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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 954, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 954

तीसरा अध्याय 3/157-166 ]
सबाकारे वासा दिल-भक्ष्य, अन्नपान।
बहुदिन आचार्य-गोसाञि कैल समाधान ॥ 158 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको मिलनेके लिये जितने भी
भक्त नवद्वीप और अनेक गाँवोंसे आये थे, बहुत दिनों
तक श्रीअद्वैताचार्यने उन सबके लिये रहनेके स्थान तथा
भोजन आदिकी सारी व्यवस्था की ॥ 157-158 ॥
अच्युत आचार्यका अच्युत भण्डार :-
आचार्य-गोसाञिर भाण्डार-अक्षय, अव्यय।
यत द्रव्य व्यय करे, तत द्रव्य हय ॥ 159 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यका भण्डार अक्षय तथा अव्यय
था। वे जितने द्रव्य व्यय करते, उतने ही द्रव्य फिर
आ जाते ॥ 159 ॥
शचीमाताके द्वारा बनाये अन्नसे महाप्रभुका भोजन :-
सेइ दिन हैते शची करेन रन्धन।
भक्तगण लञा प्रभु करेन भोजन ॥ 160 ॥
अनुवाद-उस दिनसे शचीमाता स्वयं भोजन बनाती
थीं और सभी भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभु भोजन
करते थे ॥ 160 ॥
दिनके समय आचार्यका और रातके समय अन्य-अन्य
लोगोंको महाप्रभुका दर्शन :-
दिने आचार्येर प्रीति-प्रभुर दर्शन।
रात्रे लोक देखे प्रभुर नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ 161 ॥
अनुवाद-दिनमें जो लोग आते, वे महाप्रभुके
साथ-साथ श्रीअद्वैताचार्यके उनके प्रति प्रीतिपूर्ण व्यवहारके
भी दर्शन करते। रातके समय वे महाप्रभुके नृत्यके
दर्शन करते और उनके कीर्त्तनको सुनते ॥ 161 ॥
कीर्त्तनके समय भावावेशमें महाप्रभुका भूमिपर गिरना :-
कीर्त्तन करिते प्रभुर सर्वभावोदय।
स्तम्भ, कम्प, पुलकाश्रु, गदगद, प्रलय ॥ 162 ॥
अनुवाद-कीर्तन करते समय महाप्रभुमें स्तम्भ,
कम्प, पुलक, अश्रु, गदगद-कण्ठ और प्रलय (मूर्च्छा)
आदि सभी सात्त्विक भाव उदित हो जाते ॥ 162 ॥
अनुभाष्य-‘पुलकाश्रु'-भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“हर्षरोषविषादाद्यैरश्रुनेत्रे जलोद्गमः।
हर्षजेऽश्रुणि शीतत्वमौष्णयं रोषादिसम्भवे।
सर्वत्रनयनक्षोभ रागसमार्जनादयः ॥ ”
अर्थात् “हर्ष, क्रोध और विषाद आदिसे बिना
किसी प्रयत्नके नेत्रोंसे जो जल गिरता है, वही
‘पुलकाश्रु' है। हर्षसे उत्पन्न अश्रुओंमें शीतलता, क्रोधसे
उत्पन्न अश्रुओंमें उष्णता तथा दोनों प्रकारके पुलकसे
नयनक्षोभ (नेत्रोंमें चञ्चलता) तथा राग समार्जनादि होता
है।”
'प्रलय'-भःरःसिः, दःविः, तृतीय लः-
“प्रलयः सुखदुःखाम्यां चेष्टाज्ञाननिराकृतिः।
अत्रानुभावाः कथिता महीनिपतनादयः ॥ ”
अर्थात् “सुख और दुःख-दोनों प्रकारकी चेष्टासे
ज्ञान दूर हो जाता है। इसी प्रकार प्रलयमें भूमिपर
गिरना आदि सभी अनुभाव दिखायी देते हैं।”
'सर्वभाव' अर्थात् स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद,
कम्प, वैवर्ण्य, पुलकाश्रु और प्रलय-ये अष्ट-सात्त्विक
विकार ॥ 162 ॥
स्नेह-सिक्त भयसे विह्वल शचीमाताकी
पुत्रके स्वास्थ्यके लिये श्रीविष्णुसे प्रार्थना :-
क्षणे क्षणे पड़े प्रभु आछाड़ खाञा।
देखि' शचीमाता कहे रोदन करिया ॥ 163 ॥
“चूर्ण हैल, हेन वासों निमाञि-कलेवर।”
हाहा करि' विष्णु-पाशे मागे एड वर ॥ 164 ॥
“बाल्यकाल हैते तोमार ये कैलुँ सेवन।
तार प्रतिफल मोरे देह, नारायण ॥ 165 ॥
ये-काले निमाञि पड़े धरणी-उपरे।
व्यथा येन नाहि लागे निमाञि-शरीरे ॥ ”166 ॥
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