श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 953, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/145-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
शचीमाताके कहे स्थानपर महाप्रभुकी रहनेकी प्रतिज्ञा :-
तुमि याँहा कह, आमि ताँहाइ रहिब।
तुमि येइ आज्ञा कर, सेइ से करिब॥”148॥
अनुवाद-महाप्रभु भी रोते हुए कहने लगे,-“मेरी
प्यारी माता! सुनो, यह शरीर तुम्हारा ही है, मेरा कुछ
भी नहीं है। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है और आपने
ही मेरे इस शरीरका पालन-पोषण किया है। मैं करोड़ों
जन्मोंमें भी आपके इस ऋणको नहीं चुका सकता।
जानकर अथवा न जानकर यद्यपि मैंने संन्यास ग्रहण
किया है, तथापि मैं कभी भी आपके प्रति उदासीन नहीं
होऊँगा। आप मुझे जहाँ कहेंगी, मैं वहीं रहूँगा। आप
मुझे जो आज्ञा देंगी, मैं वैसा ही करूँगा॥ 145-148॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आइ'-आर्या, शचीमाता ॥ 145॥
महाप्रभुका प्रणाम और शचीमाताका स्नेह भावसे
महाप्रभुको अपनी गोदमें धारण करना :-
एत बलि' पुनः पुनः करे नमस्कार।
तुष्ट हञा आइ कोले करे बार-बार ॥ 149॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु बार-बार माताको
प्रणाम करने लगे और शचीमाता भी सन्तुष्ट होकर
उनको बार-बार गोदमें लेने लगीं॥ 149॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन और प्रेमालिङ्गन :-
तबे आइ लञा आचार्य गेला अभ्यन्तरे।
भक्तगण मिलिते प्रभु हइला सत्वरे ॥ 150 ॥
एके एके मिलिला प्रभु सब भक्तगणे।
सबार मुख देखि' करे दृढ़ आलिङ्गने ॥ 151 ॥
अनुवाद-तब श्रीअद्वैताचार्य शचीमाताको घरके
भीतर ले गये। महाप्रभु तब सभी भक्तोंसे मिलने लगे।
एक-एक करके महाप्रभु सभी भक्तोंसे मिले और
सभीके मुखको देखकर वे उन्हें गाढ़ आलिङ्गन करने
लगे॥ 150-151॥
महाप्रभुके दर्शनसे भक्तोंका सुख
आत्मइन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा नहीं :-
केश ना देखिया भक्त यद्यपि पाय दुःख।
सौन्दर्य देखिते तबु पाय महासुख ॥ 152 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके केशोंको न देखकर यद्यपि
भक्तोंको दुःख हो रहा था, तथापि महाप्रभुके सौन्दर्यको
देखकर उन्हें अत्यन्त सुख भी हुआ॥ 152 ॥
नवद्वीपवासी भक्तगण :-
श्रीवास, रामाइ, विद्यानिधि, गदाधर।
गङ्गादास, वक्रेश्वर, मुरारि, शुक्लाम्वर ॥ 153 ॥
बुद्धिमन्त खाँन, नन्दन, श्रीधर, विजय।
वासुदेव, दामोदर, मुकुन्द, सञ्जय ॥ 154 ॥
कत नाम लइब यत नवद्वीपवासी।
सबारे मिलिला प्रभु कृपादृष्ट्ये हासि' ॥ 155 ॥
अनुवाद-श्रीवास, श्रीरामाइ, श्रीविद्यानिधि, श्रीगदाधर,
श्रीगङ्गादास, श्रीवक्रेश्वर, श्रीमुरारि, श्रीशुक्लाम्बर, श्रीबुद्धिमन्त
खाँन, श्रीनन्दन, श्रीधर, श्रीविजय, श्रीवासुदेव, श्रीदामोदर,
श्रीमुकुन्द और श्रीसञ्जय आदि जितने नवद्वीपवासी
भक्त वहाँ आये थे, कहाँ तक उन सबके नामोंका
उल्लेख करूँ? महाप्रभु मन्द-मन्द मुसकानके साथ
कृपादृष्टि वर्षण करते हुए सबसे मिले॥ 153-155 ॥
अद्वैतभवन-वैकुण्ठ, सब समय हरिसेवामय :-
आनन्दे नाचये सबे बलि' 'हरि' 'हरि'।
आचार्य-मन्दिर हैल श्रीवैकुण्ठपुरी ॥ 156 ॥
अनुवाद-सभी आनन्दपूर्वक नाचते हुए 'हरि' 'हरि'
बोल रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका घर श्रीवैकुण्ठपुरी
बन गया ॥ 156 ॥
एकत्रित सभी लोगोंको श्रीअद्वैताचार्यके
द्वारा स्थान और भोजन प्रदान :-
यत लोक आइल महाप्रभुके देखिते।
नाना-ग्राम हैते, आर नवद्वीप हैते ॥ 157 ॥
102 ।