श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें9/13-15 ]
पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, विष्णु पुरी, केशव पुरी, कृष्णानन्द
पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ और सुखानन्द पुरी—ये नौ जड़ें
वृक्षके मूलसे निकलीं, जिन्होंने वृक्षको स्थिर
किया॥13-15॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पुरी' नामके ये सभी संन्यासी
श्रीईश्वरपुरीके सम्बन्धसे और 'भारती' नामके ये संन्यासी
श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास गुरु श्रीकेशव भारतीके
सम्बन्धसे आत्मीयवर्ग हैं॥14॥
अनुभाष्य—श्रीपरमानन्दपुरी त्रिहुत नामक देशमें ब्राह्मण
कुलमें आविर्भूत हुए और वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके शिष्य
तथा श्रीचैतन्य महाप्रभुके परम प्रियपात्र थे। (चैःभाः
अन्त्यखण्ड 10/46-49, 42) में—
“संन्यासीर मध्ये ईश्वरेर प्रियपात्र।
आर नाहि, एक पुरी गोसाञि से मात्र॥46॥
दामोदरस्वरूप, परमानन्द-पुरी।
संन्यासीपार्षदे एइ दुइ अधिकारी॥47॥
निरवधि निकटे थाकेन दुईजन।
प्रभुर संन्यासे करे दण्डेर ग्रहण॥48॥
पुरी ध्यानपर, दामोदरेर कीर्त्तन।
न्यासी-रूपे न्यासी-देहे बाहु दुइ जन॥49॥
यत प्रीति ईश्वरेर पुरी-गोसाञिरे।
दामोदर-स्वरूपेओ तत प्रीति करे॥42॥”
“दामोदर-स्वरूप संन्यासियोंमें से महाप्रभुके प्रियपात्र
थे। एक परमानन्दपुरीके अतिरिक्त उनके समान और
कोई न था। संन्यासी पार्षदोंमें दामोदर-स्वरूप और
परमानन्दपुरी—ये दोनों अधिकारी थे। दोनों निरन्तर
महाप्रभुके पास ही रहते थे। महाप्रभुके संन्यासके
पश्चात् इन्होंने दण्ड ग्रहण किया। परमानन्दपुरी विरक्त
ध्यानपरायण भजनमें अनुरक्त रहते थे और दामोदर
स्वरूप कीर्तनानन्दी थे। भगवान् श्रीगौरसुन्दरके संन्यासी
शरीरमें ये दोनों भुजा सदृश थे। श्रीपरमानन्दपुरीके प्रति
भगवान् श्रीगौरसुन्दरका जिस प्रकारका मर्यादाभाव था,
दामोदर स्वरूपके प्रति भी वह भाव किसी भी प्रकारसे
न्यून नहीं था।”
श्रीपरमानन्दपुरीका दर्शनकर महाप्रभु कहने लगे—
(चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय संख्या 171-172,
175)—
“आजि धन्य लोचन, सफल आजि जन्म।
सफल आमार आजि हैल सर्वधर्म॥”171॥
प्रभु बोले,—“आजि मोर सफल संन्यास।
आजि माधवेन्द्र मोरे हइल प्रकाश॥”172॥
कत क्षणे अन्योऽन्ये करेन प्रणाम।
परमानन्दपुरी—चैतन्येर प्रेम-धाम॥”
“हरि हरि! नेत्रोंसे परमानन्दपुरीके दर्शनकर आज
मेरे नेत्र धन्य हो गये, आज जन्म सफल हो गया, धन्य
हो गया। आज मेरे सभी धर्म सफल हो गये।”
महाप्रभुने आगे कहा—“आज मेरा संन्यास सफल हुआ
है। आज श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रकाश मेरे सामने प्रकट
हुआ है।” कुछ क्षणों पश्चात् दोनोंने एक दूसरेको
प्रणाम किया। श्रीपरमानन्दपुरी चैतन्य-प्रेमके धाम हैं।
श्रीपरमानन्दपुरी पुरुषोत्तम क्षेत्रमें श्रीमन्दिरके पश्चिम
दिशाकी ओर एक मठका और एक कुँआ निर्माणकर
रहते थे। कुँएका जल पवित्र न देख महाप्रभुने कहा—
(चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय)—
“महाप्रभु जगन्नाथ मोरे देह एह वर।
गङ्गा प्रवेशुक एई कूपेर भितर॥”242॥
प्रभु बोले,—“शुनह सब भक्तगण।
ए कूपेर जले ये करिबे स्नान पान॥251॥
सत्य सत्य हबे तार गङ्गास्नान-फल।
कृष्णे भक्ति हबे तार परम निर्मल॥”252॥
प्रभु बोले,—“आमि ये आछिये पृथिवीते।
निश्चयइ जानिह पुरी-गोसाञिर प्रीते॥”255॥
श्रीचैतन्य महाप्रभु भुजाएँ उठाकर कहने लगे,—“जगन्नाथ
महाप्रभु, मुझे यह वर दीजिये कि गङ्गा इस कुँएके
भीतर प्रविष्ट हो जाय।” तब श्रीचैतन्य महाप्रभु कहने
लगे,—“सभी भक्तों सुनो! इस कुँएके जलमें जो स्नान
करेगा और जो इसका जल पान करेगा, उसे सत्य ही
गङ्गा-स्नानका फल मिलेगा और परम निर्मल कृष्णभक्तिकी
प्राप्ति होगी।” आगे श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा,—“केवल
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