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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 989

चौथा अध्याय 4/209–213 ]
अनुभाष्य—'गोङाइल'—बितायी ॥ 209 ॥
इस आख्यानके द्वारा महाप्रभु और उनके भक्तोंकी अपूर्व
प्रीति और गुणोंकी महिमाका वर्णन :—
एइ त' आख्याने कहिला दोँहार महिमा।
प्रभुर भक्तवात्सल्य, आर भक्तप्रेम-सीमा ॥ 210 ॥
भक्त-सङ्गे श्रीमुखे प्रभु कैला आस्वादन।
गोपाल-गोपीनाथ-पुरीगोसाञिर गुण ॥ 211 ॥
श्रद्धायुक्त हञा इहा सुने येइ जन।
श्रीकृष्ण-चरणे सेइ पाय प्रेमधन ॥ 212 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 213 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीमाधवेन्द्रपुरी-
चरितामृतास्वादनं नाम चतुर्थः परिच्छेदः।
अनुवाद—भगवान्‌का भक्तवात्सल्य और उनके भक्तोंके
प्रेमकी सीमा,—महाप्रभुने इस आख्यानमें इन दोनोंकी
महिमाका वर्णन किया है। इस प्रकार भक्तोंके साथ
महाप्रभुने अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हुए श्रीगोपाल,
श्रीगोपीनाथ और श्रीमाधवेन्द्रपुरीके गुणोंका आस्वादन
किया। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस आख्यानको सुनता
है, उसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमधनकी प्राप्ति होती है।
श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा
करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर
रहा है॥ 210-213 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी-
चरितामृतास्वादन नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त।
अनुभाष्य—प्रभु और भक्तोंका, दोनोंका एक-दूसरेके
प्रति जो प्रेम है, वह अतुलनीय है ॥ 210 ॥
चौथे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
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