श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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तुम्हारे इस प्रेम प्राप्त होनेसे मैं भी कृतार्थ हो गया हूँ। अब नाचो-गाओ और भक्तोंके साथ
सङ्कीर्तन करो। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करो॥'९१-९२॥
अनुभाष्य-जिन लोगोंने श्रीगुरुदेवकी दृष्टिमें अधिकार प्राप्त किया है, उन्हींको ही श्रीगुरुदेव
सजातीय-आशयस्निग्ध भजनपरायण हरिभक्तोंके साथ नृत्य, गीत और सङ्कीर्तनादिमें अधिकार
प्रदान करते हैं। वे लोग ही श्रीगुरुदेवका पदानुसरण करके अपने भजन-ज्ञानसे जगत् उद्धार
कार्योंमें नियुक्त होते हैं। अनधिकारी व्यक्ति निर्जनमें श्रीकृष्णनाम जप करेंगे। इस प्रकार
उपासनामें अन्यके साथ सङ्गादि नहीं है। अधिकार होनेपर ही जनसङ्ग अशुभफल नहीं ला
सकता; पक्षान्तरमें, बहिर्मुखलोग भी नामकी कृपा प्राप्त करनेमें समर्थ होते हैं। इस
प्रसङ्गमें-“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः”* या “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्ध कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”** आदि श्लोक आलोच्य हैं॥९२॥
एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे।
भागवतेर सार एइ-बले बारे बारे॥९३॥
अनुवाद-श्रीगुरुदेवने यह कहकर मुझे एक श्लोक सिखलाया और बार-बार कहा कि यह
श्लोक श्रीमद्भागवतका सार है॥९३॥
महाभागवतकी अवस्था :-
श्रीमद्भागवत (११/२/४०)
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥९४॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९४॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त
उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय
हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी
रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥९४॥
अनुभाष्य-वसुदेवजीके द्वारा श्रीनारद मुनिसे भगवद्धर्म सुननेकी इच्छा करनेपर उन्होंने
ऋषभदेवके नौ पुत्र नवयोगेन्द्र और विदेहराज निमिके उपाख्यानका वर्णन किया। इस प्रसङ्गमें
नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम 'कवि'ने निमि महाराजसे कहा-
*“श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा
तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये।” (भाः १०/३३/३१)
**“विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते
हुए श्रीकृष्णकी भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य' कहलाता है।”
(भःरःसिः १/२/२५५)
४१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत