श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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तारतम्य-विचारसे भक्तोंकी अपेक्षा शक्तियोंकी श्रेष्ठता देखी जाती है, इसलिये मधुररसमें
नित्याश्रित भक्तलोग ही श्रीगौरसुन्दरके अन्तरङ्ग सेवक हैं। श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैतके
सेवकगण साधारणतः वात्सल्य, सख्य, दास्य और शान्तरसमें अवस्थित हैं। ये शुद्धभक्तगण जब
श्रीगौरसुन्दरके प्रति अत्यन्त प्रीतियुक्त होते हैं, उस समय ही वे लोग अन्तरङ्ग-भक्तोंके आश्रयमें
मधुररसाश्रित होते हैं। श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशयकी ‘प्रार्थना’ के प्रारम्भमें यह बात परिस्फुट
हुई है—
“गौराङ्ग बलिते हवे पुलक शरीर।
हरि हरि बलिते नयने ब'बे नीर॥
आर कबे निताइचाँद करुणा करिबे।
संसार-वासना मोर कबे तुच्छ ह'बे॥
विषय छाड़िया कबे शुद्ध ह'बे मन।
कबे हाम हेरब श्रीवृन्दावन॥
रूप-रघुनाथपदे हइबे आकुति।
कबे हाम बुझब श्रीयुगल-पिरीति॥”
अर्थात् “अहो! वह दिन कब आयेगा जब ‘हा गौराङ्ग’ पुकारते हुए मेरा शरीर पुलकित
होगा तथा हरि-हरि बोलते हुए आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहेगी? कब श्रीनित्यानन्दप्रभुकी
कृपासे मेरे हृदयसे सांसारिक वासनाएँ दूर होंगी? विषयोंका परित्यागकर मेरा मन कब शुद्ध
होगा, जिससे कि मैं श्रीवृन्दावनधामके चिन्मय स्वरूपका दर्शन करूँगा। कब श्रीरूप गोस्वामी
तथा श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंमें मेरी प्रीति होगी कि मैं उनकी कृपासे श्रीराधाकृष्णयुगलकी
प्रीतिको जान पाऊँगा। अतः नरोत्तमदास सर्वदा प्रार्थना करते हैं कि श्रीरूप गोस्वामी एवं
श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंमें ही उनकी एकमात्र आशा रहे।”
‘शुद्धभक्त’ और ‘अन्तरङ्ग-भक्त’ के वैशिष्ट्य वर्णन करते हुए श्रीरूप गोस्वामीपादने स्वरचित
‘श्रीउपदेशामृत’ ग्रन्थमें साधक-जीवका क्रमोत्कर्ष इस प्रकार लिखा है—
“कर्मिभ्यः परितो हरेः प्रियतया व्यक्तिं ययुर्ज्ञानिन-
स्तेभ्योज्ञानविमुक्त-भक्तिपरमाः प्रेमैकनिष्ठास्ततः।
तेभ्यस्ताः पशुपालपङ्कजदृशस्ताभ्योऽपि सा राधिका,
प्रेष्ठा तद्वदियं तदीयसरसी तां नाश्रयेत् कः कृती॥”
अर्थात् “स्वेच्छाचार-परायण जीवोंकी अपेक्षा निष्काम कर्मी श्रेष्ठ हैं; उन सदा-सर्वदा
सत्कर्मोंमें लगे हुए पुण्यवान कर्मकाण्डियोंकी अपेक्षा तीनों गुणोंसे अतीत ब्रह्मज्ञानी श्रीकृष्णके
अधिक प्रिय हैं; ऐसे ब्रह्मज्ञानियोंकी अपेक्षा “ज्ञाने प्रयासमुदपास्य” (श्रीमद्भा. १०/१४/३) इस
उक्तिके अनुसार ज्ञानके प्रयासको छोड़कर, केवल भक्तिको ही श्रेष्ठ माननेवाले सनकादि
भक्तजन श्रीकृष्णके प्रिय हैं; तथा सब प्रकारके भक्तोंसे, केवल प्रेमकी निष्ठावाले नारदादि शुद्ध
भक्तजन श्रीकृष्णके और भी अधिक प्रिय हैं; उन सब प्रेमी भक्तोंकी अपेक्षा श्रीकृष्णगत-प्राण
व्रज-गोपिकाएँ श्रीकृष्णकी अतिशय प्यारी हैं; उन प्यारी गोपियोंमें भी श्रीमती राधिका जिस
प्रकार श्रीकृष्णकी सर्वाधिक-प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हैं, उसी प्रकार यह राधाकुण्ड भी
श्रीकृष्णका अतिशय प्यारा है। अतः ऐसा कौन-सा भाग्यवान-सुचतुर व्यक्ति होगा, जो
३८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत