सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1188, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1188

[ 9/2-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥२॥
महाप्रभुकी दक्षिण-यात्रा :-
दक्षिणगमन प्रभुर अति विलक्षण।
सहस्र सहस्र तीर्थ कैल दरशन ॥ ३ ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी दक्षिण यात्रा बड़ी ही विलक्षण
थी। इस यात्रामें उन्होंने हजारों-हजारों तीर्थोंका दर्शन
किया था॥३॥
महाप्रभुके दर्शनोंके फलस्वरूप तीर्थोंका भी
महातीर्थ होना और उससे लोगोंका उद्धार :-
सेइ सब तीर्थ स्पर्शि’ महातीर्थ कैल।
सेइ छले सेइ देशेर लोक निस्तारिल ॥४॥
अनुवाद-महाप्रभुने उन सब तीर्थोंको स्पर्श करके
उन्हें महातीर्थ बना दिया। तीर्थ दर्शनके बहाने महाप्रभुने
दक्षिण भारतके लोगोंका उद्धार किया॥४॥
महाप्रभुके द्वारा दाँये-बाँये भ्रमणके फलस्वरूप वर्णनमें
भौगोलिक-क्रमभङ्ग, यहाँ केवल दिग्दर्शन मात्र :-
सेइ सब तीर्थेर क्रम कहिते ना पारि।
दक्षिण-वामे तीर्थ-गमन हय फेराफेरि ॥५॥
अतएव नाममात्र करिये गणन।
कहिते ना पारि तार यथा अनुक्रम ॥६॥
अनुवाद-(ग्रन्थकार कह रहे हैं) - महाप्रभु जिन-जिन
तीर्थोंमें गये, मैं काल और भौगोलिक क्रमानुसार उन
सबको नहीं लिख सकता, क्योंकि वे तीर्थ-भ्रमणमें
कभी दाहिनीसे बाँये दिशाकी ओर, और बाँयेसे दाहिनी
दिशाकी ओर जाते थे। इसलिये मैं केवल उन तीर्थोंके
नामोंका उल्लेख कर रहा हूँ, क्रमानुसार उन तीर्थोंका
वर्णन नहीं कर पाऊँगा॥ ५-६ ॥
महाप्रभुके दर्शनमात्रसे लोगोंमें वैष्णवता :-
पूर्ववत् पथे याइते ये पाय दरशन।
येइ ग्रामे याय, से ग्रामेर यत जन ॥७॥
सबेइ वैष्णव हय, कहे ‘कृष्ण’ ‘हरि’।
अन्य ग्राम निस्तारये सेइ ‘वैष्णव’ करि’॥८॥
अनुवाद-पहले जैसे वर्णन किया है, मार्गमें
महाप्रभुके दर्शन करनेवाले व्यक्ति और महाप्रभु जिस
गाँवमें जाते, उस गाँवके सभी लोग वैष्णव बनकर
‘कृष्ण’ ‘हरि’ कीर्तन करने लगते। इस प्रकार महाप्रभु
अन्य जिन भी ग्रामोंमें गये वहाँके वासी सभी वैष्णव
बन गये और उनका उद्धार हो गया॥ ७-८॥
उस समय दक्षिणदेशके लोगोंकी अवस्था :-
दक्षिण देशेर लोक अनेक प्रकार।
केह ज्ञानी, केह कर्मी, पाषण्डी अपार ॥९॥
अनुवाद-दक्षिण भारतमें अनेक प्रकारके लोग थे।
कोई तार्किक ज्ञानी, और कोई कर्मी थे तथा पाखण्डी
तो अपार थे॥९॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘पाषण्डी' - शुद्धभक्तिविरुद्ध ज्ञानी
और कर्मवादी ॥९॥
महाप्रभुकी कृपासे कर्मी, ज्ञानी और
पाखण्डीको भी वैष्णवताकी प्राप्ति :-
सेइ सब लोक प्रभुर दर्शनप्रभावे।
निज-निज-मत छाड़ि’ हइल वैष्णवे ॥१०॥
अनुवाद-वे सब लोग महाप्रभुके दर्शनके प्रभावसे
अपने-अपने मतको छोड़कर वैष्णव बन गये॥१०॥
रामोपासक माधव और ‘श्रीवैष्णवों'के
द्वारा कृष्णभजन आरम्भ :-
वैष्णवेर मध्ये राम-उपासक सब।
केह हय ‘तत्त्ववादी’, केह हय ‘श्रीवैष्णव’ ॥११॥
सेइ सब वैष्णव महाप्रभुर दर्शने।
कृष्ण-उपासक हैल, लय कृष्णनामे ॥ १२॥
अनुवाद-दक्षिण भारतके वैष्णवोंमें अधिकांश
श्रीरामचन्द्रके उपासक थे। अन्य कोई ‘तत्त्ववादी’ और
340 ।