श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 852, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
मध्यलीला (प्रथम भाग) अध्याय-विवरण
पहला अध्याय— 3-48
मध्य और अन्त्य लीलाकी भूमिका या सूत्रवर्णन।
दूसरा अध्याय— 51-79
अन्तिम 12 वर्ष गम्भीरामें अन्तरदशामें अवस्थित
महाप्रभुका श्रीराधाके आवेशमें दिव्योन्माद और प्रलाप
आदि, एवं श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थके मूल आधारका
कथन।
तीसरा अध्याय— 81-110
संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभुका राढ़देशमें
भ्रमण, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चेष्टासे शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके
घरमें आकर शचीमाताके द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण
करना और नृत्य-कीर्तनलीला, पुरीमें निवास स्वीकार
और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि चार भक्तोंके साथ पुरीकी
यात्रा।
चौथा अध्याय— 113-139
रेमुणामें उपस्थित होकर श्रीनित्यानन्द आदिको
श्रीईश्वरपुरीके मुखसे सुनी हुयी श्रीमाधवेन्द्र पुरी गोस्वामीके
द्वारा गोवर्धनधारी गोपालकी प्रतिष्ठा और अन्नकूट
महोत्सव, श्रीमाधवेन्द्रपुरीके रेमुणामें आनेपर श्रीगोपीनाथके
द्वारा उनके लिये क्षीरकी चोरी एवं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके
द्वारा चन्दन-कर्पूर संग्रह करके श्रीगोपीनाथके अङ्गमें
लेपन आदिका वृत्तान्त वर्णित है।
पाँचवाँ अध्याय— 141-159
साक्षीगोपालमें आनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखसे
महाप्रभु आदिका बड़े ब्राह्मण, छोटे ब्राह्मण और साक्षी
गोपालके चरित्रका श्रवण, कमलपुरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके
द्वारा महाप्रभुका दण्ड भङ्ग, आठारनालामें आनेपर दण्ड
भङ्गकी बात सुनकर महाप्रभुका अकेले पुरीमें आगमन
और श्रीजगन्नाथजीके दर्शनसे मूर्च्छाकी प्राप्ति।
छठा अध्याय— 161-209
श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द आदिके द्वारा महाप्रभुका
दर्शन, महाप्रभुको बाह्य दशाकी प्राप्ति, सभीके द्वारा
प्रसादका सम्मान। अन्य एक दिन महाप्रभुके परमेश्वरत्वके
सम्बन्धमें श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ सशिष्य श्रीभट्टाचार्यका
कुतर्क, मायावादी पण्डित सार्वभौमके मुखसे सात दिन
चुपचाप वेदान्त व्याख्याका श्रवण और वेदान्तके
निर्विशेष ब्रह्मपरतारूप कुतर्कका खण्डन। श्रीसार्वभौमके
द्वारा ‘आत्मारामश्च’ श्लोककी नौ प्रकारकी व्याख्या,
महाप्रभुकी उन नौ प्रकारके अतिरिक्त अठारह प्रकारकी
व्याख्या; श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पराजय, श्रीसार्वभौमको
चतुर्भुज और द्विभुजरूपका प्रदर्शन और उद्धारका
साधन।
सातवाँ अध्याय— 211-230
कृष्णदास ब्राह्मणके साथ महाप्रभुकी दक्षिणयात्रा,
मार्गमें प्रत्येक ग्राम और नगरवासियोंको वैष्णव बनाना
और कूर्मस्थानमें वासुदेव ब्राह्मणको कुष्ठरोगसे मुक्त
करना।
आठवाँ अध्याय— 233-337
गोदावरी तटपर श्रीरामनान्दके साथ महाप्रभुका
iv ।