श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/७६-८२ ]
अमृतप्रवाह भाष्य—कलियुगमें हरिनामके अतिरिक्त और गति नहीं है; हरिनाम ही एकमात्र
गति है॥७६॥
अनुभाष्य—[सत्ययुगे ध्यानरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [त्रेतायां यज्ञे यज्ञेश्वरयजनरूपा
गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [द्वापरे अर्चनरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव।
[विशेषतः] कलौ अन्यथा गतिः नास्त्येव (अन्य-साधनानां निरर्थकत्वात्)।
श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें ध्यान नहीं,
केवल नामके द्वारा ही गति होती है; त्रेतायुगमें यज्ञेश्वर भगवान्के उद्देश्यसे यज्ञके द्वारा गति
होती है, किन्तु कलियुगमें यज्ञ नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; द्वापरयुगमें अर्चनके
द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें अर्चन नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; विशेषतः
कलियुगमें अन्य सभी साधन निरर्थक हैं॥७६॥
नामग्रहणका फल :—
एइ आज्ञा पाञा नाम लइ अनुक्षण।
नाम लैते लैते मोर भ्रान्त हैल मन॥७७॥
धैर्य धरिते नारि, हैलाम उन्मत्त।
हासि, कान्दि, नाचि, गाइ, यैछे मदमत्त॥७८॥
अनुवाद—गुरुदेवकी यह आज्ञा पाकर मैं निरन्तर नामका जप करने लगा। नाम लेते-लेते
मेरा मन भ्रान्त हो गया अर्थात् नामके अतिरिक्त सब कुछकी विस्मृति हो गयी। तभीसे मैं
धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ। मैं उन्मत्त होकर पागल व्यक्तिकी भाँति कभी हँसता, रोता,
नाचता और गाता हूँ॥७७-७८॥
तबे धैर्य धरि' मने करिलाम विचार।
कृष्णनामे ज्ञानाच्छन्न हइल आमार॥७९॥
नामग्रहणके फलस्वरूप निज-अवस्थाके दर्शनसे विस्मय :—
पागल हइलाङ् आमि, धैर्य नाहि मने।
एत चिन्ति' निवेदिलाम गुरुर चरणे॥८०॥
'किवा मन्त्र दिला गोसाञि, किवा तार बल।
जपिते जपिते मन्त्र करिल पागल॥८१॥
हासाय, नाचाय, मोरे कराय क्रन्दन।'
एत शुनि' गुरु मोरे बलिला वचन॥८२॥
अनुवाद—तब मैंने कुछ धैर्य धारण करके मनमें विचार किया कि इस श्रीकृष्णनामसे मेरा
ज्ञान ढक गया है। नाम ग्रहण करते-करते मैं पागल हो गया हूँ और मनमें धैर्य धारण नहीं
कर पा रहा हूँ। ऐसा सोचकर मैंने श्रीगुरुदेवसे निवेदन किया—'हे गुरुदेव ! आपने कैसा मन्त्र
दिया है और कैसा उसका बल है, जपते-जपते जिसने मुझे पागल कर दिया है? कभी यह
मन्त्र मुझे हँसाता है, कभी नचाता है और कभी रुलाता है।' यह सुनकर मेरे गुरुदेव
बोले॥७९-८२॥
सातवाँ अध्याय | ४०७