा रहा है ॥ 31 ॥
अनुभाष्य- 'राम' और 'कृष्ण', ये दोनों नाम ही
परब्रह्मके हैं। उनमें समानता वर्तमान है। परन्तु
शास्त्रोंमें इन दोनों नाम-परब्रह्मके रस-तारतम्यके वैशिष्ट्यका
अनुसन्धान करनेपर एक विशेष बात समझमें आती
है॥31॥
सहस्र विष्णुनामके समान एक रामनाम :-
पद्मपुराणमें श्रीरामचन्द्र शतनामस्तोत्र 9वाँ श्लोक,
उत्तरखण्डमें श्रीविष्णु सहस्रनाम-स्तोत्रमें (72/335)-
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनामभिस्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ 32 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'राम' 'राम' 'राम' कहकर
मनोरम जो राम हैं, मैं उनमें रमण (आनन्द प्राप्त)
करता हूँ। हे वरानने (सुन्दरी), एक राम-नाम सहस्र
विष्णुनामोंके तुल्य है ॥ 32 ॥
अनुभाष्य-
हे वरानने, अहं राम रामेति रामेति सङ्कीर्त्त्य मनोरमे
(मनोहरे) रामे रमे (आनन्दं प्राप्नोमि)। [एकं] राम-नाम
सहस्रनामभिः (विष्णुसहस्रनामभिः) तुल्यम्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥
तीन बार रामनामके समान एक कृष्णनाम :-
(ब्रह्माण्डपुराणका वचन)-
सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम्।
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत् प्रयच्छति ॥ 33 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- (विष्णुके) पवित्र सहस्रनामोंका
तीनबार पाठ करनेसे जो फल होता है, कृष्णनाम एक
344 ।
बार उच्चारित होनेसे ही वही फल देते हैं। तात्पर्य यह
है कि एक रामनाम सहस्र विष्णुनामके समान है।
इसलिये तीन बार रामनामका फल एक बार कृष्णनामसे
ही प्राप्त होता है॥ 33 ॥
अनुभाष्य-
पुण्याणां (पवित्राणां) सहस्रनाम्नां (विष्णुसहस्रनाम्नां) त्रिरावृत्त्या
(वारत्रयपठनेन) यत् फलं प्राप्नोति, कृष्णस्य एकं नामं
एकवृत्त्या (सकृत्तदुच्चारणेन) तत् फलं तु प्रयच्छति (ददाति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
श्रीकृष्णनामका सर्वश्रेष्ठ माहात्म्य :-
एइ वाक्ये कृष्णनामेर महिमा अपार।
तथापि लइते नारि, शुन हेतु तार ॥ 34 ॥
ब्राह्मणके द्वारा पहले श्रीकृष्णनाम नहीं लेनेका हेतु :-
इष्टदेव राम, ताँर नामे सुख पाइ।
सुख पाञा रामनाम रात्रिदिन गाइ ॥ 35 ॥
श्रीकृष्णविग्रह ही श्रीकृष्णनाम प्रदान करनेमें समर्थ होनेके
कारण ब्राह्मणका महाप्रभुमें श्रीकृष्ण-ज्ञान :-
तोमार दर्शने यबे कृष्णनाम आइल।
ताहार महिमा तबे हृदये लागिल ॥ 36 ॥
सेइ कृष्ण तुमि-इहा साक्षात् निर्धारिल।”
एत कहि' विप्र प्रभुर चरणे पड़िल ॥ 37 ॥
अनुवाद-यद्यपि इस श्लोकमें कहा गया है कि
श्रीकृष्णनामकी महिमा अपार है, तथापि मैं श्रीकृष्णनाम
नहीं लेता था, इसका कारण सुनिये। मेरे इष्टदेव
श्रीरामचन्द्र हैं और उनके नामके कीर्तनसे मुझे बहुत
आनन्द मिलता था। इसलिये मैं रात-दिन श्रीरामनामका
कीर्तन करते हुए आनन्द प्राप्त करता था। परन्तु
आपके दर्शन करके जब मेरी मुखमें श्रीकृष्णनाम
स्फुरित हुआ, तभीसे मेरे हृदयमें श्रीकृष्णनामकी महिमा
प्रकाशित हुई। आप ही वे श्रीकृष्ण हैं, यह मुझे साक्षात्
अनुभव हुआ है।” यह कहकर ब्राह्मण महाप्रभुके
चरणोंमें गिर पड़ा॥ 34-37 ॥
वृद्धकाशीमें शम्भुका दर्शन :-
ताँरे कृपा करि' प्रभु चलिला आर दिने।
वृद्धकाशी आसिं' कैल शिव-दरशने ॥ 38 ॥
अनुवाद-उस ब्राह्मणपर कृपा करके महाप्रभु
अगले दिन वहाँसे चले गये और वृद्धकाशीमें आकर
उन्होंने शिवजीका दर्शन किया॥ 38 ॥
अनुभाष्य- 'वृद्धकाशी'- वर्तमान नाम 'वृद्धाचलम्'
है। यह दक्षिण आर्कट-जिलेकी भेलार-नदीकी एक
उपनदी 'मणिमुख'के तटपर अविस्थित है। पहले इसका
नाम 'वृद्धकाशी' था (दक्षिण-आर्कट म्यानुयेल)। कोई-कोई
'कालहस्तिपुर'को वृद्धकाशी कहते हैं। श्रीरामानुजाचार्यके
मौसेरे भाई गोविन्दने इन्हीं शिवकी बहुत दिनों तक
सेवा की थी॥ 38 ॥
उसके बाद अन्य ग्राममें वास और महाप्रभुके दर्शनोंके
लिये बहुतसे लोगोंका आना :-
ताँहा हैते चलि' आगे गेला एक ग्रामे।
ब्राह्मण-समाज ताँहा, करिल विश्रामे ॥ 39 ॥
प्रभुर प्रभावे लोक आइल दरशने।
लक्षार्बुद लोक आइसे ना याय गणने ॥ 40 ॥
अनुवाद-महाप्रभु वृद्धकाशीसे आगे चले। एक
ग्राममें उन्होंने देखा कि अधिकांश व्यक्ति ब्राह्मण थे,
तब महाप्रभुने उस स्थानपर ही विश्राम किया। महाप्रभुके
प्रभावसे लाखों-लाखों लोग उनके दर्शनके लिये आने
लगे। जितने लोग आये उनकी गणना नहीं की जा
सकती॥ 39-40 ॥
महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
गोसाञिर सौन्दर्य देखि' ताते प्रेमावेश।
सबे 'कृष्ण' कहे, 'वैष्णव' हैल सर्वदेश ॥ 41 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके सौन्दर्यको और उसके ऊपर
उनके प्रेमके आवेशको देखकर सभी 'कृष्ण' नामका
कीर्तन करने लगे। इस प्रकार वहाँके सब देशवासी
वैष्णव बन गये ॥ 41 ॥
। 345
[ 9/42-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुके द्वारा समस्त मतवादियोंके विचारोंका खण्डन :—
तार्किक-मीमांसक, यत मायावादिगण।
सांख्य, पातञ्जल, स्मृति, पुराण, आगम ॥ 42 ॥
निज-निज-शास्त्रोद्ग्राहे सबाइ प्रचण्ड।
सर्व मत दुषि' प्रभु करे खण्ड खण्ड ॥ 43 ॥
वेदान्तके अचिन्त्यभेदाभेदरूप भक्तिसिद्धान्तकी स्थापना :—
सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णवसिद्धान्ते।
प्रभुर सिद्धान्त केह ना पारे खण्डिते ॥ 44 ॥
महाप्रभुके अकाट्य सिद्धान्तसे पराजित
व्यक्तियोंके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-ग्रहण :—
हारि' हारि' प्रभुमते करेन प्रवेश।
एइमते 'वैष्णव' करिल दक्षिण देश ॥ 45 ॥
अनुवाद—वहाँ तार्किक, मीमांसक, मायावादी, सांख्यक, पातञ्जल-योगी, स्मृति, पुराण और आगम शास्त्रोंको माननेवाले बड़े-बड़े पण्डित लोग थे, वे सभी अपने-अपने शास्त्रोंके प्रमाण देकर अपने मतको स्थापित करनेमें प्रवीण थे। महाप्रभुने उन सबके मतोंके दोषोंको दिखलाकर उन सभीके सिद्धान्तोंको खण्ड-खण्ड करके सर्वत्र वैष्णव सिद्धान्तको स्थापित किया, परन्तु कोई भी महाप्रभुके सिद्धान्तका खण्डन न कर सका। पराजय स्वीकार करके सभी दार्शनिकोंने महाप्रभुके मतमें प्रवेश किया। इस प्रकार महाप्रभुने दक्षिण-भारतको वैष्णव बना दिया॥ 42-45 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'तार्किक'—गौतमीय नैयायिक और कणादीय वैशेषिक। 'मीमांसक'—जैमिनी-मतके स्थापक। 'मायावादी'—शङ्करके मतके स्थापक। 'सांख्य'—कपिल-मत। 'पातञ्जल'—योगशास्त्र। 'स्मृति'—मन्वादि आदि बीस धर्मशास्त्रीय संहिता। 'पुराण'—अठारह महापुराण और अठारह उपपुराण। 'आगम'—तन्त्रशास्त्र। 'शास्त्रोद्ग्राहे'—शास्त्र-संस्थापन करनेमें। 'प्रभुर सिद्धान्त', 'एइमते'—महाप्रभुका मत अर्थात् वेद, वेदान्त और ब्रह्मसूत्रके द्वारा स्थापित अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त॥ 42-45 ॥
पाखण्डी बौद्धाचार्यका अपने शिष्योंके साथ आगमन :—
पाषण्डी आइल यत पाण्डित्य शुनिया।
गर्व करि' आइल सङ्गे शिष्यगण लञा ॥ 46 ॥
अनुवाद—जब पाखण्डी (बौद्धाचार्य)ने महाप्रभुके पाण्डित्यके विषयमें सुना, तो अपनी विद्वताका अभिमान करते हुए वह अपने शिष्योंके साथ महाप्रभुके पास आया॥ 46 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाषण्डिगण'—वेद, स्मृति, दर्शन, पुराण और आगम आदि शास्त्रोंसे बहिर्भूत मतवादियोंको पाखण्डी कहा जाता है॥ 46 ॥
उसका तर्क :—
बौद्धाचार्य महापण्डित विजन वनेते *।
प्रभुर आगे उद्ग्राह करि' लागिला बलिते ॥ 47 ॥
*पाठान्तरमें 'निज नवमते'।
अनुवाद—बौद्धाचार्य महापण्डित 'विजन वनेते' (अर्थात् एकान्तमें) महाप्रभुके पास आकर अपने सिद्धान्त स्थापित करनेके लिये तर्क करने लगा।
पाठान्तरमें 'निज नवमते', अर्थात् अपने नये मत॥ 47 ॥
असम्भाष्य होनेपर भी कृपाको प्रकाशित करके उसके विचारका खण्डन :—
यद्यपि असम्भाष्य बौद्ध अयुक्त देखिते।
तथापि बलिला प्रभु गर्व खण्डाइते ॥ 48 ॥
अनुवाद—यद्यपि बौद्धोंसे वार्त्तालाप नहीं करना चाहिये और यहाँ तक कि उनको देखना तक नहीं चाहिये, तथापि महाप्रभुने उसके अभिमानको चूर करनेके लिये उसके साथ बातचीत की॥ 48 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'असम्भाष्य'—बातचीत करनेके योग्य नहीं, क्योंकि वे वेदविरुद्ध और भक्तिसे बहिर्मुख हैं। 'देखिते अयुक्त'—निरीश्वर बौद्धादिको देखनेपर 'सचेलं जलमाविशेत्' [वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये],
346 ।
नौवाँ अध्याय 9/48-56 ]
क्योंकि (सात्वत) शास्त्र-वाक्यानुसार नास्तिक बौद्धादिका
दर्शन अनुचित है ॥ 48 ॥
अश्रौतपन्थी बौद्ध-शास्त्रका विचार-युक्तिसे खण्डन :-
तर्क-प्रधान बौद्धशास्त्र 'नव मते'।
तर्केइ खण्डिल प्रभु, ना पारे स्थापिते ॥ 49 ॥
बौद्धाचार्य 'नव प्रश्न' सब उठाइल।
दृढ़ युक्ति-तर्के प्रभु खण्ड खण्ड कैल ॥ 50 ॥
अनुवाद-बौद्धशास्त्र मुख्यतः तर्कपर आधारित हैं
और इनमें नौ प्रधान सिद्धान्त हैं। महाप्रभुने
तर्कके द्वारा ही उनके तर्कका खण्डन कर दिया और
बौद्धाचार्य अपना मत स्थापित न कर सका। बौद्धाचार्यने
अपने नौ प्रधान सिद्धान्तोंके आधारपर सब प्रश्न
उठाये, परन्तु महाप्रभुने दृढ़ युक्ति और तर्कोंसे उनके
समस्त विचारोंका खण्डन कर दिया ॥ 49-50 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-बौद्धमतमें 'हीनायन' और 'महायन'
दो प्रकारके मार्ग है। उस मार्गपर गमन करनेके
प्रस्थान-स्वरूप नौ सिद्धान्त हैं; जैसे-(1) विश्व
अनादि है, इसलिये ईश्वरशून्य है, (2) जगत् असत्य
है, (3) अहंतत्त्व, (4) जन्म-जन्मान्तर (पुनर्जन्म)
और परलोक सत्य हैं, (5) बुद्ध ही तत्त्व-प्राप्तिका
उपाय हैं, (6) निर्वाण (मुक्ति) ही परमतत्त्व है, (7)
बौद्धदर्शन ही वास्तविक दर्शन है, (8) वेद मानवके
द्वारा रचित हैं, (9) दया आदि सद्-धर्मका आचरण
ही बौद्ध-जीवन है ॥ 49 ॥
बौद्धाचार्यकी पराजय देख लोगोंका हास्य :-
दार्शनिक पण्डित सबाइ पाइल पराजय।
लोके हास्य करे, बौद्ध पाइल लज्जा-भय ॥ 51 ॥
अनुवाद-सभी (पाखण्डी) दार्शनिक और पण्डित
महाप्रभुसे पराजित हुए और जब लोग उनपर हँसने
लगे, तब बौद्ध लोग लज्जित और भयभीत हुए ॥ 51 ॥
अनुभाष्य-'दार्शनिक पण्डित सबाइ'-उपस्थित पाखण्डी
दर्शन-आचार्यगण ॥ 51 ॥
वैष्णव सिद्धान्तको श्रवणकर महाप्रभुको वैष्णव सम्प्रदायके
अन्तर्गत जानकर बौद्धाचार्यका षड़यन्त्र :-
प्रभुके वैष्णव जानि' बौद्ध घरे गेल।
सकल बौद्ध मिलि' तबे कुमन्त्रणा कैल ॥ 52 ॥
'महाप्रसाद'के नामपर महाप्रभुको अपवित्र
अन्नके द्वारा छलनेकी चेष्टा :-
अपवित्र अन्न एक थालिते भरिया।
प्रभु-आगे निल 'महाप्रसाद' बलिया ॥ 53 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके विचारोंसे बौद्धलोग जान गये
कि वे वैष्णव हैं। अपने मठमें जाकर सभी बौद्धोंने
मिलकर षड़यन्त्र रचा। उन बौद्धोंने अपवित्र अन्नसे
भरकर एक थाली लाकर महाप्रभुके आगे रख दी और
कहा कि यह भगवान्का 'महाप्रसाद' है ॥ 52-53 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अपवित्र'-वैष्णवोंके द्वारा ग्रहण
करने अयोग्य ॥ 53 ॥
अनुभाष्य-अवैष्णवोंके द्वारा अर्पित नैवेद्य (भोग)
कितना भी सुन्दर रूपमें क्यों ना सजाया गया हो,
उसमें बिन्दुमात्र भी त्रुटि ना हो, हजार बार हजार
मुखोंसे उसे 'महाप्रसाद' कहनेपर भी वास्तवमें उनमें
विष्णुदास्य या चिद्-दर्शनका अभाव अर्थात् उनकी
विष्णुविमुखताके कारण उस अन्नको विष्णु कभी भी
ग्रहण नहीं करते। इसलिये शुद्धवैष्णवदास उसको
'अपवित्र' मानकर कभी भी उसे ग्रहण करते या खाते
नहीं हैं ॥ 53 ॥
जैसा कर्म, वैसा फल :-
हेनकाले महाकाय एक पक्षी आइल।
ओठे करि' थालि-सह अन्न लञा गेल ॥ 54 ॥
बौद्धगणेर उपरे अन्न अमेध्य हञा।
बौद्धाचार्येर माथाय थालि पड़िल बाजिया ॥ 55 ॥
पाखण्डी बौद्धकी सजा :-
तेरछे पड़िल थालि, -माथा काटि' गेल।
मूर्च्छित हञा आचार्य भूमिते पड़िल ॥ 56 ॥
। 347
[ 9/54-63 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—उसी समय वहाँ एक विशाल पक्षी
उड़ता हुआ आया और अपनी चोंचमें अन्न-सहित
थालीको उठाकर ले गया। ऊपर आकाशमें जाकर वह
थाली पक्षीकी चोंचसे छूट गयी और सारा अपवित्र अन्न
उन्हीं बौद्धोंके सिरपर आ गिरा और थाली बौद्धाचार्यके
सिरपर गिरी, जिससे बहुत जोरका शब्द हुआ। वह
थाली तिरछी होकर ऐसे बौद्धाचार्यके सिरपर आकर
गिरी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मूर्च्छित
होकर भूमिपर गिर पड़ा॥54-56॥
गुरुकी दशाको देखकर शिष्योंके द्वारा
महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :-
हाहाकार करि' कान्दे सब शिष्यगण।
सबे आसि' प्रभु-पदे लइल शरण॥57॥
“तुमि त' ईश्वर साक्षात्, क्षम अपराध।
जीयाओ आमार गुरु, करह प्रसाद॥”58॥
अनुवाद—अपने गुरुकी दशा देखकर सभी शिष्य
हाहाकार करते हुए रोने लगे। तब सब आकर
महाप्रभुके चरणोंकी शरण लेकर कहने लगे,–“आप तो
साक्षात् भगवान् हैं, हमारे अपराध क्षमा कीजिये। कृपा
करके हमारे गुरुदेवको पुनः जीवित कर दीजिये॥”57-58॥
शरणागतिके बाद महाप्रभुके द्वारा उन्हें कृष्णनाम-दान :-
प्रभु कहे,–“सबे कह 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि'।
गुरुकर्णे कह कृष्णनाम उच्च करि'॥59॥
महाप्रभुके मुखसे कीर्तित कृष्णनामके श्रवणसे ही अचैतन्य
मायावादी जीवको चेतना एवं वैष्णवताकी प्राप्ति :-
तोमा-सबार गुरु तब पाइबे चेतन।”
सब बौद्ध मिलि' करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥60॥
गुरु-कर्णे कहे सबे 'कृष्ण' 'राम' 'हरि'।
चेतन पाञा आचार्य बोले 'हरि' 'हरि'॥61॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने उनसे कहा,–“तुम सब
मिलकर 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' आदि नामोंका कीर्तन
करो। और अपने गुरुके कानमें भी उच्चस्वरसे
कृष्णनाम कहो, तब तुम सबके गुरुकी चेतनता लौट
आयेगी।” सभी बौद्ध मिलकर कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने
लगे और गुरुके कानमें सब 'कृष्ण' 'राम' 'हरि' नाम
सुनाने लगे। नाम सुनकर बौद्धाचार्यकी चेतना लौट
आयी और वह भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगा॥59-61॥
अनुभाष्य—'सब बौद्ध'—बौद्धगण महाप्रभुके श्रीमुखसे
कृष्णनाम-दीक्षा प्राप्त करनेपर अब पहलेकी भाँति
पाखण्डवत् आचरण करनेवाले बौद्ध नहीं रहे। अब
उन्होंने 'वैष्णव' बनकर जीवोंके स्वरूपधर्म-विष्णुपूजाको
आरम्भ किया।
गुरु ही शिष्यका उद्धार करते हैं अर्थात् वे
अचैतन्य (आत्माको भूले हुए) शिष्यको चैतन्य (आत्माकी
स्मृति) सम्पादन करके विष्णु-पूजाका ज्ञान प्रदान करके
उसे उसमें नियुक्त करते हैं—यही 'दीक्षा' अथवा
दिव्यज्ञान है।
किन्तु यहाँ देखते हैं कि अचेतन बौद्धाचार्यके पूर्व
शिष्योंने ही महाप्रभुकी कृपासे कृष्णनामसे चैतन्य प्राप्त
करके उन नाममात्रके गुरुके कानमें कृष्णनामका
उच्चारण करके आचार्यका कार्य किया। बाहरी दृष्टिकोणसे
बौद्धाचार्य गुरु थे और स्वयंको उनका शिष्य माननेवाले
उनके शिष्य थे। परन्तु इस घटनाके बाद गुरु और
शिष्यकी परस्पर पदवी विपरीत हो गयी। क्योंकि जो
वास्तवमें श्रीकृष्णकृपासे चैतन्य-लाभ करके श्रीकृष्णनामका
उच्चारण करते हैं, वे ही 'गुरु' हैं और अचैतन्य-व्यक्ति
ही 'लघु' अर्थात् उनके शिष्य हैं—यही जगद्गुरु महाप्रभुकी
शिक्षा है॥59-61॥
बौद्धके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्ण जानकर स्तुति :-
कृष्ण बलि' आचार्य प्रभुरे करेन विनय।
देखिया सकल लोक हइल विस्मय॥62॥
महाप्रभुका अन्तर्धान होना :-
एइरूपे कौतुक करि' शचीर नन्दन।
अन्तर्धान कैल, केह ना पाय दर्शन॥63॥
348 ।
नौवाँ अध्याय 9/62–68 ]
अनुवाद—जब बौद्धाचार्यने कृष्ण बोलते हुए महाप्रभुको
आत्म-समर्पण किया, तब यह देखकर उपस्थित सभी
लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। तब श्रीशचीनन्दन एक
और कौतुक करते हुए वहाँसे अन्तर्धान हो गये और
उनको कोई देख नहीं पाया॥ 62–63॥
तिरुपति एवं तिरुमलयमें आगमन और बालाजी-दर्शन :-
महाप्रभु चलि' आइला त्रिपत्ति-त्रिमल्ले।
चतुर्भुज-मूर्त्ति देखि' व्येङ्कटाद्रये चले॥ 64॥
अनुवाद—तब महाप्रभु त्रिपत्ति-त्रिमल्लमें आये। वहाँ
चतुर्भुज श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन करके वे व्येङ्कट-पर्वतकी
ओर गये॥ 64॥
अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा भ्रमण किये गये स्थानोंका
प्रायः ठीक प्रकारसे वर्णन किया जा रहा है—
'तिरुपति' अथवा 'तिरुपट्टूर'—उत्तर आर्कटमें
चन्द्रगिरि-तालुकके अन्तर्गत प्रसिद्ध तीर्थ है। व्येङ्कटेश्वरके
नामसे व्येङ्कट-गिरि अथवा व्येङ्कट-पर्वतके ऊपर आठ
मील दूरीपर 'श्री' और 'भू'—दो शक्तियोंके साथ चतुर्भुज
'बालाजी' अथवा व्येङ्कटेश्वर विष्णु-विग्रह है। इसको
व्येङ्कटक्षेत्र भी कहते हैं। सम्पूर्ण दक्षिण भारतमें यही
एक श्रेष्ठ ऐश्वर्य-सम्पद्-शाली मन्दिर है। आश्विन
मासमें यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है।
'निम्न-तिरुपति'—व्येङ्कट पर्वतकी तलहटीमें स्थित है।
वहाँ कुछ मन्दिर हैं। यहाँ श्रीगोविन्दराज और
श्रीरामचन्द्रजीकी मूर्तियाँ हैं। 'तिरुमल्लय'—सम्भवतः
पर्वतके ऊपर विराजमान तिरुपतिके प्राचीन कालका
नामान्तर है॥ 64॥
व्येङ्कटाचलमें श्रीराम-दर्शन :-
त्रिपत्ति आसिया कैल श्रीराम-दरशन।
रघुनाथ-आगे कैल प्रणाम-स्तवन॥ 65॥
पाना-नृसिंहका दर्शन :-
स्वप्रभावे लोक सबार कराञा विस्मय।
पाना-नृसिंहे आइला प्रभु दयामय॥ 66॥
नृसिंहे प्रणति-स्तुति प्रेमावेशे कैल।
प्रभुर प्रभावे लोक चमत्कार हैल॥ 67॥
अनुवाद—त्रिपत्तिमें आकर महाप्रभुने श्रीरामचन्द्रके
दर्शन किये। उन्होंने श्रीरघुनाथको प्रणाम किया और
उनकी स्तव-स्तुति की। अपने प्रभावसे महाप्रभुने सभी
लोगोंको विस्मित कर दिया। तब दयामय महाप्रभु
पाना-नृसिंहमें आये। महाप्रभुने प्रेमावेशमें नृसिंह भगवान्को
प्रणाम किया और उनकी स्तव-स्तुति की। महाप्रभुके
प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये॥ 65–67॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाना-नृसिंह'—चीनीका पाना अर्थात्
शरबत जिसका भोग श्रीनृसिंहदेवको लगता है॥ 66॥
अनुभाष्य—'पाना-नृसिंह' (पानाकल् नरसिंह)—कृष्णा
जिलेमें विजयवाड़ा शहरसे सात मील दूर 'मङ्गलगिरि'में
स्थित है। छह सौ सीढ़ियाँ चढ़नेके बाद यह प्रसिद्ध
मन्दिर है। प्रवाद (किंवदन्ती)—इन श्रीनृसिंहदेवको
शरबतका भोग लगानेपर, वे शरबतको आधेसे अधिक
ग्रहण नहीं करते। इस मन्दिरमें ताञ्जोरके भूतपूर्व
महाराजाने 'श्रीकृष्णके द्वारा व्यवहार किये गये कहलानेवालें'
एक शङ्खका दान किया था। मार्चके महीनेंमें इस
स्थानपर बहुत बड़ा मेला लगता है॥ 66॥
शिवकाञ्चीमें शिवका दर्शन और महाप्रभुकी कृपासे
शैवोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति :-
शिवकाञ्ची आसिया कैल शिव-दरशन।
प्रभावे 'वैष्णव' कैल सब शैवगण॥ 68॥
अनुवाद—फिर महाप्रभुने शिवकाञ्ची आकर शिवजीका
दर्शन किया। अपने प्रभावसे महाप्रभुने समस्त शैवोंको
वैष्णव बना दिया॥ 68॥
अनुभाष्य—'शिवकाञ्ची'—अर्थात् काञ्चीपुरम, यह
'दक्षिणकाशी'के नामसे जाना जाता है। यहाँ असंख्य
शिवलिङ्ग हैं, उनमेंसे 'एकाम्बर कैलाशनाथ'का मन्दिर
बहुत प्राचीन है॥ 68॥
। 349
[ 9/69–74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
विष्णुकाञ्चीमें लक्ष्मी-नारायणका दर्शन
और वहाँके लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :—
विष्णुकाञ्ची आसि' देखिल लक्ष्मी-नारायण।
प्रणाम करिया कैल बहुत स्तवन॥ 69 ॥
प्रेमावेशे नृत्य-गीत बहुत करिल।
दिन-दुइ रहिं लोके 'कृष्णभक्त' कैल॥ 70 ॥
अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने विष्णुकाञ्ची आकर
श्रीलक्ष्मी-नारायणका दर्शनकर उनको प्रणाम किया
और उनकी बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने
बहुत देर तक नृत्य-गान किया। दो दिन वहाँ रहकर
महाप्रभुने लोगोंको कृष्णभक्त बना दिया॥ 69–70 ॥
अनुभाष्य—'विष्णुकाञ्ची'—काञ्चीपुरमसे पाँच मीलकी
दूरी पर है। यहाँ 'वरदराज' विष्णु-विग्रह और 'अनन्त
सरोवर' है॥ 69 ॥
त्रिकालहस्तीमें शम्भु-दर्शन :—
त्रिमलय देखि' गेला त्रिकालहस्ती-स्थाने।
महादेव देखि' ताँरे करिल प्रणामे ॥ 71 ॥
अनुवाद—त्रिमलयका दर्शन करके महाप्रभु त्रिकालहस्ती
नामक स्थानपर आये। वहाँ महादेवका दर्शन करके
महाप्रभुने उन्हें प्रणाम किया॥ 71 ॥
अनुभाष्य—'त्रिमलय'—ताञ्जोर अथवा तौण्डीर-मण्डलमें
स्थित है।
'त्रिकालहस्ती'—तिरुपतिसे बाइस मील उत्तर-पूर्व
दिशामें सुवर्णमुखी-नदीके दक्षिण-तटपर स्थित है। यह
'श्रीकालहस्ती' अथवा प्रचलित भाषामें 'कालहस्ती'-नामसे
भी जाना जाता है। यह स्थान 'वायुलिङ्ग-शिव'
मन्दिरके लिये विख्यात है। (उत्तर आर्कटम्यानुयेल) ॥ 71 ॥
पक्षीतीर्थमें शिव-दर्शन, वृद्धकोल-तीर्थमें
श्वेतवराह-विग्रहका दर्शन :—
पक्षीतीर्थ देखि' कैल शिव दरशन।
वृद्धकोल-तीर्थे तबे करिला गमन॥ 72 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने पक्षीतीर्थमें आकर शिवजीका
दर्शन किया और वहाँसे वृद्धकोल-तीर्थके लिये गमन
किया॥ 72 ॥
अनुभाष्य—'पक्षीतीर्थ'—तिरुकालुकुन्द्रम्। चेङ्गलपट्टुसे
नौ मील दक्षिण-पूर्वमें, समतल भूमिसे 500 फुट ऊँचे
पर्वतमालाके ऊपर एक शिव-मन्दिर है। इस पर्वतका
नाम वेदगिरि अथवा वेदाचलम् है और मूर्तिका
नाम—वेदगिरिश्वर है। प्रतिदिन दो बाज पक्षी आकर
सेवायेत पुजारीसे आहार प्राप्त करते हैं। वहाँ किंवदन्ती
है कि अनादिकालसे ही ऐसा चला आ रहा है
(चेङ्गलपट्टु म्यानुयेल)।
'वृद्धकोल'—श्रीवराह-विग्रहका मन्दिर; इस मन्दिरकी
विशेषता यह है कि यह केवल एक पत्थरसे ही बना
है। यह 'महाबलीपुरम्' अथवा 'सप्तमन्दिर'के अन्तर्गत
'बलिपीठम्'से प्रायः एक मील दक्षिणमें है। इस मन्दिरके
अन्दर वराहरूपी विष्णुविग्रहके ऊपर 'शेष'-नागने छत्र
धारण किया हुआ है॥ 72 ॥
पीताम्बर-शम्भुका दर्शन :—
श्वेतवराह देखि', ताँरे नमस्करि'।
पीताम्बर-शिव-स्थाने गेला गौरहरि ॥ 73 ॥
अनुवाद—वृद्धकोलमें आकर महाप्रभुने श्वेतवराहका
दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया। फिर श्रीगौरहरि पीताम्बर
शिवजीका दर्शन करनेके लिये गये॥ 73 ॥
अनुभाष्य—'पीताम्बर'—अर्थात् 'चिदाम्बरम्'। यह
'कुडालोर'-नगरसे छब्बीस मील दक्षिणकी ओर स्थित
है। विग्रहका नाम—'आकाशलिङ्ग' शिव है। उनतालीस
एकड़ जमीनके ऊपर बना हुआ यह एक बहुत बड़ा
मन्दिर है। यह चारों ओर साठ फुट चौड़े पक्के रास्तेसे
घिरा हुआ है (दक्षिण आर्कट म्यानुयेल) ॥ 73 ॥
शियाली-भैरवीरूपिणी कात्यायनीका दर्शन :—
शियाली भैरवी देवी करि' दरशन।
कावेरीर तीरे आइला शचीर नन्दन ॥ 74 ॥
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