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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 639, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 639

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अपार विक्रम था। चैतन्यदासमें जो भक्तिके जो विकार
उदित होते थे, वे अपार हैं, कितनोंका वर्णन करूँ?
श्रीचैतन्यदास मुरारि पण्डित ऐसे योग्य थे कि उनको
स्पर्शकर आ रही वायुके स्पर्शसे ही जीवोंको श्रीकृष्णप्रेमकी
निश्चित ही प्राप्ति हो जाती थी॥"20॥
शुद्धभक्त व्रजसखा ही श्रीनिताइके गण :-
नित्यानन्देर गण यत, — सब व्रजसखा।
शृङ्ग-वेत्र-गोपवेश, शिरे शिखिपाखा॥ 21 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी भक्त व्रजलीलाके
सखा हैं। वे हाथमें शृङ्ग, वेत्र (छड़ी) और सिरपर
मोरपंख धारणकर गोपवेशमें रहते थे॥ 21 ॥
अनुभाष्य—श्रीनित्यानन्द प्रभुके आश्रित जो भी भक्त
थे, वे सभी व्रजके सख्यरसके आश्रित हैं। उन सबका
ही गोपाल-वेश था। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पत्नी श्रीमती
जाह्नवा-माता व्रजकी अनङ्गमञ्जरी हैं और वे श्रीमती
राधिकाकी छोटी बहन हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 66वाँ
श्लोक)—
“केचित् श्रीवसुधादेवीं कलावपि विवृण्वते।
अनङ्गमञ्जरीं केचिज्जाह्नवीञ्च प्रचक्षते।
उभयन्तु समीचीनं पूर्वन्यायात् सतां मतम्॥ 66 ॥”
“कलियुगमें कोई-कोई व्यक्ति श्रीवसुधादेवीको और
कोई-कोई श्रीजाह्नवादेवीको अनङ्गमञ्जरी कहते हैं।
महात्माओंके मतसे पूर्वकथित न्याय अर्थात् प्रकाश
भेदके अनुसार दोनों विचार ही उचित हैं।” जाह्नवा-माताके
आश्रित भक्तोंकी गणना श्रीनित्यानन्दके गणोंमें ही होती
है॥ 21 ॥
(7) रघुनाथ वैद्य :-
रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महाशय।
याँहार दर्शने कृष्णप्रेमभक्ति हय॥ 22 ॥
अनुवाद—रघुनाथ वैद्य एक महान भक्त थे, जिनके
दर्शनसे ही श्रीकृष्णमें प्रेमाभक्ति जाग्रत होती थी॥ 22 ॥
(8) सुन्दरानन्द (गोपाल-2) :-
सुन्दरानन्द-नित्यानन्देर शाखा, भृत्य मर्म।
याँर सङ्गे नित्यानन्द करे व्रजनर्म॥ 23 ॥
अनुवाद—सुन्दरानन्द श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्तरङ्ग
सेवक थे, जिनके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभु व्रजभावमें
हास-परिहास करते थे॥ 23 ॥
अनुभाष्य—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—
“प्रेमरससमुद्र सुन्दरानन्द नाम।
नित्यानन्दस्वरूपेर पार्षद-प्रधान॥ 728 ॥”
“सुन्दरानन्द प्रेमरसके समुद्र हैं और श्रीनित्यानन्द
प्रभुके प्रधान पार्षद हैं।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 127वाँ
श्लोक)—
“पुरा सुदामनामासीदद्य ठक्कुरसुन्दरः॥ 127 (क) ॥”
“पूर्वकालके 'सुदाम' नामक गोपाल अब सुन्दर
ठाकुर हैं।”
ये बारह गोपालोंमें अन्यतम 'सुदाम' हैं। इनका
श्रीपाट यशोहर जिलाके महेशपुर ग्राममें है। इस
स्थानपर प्राचीन स्मृतिचिह्न-स्वरूप केवल सुन्दरानन्दकी
जन्मस्थलीके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रीमन्दिर
और श्रीविग्रहादि लगभग सौ वर्ष पूर्व ही प्रतिष्ठित हुए
हैं। यहाँ श्रीश्रीराधावल्लभ और श्रीश्रीराधारमणजीकी
सेवा होती है। सुन्दरानन्द ठाकुर आजीवन अविवाहित
रहे, इसलिये उनका कोई वंशज नहीं है। उनके
जातिभ्राता और सेवायतके शिष्यवंश अभी वर्तमान हैं।
वीरभूम जिलामें मङ्गलडिहि-ग्राममें सुन्दरानन्दके जाति-वंशज
हैं। वहाँ श्रीश्रीबलरामजीकी सेवा होती है। सुन्दरानन्द
ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीश्रीराधावल्लभ-विग्रहको
बहरमपुरके सैदाबाद गोस्वामी लोग ले गये थे, बादमें
वर्तमान विग्रहकी प्रतिष्ठा हुई थी। अब महेशपुरके
जमीन्दार महाशय लोग इनके सेवायत हैं। माघी-पूर्णिमाके
दिन सुन्दरानन्द ठाकुरका तिरोभाव उत्सव मनाया जाता
है॥ 23 ॥
ग्यारहवाँ अध्याय | 103