श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 584, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/25-32
“गुणमाला व्रजे यासीद्दमयन्ती तु तत्स्वसा॥”167॥
“व्रजकी गुणमाला सखी अब श्रीराघव पण्डितकी
बहन दमयन्ती हैं॥” 25॥
से-सब सामग्री यत झालिते भरिया।
राघव लइया यांन गुप्त करिया॥ 26 ॥
बारमास ताहा प्रभु करेन अङ्गीकार।
'राघवेर झालि' बलि' प्रसिद्धि याहार ॥ 27 ॥
से-सब सामग्री आगे करिब विस्तार।
याहार श्रवणे भक्तेर बहे अश्रुधार ॥ 28 ॥
अनुवाद—वह सब सामग्रीको यत्नसे एक टोकरीमें
भरकर रख देती, जिसे राघव पण्डित छिपाकर महाप्रभुके
लिये श्रीपुरुषोत्तम धाम ले जाते। महाप्रभु बारह मास
तक उस सामग्रीका आस्वादन करते, इसलिये यह
'राघवकी डलिया'के नामसे प्रसिद्ध है। उस सब सामग्रीका
आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर भक्तोंके
नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है॥26-28॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें
अध्यायमें यह द्रष्टव्य है॥ 28 ॥
अनुभाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें अध्यायमें
'झाली' का वर्णन द्रष्टव्य है॥ 27 ॥
(8) श्रीगङ्गादास :-
प्रभुर अत्यन्त प्रिय—पण्डित गङ्गादास।
याँहार स्मरणे हय सर्वबन्ध-नाश॥ 29 ॥
अनुवाद—श्रीगङ्गादास पण्डित श्रीचैतन्यदेवके अत्यन्त
प्रिय हैं, जिनके केवल स्मरणमात्रसे समस्त बन्धनोंका
नाश हो जाता है॥ 29 ॥
अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 53 और 111
श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है—
“पुरासीत् रघुनाथस्य यो वशिष्ठमुनिर्गुरुः।
स प्रकाशविशेषेण गङ्गादास-सुदर्शनौ ॥ 53 ॥
गङ्गादासः प्रभुप्रियः।
आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिका-प्रियः॥”111॥
“पूर्वकालमें जो श्रीरघुनाथके गुरु श्रीवशिष्ठ मुनि थे,
वे ही अब प्रकाश भेदसे श्रीगङ्गादास और श्रीसुदर्शन हैं।
पूर्वकालमें जो निधुवनमें गोपिकाप्रिय श्रीदुर्वासा थे, वे ही
महाप्रभुके प्रिय श्रीगङ्गादास हैं॥ 29 ॥
(9) श्रीपुरन्दर आचार्य :-
चैतन्य-पार्षद—श्रीआचार्य पुरन्दर।
पिता करि' याँरे बोले गौराङ्गसुन्दर ॥ 30 ॥
अनुवाद—श्रीपुरन्दर आचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके
पार्षद थे, जिन्हें श्रीगौराङ्गसुन्दर 'पिता' कहकर सम्बोधित
करते थे॥ 30 ॥
अनुभाष्य—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवें अध्यायमें)—
“प्रभु आइलेन मात्र पण्डितेर घर।
वार्त्ता पाइ' आइला आचार्य पुरन्दर ॥ 15 ॥
ताहाने देखिया प्रभु पिता करि' बोले।
प्रेमावेशे मत्त ताने करिलेन कोले॥ 16 ॥
परम-सुकृति से आचार्य पुरन्दर।
प्रभु देखि' कान्दे अति हइ असम्बर॥”17॥
“कुमारहट्टमें स्थित श्रीवास पण्डितके घर श्रीचैतन्य
महाप्रभुके आनेका समाचार पाते ही श्रीपुरन्दर आचार्य
वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर महाप्रभुने उन्हें 'पिता'
कहकर सम्बोधित किया और प्रेमके आवेशमें मत्त
होकर उन्हें अपनी गोदमें ले लिया। परम सुकृतिवान्
श्रीपुरन्दर आचार्य महाप्रभुको देखकर अधीर होकर
बहुत क्रन्दन करने लगे॥” 30 ॥
(10) श्रीदामोदर पण्डित-शाखा :-
दामोदर पण्डित-शाखा प्रेमेते प्रचण्ड।
प्रभुर उपरे यँहो कैल वाक्यदण्ड ॥ 31 ॥
दण्ड-कथा कहिब आगे विस्तार करिया।
दण्डे तुष्ट प्रभु ताँरे पाठाइला नदीया ॥ 32 ॥
48 | श्रीचैतन्यचरितामृत