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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

[ ५/८४-८६
षोड़शकलं—लघुभागवतामृतमें पुरुष वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ६८) में—
“श्रीर्भूःकीर्त्तिरिला लीला कान्तिर्विद्येति सप्तकम्।
विमलाद्या नवेत्येता मुख्याः षोड़श शक्तयः ॥”
१) श्री, २) भू, ३) लीला, ४) कान्ति, ५) कीर्त्ति, ६) तुष्टि, ७) गीः, ८) पुष्टि, ९)
सत्या, १०) ज्ञानाज्ञाना, ११) जया उत्कर्षिणी, १२) विमला, १३) योगमाया, १४) प्रह्वी, १५)
ईशाना और १६) अनुग्रहा—वैकुण्ठमें ये सोलह शक्तियाँ विद्यमान हैं।
इस श्लोककी श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें—
“विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा तथैव च। प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहेति नव स्मृताः॥”
अर्थात् “विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—ये
नौ शक्तियाँ शास्त्रोंमें स्मरण की गयी हैं।”
भगवत्सन्दर्भमें (११७ संख्या)—
“श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्त्या तुष्ट्येळयोर्जया। विद्ययाविद्यया शक्त्या मायाया च निषेवितम्॥
सन्धिनीसम्वित्‌ह्लादिनीभक्त्याधारशक्तिमूर्त्तिविमलाजया योगा प्रह्वीशानानुग्रहादयश्च ज्ञेयाः। ततः श्रियेत्यादौ शक्तिवृत्तिरूपया
मायावृत्तिरूपया चेति सर्वत्र ज्ञेयम्। तत्र पूर्वस्याः भेदः श्रीर्भागवतीसम्पत्। उत्तरस्याः भेदः श्रीर्जागती-सम्पत्।
××तत्र इला भूस्तदुपलक्षणत्वेन लीला अपि। अत्र सन्धिन्त्येव सत्या, जयैवोत्कर्षिणी, योगैव योगमाया, सम्विदेव
ज्ञानाज्ञानशक्तिः शुद्धसत्त्वञ्चेति ज्ञेयम्; प्रह्वी विचित्रानन्तसामर्थ्यहेतुः, ईशाना सर्वाधिकारिता-शक्तिहेतुरिति भेदः।”
अर्थात् श्री, पुष्टि, गीः, कान्ति, कीर्त्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा, विद्या, अविद्या, शक्ति और
मायाके द्वारा भगवान् सेवित होते हैं। (‘च’ शब्दसे) सन्धिनी, सम्वित्, ह्लादिनी, भक्त्याधारशक्ति,
मूर्त्ति, विमला, जया, योगा, प्रह्वी, ईशाना, अनुग्रह आदिको समझना होगा। उक्त ‘श्री’ आदिसे
(अन्तरङ्गा) शक्तिवृत्तिरूपा और (बहिरङ्गा) मायावृत्तिरूपा नामक दो प्रकारकी वृत्तियोंको सर्वत्र
जानना होगा। इनमेंसे जो प्रथम अर्थात् शक्तिवृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—भागवती सम्पद् है।
और जो दूसरी अर्थात् मायावृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—जागती सम्पद् है। उनमें इला भूशक्ति
है और उपलक्षणमें लीलाशक्ति भी है। यहाँपर सन्धिनी ही सत्या, जया ही उत्कर्षिणी, योग
ही योगमाया और सम्वित् ही ज्ञानाज्ञानशक्ति एवं शुद्धसत्त्व है। प्रह्वी विचित्र और अनन्त
सामर्थ्यका कारण है। ईशाना सर्वाधिकारिता शक्तिका कारण है।
श्रीमद्भागवतके गौड़ीयभाष्यके अन्तर्गत श्रीमध्वकृत भागवत तात्पर्य और तथ्य द्रष्टव्य
हैं॥८४॥
सबके आश्रय और अन्तर्यामी :—
यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो, ताँहाते संसार।
अन्तरात्मा-रूपे तिँहो जगत्-आधार॥८५॥
ईक्षणादिके द्वारा मायासे सम्बन्ध होनेपर भी वस्तुतः विष्णु मायातीत :—
प्रकृति सहिते ताँर उभय सम्बन्ध।
तथापि प्रकृति-सह नाहि स्पर्शगन्ध॥८६॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८५-८६॥
२९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत