श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 716, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/44-53
महाप्रभुको सान्त्वना और महाप्रभुका लज्जित होना :-
तबे शची कोले करि' कराइल सन्तोष।
लज्जित हइला प्रभु जानि' निज-दोष ॥ 44 ॥
अनुवाद-तब शचीमाताने निमाइको गोदमें लेकर
शान्त किया और महाप्रभु भी अपने दोषको जानकर
लज्जित हुए ॥ 44 ॥
मातापर प्रहार, माताको मूर्छित देखकर
दुष्प्राप्य नारियल लाना :-
कभु मृदुहस्ते कैल माताके ताड़न।
माताके मूर्च्छिता देखि' करये क्रन्दन ॥ 45 ॥
नारीगण कहे,—"नारिकेल देह आनि'।
तबे सुस्थ हइबेन तोमार जननी ॥" 46 ॥
बाहिरे याञा आनिलेन दुइ नारिकेल।
देखिया अपूर्व हैला विस्मित सकल ॥ 47 ॥
अनुवाद-किसी समय महाप्रभुने अपने कोमल
हाथोंसे माताको बाल्यभावसे पीटा और माता मूर्च्छित
होने का अभिनय करने लगीं, जिसे देखकर महाप्रभु
रोने लगे। तब अन्य स्त्रियोंने महाप्रभुसे कहा,—"माताको
नारियल लाकर दो, तभी वह स्वस्थ हो सकती है।"
यह सुनकर तत्क्षण महाप्रभु बाहरसे दो नारियल ले
आये, जिसे देखकर सभी अत्यन्त विस्मित हो
गये ॥ 45-47 ॥
अनुभाष्य-लोचनदास ठाकुरकृत चैतन्यमङ्गलमें
आदि-
"तँहि एक दिव्य नारी कहिल हासिया।
चिबुक धरिया विश्वम्भरे बले वाणी।
नारिकेल फल दुइ माये देह आनि'॥
तबे से जीयये शची-एड़ तोर माता।
×× इहा शुनि' विश्वम्भर हरिष हइला।
तखनि युगल नारिकेल आनि' दिला॥"
"तब एक दिव्य नारीने विश्वम्भरकी ठोडी पकड़कर
हँसकर कहा कि तुम दो नारियलके फल लाकर दो,
तभी तुम्हारी शचीमाता जीवित होगी। यह सुनकर
विश्वम्भर हर्षित हो गये और वे दो नारियल लेकर
आये ॥" 46 ॥
स्नानके समय कुमारी कन्याओंके साथ कौतुक :-
कभु शिशु-सङ्गे स्नान करिल गङ्गाते।
कन्यागण आइला ताँहा देवता पूजिते ॥ 48 ॥
गङ्गास्नान करि' पूजा करिते लागिला।
कन्यागण-मध्ये प्रभु आसिया बसिला ॥ 49 ॥
अनुवाद-एक दिन अन्य बालकोंके साथ महाप्रभु
गङ्गामें स्नान कर रहे थे। उसी समय कुछ कन्याएँ
देवपूजनके लिये वहाँ आयीं। गङ्गा स्नानके बाद जब वे
देवपूजा करने लगीं, तब महाप्रभु कन्याओंके बीचमें
झटसे जाकर बैठ गये ॥ 48-49 ॥
कन्याओंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :-
कन्यारे कहे,—"आमा पूज, आमि दिब वर।
गङ्गा-दुर्गा-दासी मोर, महेश-किङ्कर ॥" 50 ॥
आपनि चन्दन परि' परेन फुलमाला।
नैवेद्य काड़िया खांन-सन्देश, चाल, कला ॥ 51 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कन्याओंसे कहा,—"तुम मेरी
पूजा करो और मैं तुम्हें वरदान दूँगा। गङ्गा, दुर्गा तो
मेरी दासियाँ हैं और महेश मेरे दास हैं।" यह कहकर
महाप्रभुने स्वयं ही चन्दन और फूल-मालाएँ उठाकर
अपने अङ्गोंपर धारण कर लिये तथा सन्देश, चावल,
केला आदि नैवेद्य छीनकर खाने लगे ॥ 50-51 ॥
कन्याओंकी प्रत्युक्ति :-
क्रोधे कन्यागण कहे,—"शुन, हे निमाञि।
ग्राम-सम्बन्धे हओ तुमि आमा सबार भाइ ॥ 52 ॥
आमा सबार पक्षे इहा कहिते ना युयाय।
ना लह देवता-सज्ज, ना कर अन्याय ॥" 53 ॥
अनुवाद-वे कन्याएँ क्रोधित होकर कहने लगीं,—"हे
निमाइ, सुनो! ग्रामके सम्बन्धसे तुम हमारे भाई लगते
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