श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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यदि कहें कि चलनेमें असमर्थ, परन्तु नेत्रोंवाले पङ्गु पुरुषके सङ्गमें अन्धा, परन्तु पैरोंवाला
पुरुष भी चलनेके लिये प्रवृत्त होता है और जिस प्रकार चुम्बक-पत्थरके सङ्गमें जड़ लोहा
भी चलता है, उस प्रकार चिन्मात्र-पुरुषके सङ्गमें प्रकृति अचेतन होकर भी उसकी छायाके
प्रभावसे चेतन वस्तुके समान पुरुषके भोगके लिये सृष्टि आदिमें प्रवृत्त होती है, उसके उत्तरमें
कह रहे हैं-
(सप्तम सूत्र)—इस उदाहरणमें पुरुष चुम्बकके समान होनेपर भी जड़-प्रधानकी स्वतःप्रवृत्ति
नहीं है। इस प्रकार होनेपर भी जड़वस्तुकी स्वतःप्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती। पङ्गु व्यक्तिमें चलनेका
सामर्थ्य नहीं होनेपर भी मार्ग-प्रदर्शन और निर्देश देनेकी योग्यता एवं अन्धे व्यक्तिमें देखनेका
सामर्थ्य नहीं होनेपर भी पङ्गु व्यक्तिके द्वारा दिये निर्देशोंको ग्रहण करनेकी योग्यता विद्यमान
है और लोहेका चुम्बकके निकट जाना भी सम्भव हुआ है। किन्तु नित्य निष्क्रिय, निर्धर्मक
पुरुषमें कोई भी विकार नहीं होता। सन्निधिमात्रको ही विकार स्वीकार करनेपर, सन्निधिकी
नित्यताके कारण नित्य सृष्टिका और मोक्षके अभावका प्रसङ्ग होगा। विशेषतः पङ्गु और
अन्धा, दोनों ही चेतन हैं तथा चुम्बक और लोहा, दोनों ही जड़ हैं, इस कारण इन दो
दृष्टान्तोंमें विषमता दिखायी देती है॥७॥
अब गुणोंके उत्कर्ष तथा अपकर्षवशतः अङ्ग-अङ्गीभावके कारण जो विश्वकी सृष्टि हुई
है, ऐसे विचारका खण्डन कर रहे हैं-
(आठवाँ सूत्र)—जब गुणोंका अङ्गत्व ही अप्रमाणित हो रहा है, तब इस प्रकारका पक्ष
सङ्गत नहीं हो सकता।
सत्त्वादि गुणोंकी साम्याभावसे अवस्थितिका नाम ही 'प्रधानावस्था' है। इस अवस्थामें गुणोंका
निरपेक्षस्वरूप होनेके कारण एक गुण दूसरेका अङ्गी है, ऐसा प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि तीन
गुणोंसे एक को अङ्गी माननेसे, अन्य दो गुणोंकी उसके साथ समता होनेके कारण गुणि-भावकी
असम्भावना है। गुणोंका परस्परमें अङ्ग-अङ्गीभाव कभी भी सिद्ध नहीं होता। ईश्वरको अथवा
कालको भी उक्त अङ्ग-अङ्गीभावका कर्त्ता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसे कोई भी स्वीकार
नहीं करता। कपिलने ही कहा है—'मुक्त और बद्ध, इन दोनोंमेंसे एकके अभावके कारण अर्थात्
प्रमाणके अभावके कारण ईश्वरसिद्धि नहीं होती।' दिशाएँ और काल आकाशादिसे ही उत्पन्न
होते हैं,—पुरुष उनके कर्त्ता नहीं हैं, क्योंकि वे कर्तृत्व-विषयमें सम्पूर्ण उदासीन हैं। गुण-वैषम्य
भी सृष्टिका कारण नहीं है, क्योंकि कारणके इस प्रकार अभाव होनेपर प्रति सृष्टिमें ही वे
गुणसमूह विषमताको प्राप्त करनेपर भी आदिसृष्टिमें वैषम्य प्राप्त नहीं कर सकते॥८॥
यदि कहें कि कार्यके अनुरोधसे गुणोंमें यह विचित्र-स्वभाव है, इस प्रकार अनुमान करनेपर
उसमें पूर्वोक्त दोषोंकी सम्भावना नहीं होगी, तो इसके उत्तरमें कह रहे हैं,-
(नवम सूत्र)—इस प्रकारके अनुमानमें भी जड़की स्वतःप्रवृत्ति नहीं है अर्थात् गुणोंको उस
प्रकार विचित्रशक्तियुक्त अनुमान करनेसे भी दोषका निस्तार नहीं होता है। क्योंकि गुण तो
अचेतन हैं अर्थात् उनमें 'यह मैं हूँ और मैं इस प्रकार सृष्टि कर रहा हूँ', इस प्रकारके
विचारका ही अभाव देखा जाता है। ज्ञानशून्य जड़पदार्थोंसे कभी भी सृष्टि सम्भव नहीं है।
ईंट, लकड़ी आदि अचेतन वस्तुएँ जिस प्रकार चेतनके अधिष्ठानके बिना कार्य नहीं कर
छठा अध्याय | ३४१