श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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शुभाशुभ-निर्णयकी व्यवस्था करते हैं। इस गणनासे भी
नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने महाप्रभुके सुलक्षण दर्शन किये॥ 90 ॥
चन्द्रमाको तिरस्कार करते हुए ही
जैसे श्रीगौरचन्द्रका उदय :-
अ-कलङ्क गौरचन्द्र दिला दरशन।
स-कलङ्क चन्द्रे आर कोन् प्रयोजन ॥ 91 ॥
चन्द्रग्रहण और उसके उपलक्ष्यमें
जीवोंका हरिनाम्-ग्रहण :-
एत जानि' चन्द्रे राहु करिला ग्रहण।
'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' नामे भासे त्रिभुवन ॥ 92 ॥
जय जय ध्वनि हैल सकल भुवन।
चमत्कार हैया लोक भावे मने मन ॥ 93 ॥
जीवोंके हरिनाम ग्रहणकालमें महाप्रभुका अवतार :-
जगत् भरिया लोक बोले—'हरि' 'हरि'।
सेइक्षणे गौरकृष्ण भूमे अवतरि ॥ 94 ॥
अनुवाद—जब निष्कलङ्क श्रीगौरचन्द्र प्रकट होकर
दर्शन दे रहे हैं, तब कलङ्कयुक्त चन्द्रमासे क्या
प्रयोजन ? यह जानकर राहुने चन्द्रमाको ग्रास कर
लिया। उस समय 'कृष्ण-कृष्ण' और 'हरि-हरि' नामसे
तीनों लोक परिपूर्ण हो गये। सभी लोकोंमें जय-जयकारकी
ध्वनि होने लगी और लोग मन-ही-मन चमत्कारका
अनुभव करने लगे। जिस समय सारे जगत्के लोग
'हरि-हरि' बोल रहे थे, उसी क्षण श्रीगौरकृष्ण पृथ्वीपर
अवतरित हुए॥ 91-94 ॥
उस समय यवनोंके द्वारा भी उपहासके
छलसे हरिनाम-ग्रहण :-
प्रसन्न हइल सब जगतेर मन।
'हरि' बलि' हिन्दुके हास्य करये यवन ॥ 95 ॥
स्वर्गमें देवताओंको आनन्द :-
'हरि' बलि' नारीगण देइ हुलाहुलि।
स्वर्ग वाद्य-नृत्य करे देव कुतूहली ॥ 96 ॥
सर्वत्र आनन्दकी लहर :-
प्रसन्न हैल दशदिक्, प्रसन्न नदीजल।
स्थावर-जङ्गम हैल आनन्दे विह्वल ॥ 97 ॥
अनुवाद—समस्त जगतवासियोंका मन तब प्रसन्न हो
गया और यहाँ तक यवन लोग भी 'हरि-हरि' बोलकर
हिन्दुओंसे उपहास करने लगे। 'हरि-हरि' बोलकर
महिलाएँ 'हुलाहुलि' ध्वनि करने लगीं। स्वर्गके देवता भी
आनन्दसे वाद्य बजाते हुए नृत्य करने लगे। दसों
दिशाएँ प्रफुल्लित हो गयीं, आनन्दसे नदियोंके जलमें
उत्ताल तरङ्गों उठने लगीं। सभी चल-अचल प्राणी
आनन्दमें विह्वल हो गये॥ 95-97 ॥
अमृतानुकणिका—शास्त्रोंमें तन्त्री, ताल, झाँझ, नगाड़ा
और तुरही—इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द एवं
वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शङ्खध्वनि और हुलूध्वनि
(हुलाहुलि)—इन पाँच प्रकारकी ध्वनियोंको मङ्गलमय
कहा है॥ 95-97 ॥
महाप्रभुकी जन्मलीला-सूत्ररूपमें; हरिनाम-कीर्त्तनके
मध्य श्रीगौरहरिका आविर्भाव :-
नदीया-उदयगिरि, पूर्णचन्द्र गौरहरि,
कृपा करि' हइल उदय।
पाप-तमो हैल नाश, त्रिजगतेर उल्लास,
जगभरि' हरिध्वनि हय ॥ 98 ॥
अनुवाद—नदियाके उदयाचलपर पूर्णचन्द्र श्रीगौरहरि
कृपापूर्वक उदय हुए। उनके उदय होनेसे पापरूपी
अन्धकारका नाश हो गया, तीनों लोकोंमें उल्लास छा
गया और सर्वत्र हरिध्वनि होने लगी ॥ 98 ॥
श्रीअद्वैतप्रभुका आनन्दित होकर नृत्य करना :-
सेइकाले निजालय, उठिया अद्वैत राय,
नृत्य करे आनन्दित मने।
हरिदासे लञा सङ्गे, हुङ्कार-कीर्त्तन-रङ्गे,
केने नाचे, केह नाहि जाने ॥ 99 ॥
तेरहवाँ अध्याय | 163