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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 988, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 988

[ 4/198-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
विवश होकर महाप्रभु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
हड़बड़ाकर तुरन्त ही श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको
अपनी गोदमें ले लिया और श्रीगौरचन्द्र क्रन्दन करते
हुए उठ बैठे। महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें उन्मादग्रस्त होकर
हुँकार करके, हँसते, रोते, नाचते और गाते हुए
इधर-उधर दौड़ने लगे। वे बार-बार 'अयि दीन', अयि
दीन' बोलने लगे, किन्तु उसके आगे श्लोकका
उच्चारण करनेके लिये उनके कण्ठसे वाणी नहीं
निकली और उनके नेत्रोंसे अश्रुऑंकी धाराएँ बहने
लगीं। कम्प, स्वेद, पुलक, अश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य, निर्वेद,
विषाद, जाड्य, गर्व, हर्ष और दैन्य आदि अष्ट-सात्त्विक
और सञ्चारी भाव उनके श्रीअङ्गोंमें प्रकाशित होने
लगे। इस श्लोकमें महाप्रभुने प्रेमके कपाट खोल दिये,
तब श्रीगोपीनाथके सेवकोंने महाप्रभुको प्रेमके आवेशमें
नृत्य करते देखा॥ 198-203 ॥
अनुभाष्य- 'जाड्य'-भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“जाड्यमप्रतिपत्तिः स्यादिष्टानिष्टश्रुतीक्षणैः।
विरहाद्यैश्च तन्मोहात् पूर्वावस्था पराऽपि च॥”
“इष्ट और अनिष्टके श्रवण, दर्शन और विरह
आदिके द्वारा जो विचारशून्यता होती है, उसको 'जाड्य'
कहते हैं। यह मोहके पहले और बादकी अवस्था है।
'प्रेमानाट'—प्रेमके आवेशमें नृत्य ॥ 202-203 ॥
महाप्रभुकी बाह्यदशा और श्रीगोपीनाथकी भोगारति :-
लोकेर संघट्ट देखि' प्रभुर बाह्य हैल।
ठाकुरेर भोग सरि' आरति बाजिल ॥ 204 ॥
अनुवाद-लोगोंके जमघटको देखकर महाप्रभुकी
बाह्य चेतना लौट आयी। तभी श्रीगोपीनाथजीका भोग
लगना समाप्त हुआ और आरतीका घण्टा बजने
लगा ॥ 204 ॥
पुजारीके द्वारा महाप्रभुके लिये
बारह पात्रोंमें खीर लाना :-
ठाकुरे शयन कराञा पूजारी हैल बाहिर।
प्रभुर आगे आनि' दिल प्रसाद बार क्षीर ॥ 205 ॥
अनुवाद-आरतीके बाद श्रीगोपीनाथजीको शयन
कराकर पुजारी बाहर आया और उसने बारहके बारह
खीरके पात्र महाप्रभुको लाकर दे दिये ॥ 205 ॥
अनुभाष्य- 'बार'-बारह खीरसे भरे पात्र ॥ 205 ॥
खीरको देखनेसे महाप्रभुको आनन्द और पाँच पात्रोंको
ग्रहण करके सात पात्रोंको वापिस देना :-
क्षीर देखि' महाप्रभुर आनन्द बाड़िल।
भक्तगणे खाओयाइते पञ्च क्षीर लैल ॥ 206 ॥
सात क्षीर पूजारीके बाहुड़िया दिल।
पञ्चक्षीर पञ्चजने बाँटिया खाइल ॥ 207 ॥
गोपीनाथ-रूपे यदि करियाछेन भोजन।
भक्ति देखाइते कैल प्रसाद भक्षण ॥ 208 ॥
अनुवाद-खीर-प्रसादको देखकर महाप्रभुको बहुत
आनन्द हुआ। उन्होंने भक्तोंको खिलानेके उद्देश्यसे
केवल खीरके केवल पाँच पात्र ही लिये और बचे हुए
सात पात्रोंको पुजारीको लौटा दिया। उन पाँच खीरके
पात्रोंको महाप्रभु और उनके साथ चार भक्तोंने बाँटकर
खा लिया। यद्यपि श्रीगोपीनाथ-विग्रहके रूपमें महाप्रभुने
पहलेसे ही समस्त खीरका भोजन किया था, परन्तु
लोकशिक्षाके लिये भक्ति दिखाते हुए फिरसे महाप्रसादका
सेवन किया ॥ 206-208 ॥
अनुभाष्य- 'बाहुड़िया'-आगे बढ़कर लौटाना। यद्यपि
श्रीमन्महाप्रभुने श्रीगोपीनाथ-विग्रहके रूपमें इस खीरका
पहले ही भोजन किया था, तथापि लोकशिक्षकके रूपमें
उन्होंने श्रीकृष्णभजन प्रदर्शित करनेके लिये
खीर-महाप्रसादका सम्मान किया ॥ 207-208 ॥
प्रातःकाल होनेपर वहाँसे पुरीकी ओर यात्रा :-
नाम-सङ्कीर्त्तने सेइ रात्रि गोङाइला।
मङ्गल-आरति देखि' प्रभाते चलिला ॥ 209 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने भक्तोंके साथ नाम-सङ्कीर्तन
करते हुए वह रात बितायी। प्रभात होनेपर मङ्गल-आरतीका
दर्शन करके आगे चल दिये ॥ 209 ॥
138 ।