श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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'वैष्णवानां यथा शम्भु'—वैष्णवाग्रणी शम्भुके मनोभीष्ट वेदान्तके एकमात्र निगूढ़ सिद्धान्त
अचिन्त्यभेदाभेद तत्त्वका शिवक्षेत्रमें प्रचार करके भगवान् श्रीगौरसुन्दरने वैष्णवराज शङ्करकी
आन्तरिक अभिलाषा पूर्ण की। शिवके अंशी-तत्त्व सदाशिवातार श्रीअद्वैत प्रभुके जल-तुलसी
अर्पण करते हुए हुङ्कारके द्वारा श्रीगौरसुन्दरको धाम और पार्षद सहित प्रपञ्चमें अवतीर्ण
करानेकी सार्थकता हुई। वे सब मूढ़ जीव जो वेद-प्रतिपाद्य परमेश्वर विष्णुके परम पादपद्मोंको
शिवादि अधीन ईश्वर-तत्त्वोंके सहित समान समझते थे, शिवादि देवताओंको स्वतन्त्र भगवान्
कल्पना करके विष्णु और वैष्णवोंके चरणोंमें अपराध सञ्चय कर रहे थे और उसके
फलस्वरूप कोई-कोई तो आत्मविनाशरूप निर्विशेष गतिको ही चरम श्रेय मानकर अधःपतित
और वञ्चित हुए थे, उनके आदर्शको ग्रहणकर भविष्यमें सुकृतिमान् सत्य-पिपासु व्यक्ति और
वञ्चना-वैतरणीमें पतित ना हों, इसलिये ही श्रीगौरसुन्दरने काशीधाममें अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्तका
प्रचार किया। वस्तुके अद्वयत्व और शक्तिका वैचित्र्य स्वीकार करनेपर बहु-ईश्वरवाद या वेदोंके
एकदेशिक मतका वरण नहीं होता, अपितु वेदोंका सर्वाङ्गीण सिद्धान्त सुन्दर रूपसे मान्य होता
है॥ १५४-१५६॥
प्रभु यबे या'न विश्वेश्वर-दर्शने।
लक्ष लक्ष लोक आसि' मिले सेइ स्थाने॥ १५७॥
स्नान करिते यबे या'न गङ्गातीरे।
ताहाञि सकल लोक हय महाभिड़े ॥ १५८ ॥
हरिकीर्तन करवाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :-
बाहु तुलि' प्रभु बले,—बल हरि हरि।
हरिध्वनि करे लोक स्वर्गमर्त्त्य भरि' ॥ १५९ ॥
अनुवाद-जब महाप्रभु काशी विश्वेश्वरके दर्शनके लिये जाते, तब भी लाखों-लाखों लोग
आकर उनसे मिलते। महाप्रभु जब स्नान करनेके लिये गङ्गातटपर जाते, तब वहाँपर भी
लोगोंकी बड़ी भीड़ हो जाती। महाप्रभु जब अपने बाहोंको ऊपर उठाकर 'हरि-हरिबोल' कहते,
तब सभी लोग उनके साथ हरिबोल ध्वनि करते और उस हरिध्वनिसे स्वर्ग और मर्त्यलोक
गूँज उठते ॥ १५९ ॥
महाप्रभुका काशीत्याग और श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :-
लोक निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन।
वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन ॥ १६० ॥
रात्रि-दिवसे लोकेर शुनि' कोलाहल।
वाराणसी छाड़ि' प्रभु आइला नीलाचल ॥ १६१ ॥
अनुवाद-इस प्रकार काशीवासियोंका उद्धार करनेके बाद महाप्रभुकी वहाँसे जानेकी इच्छा
हुई। तब उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। रात-दिन लोगोंका
कोलाहल सुनकर महाप्रभु वाराणसी छोड़कर नीलाचल अर्थात् जगन्नाथपुरी आ गये॥ १६०-१६१॥
सातवाँ अध्याय | ४४९