श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 390, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६/३०-३९
परिकर उनके समान ही चतुर्भुजरूप हैं और वे भी पीताम्बर धारण करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य
नारायणके श्रेष्ठ अंश हैं, इसलिये उनके तत्त्व-नाम-गुण सभी अद्भुत और अलौकिक
हैं॥ ३०-३२॥
श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा महाप्रभुको अवतीर्ण कराना :-
याँहार तुलसीदले, याँहार हुङ्कारे।
स्वगण सहिते चैतन्येर अवतारे ॥ ३३॥
याँर द्वारा कैल प्रभु कीर्त्तन प्रचार।
याँर द्वारा कैल प्रभु जगत् निस्तार ॥ ३४॥
आचार्य गोसाञिर गुण-महिमा अपार।
जीवकीट कोथाय पाइबेक तार पार॥ ३५॥
अनुवाद- जिन्होंने गङ्गाजल और तुलसीदल अर्पणकर श्रीकृष्णकी आराधना की और
अवतरणके लिये सप्रेम-हुङ्कारसे श्रीकृष्णका आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण
श्रीचैतन्यरूपमें अपने परिकरों सहित अवतरित हुए तथा जिनके द्वारा महाप्रभुने सङ्कीर्त्तनका
प्रचार करवाया और जगत्का उद्धार किया, उन श्रीअद्वैताचार्यकी गुण-महिमा अपार है। अतः
क्षुद्र जीव उसे कैसे समझ सकता है ? ॥ ३३-३५॥
अनुभाष्य-आदिलीला ३/९१, ९५-१०८ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ ३३-३४॥
श्रीगौरके एक अङ्ग-श्रीअद्वैत और दूसरे अङ्ग-श्रीनिताइ :-
आचार्य गोसाञि चैतन्येर मुख्य अङ्ग।
आर एक अङ्ग ताँर प्रभु नित्यानन्द ॥ ३६ ॥
उपाङ्गरूप अस्त्र-श्रीवासादि भक्त :-
प्रभुर उपाङ्ग-श्रीवासादि भक्तगण।
हस्तमुखनेत्र-अङ्ग चक्राद्यस्त्र-सम ॥ ३७॥
अङ्ग-उपाङ्गको लेकर श्रीगौरके द्वारा नाम-प्रेम-प्रचार :-
ए़सब लइया चैतन्यप्रभुर विहार।
ए़सब लइया करेन वाञ्छित प्रचार ॥ ३८ ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक मुख्य अङ्ग श्रीअद्वैताचार्य हैं और दूसरे मुख्य अङ्ग
श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। महाप्रभुके उपाङ्ग श्रीवासादि भक्त हैं। ये अङ्ग और उपाङ्ग उनके
हाथ-मुख-नेत्रके समान मुख्य अङ्ग तथा चक्रादिके समान उनके अस्त्र हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने
इन सबके साथ लीला की और इनको साथ लेकर नाम-सङ्कीर्त्तन तथा श्रीकृष्णप्रेमका प्रचार
किया ॥ ३६-३८ ॥
अनुभाष्य-आदिलीला ३/७१-७४ संख्या द्रष्टव्य है॥ ३६-३८॥
लौकिक रीतिके अनुसार श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुका गुरुतुल्य व्यवहार :-
माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य, एइ ज्ञाने।
आचार्य-गोसाञिरे प्रभु गुरु करि' माने ॥ ३९ ॥
३४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत