सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 556

[ 8/57
(7) विविधाद्भुतभाषावित्—विविध भाषाओंके (पशु-पक्षी
आदि की भाषाओंके भी) विद्वान
(8) सत्यवाक्यः—जिनका वाक्य कभी मिथ्या नहीं होता
(9) प्रियंवदः—अपराधीके प्रति भी प्रिय वाक्य बोलनेवाले
(10) वावदूकः—जिनके वाक्य कानोंको प्रिय लगनेवाले
और रसभावादि युक्त हैं
(11) सुपाण्डित्यो—विद्वान और नीतिज्ञ
(12) बुद्धिमान्—मेधावी और सूक्ष्म बुद्धियुक्त
(13) प्रतिभाऽन्वितः—नव-नव विषयोंके उद्भावनमें समर्थ
(14) विदग्ध—चौंसठ विद्याओंमें निपुण
(15) चतुरो—एक ही समयमें अनेक कार्य करनेवाले
(16) दक्षः—दुष्कर कार्यको भी अति शीघ्र सम्पादन
करनेवाले
(17) कृतज्ञः—दूसरोंके द्वारा की गयी सेवाको माननेवाले
(18) सुदृढव्रतः—जिनकी प्रतिज्ञा और नियम सदा सत्य
होते हैं
(19) देशकालसुपात्रज्ञः—काल-पात्रके अनुसार कार्यमें
निपुण
(20) शास्त्रचक्षुः—शास्त्रके अनुसार कार्य करनेवाले
(21) शुचिः—पापनाशक और दोष रहित
(22) वशी—जितेन्द्रिय
(23) स्थिरो—फलोदयमें विलम्ब देखकर भी कार्यसे
निवृत न होनेवाले
(24) दान्तः—दुःसह होते हुए भी उपयुक्त क्लेश
सहन करनेवाले
(25) क्षमाशीलो—दूसरोंके अपराध क्षमा करनेवाले
(26) गम्भीरो—जिनका अभिप्राय दूसरोंके लिये दुर्बोध
है
(27) धृतिमान्—क्षोभका तीव्र कारण होनेपर भी
क्षोभशून्य
(28) समः—राग-द्वेषशून्य
(29) वदान्यो—दानवीर
(30) धार्मिकः—स्वयं धर्मका आचरण करके दूसरोंको
भी धर्मका आचरण करानेवाले
(31) शूरः—युद्धके उत्साही और अस्त्र प्रयोगमें
निपुण
(32) करुणो—दूसरोंके दुःखको सहन न कर सकनेवाले
(33) मान्यमानकृत्— गुरु, ब्राह्मण और वृद्धजनोंका
सम्मान करनेवाले
(34) दक्षिणो—सुस्वभाववश कोमल चित्तवाले
(35) विनयी— उद्धताशून्य
(36) हीमान्—दूसरोके द्वारा स्तुत्य होनेपर सङ्कोच
करनेवाले
(37) शरणागतपालकः—शरणमें आये हुए का पालन
करनेवाले
(38) सुखी—सुख भोग करनेवाले और दुःखकी
गन्धमात्रसे रहित
(39) भक्तसुहृत्—'सुसेव्य' और 'बन्धु' भेदसे दो
प्रकारसे भक्तसुहृद हैं। 'सुसेव्य'—चुल्लू भर जल और
तुलसी पत्र अर्पण करनेवालेको आत्मदान करनेवाले;
'बन्धु'—निज प्रतिज्ञाको भङ्ग करके भक्तकी प्रतिज्ञाकी
रक्षा करनेवाले
(40) प्रेमवश्यः—प्रेमके वशीभूत रहनेवाले
(41) सर्वशुभङ्करः—सबके मङ्गलकारी
(42) प्रतापी—अपने प्रतापसे शत्रुको ताप देनेमें
प्रसिद्ध
(43) कीर्तिमान्—निर्मल यशके द्वारा विख्यात
(44) रक्तलोकः—समस्त लोकोंके अनुरागके पात्र
(45) साधुसमाश्रयः—साधुके प्रति विशेष कृपाके
कारण उनका पक्षपात करनेवाले
(46) नारीगणमनोहारी—सौन्दर्य, माधुर्य, वैदग्धीके
द्वारा सभी नारियोंके चित्तको हरण करनेवाले
(47) सर्वाराध्यः—सभीके आराध्य
(48) समृद्धिवान्—अत्यन्त सम्पन्नशाली
(49) वरीयान्—ब्रह्मा, शिवादिसे भी श्रेष्ठ
(50) ईश्वर—स्वतन्त्र, अन्यसे निरपेक्ष और जिनकी
आज्ञा दुर्लङ्घ्य है।
20 | श्रीचैतन्यचरितामृत