श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/२३१-२३५ ]
अनुभाष्य-वृन्दावनमें वैष्णवोंके आदेशसे श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका मूल सूत्र-श्रीनित्यानन्द
प्रभुका कृपा-आदेश है। आदिलीला ५/१९६ द्रष्टव्य है॥ २३१॥
आपणार कथा लिखि निर्लज्ज हइया।
नित्यानन्द-गुणे लेखाय उन्मत्त करिया॥ २३३॥
नित्यानन्द-प्रभुर गुण-महिमा अपार।
‘सहस्रवदने’ शेष नाहि पाय याँर॥ २३४॥
अनुवाद-मैंने निर्लज्ज होकर अपनी बातें लिखीं हैं। वास्तवमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके गुणोंने
ही उन्मत्त करके मुझसे यह लिखवाया है। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी गुण-महिमा अपार है। स्वयं
शेष भी अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर पाते हैं॥ २३३-२३४॥
अनुभाष्य-मध्यलीला २१/१०,१२ संख्या और भागवत २/७/४१ एवं १०/१४/७ श्लोक
द्रष्टव्य हैं॥ २३४॥
इति अनुभाष्ये पञ्चम परिच्छेद।
पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ २३५॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे श्रीनित्यानन्द-तत्त्वनिरूपणं नाम पञ्चम-परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस
श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ २३५॥
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व निरूपण नामक पाँचवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
पाँचवाँ अध्याय | ३२९