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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 720

[ 14/67-72
अनुवाद-लक्ष्मीदेवीने महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें पुष्पके
साथ चन्दन प्रदान किया और मल्लिकाके फूलोंकी
माला उनके गलेमें देकर उनकी वन्दना की॥67॥
महाप्रभुका सन्तोष :-
प्रभु ताँर पूजा पाञा हासिते लागिला।
श्लोक पड़ि' ताँर भाव अङ्गीकार कैला ॥ 68 ॥
अनुवाद-उनकी पूजा पाकर महाप्रभु हँसने लगे
और उन्होंने एक श्लोक पढ़कर लक्ष्मीदेवीके भावोंको
ग्रहण किया॥68॥
अनुभाष्य-‘वल्लभाचार्य' नवद्वीपवासी राजपण्डित थे।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 44वाँ श्लोक)—
“पुरासीत् जनको राजा मिथिलाधिपतिर्महान्।
अधुना वल्लभाचार्य भीष्मकोऽपि च सम्मतः ॥ 44 ॥”
“मिथिला अधिपति महान् राजा जनक अब
श्रीवल्लभाचार्य हैं। कोई-कोई इन्हें (श्रीरुक्मिणीके पिता)
भीष्मक भी कहते हैं।” श्रीगौरहरिने प्रथम विवाह इनकी
कन्या 'लक्ष्मीप्रिया' देवीसे किया।
'लक्ष्मीदेवी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 45वाँ श्लोक)—
“श्रीजानकी रुक्मिणी च 'लक्ष्मी' नाम्नी च तत्सुता।”
“श्रीजानकी और श्रीरुक्मिणी एक साथ मिलकर
श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी हुई हैं।”
श्रीचैतन्यचरितमें-
“व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा।
सा वल्लभाचार्य-सुता चलन्ती स्नातुं सखीभिः सुरदीर्घिकायाः।
लक्ष्मीरनेनैव कृतावसारा प्रभोर्ययौ लोचनवर्त्म तत्र॥”
“वल्लभाचार्यकी कन्या श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी, जो स्वयं
लक्ष्मीका अवतार हैं, जिस समय सखियोंके साथ
गङ्गा-स्नानके लिये जा रही थीं, तभी अकस्मात्
महाप्रभुकी दृष्टि उनपर पड़ी।” ॥ 62-68 ॥
श्रीमद्भागवत (10/22/25)-
सङ्कल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम्।
मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ 69 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥69॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे साध्वियों ! तुम सबकी पूजाका
तात्पर्य मैं जान गया हूँ, इससे मुझे विशेष आनन्दकी
प्राप्ति हुई है। तुम्हारी अभिलाषाएँ निश्चित ही सिद्ध
होने योग्य हैं॥69॥
अनुभाष्य-श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी अभिलाषासे कात्यायनी
व्रत करनेवाली गोपियोंके वस्त्रहरणके पश्चात् उन्हें
फिरसे वस्त्र लौटा देनेपर उन सबकी कृष्णकामनाको
देखकर श्रीकृष्णने कहा,–
हे साध्व्यः (सत्यः)! मदर्च्चनं (मत्प्राप्त्यर्थं अर्च्चनं तदेव)
भवतीनां (गोपीनां) सङ्कल्पः (मनोरथः, मनोगतभावः इत्यर्थः,
युष्माभिः लज्जया अकथितः अपि) मया विदितः [सन्]
अनुमोदितः (स्वीकृतः); [अतः] सः असौ [सङ्कल्पः] सत्यः
(यथार्थः) भवितुम् अर्हति (योग्यो भवति)।
श्लोक भावानुवाद-हे साध्वियों ! तुम सबकी पूजाका
मनोभाव तुम्हारे लज्जाके कारण नहीं बतानेपर भी मैं
जान गया हूँ और यह मेरे द्वारा अनुमोदित है। इसलिये
तुम्हारा सङ्कल्प सत्य होनेके योग्य है॥69॥
एइमत लीला दुँहे करि' गेला घरे।
गम्भीर चैतन्य-लीला के बुझिते पारे ॥ 70 ॥
अनुवाद-इस प्रकारकी लीलाके बाद दोनों अपने-अपने
घर चले गये। चैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अत्यन्त
गम्भीर है, उनके अन्तरङ्ग भक्तोंके अतिरिक्त इनको
कौन समझ सकता है? ॥ 70 ॥
महाप्रभुका लीला-चापल्य देखकर सभीका अभियोग :-
चैतन्य-चापल्य देखि' प्रेमे सर्वजन।
शची-जगन्नाथे देखि' देन ओलाहन ॥ 71 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी चपलताको सभी
लोग प्रेमसे देखते, परन्तु जब वे शचीमाता और
जगन्नाथ मिश्रसे मिलते, तो उन्हें उलाहना भी देते॥71॥
शचीकी निमाइको पकड़नेकी चेष्टा :-
एकदिन शची-देवी पुत्रेरे भर्त्सिया।
धरिबारे गेला पुत्रे, गेला पलाइला ॥ 72 ॥
184 | श्रीचैतन्यचरितामृत