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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 564

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अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य स्वयं ही प्रेमरूप-कल्पवृक्ष
और स्वयं ही उसके माली हैं। जो उस वृक्षके फलोंके
दाता और भोक्ता हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यका मैं आश्रय
ग्रहण करता हूँ॥6॥
अनुभाष्य— यः (चैतन्यदेवः) स्वयं मालाकारः (उद्यानरक्षकः)
स्वयं कृष्णप्रेमाम्रतरुः (कृष्णस्य प्रेमैव अमरतरुः अविनाशी
वृक्षः) तत्फलानां (कल्पवृक्षस्य प्रेमफलानां) दाता, भोक्ता च,
[स्वयं एव] तं चैतन्यम् [अहम्] आश्रये (प्रपद्ये)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥
माली होनेका कारण—अभिधेय-अधिदेवता
होनेकी सार्थकता :—
प्रभु कहे, आमि 'विश्वम्भर' नाम धरि।
नाम सार्थक हय, यदि प्रेमे विश्व भरि॥7॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुने विचार किया कि मेरा
नाम 'विश्वम्भर' (विश्वका पालन करनेवाला) है। यदि
मैं कृष्णप्रेमसे सम्पूर्ण विश्वको भर दूँ, तभी मेरा यह
नाम सार्थक होगा॥7॥
नवद्वीपमें भक्तिफलके उद्यानकी रचना :—
एत चिन्ति' लैला प्रभु मालाकार-धर्म।
नवद्वीपे आरम्भिला फलोद्यान-कर्म॥8॥
श्रीचैतन्य मालाकार पृथिवीते आनि'।
भक्ति-कल्पतरु रोपिला सिञ्चि' इच्छा-पानि॥9॥
अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभुने माली बनकर
नवद्वीपमें फलका उद्यान लगाना आरम्भ किया। श्रीचैतन्य
मालीने भक्ति-कल्पवृक्षको पृथ्वीपर लाकर रोपण किया
और इच्छारूपी जलके द्वारा उसका सिञ्चन किया॥8-9॥
उसके प्रथम अङ्कुर—श्रीमाधवेन्द्रपुरी :—
जय श्रीमाधवपुरी कृष्णप्रेमपूर।
भक्तिकल्पतरुर तेंहो प्रथम अङ्कुर॥10॥
अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी जय हो, जिनका हृदय
कृष्णप्रेमसे परिपूर्ण है। वे भक्ति-कल्पवृक्षके प्रथम
अङ्कुर हैं॥10॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'श्रीमाधवपुरी'—इनका नाम
श्रीमाधवेन्द्रपुरी है। ये श्रीमध्वाचार्य सम्प्रदायमें एक
प्रसिद्ध संन्यासी थे। श्रीचैतन्यदेव इनके अनुशिष्य (शिष्यके
शिष्य) थे। इनसे पहले श्रीमध्व-सम्प्रदायमें प्रेमभक्तिका
कोई लक्षण नहीं था। इनके द्वारा रचित “अयि
दयार्द्रनाथ' श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा शिक्षित तत्त्व
बीजरूपमें था॥10॥
अमृतानुकणिका—श्रीमाधवेन्द्र पुरी श्रीमध्व गौड़ीय
सम्प्रदायके द्वारा सेवित भक्ति कल्पतरुके प्रथम अङ्कुर
हैं। इनसे पूर्व श्रीमध्व सम्प्रदायमें शृङ्गार रसात्मिका
भक्तिका कोई भी लक्षण नहीं देखा जाता। श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी
महिमा श्रीचैतन्यभागवत और श्रीभक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें
वर्णित हुई है। श्रीभक्तिरत्नाकर पाँचवीं तरङ्ग—
“माधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिरसमय।
याँर नामस्मरणे सकल सिद्धि हय॥2272॥”
“श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिके रसस्वरूप हैं, जिनके
नाम स्मरण मात्रसे ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।”
चैःभाः आदिखण्ड नौवाँ अध्याय—
“माधवेन्द्र-कथा अति अद्भुत-कथन।
मेघ देखिलेइ मात्र हय अचेतन॥175॥
अहर्निश कृष्णप्रेम मद्यपेर प्राय।
हासे, कान्दे, है है करे हाय हाय॥176॥”
“श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी ऐसी अद्भुत कथा है कि मेघ
देखने मात्रसे ही नवजलधर मेघ कान्तिवाले श्रीकृष्णकी
उद्दीपनावनेपर वे उसी समय अचेतन हो जाते। वे
रात-दिन श्रीकृष्णप्रेममें मदिरापान करनेवालेके भाँति
कभी हँसते, कभी रोते और कभी उल्लसित होकर 'है
है' करते तथा कभी दुःखी होकर 'हाय हाय' करते॥”
चैःभाः आदिखण्डके नौवें अध्यायमें श्रीमाधवेन्द्र
पुरीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुके मिलनका प्रसङ्ग वर्णित
है।
28 | श्रीचैतन्यचरितामृत