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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 535

ग्यारहवाँ अध्याय— 97-120
श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा अर्थात् नित्यानन्दगणोंका
वर्णन।
बारहवाँ अध्याय— 123-144
श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा अर्थात् श्रीअद्वैतगणोंका वर्णन,
श्रीअद्वैतगण पहले एकमत, बादमें दो मत-आचार्यके
अनुगत और उनसे स्वतन्त्र, श्रीअच्युतानन्दानुग
'सारग्राही' एवं अन्य सब 'असार', सारग्राही-सहित
सभीकी गणना करनेके बाद असारग्राहियोंका त्याग,
श्रीचैतन्य महाप्रभु चौदह भुवनोंके गुरु, बाउलिया
विश्वास, बाउल अथवा मायावादमतका खण्डन,
महाप्रभुके द्वारा वैष्णव आचार्यके कर्त्तव्यका निर्णय,
असार गणोंका श्रीगौरकृपाके अभावके कारण पतन,
श्रीगौरकृष्ण-भक्त यमके गुरु और श्रीगौरकृष्ण-विमुख
यमके दण्डके योग्य, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी
उपशाखाएँ, शाखा-स्मरणसे भवबन्धनका विमोचन।
तेरहवाँ अध्याय— 147-171
महाप्रभुकी आदिलालाका सूत्र, गृहस्थ-लीला ही
आदि-लीला एवं संन्यास-लीला ही मध्य और
अन्त्य लीला, मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलाला और
स्वरूप गोस्वामीके द्वारा मध्य और अन्त्य लीलाका
सूत्र-ग्रन्थन, आदिलालाके चार भाग; आदि, मध्य
और अन्त्य लीलाका संक्षेपमें विवरण, पहले
गुरुवर्गोंको अवतरित कराना, बादमें स्वयं अवतरण,
श्रीअद्वैतकी भक्तिपूर्ण व्याख्या, श्रीकृष्णोवतार हेतु
प्रतिज्ञा, विश्वरूप-जन्म, विश्वरूप-तत्त्व, श्रीगौराविर्भाव,
नीलाम्बर-चक्रवर्त्तीकी गणना, आर्याओं (कुलीन स्त्रियों)
का विविध उपहारों सहित श्रीगौर-दर्शन हेतु आगमन,
सर्वत्र आनन्द-कोलाहल।
चौदहवाँ अध्याय— 173-188
महाप्रभुकी बाल्यलीलाओंका वर्णन और माता-पिताको
चरणचिह्न-प्रदर्शन, महापुरुषोंके बत्तीस लक्षण, नीलाम्बर
चक्रवर्त्तीकी भविष्यवाणी, नामकरण—'विश्वम्भर' नाम,
घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नाम-प्रचार, पैरोंके
बल चलना, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान,
अतिथि-ब्राह्मणके प्रति कृपा, चोरोंको दिशा-भ्रम कराना,
रोगके बहानेसे एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशके
नैवेद्यको खाना, बाल-चपलता, माताकी मूर्च्छा और
नारियल लाना, गंगाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास,
लक्ष्मीदेवीकी पूजा ग्रहण और वर प्रदान, उच्छिष्ट
हाँडीके ऊपर बैठना तथा माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश,
खाली पैरोंमें ही नूपुर ध्वनि, मिश्रका शुद्ध वात्सल्य,
कलम पकड़ना।
पन्द्रहवाँ अध्याय— 191-198
महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका वर्णन-गङ्गादास
पण्डितके स्थानपर व्याकरण-अध्ययन, माताको
एकादशीके दिन अन्न न खाने हेतु अनुरोध,
विश्वरूपका संन्यास, महाप्रभुकी मूर्च्छा और विश्वरूपके
साथ वार्त्तालापरूपी कहानी, जगन्नाथ मिश्रका अप्रकट
होना, लक्ष्मीदेवीके पाणिग्रहणकी लीला।
सोलहवाँ अध्याय— 201-216
महाप्रभुकी कैशोर लीलाका वर्णन-अध्यापन,
पण्डित विजय, जाह्नवी (गङ्गा) में जलकेलि,
पूर्वबङ्गाल-गमन, वहाँ विद्याका विचार और
नामसङ्कीर्त्तन, तपनमिश्रके साथ मिलन, उनको
साध्य-साधन उपदेश और वाराणसी जाने हेतु
आदेश प्रदान, महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मीदेवीकी
वैकुण्ठ-प्राप्ति, महाप्रभुका घर लौटना, माताको सान्त्वना
देना, विष्णुप्रियाके साथ विवाह, दिग्विजयी-जय, दिग्विजयीके
द्वारा कहे गये श्लोकके दोष और गुणोंका विचार,
दिग्विजयीका सरस्वतीके निकट श्रीगौरतत्त्व-विषयक
ज्ञान प्राप्त करना एवं महाप्रभुका चरणाश्रय।
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