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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

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गौरगणोद्देशदीपिका 132 श्लोक—
“कालः श्रीकृष्णदासः स यो लवङ्गः सखा व्रजे ॥132(ख)॥”
“व्रजके लवङ्ग नामक सखा कालाकृष्णदास है।” ये
द्वादश गोपालोंमें अन्यतम ‘लवङ्ग’ सखा हैं। इनका
श्रीपाट बर्द्धमान जिलाके ‘आकइहाट’ ग्राममें है।
आकइहाट-गाँव बहुत ही छोटा है, इसलिये वहाँ बहुत
कम लोग रहते हैं। श्रीपाट आजकल श्रीहीन है।
कालाकृष्णदास ठाकुरके समाधि-मन्दिरकी छतकी लकड़ियाँ
टूट गयी हैं और उन्होंने समाधिको ढक दिया है।
रास्तेमें आमके बगीचेके भीतर होकर जानेसे सामने
एक टूटी हुई कोठरी दिखलायी देती है। कोठरीमें
श्रीविग्रहशून्य बेदी और कोठरीके पूर्व-दक्षिण कोणकी
ओर फूसकी छतवाला घर है, इसमें सेवायतगणोंका
समाज है। दक्षिण दिशाकी ओर एक कुण्ड है, जिसे
‘नूपुरकुण्ड’ कहते हैं। सुना जाता है कि इस कुण्डमें
श्रीखण्डनिवासी मुकुन्दके पुत्र रघुनन्दन ठाकुरका और
किसी-किसीके मतानुसार श्रीनित्यानन्द प्रभुका नूपुर गिरा
था। सुननेमें आता है कि वह नूपुर और आकाइहाट
श्रीपाटके श्रीराधावल्लभ एवं श्रीगोपालजी, आकाइहाटसे
तीन कोसकी दूरीपर कडुइ-गाँवमें महान्तके घर आज
भी विराजमान हैं। 1200 (बङ्गाब्द) वर्षकी हाथोंसे
लिखी एक श्रीचैतन्यभागवत और 1191 वर्षकी हाथोंसे
लिखी एक श्रीचरितामृत भी वहाँ है। चैत्रमासकी
कृष्णद्वादशी-वारुणीके दिन यहाँ श्रीकालाकृष्णदास ठाकुरका
तिरोभाव-उत्सव सम्पन्न होता है।
पावना जिलाके सोनातला गाँवके निवासी ‘गोस्वामी’
महोदयके अनुसार कालाकृष्णदास वरेन्द्र श्रेणीके ब्राह्मणकुलमें
जन्में थे और वे भरद्वाज-गोत्र एवं भादड़-गाँवके
निवासी हैं। आकाइ-हाटसे हरिनाम प्रचार करनेके लिये
कालाकृष्णदास ठाकुर पावनामें आये। जिस स्थानपर
उन्होंने आश्रम बनाया, उस स्थानपर अभी भी गृहादिके
टूटे चिह्न विद्यमान हैं। बादमें उनके परिवारवाले भी इस
स्थानमें आये। आकाइहाटमें वारेन्द्र ब्राह्मण न रहनेके
कारण उन्होंने इस देशमें ही विवाह किया और कुछ
दिनोंके पश्चात् वे पुनः आकाइहाट और फिर श्रीवृन्दावन
चले गये।
सोनातला-गाँवमें वास करते समय उनका ‘श्रीमोहनदास’
नामक एक पुत्र हुआ; जिसे सोनातला या भादुटी-मथुरापुर
ग्राममें मामाके घरमें छोड़कर अपनी सारी सम्पत्ति देकर
वे धर्मपत्नी-सहित श्रीवृन्दावन चले गये। श्रीवृन्दावनमें
भी उनका ‘गौराङ्गदास’ नामक एक और पुत्र हुआ।
श्रीवृन्दावनमें जन्म होनेके कारण ‘गौराङ्गदास’ का दूसरा
नाम वृन्दावनदास भी था। कुछ समय पश्चात् उन्होंने
अपने छोटे पुत्र वृन्दावनदासको बड़े पुत्र मोहनदासके
पास भेज दिया और सम्पत्तिका (एक रुपये अर्थात्
सोलह आनामें) छह आना अंश स्वीकार करनेकी
आज्ञा प्रदान की। गौराङ्गदासने श्रीवृन्दावनके श्रीगोविन्दजीके
अनुरूप श्रीकालाचाँद विग्रहको प्रकाशित किया और
अपने बड़े भाईके साथ श्रीविग्रहकी सेवा करने लगे।
कालाकृष्णदास ठाकुरके वशंधरगण पावना-जिलाके
सोनातला आदि स्थानोंपर आज भी वर्तमान हैं।
सोनातला-ग्राममें स्थित आश्रम-भवनकी नींव, मन्दिरकी
ईंटें और कुण्डका घाट आज भी दिखायी देता है।
यहाँके श्रीविग्रह-श्रीकालाचाँदजी बारी-बारीसे काला-
कृष्णदासके वशंधरोंके द्वारा सेवित होते हैं। यहाँ
अग्रहायण-मासके कृष्णद्वादशीके दिन कालाकृष्णदास
ठाकुरका तिरोभाव-उत्सव सम्पन्न होता है॥37॥
(23) सदाशिव कविराज,
(24) पुरुषोत्तम (गोपाल-10) :-
श्रीसदाशिव कविराज-बड़ महाशय।
श्रीपुरुषोत्तमदास-ताँहार तनय॥38॥
‘नागर’ पुरुषोत्तम :-
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर चरणे।
निरन्तर बाल्यलीला करे कृष्ण-सने॥39॥
अनुवाद-श्रीसदाशिव कविराज महाशयके पुत्र
श्रीपुरुषोत्तमदास हैं। जन्मसे ही श्रीपुरुषोत्तमदासका मन
112 | श्रीचैतन्यचरितामृत