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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

[ ५/४१-४८

विश्रुतः। यः प्रद्युम्नो बुद्धितत्त्वे बुद्धिमद्भिरुपास्यते ॥ स्तवत्या च श्रिया देव्या निषेव्यत इलावृते। शुद्धजाम्बूनदप्रख्यः
क्वचिन्नोलघनच्छविः॥ निदानं विश्वसर्गस्य कामन्यस्तनिजांशकः। विधेः प्रजापतीनाञ्च रागिणाञ्च स्मरस्य च।
अन्तर्यामित्वमापन्नः सर्गं सम्यक् करोत्यसौ॥ व्यूहस्तर्योऽनिरुद्धाख्यो विलासो यस्य शस्यते। योऽनिरुद्धो मनस्तत्त्वे
मनीषिभिरुपास्यते॥ नीलजीमूतसङ्काशो विश्वरक्षणतत्परः। धर्मस्यायं मनूनाञ्च देवानां भूभुजां तथा। अन्तर्यामित्वमास्थाय
कुरुते जगतः स्थितिम्॥ मोक्षधर्मे तु मनसः स्यात् प्रद्युम्नोऽधिदैवतम्। अनिरुद्धस्त्वहङ्कारस्येति तत्रैव कीर्त्तितम्॥
सर्वेषां पञ्चरात्राणामप्येषा प्रक्रिया मता। पाद्मे तु परमव्योम्नः पूर्वाद्ये दिक्‌चतुष्टये। वासुदेवादयो व्यूहश्चत्वारः कथिता
क्रमात्॥"
“परव्योम-महावैकुण्ठनाथ नारायणके ‘महावस्थ’ नामक विख्यात चतुर्व्यूहमें ये वासुदेव
‘आदिव्यूह’ हैं और चित्तके उपास्य हैं। इसलिये ये चित्तके अधिष्ठातृ देवता हैं और
विशुद्ध-सत्त्वमें अधिष्ठित हैं। (भाः ४/३/२३) श्रीसङ्कर्षण इनके स्वांश अर्थात् विलास हैं।
सङ्कर्षणको ‘द्वितीयव्यूह’ और सभी जीवोंके प्रादुर्भावका स्रोत होनेके कारण उन्हें ‘जीव’ भी कहा
जाता है। असंख्य शारदीय पूर्ण-चन्द्रमाओंकी उज्ज्वल किरणोंसे भी सुमधुर उनकी कान्ति है।
वे अहङ्कारतत्त्वके उपास्य हैं; उन्होंने अनन्तदेवमें अपनी आधारशक्ति स्थापित की है और वे
कामदेवको भस्म करनेवाले रुद्र और अधर्म, अहि (सर्प), अन्तक (मृत्यु) एवं असुरोंके
अन्तर्यामी रूपमें रहकर जगत्के संहार कार्यका सम्पादन करते हैं। उन्हीं सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति
प्रद्युम्न तीसरा व्यूह हैं। बुद्धिमान लोग बुद्धितत्त्वसे प्रद्युम्नकी उपासना करते हैं। लक्ष्मीदेवी
इलावृतवर्षमें उनका गुणगान करते-करते सेवा करती हैं। कहीं पिघले स्वर्णकी भाँति, तो कहीं
नवीन-नील मेघकी भाँति उनकी अङ्गकान्ति है। वे विश्वसृष्टिका मूल कारण हैं और उन्होंने
अपनी सृष्टि करनेकी शक्ति कामदेवमें निहित की है। वे विधाता हैं और सभी प्रजापतियों,
विषयोंमें अनुरक्त देव-मानवादि प्राणियों एवं कन्दर्पके अन्तर्यामी रूपमें सृष्टि कार्यका सम्पादन
करते हैं। चौथे व्यूह अनिरुद्ध सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति हैं। मनीषीगण मनःतत्त्वमें इन अनिरुद्धकी
उपासना करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति नीलमेघके सदृश है। वे विश्वके पालनमें सदा तत्पर
हैं। वे धर्म, मनु, देवता और राजाओंके अन्तर्यामी रूपमें जगत्का पालन करते है। मोक्षधर्ममें
प्रद्युम्नको मनका अधिदेवता और अनिरुद्धको अहङ्कारका अधिदेवता कहा गया है, परन्तु
चतुर्व्यूहके विषयमें पूर्वोक्त वाक्य (अर्थात् प्रद्युम्न बुद्धिके और अनिरुद्ध मनके अधिदेवता, यह)
पूर्ण रूपसे पञ्चरात्र-सम्मत है।”
भगवान्‌का विलास और अचिन्त्यशक्तिके सम्बन्धमें लघुभागवतामृतमें (४४-४६ संख्या) —
“नन्विदं श्रूयते शास्त्रे महावाराह-वाक्यतः। 'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः। हानोपादानरहिता
नैव प्रकृतिजाः क्वचित्॥ परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः। सर्वे सर्वगुणैः पूर्णा सर्वदोषविवर्जिताः ॥ इति।
किञ्च श्रीनारद-पञ्चरात्रे- 'मणैर्यथा विभागेन नील-पीतादिभिर्युतः। रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात् तथाच्युतः ॥' इति।
तस्मात् कथं तारतम्यं तेषां व्याख्यायते त्वया॥ अत्रोच्यते—'एकत्वञ्च पृथकत्वञ्च तथांशत्वमृतांशता। तस्मिन्नेकत्र
नायुक्तमचिन्त्यानन्तशक्तितः ॥' तत्रैकत्वेऽपि पृथक्प्रकाशता, यथा- (भाः १०/६९/२) 'चित्रं वतैनदेकेन वपुषा
युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥' इति। पृथक्त्वेऽप्योकरूपतापत्तिः, यथा पाद्मे- 'स देवो
बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः। एकीभूय पुनः शेते निर्दोषा हरिरादिकृत् ॥' इति। एकस्यैव अंशांशित्वं
विरुद्धशक्तित्वञ्च, यथा (भाः १०/४०/७) - 'यजन्ति त्वन्मायास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम्॥' इति। कौर्मे
च—'अस्थूलश्चाणुरूंश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः। अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः। ऐश्वर्योगाद् भगवान्

२७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत