श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५/२११-२१९
अनुवाद-मैंने जो श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्दके दर्शन किये, उस विषयको मैं कहने
योग्य नहीं हूँ। श्रीमदनगोपाल वृन्दावनके मुख्य विग्रह हैं और वे रासविलासी साक्षात्
व्रजेन्द्रकुमार हैं। वे श्रीराधा-ललिताके साथ रास विलास करते हैं और वे मन्मथ-मन्मथ अर्थात्
कामदेवके मनको भी मथनेवाले रूपमें प्रकाशित होते हैं॥२११-२१३॥
श्रीमद्भागवत (१०/३२/२)-
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः॥२१४॥
अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट
हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और
शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले
साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था॥२१४॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरासलीलामें गोपियोंके विच्छेद-विलापके बाद सहसा पीताम्बर,
वनमाला और मुखकमलपर मन्द मुस्कान धारण किये हुए, साक्षात् मदनमोहन उनके बीचमें
आविर्भूत हुए॥२१४॥
अनुभाष्य-रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेके कारण श्रीकृष्णके दर्शनकी
अभिलाषी गोपियोंके अधीर होकर रोनेपर उनके सामने गोविन्ददेव आविर्भूत हुए-
तासां (दुःखपरिखिन्नानां गोपीनां मध्ये) स्मयमानमुखाम्बुजः (स्मयमानं मुखाम्बुजं यस्य सः) पीताम्बरधरः
(पीतवसनधारी) स्रग्वी (माल्यवान्) साक्षात् मन्मथमन्मथः (कामदेव-मोहनमूर्तिः) शौरिः (कृष्ण) आविर्भूत्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१४॥
स्वमाधुर्ये लोकेर मन करे आकर्षण।
दुइ पाशे राधा ललिता करेन सेवन॥२१५॥
नित्यानन्द-दया मोरे ताँरे देखाइल।
श्रीराधा-मदनमोहन प्रभु करि' दिल॥२१६॥
अनुवाद-अपने दोनों ओर स्थित राधा और ललिताके द्वारा सेवित, वे अपने माधुर्यसे
सभीके मनको आकर्षित करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी दयाने मुझे उनका दर्शन करवाया और
श्रीराधा-मदनमोहनको मेरे प्रभु रूपमें प्रदान किया॥२१५-२१६॥
श्रीनित्यानन्द-कृपासे श्रीगोविन्द-सेवा-लाभ :-
मो-अधमे दिल श्रीगोविन्द-दरशन।
करिबार कथा नहे अकथ्य-कथन॥२१७॥
कल्पवृक्षतले सखीसेवित श्रीराधागोविन्द :-
वृन्दावने योगपीठे कल्पतरु-वने।
रत्नमण्डप, ताहे रत्नसिंहासने॥२१८॥
श्रीगोविन्द बसियाछेन व्रजेन्द्रनन्दन।
माधुर्य प्रकाशि' करेन जगत् मोहन॥२१९॥
३२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत