श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५/५०-५६
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥
कारणजलका वर्णन :-
वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ज्योतिर्मय धाम।
ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' नाम॥५१॥
परव्योमकी सीमापर कारण-सागर :-
वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जलनिधि।
अनन्त, अपार-तार नाहिक अवधि॥५२॥
अनुवाद-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय ब्रह्मधाम है और उसके बाहर 'कारण-समुद्र' है।
वैकुण्ठके बाहर एक अनन्त-अपार जलराशि है, जिसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं
है॥५१-५२॥
अनुभाष्य-'जलनिधि'-'विरजा' या 'कारणजल' (मध्यलीला १५/१७५-१७६, मध्यलीला
२०/२६८-२६९ और मध्यलीला २१/५२ द्रष्टव्य हैं)॥५२॥
वैकुण्ठमें स्थित महाभूतादि मायातीत :-
वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल चिन्मय।
मायिक भूतेर तथि जन्म नाहि हय॥५३॥
अनुवाद-वैकुण्ठके पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशादि शुद्धसत्त्वसे उत्पन्न होनेके कारण
पूर्ण रूपसे चिन्मय है, उसमें मायाके पञ्चमहाभूतोंका लेशमात्र भी नहीं है॥५३॥
अनुभाष्य-'मायिक भूत' अर्थात् पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत॥५३॥
कारणजलकी चिन्मयता :-
चिन्मय-जल सेइ परम-'कारण'।
यार एक कणा गङ्गा पतितपावन॥५४॥
अनुवाद-कारण-समुद्र इस जगत्का मूल कारण है और उसका जल पूर्ण चिन्मय है।
उसकी एक बूँद स्वरूप गङ्गा हैं, जो पतितोंको पवित्र करनेवाली हैं॥५४॥
अनुभाष्य-'कारण'-माया-सम्बन्धयुक्त उपाधि होनेपर भी वस्तुतः मिश्र रज-तमसे शून्य या
सत्त्वमय है। आदिलीला २/५३ द्रष्टव्य है॥५४॥
परव्योममें स्थित सङ्कर्षण ही एकांशसे कारणोदशायी :-
सेइ त' कारणार्णवे सेइ सङ्कर्षण।
आपनार एक अंश करेन शयन॥५५॥
अनुवाद-उस कारण समुद्रमें वे सङ्कर्षण अपने एक अंश कारणोदशायी विष्णु रूपमें शयन
करते हैं॥५५॥
वे ही आदि पुरुषावतार और मायाके ईक्षणकर्त्ता :-
महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो जगत्-कारण।
आद्य-अवतार करे मायार दरशन॥५६॥
२८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत